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28 अगस्त 2012

सीख के उपहार

प्राचीन मिथिला देश में नरहन (सरसा) राज्य का भी बड़ा महत्व था। वहां का राजा बड़ा उदार और विद्वान् था। अपनी प्रजा के प्रति सदैव वात्सल्य भाव रखता था। प्रजा को वह सन्तान की तरह चाहता था, प्रजा भी उसे पिता की तरह मानती थी। किन्तु उसकी राजधानी में एक गरीब आदमी था, जो हर घड़ी राजा की आलोचना किया करता। राजा को इस बात की जानकरी थी किन्तु वे इस आलोचना के प्रति उपेक्षा भाव ही रखते।

एक दिन राजा ने इस बारे में गम्भीरता से सोचा। फिर अपने सेवक को 'गेहूं के आटे के बडे मटके', 'वस्त्र धोने का क्षार', 'गुड़ की ढेलियां'   बैलगाड़ी पर लाद कर उसके यहां भेजा।

राजा से उपहार में इन वस्तुओं को पाकर वह आदमी गर्व से फूल उठा। हो न हो, राजा ने ये वस्तुएँ उससे डर कर भेजी हैं। सामान को घर में रखकर वह अभिमान के साथ राजगुरु के पास पहुँचा। सारी बात बताकर बोला, "गुरुदेव! आप मुझसे हमेशा चुप रहने को कहा करते थे। यह देखिये, राजा मुझसे डरता है।"

राजगुरु बोले, "बलिहारी है तुम्हारी समझ की! अरे! राजा को अपने अपयश का डर नहीं है उसे मात्र यह चिंता है कि तुम्हारी आलोचनाओं पर विश्वास करके कोई अभिलाषी याचना से ही वंचित न रह जाय। राजा ने इन उपहारों द्वारा तुम्हे सार्थक सीख देने का प्रयास किया है। वह यह कि हर समय मात्र निंदा में ही रत न रहो, संतुष्ट रहो, शुभ-चिंतन करो और मधुर संभाषण भी कर लिया करो। आटे के यह मटके तुम्हारे पेट पुष्टि के साथ तुम्हारे संतुष्ट भाव के लिए हैं, क्षार तुम्हारे वस्त्रो के मैल दूर करने के साथ ही मन का मैल दूर करने के लिए है और गुड़ की ये ढेलियां तुम्हारी कड़ुवी जबान को मीठी बनाने के लिए हैं।"

1 जुलाई 2011

नीर क्षीर विवेक


प्रायः लोग कहते है कि हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। किसी को भला, और किसी को बुरा कहना राग-द्वेष है। सही भी है किसी से अतिशय राग अन्याय को न्योता देता है। और किसी की निंदा विद्वेष ही पैदा करती है।

दूसरों की निंदा बुरी बात है किन्तु, भले और बुरे सभी को एक ही तराजु पर, समतोल में तोलना मूर्खता है। उचित अनुचित में सम्यक भेद करना विवेकबुद्धि है।  भला-बुरा, हित-अहित और सत्यासत्य का विवेक रखकर,  बुरे, अहितकारी और असत्य का त्याग करना। भले, हितकारी और सत्य का आदर करना एक उपादेय आवश्यक गुण है। जो जैसा है, उसे वैसा ही, बिना किसी अतिश्योक्ति के निरूपित करना, कहीं से भी बुरा कर्म नहीं है।

एक व्यापारी को एक अपरिचित व्यक्ति के साथ लेन-देन व्यवहार करना था। रेफरन्स के लिए उसने,  अपने एक मित्र जो उसका भी परिचित था, को पूछा- “यह व्यक्ति कैसा है? इसके साथ लेन देन व्यवहार करनें में कोई हानि तो न होगी”

उस व्यापारी का मित्र सोचने लगा- मैं किसी के दोष क्यों बताऊँ? दोष दर्शाना तो निंदा है। मुझे तो उसकी प्रसंशा करनी चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए मित्र नें उस रेफर धूर्त की प्रशंसा ही कर दी। सच्चाई और ईमानदारी गुण, जो कि उसमें तनिक भी नही थे, व्यापारी के मित्र नें उस धूर्त के लिए गढ दिए। मित्र की बात पर विश्वास करके व्यापारी ने उस धूर्त व्यक्ति के साथ व्यवहार कर दिया और कुछ ही समय में धूर्त सब कुछ समेट कर गायब हो गया। ठगा सा व्यापारी अपने मित्र के पास जाकर कहनें लगा- “मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, तुमनें तो मुझे बरबाद ही कर दिया। तुम्हारे द्वारा की गई धूर्त की अनावश्यक प्रसंशा नें मुझे तो डूबा ही दिया। कहिए आपने मुझ निरपराध को क्यों धोखा दिया? तुम तो मेरे मित्र-परिचित थे, तुमनें उसकी यथार्थ वास्तविकता का गोपन कर, झूठी प्रसंशा क्यों की?”

प्रशंसक कहने लगा- “मैं आपका शत्रु नहीं, मित्र ही हूँ। और पक्का सज्जन भी हूँ। कोई भी भला व्यक्ति, कभी भी, किसी के दोष नहीं देखता, आलोचना नहीं करता। निंदा करना तो पाप है। मैनें तुम्हें हानि पहूँचाने के उद्देश्य से उसकी प्रशंसा नहीं की, बल्कि यह सोचकर कि, सज्ज्न व्यक्ति सदैव सभी में गुण ही देखता है, मैं भी क्यों बुरा देखन में जाउँ, इसलिए मैने सद्भाव से प्रशंसा की”

“तो क्या उसमें ईमानदारी और सच्चाई के गुण थे?”

-“हाँ, थे न! वह प्रथम ईमानदारी प्रदर्शीत करके ही तो अपनी प्रतिष्ठा जमाता था। वह  सच्चाई व ईमानदारी से साख जमा कर प्रभाव पैदा करता था। धौखा तो उसने मात्र अन्तिम दिन ही दिया जबकि लम्बी अवधी तक वह नैतिक ही तो बना रहा। अधिक काल के गुणों की उपेक्षा करके थोड़े व न्यूनकाल के दोषों को दिखाकर, निंदा करना पाप है। भला मैं ऐसा पाप क्यों करूँ?” उसने सफाई दी।

-“वाह! भाई वाह!, कमाल है तुम्हारा चिंतन और उत्कृष्ट है तुम्हारी गुणग्राहकता!! तुम्हारी इस सज्जनता नें, मेरी तो लुटिया ही डुबो दी। तुम्हारी गुणग्राहकता उस ठग का हथियार ही बन गई। उसकी ईमानदारी और सच्चाई जो प्रदर्शन मात्र थी, धूर्तता छुपाने का आवरण मात्र थी, और जिसे तुम अच्छे से जानते भी थे कि धूर्तता ही उसका मूल गुण था। मैने आज यह समझा कि धूर्तो से भी तुम्हारे जैसे सदभावी शुभचिंतक तो अधिक खतरनाक होते है”। उस पर अविश्वास करता तो शायद बच जाता, पर तुम्हारे पर आस्था नें तो मुझे कहीं का न रखा। व्यापारी अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया।

कोई वैद्य या डॉक्टर, यदि रोग को ही उजागर करना बुरा मानते हुए, रोग लक्षण जानते हुए भी रोग  उजागर न करे। रोग प्रकटन को हीन कृत्य माने, रोग से बचने के उपाय को सेहत की श्रेष्ठता का बखान माने, या फिर सेहत और रोग के लक्षणों को सम्भाव से ग्रहण करते हुए, स्वास्थय व रूग्णता दोनो को समान रूप से अच्छे है कहकर, रोग विश्लेषण ही न करे, तो निदान व ईलाज कैसे होगा? और आगे चलकर वह रोग कारकों से बचने का परामर्श न दे। कुपथ्य से परहेज का निर्देश न करे। उपचार हेतू कड़वी दवा न दे तो रोगी का रोग से पिंड छूटेगा कैसे? ऐसा करता हुआ डॉक्टर कर्तव्यनिष्ट सज्जन या मौत का सौदागर?

कोई भी समझदार कांटों को फूल नहीं कहता, विष को अमृत समझकर ग्रहण नहीं करता। गोबर और हलवे के प्रति समभाव रखकर कौन समाचरण करेगा? छोटा बालक यदि गोद में मल विसर्जन कर कपडे खराब कर दे तो कहना ही पडता है कि ‘उसने गंदा कर दिया’। न कि बच्चे के प्रति राग होते हुए भी यह कहेंगे कि- ‘उसने अच्छा किया’। इस प्रकार गंदा या बुरा कहना, बच्चे के प्रति द्वेष नहीं है। जिस प्रकार गंदे को गंदा और साफ को साफ व्यक्त करना ही व्यवहार है उसी प्रकार बुरे को बुरा कहना सम्यक् आचरण है। निंदा नहीं।

संसार में अनेक मत-मतान्तर है। उसमें से जो हमें अच्छा, उत्तम और सत्य लगे, उसे  अगर मानें, तो यह हमारा अन्य के साथ द्वेष नहीं है बल्कि विवेक है। विवेकपूर्वक हितकारी को अंगीकार करना और अहितकारी को छोडना ही चेतन के लिए कल्याणकारी है।

अनुकरणीय और अकरणीय में विवेक करना ही तो नीर क्षीर विवेक है।

18 मई 2011

आप क्या कहते हैं, धर्म लड़वाता है?


“यदि धर्म नहीं होता तो ये झगडे नहीं होते और मनुष्य शान्ति और प्रेम पूर्वक रहते। सारे झगड़ों की जड़ यह धर्म ही है और कोई नहीं। इसे ही पोषित करने में सारे संसाधन व्यय होते है, अन्यथा इन्सान आनंद और मौज में जीवन बिताए”। लोग अक्सर ऐसा कहते पाए जाते है।

जबकि धर्म तो शान्ति, समता, सरलता और सहनशीलता आदि सद्गुणों की शिक्षा देता है। धर्म लड़ाई झगडे करना नहीं सिखाता। फ़िर धार्मिकजनों में यह लड़ाई झगड़े और ईर्ष्या द्वेष क्यो? वास्तव में जो सच्चा धर्म होगा वह कभी भी लड़ाई-झगड़े नहीं कराएगा। जो मनुष्य मनुष्य में वैर-विरोध कराए, वह धर्म नहीं हो सकता। यह स्वीकार करते हुए भी उपरोक्त विचार समुचित नहीं लगता। कुछ ऐसे ‘धर्म’ नामधारी मत है जो विपक्षी से लड़ना, युद्ध करना, पशु-हत्या करना, ईश्वर की राह में लड़ने को प्रेरित करना आदि का विधान करते है किन्तु यहाँ हम उन पंथो की बात नहीं करते। क्योंकि उनका आत्म विशुद्धि से कुछ भी लेना देना नहीं है, उनका लक्ष्य भौतिकवाद है। वे तो राज्य, सम्पत्ति, अधिकार, अहंपूर्ति, भोगसाधन की प्राप्ति, उसकी रक्षा एवं वृद्धि की कामना लिए हुए है। मिथ्या मतों में अज्ञान ही प्रमुख कारण है। ऐसे मत दूसरे संयत धर्मानुयायीओं में भी विद्वेष फैलाने का कार्य करते है।

“फिर आत्म शुद्धि और सद्भाव धर्म वाले अनुयायी आपस में लड़ते झगड़ते क्यों है” प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि चिंतन किया जाय, तो स्पष्ठ ज्ञात होता है कि सभी झगड़े धर्म के कारण नहीं, बल्कि स्वयं मानव मन में रहे हुए कषाय कलुष एवं अहंकार के निमित होते है। वे धर्म को तो मात्र अपनी अहं-तुष्टि में हथियार बनाते है। उन्हें तो बस कारण बनाना है। यदि धर्म न होता तो वे और किसी अन्य पहचान प्रतिष्ठा को कारण बना देते। वैसे भी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक कारण से झगडे होते ही है। पर उन्हें संज्ञावाची बदनामी नहीं मिलती। संसार में करोड़ों कम्युनिस्ट, धर्म-निरपेक्ष, नास्तिक आदि हैं। क्या उनमें झगड़े नहीं होते? धर्म की अनुपस्थिति में भी वहां झगड़े क्यों? अधर्मी कम्युनिस्टों की ध्येय प्राप्ति का तो साधन ही हिंसा है। यदि उनके जीवन में धर्म का स्थान होता, तो वे हिंसा को आवश्यक साधन न मानते। यही कलुषित इरादों वाले अधर्मी-त्रय, धर्म को निशाना बनाकर अपना हित साधते है। क्योंकि उनके लिए निज स्वार्थ सर्वोपरी है, नीतिमान बने रहना उनके लिए धार्मिक बंधन है, रास्ते का कांटा है। ऐसे में जब इन्हें दिखावटी धार्मिक अहंकारी मिल जाते है, धर्म को निंदित कर उसे रास्ते से हटाने का इनका प्रयोजन सफल हो जाता है।

अतः इन सभी झगड़ों का मूल कारण मनुष्यों की अपनी मलीन वृति है। कोई किसी को नीचा दिखाने के लिए तो कोई अपनी इज्जत बचाने के लिए। कोई किसी की प्रतिष्ठा से जलकर जाल बुनता है तो कोई इस जालसाज़ी का आक्रमक प्रत्युत्तर देता है। कोई किसी का हक़ हड़पने को तत्पर होता है तो कोई उसे सबक़ सिखाने को आवेशित। अपने इन्ही दुर्गुणों के कारण लड़ता मानव, सद्गुणों की सीख देने वाले धर्म को ही आरोपित करता है। और अन्य साधारण से करवाता भी है।

धर्म एक ज्ञान है, कोई चेतन नहीं कि मानव को जबदस्ती पकड कर उनके दुर्गुणों, कषाय-कलुषिता को दूर कर दे और उनमें सद्गुण भर दे। या फिर आकर सफाई दे कि मानवीय लड़ाई में मेरा किंचित भी दोष नहीं।

आप क्या कहते हैं, धर्म लड़वाता है?

3 सितंबर 2010

घाघ कलुषित हृदय, क्रूरता संग सहभोज सहवास करने लगे है।

हमारे हृदय और अंतरमन इतने घाघ व नासूर बन चुके है कि सदाचरण आसानी से स्वीकार नहीं होता। न हमें रूचता है न पचता है। बडे सतर्क रहते है कि सदाचार-संस्कार अपना कर कहीं हम  बुद्दु, सरल, भोले न मान लिये जाय। चतुरता का आलम यह कि हम, 'यह सब तो बडी बडी ज्ञान की बातें', 'बाबाओं के प्रवचन', 'सत्संग' आदि शब्दों से मखौल उडाकर अपनी विद्वता बचाने का प्रयास करते है।

इन आदतों से हमारे हृदय इतने कलुषित हो गये है कि सुविधाभोग़ी पूर्वाग्रहरत हम क्रूरता के संग सहभोज सहवास करने लगे है। निर्दयता को चातुर्य कहकर आदर की नज़र से देखते है। भला ऐसे कठोर हृदय में सुकोमलता आये भी तो कैसे?

माया, छल, कपट व असत्य को हम दुर्गुण नहीं, आज के युग की आवश्यकता मान भुनाते है। आवेश,धूर्तता और प्रतिशोध ही आसान विकल्प नजर आते है।

अच्छे सदविचारों को स्वभाव में सम्मलित करना या अंगीकार करना बहुत ही कठिन होता है,क्योंकि जन्मों के या बरसों के सुविधाभोगी कुआचार हमारे व्यवहार में जडें जमायें होते है, वे आसानी से दूर नहीं हो जाते।

सदाचरण बस आध्यात्मिक बातें है, किताबी उपदेश भर है, पालन मुश्किल है,या कलयुग व जमाने के नाम पर सदाचरण को सिरे से खारिज नहीं किया जाना चाहिए। पालन कितना ही दुष्कर हो, सदविचारों पर किया गया क्षणिक चिन्तन भी कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यदि सदाचरण को 'अच्छा' मानने की प्रवृति मात्र भी हमारी मानसिकता में बनी रहे,  हमारी आशाओं की जीत है। दया के,करूणा के,अनुकंपा के और क्षमा के भावों को उत्तम जानना, उत्तम मानना व उत्तम कहना भी नितांत ही आवश्यक है। हमारे कोमल मनोभावों को हिंसा व क्रूरता से दूर रखना, प्रथम व प्रधान आवश्यकता है, कुछ देर से या शनै शनै ही सही हृदय की शुभ मानसिकता, अंततः क्रियान्वन में उतरती ही है।

निरंतर हृदय को निष्ठुरता से मुक्त रख, उसमें सद्विचारों को आवास देना नितांत ही जरूरी है।

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