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13 मार्च 2013

अपने की चोट

एक सुनार था। उसकी दुकान से लगी हुई एक लुहार की भी दुकान थी। सुनार जब काम करता, उसकी दुकान से बहुत ही धीमी आवाज होती, पर जब लुहार काम करता तो उसकी दुकान से कानो के पर्दे फाड़ देने वाली आवाज सुनाई पड़ती।

एक दिन सोने का एक कण छिटककर लुहार की दुकान में आ गिरा। वहां उसकी भेंट लोहे के एक कण के साथ हुई। सोने के कण ने लोहे के कण से कहा, "भाई, हम दोनों का दु:ख समान है। हम दोनों को एक ही तरह आग में तपाया जाता है और समान रुप से हथौड़े की चोटें सहनी पड़ती हैं। मैं यह सब यातना चुपचाप सहन करता हूं, पर तुम इतना आक्रंद क्यों करते हो?"

"तुम्हारा कहना सही है, लेकिन तुम पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है, पर वह मेरा सगा भाई है।" लोहे के कण ने दु:ख भरे कातर स्वर में उत्तर दिया। फिर कुछ रुककर बोला, "पराये की अपेक्षा अपनों के द्वारा की गई चोट की पीड़ा अधिक असह्य होती है।"

"नास्ति राग समं दुःखम्" अपनो के प्रति अतिशय आसक्ति,  हमारे परितापों में वृद्धि का प्रमुख कारण है।


13 दिसंबर 2010

ब्लॉग मैं लिखता हूँ बस सुमार्ग के लिए


निरीह जीवहिंसा में जिनको शर्म नहीं है।
बदनीयत के  बहाने, सच्चा कर्म नहीं है।
भूख स्वाद की कुतर्की में मर्म नहीं है।
‘जो मिले वह खाओ’ सच्चा धर्म नहीं है।
मनों से अनुकम्पा कहीं नष्ट हो न जाए।
सभ्यता विकास आदिम भ्रष्ट हो न जाए।
इसलिये मैं लिखता दुर्भाव त्याग के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ बस सुमार्ग के लिए।
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