या धार्मिक
विधानो के तौर पर
कितने ही………
- अच्छे अच्छे जीवन तरीके अपनालो,
- सुन्दर वेश, परिवेश, गणवेश धारण कर लो,
- पुरानी रिति, निति, परम्पराएं और प्रतीक अपना लो,
- आधा दिन भूखे रहो, और आधा दिन डट कर पेट भरो,
- या कुछ दिन भूखे रहो और अन्य सभी दिन खाद्य व्यर्थ करो,
- हिंसा करके दान करो, या बुरी कमाई से पुण्य करो,
- यात्रा करो, पहाड़ चढ़ो, नदी, पोख़रों,सोतों में नहाओ,
- भोगवाद को धर्मानुष्ठान बनालो
यदि आपका यह
सारा उपक्रम मानवता के हित में अंश भर भी योगदान नहीं करता,
समस्त प्रकृति
के जीवन हित में कुछ भी सहयोग नहीं करता,
तो व्यर्थ है,
निर्थक है। वह निश्चित ही धर्म नहीं है। मोहांध विकार है, पाखण्ड है।
