सहिष्णुता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सहिष्णुता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

14 जून 2024

गार्बेज ट्रक (कूडा-वाहन)

कूडा-वाहन

एक दिन एक व्यक्ति टैक्सी से एअरपोर्ट जा रहा था।  टैक्सी वाला कुछ गुनगुनाते हुए बड़े मनोयोग से गाड़ी चला रहा था कि सहसा एक दूसरी कार, पार्किंग से निकल कर तेजी से रोड पर आ गयी। टैक्सी वाले ने तेजी से ब्रेक लगाया, गाड़ी स्किड करने लगी और मात्र एक -आध इंच भर से,  सामने वाली कार से भिड़ते -भिड़ते बची।

यात्री ने सोचा कि अब टैक्सी वाला उस कार वाले को भला -बुरा कहेगा …लेकिन इसके उलट सामने वाला ही पीछे मुड़ कर उसे गलियां देने लगा।  इसपर टैक्सी वाला नाराज़ होने की बजाये उसकी तरफ हाथ हिलाते हुए मुस्कुराने लगा, और धीरे -धीरे आगे बढ़ गया। यात्री ने आश्चर्य से पूछा “ तुमने ऐसा क्यों किया ? गलती तो उस कार वाले की थी ,उसकी वजह से तुम्हारी गाडी लड़ सकती थी और हम होस्पिटलाइज भी हो सकते थे!”

“सर जी ”, टैक्सी वाला बोला, “बहुत से लोग गार्बेज ट्रक की तरह होते हैं। वे बहुत सारा गार्बेज उठाये हुए चलते हैं, फ्रस्ट्रेटेड, निराशा से भरे हुए, हर किसी से नाराज़।  और जब गार्बेज बहुत ज्यादा हो जाता है, तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए उसे दूसरों पर फैकने का मौका खोजने लगते हैं। किन्तु जब ऐसा कोई व्यक्ति मुझे अपना शिकार बनाने की कोशिश करता हैं, तो मैं बस यूँही मुस्कुराकर हाथ हिलाते हुए उनसे दूरी बना लेता हूँ।

ऐसे किसी भी व्यक्ति से उनका गार्बेज नहीं लेना चाहिए, अगर ले लिया तो समझो हम भी उन्ही की तरह उसे इधर उधर फेंकने में लग जायेंगे। घर में, ऑफिस में, सड़कों पर …और माहौल गन्दा कर देंगे, दूषित कर देंगे। हमें इन गार्बेज ट्रक्स को, अपना दिन खराब करने का अवसर नहीं देना चाहिए। ऐसा न हो कि हम हर सुबह किसी अफ़सोस के साथ उठें। ज़िन्दगी बहुत छोटी है, इसलिए उनसे प्यार करो जो हमारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। किन्तु जो नहीं करते, उन्हें माफ़ कर दो।”

मित्रों, बहुत ही गम्भीराता से सोचने की बात है, हम सौद्देश्य ही कूडा वाहन से कूडा उफनवाते है। फिर उसे स्वीकारते है, उसे उठाए घुमते है और फिर यत्र तत्र बिखेरते चलते है।  ऐसा करने के पूर्व ही हमें, गार्बेज ट्रक की अवहेलना नहीं कर देनी चाहिए??? और सबसे बड़ी बात कि कहीं हम खुद गार्बेज ट्रक तो नहीं बन रहे ???

इस कहानी से सीख लेते हुए, हमें विषादग्रस्त व कुंठाग्रस्त लोगों को उत्प्रेरित करने से बचना चाहिए। स्वयं क्रोध कर उनसे उलझने की बजाए उन्हें माफ करने की आदत डालनी चाहिए। सहनशीलता, समता और सहिष्णुता वस्तुतः हमारे अपने व्यक्तित्व को ही स्वच्छ और शुद्ध रखने के अभिप्राय से है, न कि अपने ही गुण-गौरव अभिमान की वृद्धि के लिए। समाज में शिष्टाचार, समतायुक्त आचरण से ही प्रसार पाता है। और इसी आचरण से चारों ओर का वातावरण खुशनुमा और प्रफुल्लित बनता है।

26 जून 2013

सहिष्णुता

यह एक भ्रामक धारणा है कि भड़ास या क्रोध निस्तारण से तनाव मुक्ति मिलती है। उलट, क्रोध तो तनाव के अन्तहीन चक्र को जन्म देता है। क्योंकि भड़ास निकालने, आवेश अभिव्यक्त करने या क्रोध को मुक्त करने से प्रतिक्रियात्मक द्वेष ही पैदा होता है और द्वेष से तो वैर की परम्परा का ही सर्जन होता है। इस तरह प्रतिशोध की प्रतिपूर्ति के लिए व्यक्ति निरन्तर तनाव में रहता है। क्रोध का ईलाज आवेशों को मंद करके, क्रोध के शमन या दमन में ही है। क्षमा ही परमानेंट क्योर है। क्योंकि क्षमा ही वह शस्त्र है जो वैर के दुष्चक्र को खण्डित करता है। क्षमा के बाद किसी तरह के तनाव-बोझ को नहीं झेलना पड़ता। अर्थात् सहिष्णुता ही तनाव मुक्ति का उपाय है।

अहिंसा पर आम सोच बहुत ही सतही होती है। लोग गांधी के चिंतन, 'दूसरा गाल सामने करने' का परिहास करते है। वस्तुतः दूसरा गाल सामने करने का अभिप्राय है, धैर्यपूर्वक सहनशीलता से कोई ऐसा व्यवहार करना जिससे बदले की परम्परा प्रारम्भ होने से पहले ही थम जाय। ईट का जवाब पत्थर से देना तो तात्कालिक सरल और सहज है, किंतु निराकरण तो तब है जब हिंसा-प्रतिहिंसा की श्रंखला बनने से पूर्व ही तोड दी जाय। कईं लोगों के मानस में हिंसा और अहिंसा की अजीब अवधारणा होती है, वे सभी से हर हाल में अपने साथ तो अहिंसक व्यवहार की अपेक्षा रखते है, दूसरे किसी आक्रोशी को सहनशीलता का पाठ पढा लेते है, दूसरे लोगों के धैर्य सहित शिष्टाचार की भूरि भूरि प्रशंसा भी करते है। किन्तु अपने साथ पेश आती, जरा सी प्रतिकूलता का प्रतिक्रियात्मक हिंसा से ही जवाब देना उचित मानते है। सभी से सहिष्णु व्यवहार तो चाहते है, किन्तु अन्याय अत्याचार का जबाब तो त्वरित प्रतिहिंसा से ही देना उपयुक्त मानते है। हिंसा की प्रतिक्रिया हिंसा से न हो तो उसे कायरता मान बैठते है। अधैर्य से, सहिष्णुता एक ओर फैक कर, अतिशीघ्र क्रोध के अधीन हो जाते है और प्रतिहिंसा का दामन थाम लेते है। जबकि सबसे ज्यादा, उसी पल-परिस्थिति में क्षमा की आवश्यकता होती है। स्वार्थी सुध-बुध का आलम यह है कि यदि कोई उन्हें धैर्य की सलाह देकर, सहिष्णु बनने का आग्रह करे और अहिंसा अपनाने को प्रेरित करे तो उस सद्वचन में भी लोगों को आक्रमक वैचारिक हिंसा नजर आती है। ऐसे ही लोगों को क्षमा सदैव कायरता प्रतीत होती है। व प्रतिक्रियात्मक हिंसा ही उन्हें प्रथम व अन्तिम उपाय समझ आता है। यह सोच, प्रतिशोध शृंखला को जीर्ण शीर्ण नहीं होने देती और शान्ति का मनोरथ कभी भी पूर्ण नहीं हो पाता।

क्रोध प्रेरित द्वेष के साथ साथ, कभी-कभी ईर्ष्या जनित द्वेष भी पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों के  कारण बनते है। राग की भाँति द्वेष भी अंधा होता है। राग हमको प्रेमपात्र के अवगुणों की ओर से अंधा कर देता है और द्वेष, अप्रिय पात्र के गुणों की ओर से। इसलिए प्रतिहिंसा न तो अन्याय अत्याचार रोकने का साधन है न प्रतिशोध और द्वेष के निवारण का समुचित उपाय। प्रत्येक सदाचरण कठिन ही होता है, अहिंसा और क्षमा भी कठिन राजमार्ग है, किसी भी परिस्थिति में समतावान व धैर्यवान ही इस महामार्ग पर चल पाते है। 'मन की शान्ति' तो निश्चित ही क्षमावान-सहिष्णु लोगों को ही प्राप्त होती है और वे ही इसके अधिकारी भी है।

सम्बंधित अन्य सूत्र…
  1. क्रोध विकार
  2. क्रोध कषाय
  3. सद्भाव
  4. क्षमा-सूत्र
  5. बोध कथा : समता की धोबी पछाड़
  6. समता
  7. बोध कथा : सहन-शक्ति
  8. क्षमा, क्षांति

7 जून 2013

नम्रशीलता

जीवन के आखिरी क्षणों में एक साधु ने अपने शिष्यों को पास बुलाया। जब सब उनके पास आ गए, तब उन्होंने अपना पोपला मुंह पूरा खोल दिया और बोले-"देखो, मेरे मुंह में कितने दांत बच गए हैं?" शिष्य एक स्वर में बोल उठे -"महाराज आपका तो एक भी दांत शेष नहीं बचा।" साधु बोले-"देखो, मेरी जीभ तो बची हुई है।" सबने उत्तर दिया-"हां, आपकी जीभ अवश्य बची हुई है।" इस पर सबने कहा-"पर यह हुआ कैसे?" मेरे जन्म के समय जीभ थी और आज मैं यह चोला छोड़ रहा हूं तो भी यह जीभ बची हुई है। ये दांत पीछे पैदा हुए, ये जीभ से पहले कैसे विदा हो गए? इसका क्या कारण है, कभी सोचा?"

शिष्यों ने उत्तर दिया-"हमें मालूम नहीं। महाराज, आप ही बतलाइए।" उस समय मृदु आवाज में संत ने समझाया- "यही रहस्य बताने के लिए मैंने तुम सबको इस बेला में बुलाया है। इस जीभ में माधुर्य था, मृदुता थी और खुद भी कोमल थी, इसलिए वह आज भी मेरे पास है, परंतु मेरे दांतों में शुरू से ही कठोरता थी, इसलिए वे पीछे आकर भी पहले खत्म हो गए। इसलिए दीर्घजीवी होना चाहते हो, तो कठोरता छोड़ो और विनम्रता सीखो।" एक शिष्य ने गुरू से इसका कोई दूसरा उदाहरण बताने को कहा। संत ने कहा-"क्या तुमने बेंत या बांस नहीं देखा है। आंधी भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, जबकि तनकर खड़े रहने वाले पेड़ धराशायी हो जाते हैं।" उनकी बात सुनकर शिष्यों को समझ में आ गया कि विनम्रता से काम बन जाता है।

नमे सो आम्बा-आमली, नमे से दाड़म दाख।

एरण्ड बेचारा क्या नमे, जिसकी ओछी शाख॥

3 जून 2013

क्षमा, क्षांति

क्षमा आत्मा का नैसर्गिक गुण है. यह आत्मा का स्वभाव है. जब हम विकारों से ग्रस्त हो जाते है तो स्वभाव से विभाव में चले जाते है. यह विभाव क्रोध, भय, द्वेष, एवं घृणा के विकार रूप में प्रकट होते है. जब इन विकारों को परास्त किया जाता है तो हमारी आत्मा में क्षमा का शांत झरना बहने लगता है.

क्रोध से क्रोध ही प्रज्वल्लित होता है. क्षमा के स्वभाव को आवृत करने वाले क्रोध को, पहले जीतना आवश्यक है. अक्रोध से क्रोध जीता जाता है. क्योंकि क्रोध का अभाव ही क्षमा है. अतः क्रोध को धैर्य एवं विवेक से उपशांत करके, क्षमा के स्वधर्म को प्राप्त करना चाहिए. बडा व्यक्ति या बडे दिल वाला कौन कहलाता है? वह जो सहन करना जानता है, जो क्षमा करना जानता है. क्षांति जो आत्मा का प्रथम और प्रधान धर्म है. क्षमा के लिए ”क्षांति” शब्द अधिक उपयुक्त है. क्षांति शब्द में क्षमा सहित सहिष्णुता, धैर्य, और तितिक्षा अंतर्निहित है.

क्षमा में लेश मात्र भी कायरता नहीं है. सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव व उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरूषार्थ हीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते. निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही प्रायः क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते है. यह अधीरों का, कठिन पुरूषार्थ से बचने का उपक्रम होता है. जबकि क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करता है. वस्तुतः आत्मा के मूल स्वभाव क्षमा पर छाये हुए क्रोध के आवरण को अनावृत करने के लिए, दृढ पुरूषार्थ, वीरता, निर्भयता, साहस, उदारता और दृढ मनोबल चाहिए, इसीलिए “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहा जाता है.

दान करने के लिए धन खर्चना पडता है, तप करने के लिए काया को कष्ट देना पडता है, ज्ञान पाने के लिए बुद्धि को कसना पडता है. किंतु क्षमा करने के लिए न धन-खर्च, न काय-कष्ट, न बुद्धि-श्रम लगता है. फिर भी क्षमा जैसे कठिन पुरूषार्थ युक्त गुण का आरोहण हो जाता है.

क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है. क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है. और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम व संतोष की प्रवृतियों को विकसित करती है.

क्षमापना से निम्न गुणों की प्राप्ति होती है-

1. चित्त में आह्लाद - मन वचन काय के योग से किए गए अपराधों की क्षमा माँगने से मन और आत्मा का बोझ हल्का हो जाता है. क्योंकि क्षमायाचना करना उदात्त भाव है. क्षमायाचक अपराध बोध से मुक्त हो जाता है परिणाम स्वरूप उसका चित्त प्रफुल्ल हो जाता है.

2. मैत्रीभाव ‌- क्षमापना में चित्त की निर्मलता ही आधारभूत है. क्षमायाचना से वैरभाव समाप्त होकर मैत्री भाव का उदय होता है. “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सद्भाव ही मैत्रीभाव की आधारभूमि है.

3. भावविशुद्धि – क्षमापना से विपरित भाव- क्रोध,वैर, कटुता, ईर्ष्या आदि समाप्त होते है और शुद्ध भाव सहिष्णुता, तितिक्षा, आत्मसंतोष, उदारता, करूणा, स्नेह, दया आदि उद्भूत होते है. क्रोध का वैकारिक विभाव हटते ही क्षमा का शुद्ध भाव अस्तित्व में आ जाता है.

4. निर्भयता – क्रोध, बैर, ईर्ष्या और प्रतिशोध में जीते हुए व्यक्ति भयग्रस्त ही रहता है. किंतु क्रोध निग्रह के बाद सहिष्णुता और क्षमाशीलता से व्यक्ति निर्भय हो जाता है. स्वयं तो अभय होता ही है साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त सत्व भूत प्राणियों और लोगों को अभय प्रदान करता है.

5. द्विपक्षीय शुभ आत्म परिणाम – क्रोध शमन और क्षमाभाव के संधान से द्विपक्षीय शुभ आत्मपरिणाम होते है. क्षमा से सामने वाला व्यक्ति भी निर्वेरता प्राप्त कर मैत्रीभाव का अनुभव करता है. प्रतिक्रिया में स्वयं भी क्षमा प्रदान कर हल्का महसुस करते हुए निर्भय महसुस करता है. क्षमायाचक साहसपूर्वक क्षमा करके अपने हृदय में निर्मलता, निश्चिंतता, निर्भयता और सहृदयता अनुभव करता है. अतः क्षमा करने वाले और प्राप्त करने वाले दोनो पक्षों को सौहार्द युक्त शांति का भाव स्थापित होता है.

क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है. जगत में शांति सौहार्द सहिष्णुता सहनशीलता और समता को प्रसारित करने का अमोघ उपाय है.

28 मई 2013

धुंध में उगता अहिंसा का सूरज

हत्या न करना, न सताना, दुख न देना अहिंसा का एक रूप है। यह अहिंसा की पूर्णता नहीं. उसका आचारात्मक पक्ष है। विचारात्मक अहिंसा इससे अधिक महत्वपूर्ण है। विचारों में उतर कर ही अहिंसा या हिंसा को सक्रिय होने का अवसर मिलता है. वैचारिक हिंसा अधिक भयावह है। उसके परिणाम अधिक घातक हैं. विचारों की शक्ति का थाह पाना बहुत मुश्किल है. जिन लोगों ने इसमें थोड़ा भी अवगाहन किया है, वे विचार चिकित्सा नाम से नई चिकित्सा विधि का प्रयोग कर रहे हैं। इस विधि में हिंसा, भय और निराशा जैसे नकारात्मक विचारों की कोई मूल्यवत्ता नहीं है। अहिंसा एकमात्र पॉजिटिव थिंकिंग पर खड़ी है. पॉजिटिव थिंकिंग एक अनेकांत की उर्वरा में ही पैदा हो सकती है। अनेकांत दृष्टि के बिना विश्व-शांति की कल्पना ही नहीं हो सकती।

शांति का दूसरा बड़ा कारण है- त्याग की चेतना के विकास का प्रशिक्षण. भोगवादी वृत्ति से हिंसा को प्रोत्साहन मिलता है। यदि व्यक्ति को शांति से जीना है तो उसे त्याग की महिमा को स्वीकार करना होगा, त्याग की चेतना का विकास करना होगा। हमारे पूज्य गुरुदेव आचार्य भिक्षु ने सब प्रकार के उपचारों से ऊपर उठकर साफ शब्दों में कहा- ‘त्याग धर्म है; भोग धर्म नहीं है. संयम धर्म है; असंयम धर्म नहीं है.’ यह वैचारिक आस्था व्यक्ति में अहिंसा की लौ प्रज्जवलित कर सकती है। बात विश्व-शांति की हो और विचारों में घोर अशांति व्याप्त हो तो शांति किस दरवाजे से भीतर प्रवेश करेगी? एक ओर शांति पर चर्चा, दूसरी ओर घोर प्रलयंकारी अणु अस्त्रों का निर्माण, क्या यह विसंगति नहीं है? ऐसी विसंगतियां तभी टूट सकेंगी, जब अणु अस्त्रों के प्रयोग पर नियंत्रण हो जाएगा। जिस प्रकार पानी मथने से घी नहीं मिलता, वैसे ही हिंसा से शांति नहीं होती। शांति के सारे रहस्य अहिंसा के पास हैं। अहिंसा से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, शस्त्र भी नहीं है।
- ‘कुहासे में उगता सूरज’ से आचार्य तुलसी 

25 मार्च 2013

अहिंसा के मायने


कई बार लोग अहिंसा की व्याख्या अपने-अपने मतलब के अनुसार करते हैं। पर अहिंसा का अर्थ कायर की तरह चुप बैठना नहीं है।

एक राज्य पर किसी दूर देश के विधर्मी शासक ने एक बार आक्रमण कर दिया। राजा ने अपने सेनापति को आदेश दिया कि सेना लेकर सीमा पर जाये और आक्रमणकारी का मुँहतोड़ उत्तर दे। सेनापति अहिंसावादी था। वह लड़ना नहीं चाहता था। पर राजा का आदेश लड़ने का था। अत: वह अपनी समस्या लेकर परामर्श करने के लिए भगवान बुध्द के पास गया। सेनापति ने कहा, ''युध्द हो पर शत्रु सेना के सैकड़ों सैनिक मारे जायेंगे, क्या यह हिंसा नहीं है ?'' ''हाँ, हिंसा तो है।'' भगवान बोले। ''पर यह बताओ, यदि हमारी सेना ने उनका मुकाबला न किया, तो क्या वे वापस अपने देश चले जायेंगे ?''

''नहीं, वापस तो नहीं जायेंगे।'' सेनापति ने कहा। ''अर्थात वे हमारे देश में निरपराध नागरिकों की हत्या करेंगे। फसल और सम्पत्ति को नष्ट करेंगे ?'' ''हाँ, यह तो होगा ही।'' सेनानायक बोला। ''तो क्या यह हिंसा नहीं होगी ? यदि तुम हिंसा के भय से चुप बैठे रहे, तब हमारे देश के नागरिक मारे जायेंगे। और इस हिंसा का पाप तुम्हारे सिर आयेगा।'' सेनापति ने सिर झुका लिया। ''क्या हमारी सेना आक्रमणकारियों को रोकने में सक्षम है ?'' भगवान ने आगे पूछा। ''जी हाँ। यदि उसे आदेश दिया जाये, तो वह हमलावरों को बुरी तरह मार भगायेगी।'' सेनापति का उत्तर था। ''ऐसी दशा में देश व प्रजा की रक्षा करना ही तुम्हारा परम कर्तव्य है,यही तुम्हारा प्रतिरक्षा धर्म है।'' स्पष्ट है कि अंहिसा का अर्थ कायरता नहीं है। अहिंसा का अर्थ है किसी दूसरे पर अत्याचार न करना। लेकिन यदि कोई हम पर आक्रमण और अत्याचार करे, तो वीरतापूर्वक उसके द्वारा की जाने वाली हिंसा का प्रतिरोध करना।
Enhanced by Zemanta

10 दिसंबर 2012

अहिंसा का आलोक

वे सभी व्यक्ति अहिंसा की शीतल छाया में विश्राम पाने के लिए उत्सुक रहते हैं, जो सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हैं. अहिंसा का क्षेत्र व्यापक है. यह सूर्य के प्रकाश की भांति मानव मात्र और उससे भी आगे प्राणी मात्र के लिए अपेक्षित है. इसके बिना शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की बात केवल कल्पना बनकर रह जाती है. अहिंसा का आलोक जीवन की अक्षय संपदा है. यह संपदा जिन्हें उपलब्ध हो जाती है, वे नए इतिहास का सृजन करते हैं. वे उन बंधी-बंधाई परंपराओं से दूर हट जाते हैं, जिनकी सीमाएं हिंसा से स्पृष्ट होती हैं. परिस्थितिवाद का बहाना बनाकर वे हिंसा को प्रश्रय नहीं दे सकते.

अहिंसा की चेतना विकसित होने के अनंतर ही व्यक्ति की मनोभूमिका विशद बन जाती है. वह किसी को कष्ट नहीं पहुंचा सकता. इसके विपरीत हिंसक व्यक्ति अपने हितों को विश्व-हित से अधिक मूल्य देता है. किंतु ऐसा व्यक्ति भी किसी को सताते समय स्वयं संतप्त हो जाता है. किसी को स्वायत्त बनाते समय उसकी अपनी स्वतंत्रता अपहृत हो जाती है.

किसी पर अनुशासन थोपते समय वह स्वयं अपनी स्वाधीनता खो देता है. इसीलिए हिंसक व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में संतुष्ट और समाहित नहीं रह सकता. उसकी हर प्रवृत्ति मं एक खिंचाव-सा रहता है. वह जिन क्षणों में हिंसा से गुजरता है, एक प्रकार के आवेश से बेभान हो जाता है. आवेश का उपशम होते ही वह पछताता है, रोता है और संताप से भर जाता है.

हिंसक व्यक्ति जिस क्षण अहिंसा के अनुभाव से परिचित होता है, वह उसकी ठंडी छांह पाने के लिए मचल उठता है. उसका मन बेचैन हो जाता है. फिर भी पूर्वोपात्त संस्कारों का अस्तित्व उसे बार-बार हिंसा की ओर धकेलता है. ये संस्कार जब सर्वथा क्षीण हो जाते हैं तब ही व्यक्ति अहिंसा के अनुत्तर पथ में पदन्यास करता है और स्वयं उससे संरक्षित होता हुआ अहिंसा का संरक्षक बन जाता है.

अहिंसा के संरक्षक इस संसार के पथ-दर्शक बनते हैं और हिंसा, भय, संत्रास, अनिश्चय, संदेह तथा असंतोष की अरण्यानी में भटके हुए प्राणियों का उद्धार करते हैं.

-आचार्य तुलसी (राजपथ की खोज)

2 अक्टूबर 2012

अहिंसा की सार्वभौम शक्ति

आज वैश्विक अहिंसा दिवस है, भारत के लिए यह गौरव का प्रसंग है कि विश्व को अहिंसा की इस अवधारणा का अर्पण किया। 15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

भारत में आदिकाल से, कुछ अपवादों को छोड़कर अहिंसा के प्रयोग प्रायः व्यक्तिगत ही हुए है। किन्तु महात्मा गांधी ने अहिंसा का मंथन कर अनेक प्रयोग द्वारा अहिंसा को सामूहिक साध्य बनाया। अतएव विश्व को अहिंसा की सामुहिक प्रस्थापना के प्रेरक महात्मा गांधी है। निष्ठापूर्वक सामूहिक प्रयोग ही अहिंसा की गति में तीव्रता ला सकते है और उसे अधिक क्षमतावान बना सकते है। महात्मा गांधी के इस अवदान के लिए समग्र विश्व ॠणी रहेगा।

मार-काट जबरदस्ती दंड या अत्यधिक दबाव द्वारा समाज में परिवर्तन का क्षणिक आभास आ सकता है परन्तु वास्तविक या स्थायी परिवर्तन नहीं आता। स्थायी परिवर्तन के लिए अहिंसा को ही माध्यम बनाना होगा। हिंसक मानसिकता में परदुख कातरता नहीं होती परिणाम स्वरूप हिंसकता शोषक बन जाती है। हिंसा पहले अन्याय के प्रतिकार का आवरण ओढ़ती है और हिंसा से शक्ति सामर्थ्य व सत्ता मिलते ही वह स्वयं अत्याचार और शोषण में बदल जाती है। परिणाम स्वरूप नए शोषित व असंतुष्ट पैदा होते है। और हिंसा-प्रतिहिंसा का एक दुष्चक्र चलायमान होता है। परिवार समाज देश और विश्व में यदि शांति के संदर्शन हो सकते है तो वह मात्र अहिंसा से ही।

वर्तमान युग में हिंसा के साधनो की प्रचुरता और तनाव उपार्जित अधैर्य नें हिंसा की सम्भावनाओं को अनेक गुना बढ़ा दिया है। हिंसा द्वारा हिंसा का उन्मूलन कर अहिंसा की प्रतिष्ठा सम्भव ही नहीं। स्याही से सने वस्त्र को स्याही से धोना बुद्धिमत्ता नहीं, स्याही के दाग पानी से ही धोए जा सकते है, ठीक उसी प्रकार हिंसा का प्रतिकार अहिंसा से ही किया जा सकता है। यदि कोई कहे कि हम हिंसा का प्रतिकार हिंसा से ही करेंगे तो यह दुराशा मात्र है।

कुछ लोगों की ऐसी धारणा बन गई है कि अहिंसा केवल धार्मिक क्षेत्र की वस्तु है, मगर यह भ्रांति है। अहिंसा का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। मानव जीवन के जितने भी क्षेत्र है, सभी अहिंसा की क्रिड़ा-भूमि है। धर्म, राजनीति, समाज, अर्थनीति, व्यापार, अध्यात्म, शिक्षा, स्वास्थ्य और विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में अहिंसा का अप्रतिहत प्रवेश है। उसके लिए न स्थान की कोई सीमा है और न काल की किसी परिधि से आबद्ध है। अहिंसा किन्तु परन्तु के विचलन से प्रभावित होते ही स्वच्छंद बनकर विपरित परिणामी हो जाती है।

जो लोग अहिंसा को कायरता का चिन्ह कहकर अहिंसात्मक प्रतिकार को अव्यवहार्य मानते है, उन्होने जिन्दगी की पोथी को अनुभव की आंखों से नहीं पढ़ा। वे अहिंसा की असीम शक्ति से अनभिज्ञ है और अहिंसा के स्वरूप को भी शायद नहीं समझते। क्या ईंट का जवाब पत्थर से देना या पद-पद पर संघर्ष करना ही शूर-वीरता का लक्षण है? अहिंसक प्रतिकार द्वारा दूसरे के हृदय पर विजय पाना ही शूर-वीरता है। हिंसा के मार्ग पर चलने वाले आखिर ऊब जाते है, थक जाते है और उससे हटने को तैयार हो जाते है। जिन्होने बड़े जोश के साथ लड़ाईयां लड़ी और कत्ले आम किया, उन्हे भी अन्त में सुलह करने को तैयार होना पडा। अतएव हिंसा का मार्ग राजमार्ग नहीं है, अहिंसा का मार्ग ही राजमार्ग और व्यवहार्य मार्ग है।

आज अहिंसा दिवस पर यह निश्चय करें कि- धैर्य की उर्वरक हृदय भूमि पर अहिंसा निष्कंटक फले-फूले।

14 सितंबर 2012

हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।

आज जगत में हिंसा और प्रतिहिंसा का बोलबाला है। इसका प्रमुख कारण है लोगों में अधैर्य, असहनशीलता और आक्रोश की बढ़ती दर। सुखी सम्पन्न बनने की प्रतिस्पर्धा हो या सुरक्षित जीवन यापन का संघर्ष, व्यक्ति प्रतिक्षण तनाव में जीता है। यह तनाव ही उसे आवेश और अधैर्य की ओर ले जाता है। संतुष्ट और सुखी जीवन, अहिंसक जीवन मूल्यों से ही उपार्जित किया जा सकता है। किन्तु व्यक्ति के सहनशीलता और सब्र की सोच तथा भाव परित्यक्त हो चुके होते है। अन्तत: सुख के सरल मार्ग को छोड व्यक्ति अनावश्यक संघर्ष को ही जीवट मान इठलाता है।

अन्याय का जवाब हिंसा से दिया जाना सहज सामान्य प्रवृत्ति है किन्तु निराकरण पूर्णतया निष्फल ही होता है। आवेश आक्रोश से हमारे अपने मित्र तक हमसे सहमत नहीं होते तो फिर जो अन्यायी है, अवरोधक है वे हमारे आवेश, आक्रोश व प्रतिहिंसा से कैसे सुधर सकते है। अधैर्य-असहनशीलता हमेशा आक्रोश को जन्म देती है और आक्रोश हिंसा को, हिंसा प्रतिशोध को, और प्रतिशोध सहित दो तरफा आतंक को, क्योंकि व्यक्ति अपने प्रति हिंसा के भय की प्रतिक्रिया में भी आतंक फैलाता है। प्रतिशोध और आतंक पुनः हिंसा को जन्म देते है। इस प्रकार हिंसा प्रतिहिंसा एक दुश्चक्र की तरह स्थापित हो जाती है।

मानव सहित जीव मात्र का उद्देश्य है सुखी व संतुष्ट बनना। किन्तु उसे पाने का मार्ग हमने उलटा अपना रखा है। यह असफलता पर समाप्त होने वाला मिथ्या मार्ग है, दूसरों का दमन कभी भी सुखी व संतुष्ट बनने का समाधानकारी मार्ग नहीं हो सकता। आक्रोश व प्रति-अन्याय निदान नहीं है। सुखी तो सभी बनना चाहते है लेकिन सभी को संदेह है कि दूसरे उसे सुखी व संतुष्ट नहीं बनने देंगे अतः सभी दूसरों को आतंकित कर अपने सुखों को सुरक्षित करने के मिथ्या प्रयत्न में लगे हुए है। यदि दमन ही करना है तो दूसरों का दमन नहीं अपनी वृतियों दमन करना होगा, अपने क्रोध, अहंकार, कपट, और लोभ का दमन कर क्षमा, नम्रता सरलता और संतोष को अपनाना होगा। समता, सहनशीलता, धैर्य और विवेक को स्थान देना होगा।

हमें अनुभव हो सकता है कि ऐसे जीवन मूल्य कहां सफल होते है, किन्तु सफलता के निहितार्थ तुच्छ से स्वतः उत्कृष्ट हो जाते है। सभी को यही लगता है कि अपनी ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा तो अपने लिए जरूरी साधन है किन्तु दूसरों की ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा हमारे सुखों का अतिक्रमण है। सही मार्ग तो यह है कि इस धारणा को बल प्रदान किया जाय कि दूसरे सुखी व संतुष्ट होंगे तो संतुष्ट लोग हमारे सुखों पर कभी अतिक्रमण नहीं करेंगे और सुख सभी के लिए सहज प्राप्य रहेंगे। अन्यथा जरा से सुख को लभ्य बनाने के संघर्ष में अनेक गुना प्रतिस्पर्धा अनेक गुना संघर्ष और उस सुख भोग से भी लम्बा काल संघर्ष में व्यर्थ हो जाएगा। उसके बाद सुख पाया भी (जो कि असम्भव होगा) तो उसमें आनन्द कहाँ शेष बचेगा?

इसलिए इस छोटे से जीवन को अनावश्यक संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, उठापटक में अपव्यय होने से बचाना होगा। उसका एक ही तरीका है संतोष में व्याप्त सुख को पहचानना और उसका आस्वादन करना। हिंसा प्रतिहिंसा के दुश्चक्र को समाप्त करना और अहिंसक जीवन मूल्यों को सार्थक सफलता के रूप में पहचानना होगा।

25 अगस्त 2012

हिंसा का बीज़

कस्बे में एक महात्मा थे। सत्संग करते और लोगों को धैर्य, अहिंसा, सहनशीलता, सन्तोष आदि के सदुपदेश देते। उनके पास सत्संग मे बहुत बड़ी संख्या में भक्त आने लगे। एक बार भक्तों ने कहा महात्मा जी आप कस्बे में अस्पताल, स्कूल आदि भी बनवाने की प्रेरणा दीजिए। महात्मा जी ने ऐसा ही किया। भक्तों के अवदान और परिश्रम से योजनाएं भी बन गई। योजनाओं में सुविधा के लिए भक्तों नें, कस्बे के नेता को सत्संग में बुलाने का निर्णय किया।

नेताजी सत्संग में पधारे और जनसुविधा के कार्यों की जी भरकर सराहना  की और दानदाताओं की प्रशंसा भी। किन्तु महात्मा जी की विशाल जनप्रियता देखकर, अन्दर ही अन्दर जल-भुन गए। महात्मा जी के संतोष और सहनशीलता के उपदेशों के कारण कस्बे में समस्याएं भी बहुत कम थी। परिणाम स्वरूप नेता जी के पास भीड कम ही लगती थी।

घर आकर नेताजी सोच में डूब गए। इतनी अधिक जनप्रियता मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होगी, अगर यह महात्मा अहिंसा आदि सदाचारों का प्रसार करता रहा। महात्मा की कीर्ती भी इतनी सुदृढ थी कि उसे बदनाम भी नहीं किया जा सकता था। नेता जी अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे।आचानक उसके दिमाग में एक जोरदार विचार कौंधा और निश्चिंत होकर आराम से सो गए।

प्रातः काल ही नेता जी पहूँच गए महात्मा जी के पास। थोडी ज्ञान ध्यान की बात करके नेताजी नें महात्मा जी से कहा आप एक रिवाल्वर का लायसंस ले लीजिए। एक हथियार आपके पास हमेशा रहना चाहिए। इतनी पब्लिक आती है पता नहीं कौन आपका शत्रु हो? आत्मरक्षा के लिए हथियार का पास होना बेहद जरूरी है।

महात्मा जी नें कहा, "बंधु! मेरा कौन शत्रु?  शान्ति और सदाचार की शिक्षा देते हुए भला  मेरा कौन अहित करना चाहेगा। मै स्वयं अहिंसा का उपदेश देता हूँ और अहिंसा में मानता भी हूँ।" नेता जी नें कहा, "इसमें कहाँ आपको कोई हिंसा करनी है। इसे तो आत्मरक्षा के लिए अपने पास रखना भर है। हथियार पास हो तो शत्रु को भय रहता है, यह तो केवल सावधानी भर है।" नेताजी ने छूटते ही कहा, "महात्मा जी, मैं आपकी अब एक नहीं सुनूंगा। आपको भले आपकी जान प्यारी न हो, हमें तो है। कल ही मैं आपको लायसंस शुदा हथियार भैंट करता हूँ।"

दूसरे ही दिन महात्मा जी के लिए चमकदार हथियार आ गया। महात्मा जी भी अब उसे सदैव अपने पास रखने लगे। सत्संग सभा में भी वह हथियार, महात्मा जी के दायी तरफ रखे ग्रंथ पर शान से सजा रहता। किन्तु अब पता नहीं, महाराज जब भी अहिंसा पर प्रवचन देते, शब्द तो वही थे किन्तु श्रोताओं पर प्रभाव नहीं छोडते थे। वे सदाचार पर चर्चा करते किन्तु लोग आपसी बातचित में ही रत रहते। दिन प्रतिदिन श्रोता कम होने लगे।

एक दिन तांत्रिकों का सताया, एक विक्षिप्त सा  युवक सभा में हो-हल्ला करने लगा। महाराज नें उसे शान्त रहने के लिए कहा। किन्तु टोकने पर उस युवक का आवेश और भी बढ़ गया और वह चीखा, “चुप तो तूँ रह पाखण्डी” इतना सुनना था कि महात्मा जी घोर अपमान से क्षुब्ध हो उठे। तत्क्षण क्रोधावेश में निकट रखा हथियार उठाया और हवाई फायर कर दिया। लोगों की जान हलक में अटक कर रह गई।

उसके बाद कस्बे में महात्मा जी का सत्संग वीरान हो गया और नेताजी की जनप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।

17 अगस्त 2012

आत्मरक्षा में की गई हिंसा, हिंसा नहीं होती ????

‘हिंसा’ चाहे कितने ही उचित कारणों से की जाय कहलाती ‘हिंसा’ ही है। उसका किसी भी काल, कारण, स्थिति, के कारण ‘अहिंसा’ में परिवर्तन नहीं हो जाता। वैसे तो प्रतिकार या आत्मरक्षा में हिंसा का हो जाना सम्भव है,  तब भी वह विवशता में की गई ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। ऐसी हिंसा के लाख अवश्यंभावी कारण जता कर भी उसे ‘अहिंसा’ रूप में स्थापित नहीं जा सकता। प्रतिरक्षात्मक हिंसा को भी सर्वसामान्य सहज बनाया भी नहीं जाना चाहिए, अन्यथा अनियंत्रित अराजकाता ही फैल जाएगी। इस तरह तो प्रतिरक्षा या प्रतिशोध को आगे कर प्रत्येक व्यक्ति हिंसा में रत रहने लगेगा और उसे अभिमान पूर्वक 'अहिंसा' कहने लगेगा।

विधि-नियमानुसार भी अभियोग में, आत्मरक्षार्थ हिंसा हो जाने पर मात्र अपराध की तीव्रता कम होती है, समूचा अपराध ही सुकृत्य में नहीं बदल जाता न ही उस कृत्य को अहिंसा स्वरूप स्वीकार किया जाता है। कानून किसी को भी दंडित कर देने की जनसामान्य को  अनुमति नहीं देता, चाहे दंड देना कितना भी न्यायसंगत हो। अदालती भाषा में इसे ‘कानून हाथ में लेना’ कहते है। अन्यथा लोग स्वयं न्यायाधीश बन, प्रतिरक्षार्थ एक दूसरे को दंडित ही करते ही रहेंगे। और बाकी जो बच जाय उन्हें प्रतिशोध में दंडित करेंगे। इस तरह तो हिंसा का ही राज स्थापित हो जाएगा। इसीलिए अत्याचार और अन्याय के बाद भी प्रतिशोध में दंडित करने का अधिकार अत्याचार भोगी को भी नहीं दिया गया है। हिंसक विचारधारा और हिंसा की यह व्यवस्था सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं होती।

इसका भी कारण है सभी तरह के कारणों कारकों पर समुचित विचार करने के बाद ही अपराध निश्चित किया जाता है। प्रतिरक्षा में हिंसा अपवाद स्वरूप है प्रतिरक्षात्मक हिंसा से पहले भी अन्य सभी विकल्पों पर विचार किया जाता है। यह सुनिश्चित करने के लिए ही  न्यायालय व्यवस्था होती है। अन्यथा सामन्य जन द्वारा तो जल्दबाजी आवेश क्रोध आदि वश निरपराधी की हिंसा हो सकती है। धैर्य, सहनशीलता या समता हमेशा विवेक को सक्रिय करने के उद्देश्य से ही होती है।

पालतू नेवले और माँ की वह बोध-कथा है जिसमें सोए बच्चे को बचाने के लिए नेवला सांप से लडता है और उसको मार देता है, घड़ा भरकर घर आते ही द्वार पर मां नेवले के मुँह में रक्त देखकर निर्णय कर लेती है कि इसने बच्चे को काट खाया है। आवेश में नेवले पर घड़ा गिराकर मार देती है किन्तु जब भीतर जाकर देखती है कि बच्चा तो सुख की निंद सो रहा है और पास ही साँप मरा पड़ा है। उसे होश आता है, नेवला अपराधी नहीं रक्षक था। अब पश्चाताप ही शेष था। हिंसा तो हो चुकी। नेवला जान से जा चुका।

इसीलिए न्यायालयों का अलिखित नियम होता है कि भले 100 अपराधी बच जाय, एक निरपराधी को सजा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि सुसंस्कृत मानव जानता है जीवन अमूल्य है। एक बार जान जाने के बाद किसी को जीवित नहीं किया जा सकता।

गौतम बुद्ध का एक दृष्टांत है सहनशीलता में निडरता के लिए भी और जीवन के मूल्य (अहिंसा) के लिए भी।

अंगुलिमाल नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उंगलियां काट लेता था और उनकी माला पहनता था। इसी से उसका यह नाम पड़ा था। आदमियों को लूट लेना, उनकी जान ले लेना, उसके बाएं हाथ का खेल था। लोग उससे डरते थे। उसका नाम सुनते ही उनके प्राण सूख जाते थे।

संयोग से एक बार भगवान बुद्ध उपदेश देते हुए उधर आ निकले। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि वह वहां से चले जायं। अंगुलिमाल ऐसा डाकू है, जो किसी के आगे नहीं झुकता।

बुद्ध ने लोगों की बात सुनी,पर उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वह बेधड़क वहां घूमने लगे।जब अंगुलिमाल को इसका पता चला तो वह झुंझलाकर बुद्ध के पास आया। वह उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन जब उसने बुद्ध को मुस्कराकर प्यार से उसका स्वागत करते देखा तो उसका पत्थर का दिल कुछ मुलायम हो गया।

बुद्ध ने उससे कहा, "क्यों भाई, सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड़ लाओगे?"

अंगुलिमाल के लिएयह काम क्या मुश्किल था! वह दौड़ कर गया और जरा-सी देर में पत्ते तोड़कर ले आया।

"बुद्ध ने कहा, अब एक काम करो। जहां से इन पत्तों को तोड़कर लाये हो, वहीं इन्हें लगा आओ।"

अंगुलिमाल बोला, "यह कैसे हो सकता?"

बुद्ध ने कहा, "भैया! जब जानते हो कि टूटा जुड़ता नहीं तो फिर तोड़ने का काम क्यों करते हो?"

इतना सुनते ही अंगुलिमाल को बोध हो गया और उसने सदैव के लिए उस हिंसा और आतंक को त्याग दिया।

सही भी है किसी को पुनः जीवन देने का सामर्थ्य नहीं तो आपको किसी का जीवन हरने का कोई अधिकार नहीं। आज फांसी की न्यायिक सजा का भी विरोध हो रहा है। कारण वही है एक तो सजा सुधार के वांछित परिणाम नहीं देती और दूसरा जीवन ले लेने के बाद तो कुछ भी शेष नहीं रहता न सजा न सुधार।

एक सामान्य सी सजा के भी असंख्य विपरित परिणाम होते है। ऐसे में चुकवश सजा यदि निरपराधी को दे दी जाय तो परिणाम और भी भयंकर हो सकते है। सम्भावित दुष्परिणामों के कारण अहिंसा का महत्व अनेक गुना बढ़ जाता है। किसी भी तरह की हिंसा के पिछे कितने ही उचित कारणों हो, हिंसा प्रतिशोध के एक अंतहीन चक्र को जन्म देती है। प्रतिरक्षा में भी जो सुरक्षा भाव निहित है उसका मूल उद्देश्य तो शान्तिपूर्ण जीवन ही है। जिस अंतहीन चक्र से अशान्ति और संताप  उत्पन्न हो और समाधान स्थिर न हो तो क्या लाभ?

प्रतिरक्षा में हिंसा हमेशा एक ‘विवशता’ होती है, यह विवशता भी गर्भित ही रहनी भी चाहिए। इस प्रकार की हिंसा का सामान्ययीकरण व सार्वजनिक करना हिंसा को प्रोत्साहन देना है। ऐसी हिंसा की संभावना एक अपवाद होती है। सभ्य मानवों में अन्य उपाय के न होने पर ही सम्भावनाएं बनती है। अतः विवशता की हिंसा को अनावश्यक रूप से जरूरी नियम की तरह प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। और न ही इसे ‘अहिंसा’ नाम देकर भ्रम मण्डित किया जाना चाहिए। यदि इस प्रकार की हिंसा का सेवन हो भी जाय तो निष्ठापूर्वक हिंसा को हिंसा ही कहना/मानना चाहिए उसे वक्रता से अहिंसा में नहीं खपाया जाना चाहिए।
  • हिंसा नाम भवेद् धर्मो न भूतो न भविष्यति।  (पूर्व मीमांसा) 
    अर्थात् :- हिंसा में धर्म माना जाए, ऐसा न कभी भूतकाल में था, न कभी भविष्य में होगा।


अन्य अहिंसा सूत्र......
हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।
हिंसा का बीज़
धुंध में उगता अहिंसा का सूरज
अहिंसा का आलोक
अहिंसा की सार्वभौम शक्ति
सहिष्णुता

23 मई 2011

समता


समता का अर्थ है मन की चंचलता को विश्राम, समान भाव को जाग्रत और दृष्टि को विकसित करें तो ‘मैं’ के सम्पूर्ण त्याग पर समभाव स्थिरता पाता है। समभाव जाग्रत होने का आशय है कि लाभ-हानि, यश-अपयश भी हमें प्रभावित न करे, क्योंकि कर्मविधान के अनुसार इस संसार के रंगमंच के यह विभिन्न परिवर्तनशील दृश्य है। हमें एक कलाकार की भांति विभिन्न भूमिकाओं को निभाना होता है। इन पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं है। कलाकार को हर भूमिका का निर्वहन तटस्थ भाव से करना होता है। संसार के प्रति इस भाव की सच्ची साधना ही समता है।

समता का पथ कभी भी सुगम नहीं होता, हमने सदैव इसे दुर्गम ही माना है। परन्तु क्या वास्तव में धैर्य और समता का पथ दुष्कर है? हमने एक बार किसी मानसिकता को विकसित कर लिया तो उसे बदलने में वक्त और श्रम लगता है। यदि किसी अच्छी वस्तु या व्यक्ति को हमने बुरा माननें की मानसिकता बना ली तो पुनः उसे अच्छा समझने की मानसिकता तैयार करने में समय लगता है। क्योंकि मन में एक विरोधाभास पैदा होता है,और प्रयत्नपूर्वक मन के विपरित जाकर ही हम अच्छी वस्तु को अच्छी समझ पाएंगे। तब हमें यथार्थ के दर्शन होंगे।

जीवन में कईं बार ऐसे मौके आते है जब हमें किसी कार्य की जल्दी होती है और इसी जल्दबाजी और आवेश में अक्सर कार्य बिगड़ते हुए देखे है। फिर भी क्यों हम धैर्य और समता भाव को विकसित नहीं करते। कईं ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सामने उपस्थित होते है जब आवेश पर नियंत्रण, सपेक्ष चिंतन और विवेक मंथन से कार्य सुनियोजित सफल होते है और प्रमाणित होता है कि समता में ही श्रेष्ठता है।

समता रस का पान सुखद होता है। समता जीवन की तपती हुई राहों में सघन छायादार वृक्ष है। जो ‘प्राप्त को पर्याप्त’ मानने लगता है, उसके स्वभाव में समता का गुण स्वतः स्फूरित होने लगता है। समता की साधना से सारे अन्तर्द्वन्द्व खत्म हो जाते है, क्लेश समाप्त हो जाते है। उसका समग्र चिंतन समता में एकात्म हो जाता है। चित्त में समाधि भाव आ जाता है।

2 सितंबर 2010

क्षमा-सूत्र

 
  • प्रतिशोध लेने का आनंद मात्र एक दिन का होता है, जबकि क्षमा करने का गौरव सदा बना रहता है।
  • सच्ची क्षमा समस्त ग्रंथियों को विदीर्ण करने का सामर्थ्य रखती है।
  • हर परिस्थिति में स्वयं को संयोजित संतुलित रखना भी क्षमा ही है।
  • क्षमा देने व क्षमा प्राप्त करने का सामर्थ्य उसी में है जो आत्म निरिक्षण कर सकता है
  • क्षमापना आत्म शुद्धि का प्रवाहमान अनुष्ठान है, सौम्यता, विनयसरलता, नम्रता शुद्ध आत्म में स्थापित होती है।

26 जुलाई 2010

सत्य-क्षमा

चलिये चल कर देखिये, सच का दामन थाम ।
साहस का यह काम है, किन्तु सुखद परिणाम ॥1॥

धर्म तत्व में मूढता, संसार तर्क में शूर ।
दुखदायक कारकों पर!, गारव और गरूर? ॥2॥

क्षमा भाव वरदान है, वैर भाव ही शाप ।
परोपकार बस पुण्य है, पर पीडन ही पाप ॥3॥

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...