जीवदया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जीवदया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 मार्च 2015

मांस का मूल्य


मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि - "देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है?"

मंत्रि-परिषद्  तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।

उसने मुस्कराते हुए कहा, "राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।"

सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।

श्रेणिक ने उससे कहा, "तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारे में क्या मत है?"

प्रधान मंत्री ने कहा, "यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।"

रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था। अभय ने द्वार खटखटाया।

सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।

प्रधान मंत्री ने कहा,- "संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।"

यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!

उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।

श्रेणिक ने पूछा, "ये मुद्राएं किसलिए हैं?"

प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बो्ले,- " दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?"

जीवन का मूल्य अनन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सबको अपनी जान प्यारी होती है।
निरामिष पर
(Price Versus Cost of Meat - English translation of this article is available at Niramish English)

6 जनवरी 2012

निरामिष पर शाकाहार पहेली

निरामिष के सभी पाठकों व हितैषियों को नववर्ष 2012 की शुभकामनायें! पता ही नहीं चला कि आपसे बात करते-करते कब एक वर्ष बीत गया। शाकाहार, करुणा, और जीवदया मे आपकी रुचि के कारण ही इस अल्पकाल में निरामिष ब्लॉग ने इतनी प्रगति की। एक वर्ष के अंतराल में ही हमारे नियमित पाठकों की संख्या हमारे अनुमान से कहीं अधिक हो गयी है और लगातार बढती जा रही है। इस ब्लॉग पर हम शाकाहार के सभी पक्षों को वैज्ञानिक, स्वास्थ सम्बन्धी, धार्मिक, मानवीय विश्लेषण करके तथ्यों के प्रकाश में सामने रखते हैं ताकि ज्ञानी पाठक अपने विवेक का प्रयोग करके शाकाहार का निष्पाप मार्ग चुनकर संतुष्ट हों।

हमारे पाठक ब्लॉगर श्री सतीश सक्सेना जी, डॉ रूपचन्द शास्त्री जी, राकेश कुमार जी, रेखा जी, वाणी गीत जी, मदन शर्मा जी, तरूण भारतीय जी, सवाईसिंह जी, पटाली द विलेज, संदीप पंवार जी, कुमार राधारमण जी का प्रोत्साहन के लिए आभार व्यक्त करते है।

हमारे सुदृढ़ स्तम्भ, विशेषकर सर्वश्री विरेन्द्र सिंह चौहान, गौरव अग्रवाल, डॉ मोनिका शर्मा, शिल्पा मेहता, आलोक मोहन, प्रश्नवादी  जैसे समर्थकों का विशेषरूप से आभार व्यक्त करना चाहते हैं जिन्होंने लेखकमण्डल से बाहर रहते हुए भी हमें भरपूर समर्थन दिया है। हमारे एक जोशीले पाठक ने निरामिष ब्लॉग के सामने शाकाहार के विरोध में कई भ्रांतियाँ और चुनौतियाँ रखीं। डॉ. अनवर जमाल द्वारा पोषण, शाकाहार, और भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रश्नों ने हमें प्रचलित बहुत सी भ्रांतियों को दूर करने का अवसर प्रदान किया। मांसाहार की बुराइयों को उद्घाटित करने और उनके मन में पल रहे भ्रम के बारे में जानने के कारण हमें शाकाहार सम्बन्धी विषयों की वैज्ञानिक और तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत करने में अपनी प्राथमिकतायें चुनने में आसानी हुई। आशा है कि वे हमें भविष्य में भी झूठे प्रचार की कलई खोलने के अवसर इसी प्रकार प्रदान करते रहेंगे।

पहेली की ओर आगे बढने से पहले हम अभिनन्दन करना चाहते हैं उन सभी महानुभावों का जिन्होने गतवर्ष शाकाहार अपनाकर हमारे प्रयास को बल दिया:
* दीप पांडेय
* इम्तियाज़ हुसैन
* कुमार राधारमण
* शिल्पा मेहता


अपनी पहली वर्षगांठ के अवसर पर आज हम आपका आभार व्यक्त करना चाहते हैं, एक छोटे से आयोजन के साथ। आइये, हल करते हैं आज की निरामिष पहेली अपने निराले शाकाहारी, सात्विक अन्दाज़ में। केवल कुछ सरल प्रश्न और बहुत से पुरस्कार। हमारा प्रयास है कि इस प्रतियोगिता में सम्मिलित प्रश्नों के उत्तर या उनके संकेत आपको निरामिष ब्लॉग की पिछली प्रविष्टियों व टिप्पणियों में मिल जायें।

29 अगस्त 2011

पर्यावरण का अहिंसा से सीधा सम्बंध




पर्यावरण आज विश्व की गम्भीर समस्या हो गई है। प्रकृति को बचाना अब हमारी ज्वलंत प्राथमिकता है। लेकिन प्राकृतिक सन्तुलन को विकृत करने में स्वयं मानव का ही हाथ है। पर्यावरण और प्रदूषण मानव की पैदा की हुई समस्या है। प्रारम्भ में पृथ्वी घने वनों से भरी थी। लेकिन जनसंख्या वृद्धि और मनुष्य के सुविधाभोगी मानस ने, बसाहट,खेती-बाडी आदि के लिए वनों की कटाई शुरू की। औद्योगिकीकरण के दौर में मानव नें पर्यावरण को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। जीवों के आश्रय स्थल उजाड़ दिए गये। न केवल वन सम्पदा और जैव सम्पदा का विनाश किया, बल्कि मानव नें जल और वायु को भी प्रदूषित कर दिया। कभी ईंधन के नाम पर तो कभी इमारतों के नाम पर। कभी खेती के नाम पर तो कभी जनसुविधा के नाम पर, मानव प्राकृतिक संसाधनो का विनाशक दोहन करता रहा।

वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। अप्राकृतिक रूप से जब इस कड़ी को खण्डित करने का दुष्कर्म होता है, प्रकृति में विनाशक विकृति उत्पन्न होती है जो अन्ततः स्वयं मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बन खड़ी हो जाती है। जीव-जन्तु हमारी ही भांति इस प्रकृति के आयोजन-नियोजन का अटूट हिस्सा होते है। वे पूरे सिस्टम को आधार प्रदान करते है। प्रकृति पर केवल मानव का मालिकाना हक़ नहीं है। मानव को समस्त प्रकृति के संरक्षण की शर्तों के साथ ही अतिरिक्त उपयोग बुद्धि मिली है। मानव पर, प्रकृति के नियंत्रित उपयोगार्थ विधानों का आरोपण किया गया है, जिसे हम धर्मोपदेश के नाम से जानते है। वे शर्तें और विधान, यह सुनिश्चित करते है कि सुख सभी को समान रूप से उपलब्ध रहे।

इसीलिए विश्व के सभी धर्मों के प्रणेता व महापुरूष, हिंसा, क्रूरता, जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा देने को गुनाह कहते है। वे प्रकृति के संसाधनों के मर्यादित उपभोग की सलाह देते है। अपरिग्रह का उपदेश देते है। मन वचन काया से संयमित,अनुशासित रहने की प्रेरणा देते है। इसी भावना से वे प्राणी मात्र में अपनी आत्मा सम झलक देखते/दिखलाते है। जब वे कण कण में भगवान होने की बात करते है,तो अहिंसा का ही आशय होता है । सभी को सुख प्रदान करने के उद्देश्य से ही वे यह सूत्र देते है कि ‘आत्मा सो परमात्मा’ या हर जीव में परमात्मा का अंश होता है। यह भी कहा जाता है कि सभी को ईश्वर नें पैदा किया अतः सभी जीव ईश्वर की सन्तान है। इसीलिए जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों के साथ दया, करूणा का व्यवहार करनें की शिक्षा दी जाती है। सारी बुराईयां किसी न किसी के लिए पीड़ादायक हिंसा बनती है। अतः सभी सद्गुणों को अहिंसा में समाहित किया जा सकता है। यही धर्म है। यही प्रकृति का धर्म है। यही सुनियोजित जीवन का विधान है। अर्थात्, अहिंसा पर्यावरण का संरक्षण विधान है।

22 फ़रवरी 2011

जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पाणी वैसी वाणी

एक साधु ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए जा रहे थे और एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। ग्रामसीमा पर स्थित पहले ही घर में आश्रय मांगा,वहां एक पुरुष था जिसने रात्री विश्राम की अनुमति दे दी। और भोजन के लिये भी कहा। साधु भोजन कर बरामदे में पडी खाट पर सो गया। चौगान में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा बंधा था। साधु सोते हुए उसे निहारने लगा। साधु के मन में दुर्विचार नें डेरा जमाया, ‘यदि यह घोडा मेरा हो जाय तो मेरा ग्रामानुग्राम विचरण सरल हो जाय’। वह सोचने लगा, जब गृहस्वामी सो जायेगा आधी रात को मैं घोडा लेकर चुपके से चल पडुंगा। गृहस्वामी को सोया जानकर साधु घोडा ले उडा।

कोई एक कोस जा कर पेड से घोडा बांधकर सो गया। प्रातः उठकर नित्यकर्म निपटाया और घोडे के पास आकर फ़िर उसके विचारों ने गति पकडी। ‘अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्योंकर सुझी?’ उसने घोडा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा।

उसी घर में पहूँच कर गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोडा लौटा दिया। साधु नें सोचा कल मैने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं, जिज्ञासा से उस गृहस्वामी को पूछा- 'आप काम क्या करते है,आपकी आजिविका क्या है?' अचकाते हुए गृहस्वामी नें, साधु जानकर सच्चाई बता दी- ‘महात्मा मैं चोर हूँ,और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूँ’। साधु का समाधान हो गया, चोरी से उपार्जित अन्न का आहार पेट में जाते ही उस के मन में कुबुद्धि पैदा हो गई थी। जो प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के निहार हो जाने पर ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

नीति-अनीति से उपार्जित आहार का प्रभाव प्रत्यक्ष था।

जैसा अन्न वैसा मन!

25 नवंबर 2010

आहार स्रोत के विचारों का मनोवृति पर प्रभाव

स्वादेन्द्रीय के रास्ते आचार और विचारों में विकार

क्या इसतरह होना चाहिए…?

घर में हमेशा हमें बच्चों के सामने गालियों का प्रयोग करना चाहिये, ऐसे थोडा ही है कि बच्चे गालियां ही सीखेंगे? न भी सीखे और अच्छे शब्द ही अपनाए। या फ़िर उन्ही का अधिकार होना चाहिए वे क्या सीखें क्या बोलें।

 बच्चों के समक्ष ही टीवी पर थोडे बहुत अश्लील हिंसक फ़िल्म-कार्यक्रम देखने चाहिए, कोई देखने सुनने मात्र से थोडे ही ऐसी हरकते करने लगेंगे? और उन्हे क्या देखना क्या सुनना उनका अधिकार है जब बडे होंगे तो स्वतः ही निर्णय कर लेंगे क्या करना है और क्या नहीं, यह उनका अधिकार होना चाहिए।

नहीं ना?

फ़िर भला हिंसक कृत्यों व मंतव्यो से ही उत्पन्न, मांसाहार से मन में हिंसक विचारों का प्रस्फुटन क्यों नहीं हो सकता? यह तर्क निर्थक हो जाता है कि 'जरूरी नहीं मांसाहारी क्रूर प्रकृति के ही हों।' न भी हों, किन्तु  क्रूर प्रकृति के पनपने की संभावनाएं अधिक ही हो जाती है। विवेकशीलता इसी में है कि हमें परिणामो से पूर्व ही सम्भावनाओं से बचने के उपाय कर लेने चाहिए।

किसी जीव की हिंसा किये बिना मांस प्राप्त करना असंभव है। हिंसा से विरत हुए बिना अहिंसा-भाव को ह्रदय में जगाना असम्भव है, अतः अहिंसा-भाव के अभाव में,  दया, करूणा, प्रेम, अनुकम्पा, वात्सल्य दिखावे के शब्द मात्र रह जाते है। जीवों के प्रति करूणा लाए बिना, अहिंसा की मनोवृति प्रबल नहीं हो सकती। यह कुतर्क विषय से भ्रमित करने के लिए है कि 'पहले मानव के प्रति हिंसा समाप्त की जाय उसके बाद ही जानवरों पर दया के बारे में सोचा जाय।' मानव के साथ तो होने वाली हिंसाएं उसी के द्वेष और क्रोध का परिणाम होती है, और मानव के लिये द्वेष और क्रोध पर पूर्ण जीत हासिल करना आज तो सम्भव नहीं है। और निरिह निर्दोष जीव के साथ हमारे सम्बंध इस प्रकार क्रोध - द्वेष के साथ नहीं बिगडते, फ़िर इन निरपराधी ईश्वर की संतानों को क्यों दंड दिया जाय। अतः मै समझता हू मानव के कोमल भावों की अभिवृद्धि के लिये भी अहिंसा, जीवों से ही प्रारंभ की जानी चाहिए। वही विस्तृत होकर, परस्पर मानव सम्बंधो से भी क्रूरता दूर करने की प्रेरक बनती है। वस्तुतः समुचित अहिंसा के विचार ही हमें मानवों के प्रति भी सहिष्णु बनाते है। सर्वभूतों से सम्पूर्ण, सम्यक प्रेम ही, निष्पक्ष अहिंसा की मनोवृति को दृढ़भूत कर सकता है।


दृष्टांत :
जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पाणी वैसी वाणी

12 नवंबर 2010

सभ्यता अनुशासन : उपभोग संयम। (आहार संयम)

मानव को उर्ज़ा पाने के लिये भोजन करना आवश्यक है, और इसमें भी दो मत नहीं कि मनुष्य को जीवित रहने के लिये अन्य जीवों पर आश्रित रहना ही पडता है। लेकिन, सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, दूसरे जीवों के प्रति उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी, मानव का ही कर्तव्य है। इसलिये मानव की यह जिम्मेदारी है कि वह अपना भोजन प्रबंध कुछ इस प्रकार करे कि, आहार की इच्छा होने से लेकर, ग्रहण करने तक, सृष्टि की जीवराशी कम से कम खर्च हो। हिंसा तो वनस्पतिजन्य आहार में भी सम्भव है, लेकिन इसका निहितार्थ यह नहीं कि जब सभी तरह के आहार में हिंसा है, तो जानबुझ कर सबसे क्रूरत्तम हिंसा ही अपनाई जाय। यह तो मूढ़ता ही है। यहाँ हमारा विवेक कहता है कि जितना हिंसा से बचा जा सकता है, सजगता से बचना चाहिये।

हमें यह नहीं भुलना चाहिए, कि एक समान दिखने वाले कांच और हीरे के मूल्य में अंतर होता है। और वह अंतर उनकी गुणवत्ता के आधार पर होता है। उसी प्रकार एक बकरे के जीव और एक केले के जीव के जीवन-मूल्य में भी अंतर तो है ही।

आहार का चुनाव करते समय हमें अपने विवेक को वैज्ञानिक अभिगम देना होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण है कि प्रकृति में जीवन विकास, सुक्षम एकेन्द्रिय जीव से प्रारंभ होकर क्रमशः पंचेंद्रिय तक पहुँचा है। ऐसे में यदि हमारा आहार प्रबंध कम से कम विकसित जीवो (वनस्पति आदि एकेन्द्रिय जीव) की हिंसा से चल सकता है तो हमारा कोई अधिकार नहीं बनता कि हम उससे अधिक विकसित जीवों (पशु आदि) की अनावश्यक हिंसा करें। जैव विकास की दृष्टि से विकसित जीव ( पशु आदि) की हिंसा, प्रकृति के साथ जघन्य अपराध है।

प्रकृति का अघोषित विधान है कि संसाधनो का पूरी दक्षता से और विवेक पूर्वक उपभोग किया जाय। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम नियमन प्रबंधन करे। अर्थात् अपरिहार्यता की दशा में भी कम से कम संसाधन खर्च कर सावधानी से अतिआवश्यक जरूरत पूरी कर ले।

जीव की इन्द्रियां उसके सुख दुख महसुस करने के माध्यम भी होती है, जो जीव जितनी भी इन्द्रियों की योगयता वाला है, उसे हिंसा के समय इतनी ही अधिक इन्द्रियों के माध्यम से पीडा पहुँचेगी, अर्थात् पांचो ही इन्द्रिय धारक जीव को अधिक पीडा पहुँचेगी जो मानव मन में क्रूर भावों की उत्पत्ती का कारण बनेगी।

मांस में केवल एक जीव का ही प्रश्न नहीं, जब जीव की मांस के लिये हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मक्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मक्खिओं को कैसे आभास हो जाता है, उसी क्षण से वह मांस मक्खिओं के लार्वा का भोजन बनना शुरू हो जाता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही असंख्य सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार होता है, वे बुचड्खाने व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, स्पष्ठ है कि यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यानि ताज़ा मांस के टुकडे पर ही लाखों मक्खी के अंडे, लाखों सुक्ष्म जीव और लाखों रोगाणु होते है। इतना ही नहीं पकने के बाद भी मांस में जीवोत्पती निरंतर जारी रहती है। इसलिये, एक जीव का मांस होने के उपरांत भी, संख्या के आधार पर एक मांस का लोथड़ा, उस पर निर्भर अनंत जीवहिंसा का कारण बनता है।

जीवन जीने की हर प्राणी में अदम्य इच्छा होती है, यहां तक कि कीट व जंतु भी कीटनाशक दवाओं के खिलाफ़ प्रतिकार शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु-रोगाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं के विरुद्ध जीवन बचाने के तरीके खोज लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जीजिविषा का परिणाम होता है, सभी जीना चाह्ते है मरना कोई नहीं चाहता। फिर प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के खातिर मार खाना तो क्रूरता की पराकाष्ठा है।

येन केन पेट भरना ही मानव का लक्षय नहीं है। यह तो पशुओं का लक्षण है। प्रकृति प्रदत्त बुद्धि से ही हमने सभ्यता साधी। यही बुद्धि हमें विवेकशीलता प्रदान करती है, कि हमारे विचार और व्यवहार सौम्य व पवित्र बने रहे। हिंसाजन्य आहार लेने से, हिंसा के प्रति सम्वेदनाएं समाप्तप्राय हो जाती है। किसी दूसरे जीव के प्रति दया करूणा के भाव नष्ट हो जाते है। इस तरह अनावश्यक हिंसा-भाव मन में रूढ हो जाता है, जो अनजाने ही हमारे आचरण में क्रूरता समाहित कर देता है। ऐसी मनोवृति में, जरा सी प्रतिकूलता उपस्थित होनें पर, आवेश आना सामान्य है। ऐसी ही मनोदशा में हिंसक कृत्य होना भी सम्भव है। आहार इसी तरह पहले हमारे विचारों को और फिर हमारे आचरण को प्रभावित करता है।

निष्कर्ष यही है कि हमारी सम्वेदनाओं और अनुकंपा भाव की रक्षा के लिये, हमारे विचार और वर्तन को विशुद्ध रखनें के लिये, शाकाहार ही हमारी पसंद होना चाहिए। और जहां तक और जब तक, हमें सात्विक संतुलित पौष्ठिक शाकाहार, प्रचूरता से उपलब्ध हो, वहां तो हमें जीवों को करूणा दान, अभयदान दे ही देना चाहिए। यही मानवता के लिए श्रेयस्कर है।

अन्य सूत्र : पर्यावरण का अहिंसा से सीधा सम्बंध

26 अगस्त 2010

क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है


सौ सौ चुहे खा के बिल्ली, हज़ को जा रही है।
क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है॥

गुड की ढेली पाकर चुहा, बन बैठा पंसारी।
पंसारिन नमक पे गुड का, पानी चढा रही है॥

कपि के हाथ लगा है अबतो, शांत पडा वो पत्थर।
शांति भी विचलित अपना, कोप बढा रही है

 
हिंसा ने ओढा है जब से, शांति का चोला।
अहिंसा मन ही मन अबतो, बडबडा रही है॥

सियारिन जान गई जब करूणा की कीमत।
मासूम हिरनी पर हिंसक आरोप चढा रही है॥

सौ सौ चुहे खा के बिल्ली, हज़ को जा रही है।
क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है॥

23 अगस्त 2010

मांसाहार प्रचार का भ्रमज़ाल (सार्थक विकल्प निरामिष)

सलीम खान ने कभी अपने ब्लॉग पर यह '14 बिन्दु' मांसाहार के पक्ष में प्रस्तुत किये थे। असल में यह सभी कुतर्क ज़ाकिर नाईक के है, जो यहां वहां प्रचार माध्यमों से फैलाए जाते है। वैसे तो इन फालतू कुतर्को पर प्रतिक्रिया टाली भी जा सकती थी, किन्तु  इन्टरनेट जानकारियों का स्थायी स्रोत है यहाँ ऐसे भ्रामक कुतर्क अगर अपना भ्रमजाल फैला कर स्थायी रहेंगे तो लोगों में संशय और भ्रम यथावत बना रहेगा। ये कुतर्क यदि निरूत्तर रहे तो भ्रम, सच की तरह रूढ़ हो जाएंगे, इसलिए  इन कुतर्कों का यथार्थ और तथ्ययुक्त खण्ड़न  जालस्थानों पर उपलब्ध होना नितांत ही आवश्यक है।

मांसाहार पर यह प्रत्युत्तर-खण्ड़न, धर्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अहिंसा और करूणा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए जा रहे है। मांसाहार को भले ही कोई अपने धर्म का पर्याय या प्रतीक मानते हो, जीव-हत्या किसी भी धर्म का उपदेश या सिद्धांत नहीं हो सकता। इसलिए इस को खण्ड़न अगर निंदा भी माना जाता है तो स्पष्ट रूप से यह हिंसा, क्रूरता और निर्दयता की निंदा है। प्रायोजित गोश्तखोरी की हिंसा प्रेरणा सर्वत्र निंदनीय ही होनी चाहिए, क्योंकि इस विकार से बनती हिंसक मनोवृति समाज के शान्त व संतुष्ट जीवन ध्येय में प्रमुख बाधक है।

निश्चित ही शारीरिक उर्जा पूर्ति के लिए भोजन करना आवश्यक है। किन्तु सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, मानव इस जगत का मुखिया है। अतः प्रत्येक जीवन के प्रति, उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी मानव का कर्तव्य है। सृष्टि के सभी प्राणभूत के अस्तित्व और संरक्षण के लिए सजग रहना, मानव की जिम्मेदारी है। ऐसे में आहार से उर्जा पूर्ति का निर्वाह करते हुए भी, उसका भोजन कुछ ऐसा हो कि आहार-इच्छा से लेकर, आहार-ग्रहण करने तक वह संयम और मितव्ययता से काम ले। उसका यह ध्येय होना चाहिए कि सृष्टि की जीवराशी  कम से कम खर्च हो। साथ ही उसकी भावनाएँ सम्वेदनाएँ सुरक्षित रहे, मनोवृत्तियाँ उत्कृष्ट बनी रहे। प्रकृति-पर्यावरण और स्वभाव के प्रति ऐसी निष्ठा, वस्तुतः उसे मिली अतिरिक्त बुद्धि के बदले, कृतज्ञता ज्ञापन  है। अस्तित्व रक्षा के लिए भी अहिंसक जीवन-मूल्यों को पुनः स्थापित करना मानव का कर्तव्य है। सभ्यता और विकास को आधार प्रदान के लिए सौम्य, सात्विक और सुसंस्कृत भोजन शैली का प्रसार नितांत आवश्यक है।

सलीम खान के मांसाहार भ्रमजाल का खण्ड़न।

1 - दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.

खण्ड़न- इस तर्क से मांसाहार ग्रहणीय नहीं हो जाता। यदि मांसाहर लेने का यही मूढ़ता भरा कारण है तो  ऐसा भी कोई प्रधान धर्म नहीं, जिस ने शाकाहार पर प्रतिबंध लगाया हो। प्रतिबंध तो मूढ़ बुद्धि के लिए होते है, विवेकवान के लिए संकेत ही पर्याप्त होते है। धर्म केवल हिंसा न करने का उपदेश करते है एवं हिंसा प्रेरक कृत्यों से दूर रहने की सजग करते है। आगे मानव के विवेकाधीन है कि आहार व रोजमर्रा के वे कौन से कार्य है जिसमें हिंसा की सम्भावनाएं अधिक है और उसका सारा प्रयास हिंसा से विरत रहकर बचने का होना चाहिए। सभी धर्मों में, अहिंसा के उद्देश्य से ही, प्रकट व अप्रकट रूप से, सभी जीवों के प्रति दया, करूणा, रहम और सहिष्णुता आदि को उपदेशित किया गया है। पाबन्दीयां तो कपट और माया का सहारा लेकर बचने के रास्ते निकालने वालों के लिए होती है। विवेकवान के लिए तो दया, करूणा, रहम, सदाचार, ईमान में अहिंसा और जीवदया ही गर्भित है।

2 - क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?

खण्ड़न- अगर एस्किमोज़ मांसाहार के बिना नहीं रह सकते तो क्या आप भी शाकाहार उपलब्ध होते हुए एस्किमोज़ का बहाना आगे कर मांसाहार चलाए रखेंगे? खूब!! एस्किमोज़ तो वस्त्र के स्थान पर चमड़ा पहते है, आप क्यों नही सदैव उनका वेश धारण किए रहते? अल्लाह नें आर्कटिक में मनुष्य पैदा ही नहीं किये थे,जो उनके लिये वहां पेड-पौधे भी पैदा करते, लोग पलायन कर पहुँच जाय तो क्या किया जा सकता है। ईश्वर नें बंजर रेगीस्तान में भी इन्सान पैदा नहीं किए थे, फ़िर भी सत्ता भूखा स्वार्थी मनुष्य वहाँ भी पहुँच ही गया। यह तो कोई बात नहीं हुई कि  दुर्गम क्षेत्र में रहने वालों को शाकाहार उपलब्ध नहीं, इसलिए सभी को उन्ही की आहार शैली अपना लेनी चाहिए। आपका यह एस्किमोज़ की आहारवृत्ति का बहाना निर्थक है। जिन देशों में शाकाहार उपलब्ध न था, वहां मांसाहार क्षेत्र वातावरण की अपेक्षा से विवशता हो सकता है और इसीलिए ही उसी वातावरण के संदेशकों-उपदेशकों नें मांसाहार पर उपेक्षा का रूख अपनाया और निषेध नहीं किया। यदि शाक उपलब्ध होता तो, सभ्य व सुधरे लोगों की पहली पसंद शाकाहार ही होता है। बुद्धिमता यही है कि जहां सात्विक पौष्ठिक शाकाहार प्रचूरता से उपलब्ध है वहां जीवों को मौत के घाट उतार कर उदरपूर्ति नहीं करनी चाहिए। सजीव और निर्जीव एक गहन विषय है। जीवन वनस्पतियों आदि में भी है, लेकिन प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता की पराकाष्ठा है। आप लोग दबी जुबां से कहते भी हो कि "मुसलमान, शाकाहारी होकर भी एक अच्छा मुसलमान हो सकता है" इस सच्चाई के उपरांत मांसाहार की ज़िद्द मूर्खता है। आखिर एक 'अच्छा मुसलमान' बनने से इतना परहेज ही क्यों ?

3 - अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 - अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 - अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.

खण्ड़न- इस विषय पर जानने के लिए शाकाहार मांसाहार की हिंसा के सुक्ष्म अन्तर  को समझना होगा। साथ ही हिंसा में विवेक  करना होगा। स्पष्ट हो जाएगा कि जीवहिंसा प्रत्येक कर्म में है, किन्तु हम विवेकशील है,  हमारा कर्तव्य बनता है, हम वह रास्ता चुनें जिसमे जीव हिंसा कम से कम हो। किन्तु आपके तर्क की सच्चाई यह है कि वनस्पति हो या पशु-पक्षी, उनमें जान साबित करके भी आपको किसी की जान बचानी नहीं है। आपका कुतर्क वनस्पति जीवन पर करूणा के उद्देश्य से नहीं, हिंसा अहिंसा आपके लिए अर्थहीन है, आपको तो मात्र सभी में 'जीव' साबित करने के बाद भी वक्रता के साथ, बडे से बडे प्राणी और बडी से बडी हिंसा का ही चुनाव करना है।

"एक यह भी कुतर्क दिया जाता है कि शाकाहारी सब्जीयों को पैदा करनें के लिये आठ दस प्रकार के जंतु व कीटों को मारा जाता है।"

खण्ड़न- इन्ही की तरह कुतर्क करने को दिल चाहता है………
भाई, इतनी ही अगर सभी जीवों पर करूणा आ रही है,और जब दोनो ही आहार हिंसाजनक है तो दोनो को छोड क्यों नहीं देते?  दोनो नहीं तो पूरी तरह से किसी एक की तो कुर्बानी(त्याग) करो…॥ कौन सा करोगे????


"ऐसा कोनसा आहार है,जिसमें हिंसा नहीं होती।"

खण्ड़न- यह कुतर्क ठीक ऐसा है कि 'वो कौनसा देश है जहां मानव हत्याएं नहीं होती?' इसलिए मानव हत्याओं को जायज मान लिया जाय? उसे सहज ही स्वीकार कर लिया जाय? और उसे बुरा भी न कहा जाय? आपका आशय यह है कि, जब सभी में जीवन हैं, और सभी जीवों का प्राणांत, हिंसादोष है तो सबसे उच्च्तम, क्रूर, घिघौना बडे जीव की हत्या का दुष्कर्म ही क्यों न अपनाया जाय? यह तो समझ का सरासर दिवालियापन है!!

तर्क से तो बिना जान निकले पशु शरीर भी मांस में परिणित नहीं हो सकता। तार्किक तो यह भी है कि किसी भी तरह का मांस हो, अंततः मुर्दे का ही मांस होगा। उपर से तुर्रा यह है कि हलाल तरीके से काटो तो वह मुर्दा नहीं । मांस के लिये जीव की जब हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मख्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मख्खियों को कैसे आभास हो जाता है। उसी क्षण से वह मांस मख्खियों के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही लगभग 563 तरह के सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार किया जाता है वह जगह व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, और यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यानि एक ताज़ा मांस के टुकडे पर ही हज़ारों मख्खी के अंडे, लाखों सुक्ष्म जीव, और हज़ारों रोगाणु होते है। कहो, किसमें जीव हिंसा ज्यादा है।, मुर्दाखोरी में या अनाज दाल फ़ल तरकारी में?

रही बात इन्द्रिय के आधार पर अपराध की तो जान लीजिए कि हिंसा तो अपराध ही है बस क्रूरता और सम्वेदनाओं के स्तर में अन्तर है। जिस प्रकार किसी कारण से गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो होने वाले दुख की मात्रा व तीव्रता बढ़ती जाती है। कम से अधिकतम दुख महसुस होता है क्योंकि इसका सम्बंध भाव से है। उसी तरह अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा पर क्रूर भाव की श्रेणी बढती जाती है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। सम्वेदना भी अधिक से अधिक कुंद हो जानी चाहिए। आप कम इन्द्रिय पर अधिक करूणा की बात करते है न, क्या विकलेन्द्रिय भाई के अपराध के लिए इन्द्रिय पूर्ण भाई को फांसी दे देना न्यायोचित होगा? यदि दोनो में से किसी एक के जीवन की कामना करनी पडे तो किसके पूर्ण जीवन की कामना करेंगे? विकलेन्द्रिय या पूर्णइन्द्रिय?

6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दांत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.

7 - और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.

खण्ड़न- मानते है इन्सान कुछ भी खा/चबा सकता है, किन्तु प्राकृतिक रूप से वह शिकार करने के काबिल हर्गिज नहीं है।  वे दांत शिकार के अनुकूल नहीं है। उसके पास तेज धारदार पंजे भी नहीं है। मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल है। मानव प्रकृति से शाकाहारी ही है। खाने चबाने को तो हमने लोगों को कांच चबाते देखा है, जहर और नशीली वस्तुएँ पीते पचाते देखा है। मात्र खाने पचाने का सामर्थ्य हो जाने भर से जहर, कीचड़, कांच मिट्टी आदि उसके प्राकृतिक आहार नहीं हो जाते। ‘खाओ जो पृथ्वी पर है’ का मतलब यह नहीं कि कहीं निषेध का उल्लेख न हो तो धूल, पत्थर, जहर, एसीड आदि भी खा लिया जाय या खाने की संस्तुति की जाय। इसलिए ऐसे किसी बेजा तर्क से मांसहार तर्कसंगत सिद्ध नहीं हो जाता।

8 - आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.

खण्ड़न- हां, देखा तो नहीं, पर सुना अवश्य था कि आदि मानव मांसाहारी थे। पर नवीनतम जानकारी तो यह भी मिली कि प्रगैतिहासिक मानव शाकाहारी था। यदि फिर भी मान लें कि वे मांसाहारी थे तो बताईए शिकार कैसे करते थे? अपने उन दो छोटे भोथरे दांतो से? या कोमल नाखूनो से? मानव तो पहले से ही शाकाहारी रहा है, उसकी मां के दूध के बाद उसकी पहली पहचान फलों - सब्जियों से हुई होगी। जब कभी कहीं, शाकाहार का अभाव रहा होगा तो पहले उसने पत्थर आदि के हथियार बनाए होंगे फिर शिकार किया होगा, पहले उसने अग्नी जलाना सीखा होगा  फ़िर मांसाहार किया होगा। यानि हथियारों और आग्नी के अविष्कार के पहले वह फ़ल फ़ूल पर ही आश्रित था।

लेकिन फिर भी इस कुतर्क की जिद्द है तो, आदि युग में तो आदिमानव नंगे घुमते थे, क्या हम आज उनका अनुकरण करें? वे अगर सभ्यता के लिए अपनी नंगई छोड़ कर परिधान धारक बन सकते है तो हम आदियुगीन जंगली मांसाहार त्याग कर, सभ्ययुगीन संस्कारी शाकाहार क्यों नहीं अपना सकते? हमारे आदि पूर्वज शिकार से निर्दोष आहार की तरफ बढ़े है उन्होने विकार से संस्कार की और विकास साधा है क्या हम उस विकास को उलट कर पुनः पतन गामी बन जाएं?

9 - जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है - यह कहना 'मांसाहार आपको आक्रामक बनता है' का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.

खण्ड़न- इसका तात्पर्य ऐसा नहीं कि हिंसक पशुओं के मांस से हिंसक,व शालिन पशुओं के मांस से शालिन बन जाओगे।

इसका तात्पर्य यह है कि जब आप बार बार बड़े पशुओं की अत्यधिक क्रूरता से हिंसा करते है तब ऐसी हिंसा, और हिंसा से उपजे आहार के कारण, हिंसा के प्रति सम्वेदनशीलता खत्म हो जाती है। क्रूर मानसिकता पनपती है और गूढ़ हिंसक मनोवृति बनती है। ऐसी मनोवृति के कारण आवेश आक्रोश द्वेष सामान्य सा हो जाता है। क्रोधावेश में हिंसक कृत्य भी सामान्य होता चला जाता है। इसलिए आवेश आक्रोश की जगह कोमल संवेदनाओं का संरक्षण जरूरी है। जैसे आपने प्राय देखा होगा कि रोज रोज कब्र खोदने वाले के चहरे का भाव पत्थर की तरह सपाट रहता है। क्या वह मरने वाले के प्रति जरा भी संवेदना या सहानुभूति दर्शाता है? वस्तुतः उसके बार बार के इस कृत्य में सलग्न रहने से, मौत के प्रति उसकी सम्वेदनाएँ मर जाती है।

10 - यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.

खण्ड़न- हाथ कंगन को आरसी क्या?, यदि शाकाहारी होने से कमजोरी आती तो मानव कब का शाकाहार और कृषि-कर्म  छोड चुका होता। कईं संशोधनों से यह बात उभर कर आती रही है कि शाकाहार में शक्ति के लिए जरूरी सभी पोषक पदार्थ है। बाकी शक्ति सामर्थ्य के प्रतीक खेलो के क्षेत्र में अधिकांश खिलाडी शाकाहार अपना रहे है। कटु सत्य तो यह है कि शक्तिशाली, शांतिप्रिय, बुद्धिमान बनाने के गुण मांसाहार में तो बिलकुल भी नहीं है।

11 - शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.

खण्ड़न- भाड में जाय वो बंजर पाश्चात्य देश जो ताज़ा शाक पैदा नहीं कर सकते!! भारत में यह सस्ता और सहज उपलब्ध है तब यहां तो शाकाहार अपना लेना ही बुद्धिमानी है। सस्ते महंगे की सच्चाई तो यह है कि पशु से 1 किलो मांस प्राप्त करने के लिए उन्हें 13 किलो अनाज खिला दिया जाता है, उपर से पशु पालन उद्योग में बर्बाद होती है विशाल भू-सम्पदा, अनियंत्रित पानी के उपयोग का यह दुष्कृत्य  निश्चित ही पृथ्वी पर भार है। मात्र  उपलब्ध उपजाऊ भूमि का भी अन्न उत्पादन के लिए प्रयोग हो तो निश्चित ही अन्न सभी जगह अत्यधिक सस्ता हो जाएगा। बंजर निवासियों को कुछ अतिरिक्त खर्चा करना पडे तब भी उनके लिए सस्ता सौदा होगा।

12 - अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.

खण्ड़न- यदि अल्लाह ही जीवन देता हरता है  तो संख्या कम करने का ठेका अल्लाह से आपने ले रखा है?

जो लोग ईश्वरवादी है, वे तो अच्छी तरह से जानते है, संख्या का बेहतर प्रबंधक ईश्वर ही है।

जो लोग प्रकृतिवादी है वे भी जानते है कि प्रकृति के पास जैव सृष्टि के संतुलन का गजब प्लान है।

करोडों साल से जंगली जानवर और आप लोग मिलकर शाकाहारी पशुओं को खाते आ रहे हो, फ़िर भी जिस प्रजाति के जानवरों को खाया जाता है, बिलकुल ही विलुप्त या कम नहीं हुए। उल्टे मांसाहारी पशु अवश्य विलुप्ति की कगार पर है। सच्चाई तो यह है कि जो जानवर खाए जाते है उनका बहुत बडे पैमाने पर उत्पादन होता है। जितनी माँग होगी उत्पादन उसी अनुपात में बढता जाएगा। अगर नही खाया गया तो जानवरों की खेती ही नहीं होगी। मांसाहारियों ने जानवर पैदा करने के उद्योग लगा रखे है।

13 -कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.

खण्ड़न- मेडिकल बुक किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह 'अंतिम सत्य' नहीं है। वह इतनी इमानदार है कि कल को यदि कोई नई शोध प्रकाश में आए तो वह अपनी 'बुक' में इमानदारी से परिवर्तन-परिवर्धन कर देगी। शाकाहार के श्रेष्ठ विकल्प होने पर अभी तक गम्भीर शोध-खोज नहीं हुई है। किन्तु सवाल जब मानव स्वास्थ्य का है तो कभी न कभी यह तथ्य अवश्य उभर कर आएगा कि मांसाहार मनुष्य के स्वास्थ्य के बिलकुल योग्य नहीं है। और फिर माँसाहार त्याग का उपाय सहज हो, अहानिकर हो तो माँसाहार से निवृति का स्वागत होना चाहिए। मेडिकल बुक में भावनाओं और सम्वेदनाओं पर कोई उल्लेख या निर्देश नहीं होता, तो क्या भावनाओं और सम्वेदनाओं की उपयोगिता महत्वहीन हो जाती है? भावों के प्रभाव पर कोई शोध खोज तथ्य या तत्व  मेडिकल बुक में नहीं है, तो क्या मन के भावों पर उपदेश करती उस अन्तिम बुक को भी निरस्त कर देंगे कि मेडिकल बुक में भावों के बारे में कुछ नहीं लिखा?

14 - और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

खण्ड़न- सरकारें क्यों प्रतिबंध लगायेगी? जबकि उसके निति-नियंता भी इसी समाज की देन है, यहीं से मानसिकता और मनोवृतियां प्राप्त करते है। लोगों का आहार नियत करना सरकारों का काम नहीं है।यह तो हमारा फ़र्ज़ है, हम विवेक से उचित अनुचित का भेद करें और उचित को अपनाएं, अनुचित को दूर हटाएं। उदाहरण के लिए झुठ पर सरकारी कानून से प्रतिबंध कहीं भी नहीं लगाया गया है। फिर भी सर्वसम्मति से झूठ को बुरा माना जाता है। किसी प्रतिबंध से नहीं बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता से हम झूठ का व्यवहार नहीं करते। कानून सच्च बोलने के लिए मजबूर नहीं कैसे कर पाएगा?  इसीलिए सच पाने के लिए अदालतों को धर्मशास्त्रों शपथ दिलवानी पडती है। ईमान वाला व्यक्ति इमान से ही सच अपनाता है और झूठ न बोलने को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर बचता है। उसी तरह अहिंसक आहार को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर अपनाना होता है।

हर प्राणी में जीवन जीने की अदम्य इच्छा होती है, यहां तक की कीट व जंतु भी कीटनाशक दवाओं के प्रतिकार की शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं से प्रतिकार शक्ति पैदा कर लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जिजीविषा का परिणाम होता है। सभी जीना चाहते है मरना कोई नहीं चाहता।

इसलिए, 'ईमान' और 'रहम' की बात करने वाले 'शान्तिपसंद' मानव का यह फ़र्ज़ है कि वह जीए और जीने दे।

21 अगस्त 2010

मै न हिंदु, न इस्लाम, न जैन, न बौध प्रचारक हूं, मै हूं मात्र जीवदया वादी।

लोगो को लगता है कि मैँ शाकाहार के बहाने किसी धर्म का प्रचार कर रहा हूँ किंतु यह सच नही हैमेरे शाकाहार मांसाहार सम्बंधी आलेखो को किसी भी धर्म का अपमान न माना जाय।  यह किसी भी धर्म को हीन बताने के उद्देश्य से नहीं है। फिर भी किसी विचारधारा में दया जैसा कुछ भी नहीं है तो उस धर्म मेँ धर्म जैसा है भी क्या? यदि हिंसक कुरीति, धार्मिक आस्था का चोला पहन कर आती है तो ऐसी कुरीतियो पर आघात करना जागरूकता कहलाता है। मेरा मक़सद अहिंसा है, जीव दया है, इसलिए बात मात्र इतनी सी है कि कईं प्रकार की हिंसाओं से जब मानव बच सकता है,तो उसे क्यों न हिंसा से बचना चाहिए?

हिंसा पाप है और हर व्यक्ति को पाप को पाप स्वीकार करना ही चाहिए, फिर चाहे वह धर्म के नाम पर या धार्मिक आस्थाओँ की ओट में ही क्यो न किया जा रहा हो।  मैं तो यह स्वीकार करता हूं कि मेरे शाकाहार से भी, मेरे गमन-आगमन से, साथ ही जीवन के कई कार्यों से जीवहिंसा होती है. किंतु अपने लिए आवश्यक होने मात्र से कोई पाप कृत्य धर्म नही बन जाता, वह पाप ही माना जाएगा। बस ध्यान विवेक व सावधानी इसी बात पर हो कि हमसे बडी जीवहिंसा न हो जाय। यह कुटिलता नहीं कि अपरिहार्यता के कारण पाप को भी धर्म बताया जाय।
कहते है कि किसी की आस्थाओं और भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए। लेकिन जरा सी सार्थक ठेस से यदि आस्थाएँ कांप उठे तो वे कैसी आस्थाएँ? मै तो कहता हूँ बेशक उन अस्थिर आस्थाओं को ठेस पहुँचाओ यदि वे आस्थाएं कुरीति है। इन ठेसों से ही सम्यक् आस्थाओं को सुदृढ़ होने का औचित्य प्राप्त होता है। बस यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ठेस कुतर्कों से किसी को मात्र बुरा साबित करने के लिए ही न पहुँचाई जाय।

20 अगस्त 2010

ईश्वर ने जानवरों को हमारे भोजन के लिये ही पैदा किया है? (हिंसा अनुमति का यथार्थ)

वैसे तो शाकाहार - मांसाहार का सम्बंध किसी धर्म विशेष से नहीं होता है, क्योंकि धर्म का सम्बंध गहराई से सीधे दया, रहम, करूणा से होता है। लेकिन मांसाहार प्रचारक ही अक्सर इस कहावत को चरितार्थ करते है कि ‘मांस खाए तो ही मुसलमान’। क्योंकि शाकाहार के प्रसार से इन्हे ही गम्भीर आपत्ति होती है। इस्लाम के अनुयायी मांसाहारी आदतों के संरक्षण में जी-जान से जुटे देखे जा सकते है। कहने को तो कह देते है कि 'मांसाहार फर्ज नहीं है, मांसाहार न करके भी एक अच्छा मुसलमान बनकर रहा जा सकता है।' लेकिन तत्काल पलट कर मांसाहार की उपयोगिता और आवश्यक्ता पर कुतर्क करते नजर आते है। अपनी किताबों से माँसाहार की ‘अनुमति’ को कुछ इस प्रकार जताते है जैसे यह ‘आदेश’ ही हो, जबकि यथार्थ तो यह है कि वह ‘अनुमति’ भी नहीं  मात्र आदतों का ‘उल्लेख’ है। प्रस्तुत आलेख उक्त मांसाहार उल्लेख को समझने परखने का विनम्र प्रयास है।

 ईश्वर नें जानवरों को हमारे भोजन आदि के लिये ही पैदा किया है?

अक्सर कुरआन की चार आयतों का हवाला देकर, यह ‘अनुमति’ की बात कही जाती हैं, आइए देखते है उन आयतों के क्या मायने है।

"ऐ लोगों, खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़ (कुरआन 2:168)

"ऐ ईमान वालों, प्रत्येक कर्तव्य का निर्वाह करो| तुम्हारे लिए चौपाये जानवर जायज़ है, केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख किया गया है" (कुरआन 5:1)

इन आयतों में 'मांस' शब्द का उल्लेख तक नहीं है। कहा मात्र यह गया है कि "खाओ जो पृथ्वी पर है लेकिन पवित्र और जायज़।" बात अगर ‘पवित्र और जायज़’ की है तो,शाकाहार पवित्र भी है और जायज़ भी। फिर उससे विशेष क्या शुद्ध और योग्य हो सकता है?  यदपि कुछ जानवरों को नाज़ायज़ नहीं कहा गया है. तथापि यह अर्थ लेना हो तो पृथ्वी पर उपलब्ध धूल पत्थर को भी नाज़ायज़ नहीं कहा गया, उसे तो अनुमति केनाम पर आहार नहीं बनाया जाता? बिना नाम लिए कहा गया है अतः पवित्र और जायज़ का विवेक इंसानो को करना है. इस आयत का आशय मात्र यही है।

"रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया जिसमें तुम्हारे लिए गर्मी का सामान (वस्त्र) भी और अन्य कितने लाभ. उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो" (कुरआन 16:5)

"और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए ज्ञानवर्धक उदहारण हैं. उनके शरीर के अन्दर हम तुम्हारे पीने के लिए दूध पैदा करते हैं और इसके अलावा उनमें तुम्हारे लिए अनेक लाभ हैं, और जिनका माँस तुम प्रयोग करते हो" (कुरआन 23:21)

इन आयतों में ‘खाना’ व ‘माँस’ शब्द अवश्य है। लेकिन इसे गहनता से विवेक पूर्वक समझने की आवश्यकता है। ऐसी सभी आयतो में एक वाक्य बडा आम मिलता है कि "इसमें तुम्हारे लिए बहुत बडा ईशारा है" इस वाक्य का सीधा सा अर्थ है, 'सार्थक निर्थक पर विवेक से सोचो।' ईशारा यह है कि उचित अनुचित का भेद शब्दों में ही है। यहां अल्लाह, जानवरों को गर्मी के सामान आदि व उपयोग के लिये पैदा करनें की तो जिम्मेदारी लेता है, किन्तु उन्हे खाने की क्रिया बंदे पर छोडता है, यह कहकर कि, "कुछ को 'तुम' खाते भी हो"। अर्थ साफ़ है 'खा सकते हो' नहीं कहा,  'तुम खाते हो' कहा, यही ईशारे भरा वाक्य है, इसे ही विवेक से समझने की दरकार है। अतः यह वाक्य खाने की आदतों का उल्लेख मात्र है, किसी भी प्रकार की आज्ञा या आदेश नहीं है। उस स्थल परिवेश और काल अनुसार आदतें होगी, उन आदतों का बयान मात्र है। यह कोई अनुमति नहीं, फिर यदि अविवेक से अनुमति की बात कही भी जाय तब भी कोई जरूरी नहीं कि प्रदत्त अनुमति का जडवत उपभोग किया ही जाय। यदि पोषण आवश्यकताएं शाकाहार से पूर्ण हो जाती हो तो ईश्वर की अनुकम्पा का दुरुपयोग कृतघ्नता है।

निशानी: ईशारा - 'विवेक के लिए'

और तुम्हारे लिए चौपायों में से एक बड़ी शिक्षा-सामग्री है, जो कुछ उनके पेटों में है उसमें से गोबर और रक्त से मध्य से हम तुम्हे विशुद्ध दूध पिलाते है, जो पीनेवालों के लिए अत्यन्त प्रिय है, (16 : 66) और खजूरों और अंगूरों के फलों से भी, जिससे तुम मादक चीज़ भी तैयार कर लेते हो और अच्छी रोज़ी भी। निश्चय ही इसमें बुद्धि से काम लेनेवाले लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है (16 : 67)

और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो (23 : 21)

उपरोक्त अलग अलग आयतों में अल्लाह ने अपने अवदान का उल्लेख और उसमें 'शिक्षा और निशानी' की बात रखकर 'अपने कर्म' और 'तुम्हारे कर्म' में भेद कर दिया है। अल्लाह का कर्म "हम तुम्हें पिलाते है।" और तुम्हारा कार्य "उन्हें तुम खाते भी हो"। अल्लाह ईशारा करते है कि जो कर्म तुम कर रहे हो इसमें बड़ी शिक्षा या बड़ी निशानी है, जिसे बुद्धि से काम लेने वालों को स्वविवेक से समझना चाहिए। यहां सोचने वाली बात यह भी है कि यदि आयत 16:67 से ‘तुम’ लगाकर भी शराब का निषेध है तो 23:21 में भी ‘तुम’ लगे होने से अल्लाह द्वारा मांसाहार की अनुमति कैसे हो गई? निशानी का अर्थ यदि विवेक है तो विवेक का प्रयोग दोनो जगह समान रूप से  होना चाहिए।

कुरआन में कईं जगह, रहम के परिपेक्ष्य में आदेश है कि तुम ‘अनावश्यक हत्या’ न करो। चलो भी तो पैर पटकते हुए न चलो, ताकि कोई जीव जन्तु कुचल कर न मर जाय। फिर पर्याप्त शाकाहार रूपी भोजन के उपल्ब्ध रहते भी स्वादेन्द्रीय के वशीभूत, मांसाहार करना ‘अनावश्यक हत्या’ ही है। गैर जरूरी हिंसा ही है। निशानी ईशारा या विवेक यही कहता है यदि हमें विकल्प उपलब्ध हो तो आहार प्रयोजन से जीवहिंसा नहीं करनी चाहिए।

हज इस्लाम में सबसे शीर्ष धार्मिक अनुष्ठान है। जब मुसलिम हज यात्रा पर जाते हैं वे बिना सिले हुए श्वेत वस्त्र के दो टुकड़े परिधान करते हैं, जिसे 'अहराम' कहा जाता है। ये अत्यंत साधारण वस्त्र सादगी और सहिष्णुता का प्रतीक होता है, ये परिधान प्रकट करते है कि यह मनुष्य दुनिया के आडंबर, दंभ और द्वेष से दूर है। इन धार्मिक वस्त्रों में समस्त जी्वों को अभयदान देना होता है। क्योंकि अहराम की दशा में किसी जीव की हत्या करना मना है। न तो मक्खी, न मच्छर और न ही जूं यानी किसी जीव के मारने पर कड़ा प्रतिबंध है। यदि कोई हाजी जमीन पर पड़े हुए किसी कीड़े को देख ले तो अपने अन्य साथी को उससे बचकर चलने की हिदायत करता है। कहीं ऐसा न हो जाए कि उसके पांव के नीचे वह कीड़ा दब जाए।  यदि कोई जीव जंतु उसे अपने कपड़े पर नजर आए तो वह उसे उठाकर जमीन पर तक नही फेंक सकता। जब तक उसके शरीर पर यह अहराम है, जीव को मारना तो दूर वह उसके जीवन में बाधा  भी नहीं पहूंचा सकता। 'अहराम' जीवन की सर्वाधिक पवित्र अवस्था है। तो समग्र जीवन में इस आत्मिक शुद्धता और पवित्रता को आत्मसात करने में क्यों आपत्ति होनी चाहिए। 

दृष्टांत : सद्बुद्धि
: सामर्थ्य का दुरुपयोग

19 अगस्त 2010

मांसाहार करते हुए वनस्पति जीवन पर करूणा क्यों उमड रही है?

मांसाहारी प्रचारको द्वारा शाकाहार पर बडे बचकाना कुतर्क प्रस्तूत किये जाते है। September 6, 2008 में ही श्री अनुराग शर्मा ने चार लेखों की श्रेणी लिखकर बडे ही तर्किक ढंग से प्रत्युत्तर प्रस्तूत किये थे। आपके लिये उस में से अन्तिम लेख यहां प्रस्तूत किया जा रहा है।
शाकाहार - कुछ तर्क कुतर्क

शाकाहार के बारे में अक्सर होने वाली बहस और इन सब तर्कों-कुतर्कों में कितनी सच्चाई है। लोग पेड़ पौधों में जीवन होने की बात को अक्सर शाकाहार के विरोध में तर्क के रूप में प्रयोग करते हैं। मगर वे यह भूल जाते हैं कि भोजन के लिए प्रयोग होने वाले पशु की हत्या निश्चित है जबकि पौधों के साथ ऐसा होना ज़रूरी नहीं है।

मैं अपने टमाटर के पौधे से पिछले दिनों में बीस टमाटर ले चुका हूँ और इसके लिए मैंने उस पौधे की ह्त्या नहीं की है। पौधों से फल और सब्जी लेने की तुलना यदि पशु उपयोग से करने की ज़हमत की जाए तो भी इसे गाय का दूध पीने जैसा समझा जा सकता है। हार्ड कोर मांसाहारियों को भी इतना तो मानना ही पडेगा की गाय को एक बारगी मारकर उसका मांस खाने और रोज़ उसकी सेवा करके दूध पीने के इन दो कृत्यों में ज़मीन आसमान का अन्तर है।

अधिकाँश अनाज के पौधे गेंहूँ आदि अनाज देने से पहले ही मर चुके होते हैं। हाँ साग और कंद-मूल की बात अलग है। और अगर आपको इन कंद मूल की जान लेने का अफ़सोस है तो फ़िर प्याज, लहसुन, शलजम, आलू आदि मत खाइए और हमारे प्राचीन भारतीयों की तरह सात्विक शाकाहार करिए। मगर नहीं - आपके फलाहार को भी मांसाहार जैसा हिंसक बताने वाले प्याज खाना नहीं छोडेंगे क्योंकि उनका तर्क प्राणिमात्र के प्रति करुणा से उत्पन्न नहीं हुआ है। यह तो सिर्फ़ बहस करने के लिए की गयी कागजी खानापूरी है।

मुझे याद आया कि एक बार मेरे एक मित्र मेरे घर पर बोनसाई देखकर काफी व्यथित होकर बोले, "क्या यह पौधों पर अत्याचार नहीं है?" अब मैं क्या कहता? थोड़ी ही देर बाद उन्होंने अपने पेट ख़राब होने का किस्सा बताया और उसका दोष उन बीसिओं झींगों को दे डाला जिन्हें वे सुबह डकार चुके थे - कहाँ गया वह अत्याचार-विरोधी झंडा?

एक और बन्धु दूध में पाये जाने वाले बैक्टीरिया की जान की चिंता में डूबे हुए थे। शायद उनकी मांसाहारी खुराक पूर्णतः बैक्टीरिया-मुक्त ही होती है। दरअसल विनोबा भावे का सिर्फ़ दूध की खुराक लेना मांसाहार से तो लाख गुने हिंसा-रहित है ही, मेरी नज़र में यह किसी भी तरह के साग, कंद-मूल आदि से भी बेहतर है। यहाँ तक कि यह मेरे अपने पौधे से तोडे गए टमाटरों से भी बेहतर है क्योंकि यदि टमाटर के पौधे को किसी भी तरह की पीडा की संभावना को मान भी लिया जाए तो भी दूध में तो वह भी नहीं है। इसलिए अगली बार यदि कोई बहसी आपको पौधों पर अत्याचार का दोषी ठहराए तो आप उसे सिर्फ़ दूध पीने की सलाह दे सकते हैं। बेशक वह संतुलित पोषण न मिलने का बहाना करेगा तो उसे याद दिला दें कि विनोबा दूध के दो गिलास प्रतिदिन लेकर ३०० मील की पदयात्रा कर सकते थे, यह संतुलित और पौष्टिक आहार वाला कितने मील चलने को तैयार है?

आईये सुनते हैं शिरिमान डॉक्टर नायक जी की बहस को - अरे भैया, अगर दिमाग की भैंस को थोडा ढील देंगे तो थोड़ा आगे जाने पर जान पायेंगे कि अगर प्रभु ने अन्टार्कटिका में घास पैदा नहीं की तो वहाँ इंसान भी पैदा नहीं किया था। आपके ख़ुद के तर्क से ही पता लग जाता है कि प्रभु की मंशा क्या थी। फ़िर भी अगर आपको जुबां का चटखारा किसी की जान से ज़्यादा प्यारा है तो कम से कम उसे धर्म का बहाना तो न दें। पशु-बलि की प्रथा पर कवि ह्रदय का कौतूहल देखिये :


अजब रस्म देखी दिन ईदे-कुर्बां

ज़बह करे जो लूटे सवाब उल्टा

धर्म के नाम पर हिंसाचार को सही ठहराने वालों को एक बार इस्लामिक कंसर्न की वेबसाइट ज़रूर देखनी चाहिए। इसी प्रकार की एक दूसरी वेबसाइट है जीसस-वेज। हमारे दूर के नज़दीकी रिश्तेदार हमसे कई बार पूछ चुके हैं कि "किस हिंदू ग्रन्थ में मांसाहार की मनाही है?" हमने उनसे यह नहीं पूछा कि किस ग्रन्थ में इसकी इजाजत है लेकिन फ़िर भी अपने कुछ अवलोकन तो आपके सामने रखना ही चाहूंगा।

योग के आठ अंग हैं। पहले अंग यम् में पाँच तत्त्व हैं जिनमें से पहला ही "अहिंसा" है। मतलब यह कि योग की आठ मंजिलों में से पहली मंजिल की पहली सीढ़ी ही अहिंसा है। जीभ के स्वाद के लिए ह्त्या करने वाले क्या अहिंसा जैसे उत्कृष्ट विषय को समझ सकते हैं? श्रीमदभगवदगीता जैसे युद्धभूमि में गाये गए ग्रन्थ में भी श्रीकृष्ण भोजन के लिए हर जगह अन्न शब्द का प्रयोग करते हैं।

अंडे के बिना मिठाई की कल्पना न कर सकने वाले केक-भक्षियों के ध्यान में यह लाना ज़रूरी है कि भारतीय संस्कृति में मिठाई का नाम ही मिष्ठान्न = मीठा अन्न है। पंचामृत, फलाहार, आदि सारे विचार अहिंसक, सात्विक भोजन की और इशारा करते हैं। हिंदू मंदिरों की बात छोड़ भी दें तो गुरुद्वारों में मिलने वाला भोजन भी परम्परा के अनुसार शाकाहारी ही होता है। संस्कृत ग्रन्थ हर प्राणी मैं जीवन और हर जीवन में प्रभु का अंश देखने की बात करते हैं। ग्रंथों में औषधि के उद्देश्य से उखाड़े जाने वाले पौधे तक से पहले क्षमा प्रार्थना और फ़िर झटके से उखाड़ने का अनुरोध है। वे लोग पशु-हत्या को जायज़ कैसे ठहरा सकते हैं?

अब रही बात प्रकृति में पायी जाने वाली हिंसा की। मेरे बचपन में मैंने घर में पले कुत्ते भी देखे थे और तोते भी। दोनों ही शुद्ध शाकाहारी थे। प्रकृति में अनेकों पशु-पक्षी प्राकृतिक रूप से ही शाकाहारी हैं। जो नहीं भी हैं वे भी हैं तो पशु ही। उनका हर काम पाशविक ही होता है। वे मांस खाते ज़रूर हैं मगर उसके लिए कोई भी अप्राकृतिक कार्य नहीं करते हैं। वे मांस के लिए पशु-व्यापार नहीं करते, न ही मांस को कारखानों में काटकर पैक या निर्यात करते हैं। वे उसे लोहे के चाकू से नहीं काटते और न ही रसोई में पकाते हैं। वे उसमें मसाले भी नहीं मिलाते और बचने पर फ्रिज में भी नहीं रखते हैं। अगर हम मनुष्य इतने सारे अप्राकृतिक काम कर सकते हैं तो शाकाहार क्यों नहीं? शाकाहार को अगर आप अप्राकृतिक भी कहें तो भी मैं उसे मानवी तो कहूंगा ही।

अगर आप अपने शाकाहार के स्तर से असंतुष्ट हैं और उसे पौधे पर अत्याचार करने वाला मानते हैं तो उसे बेहतर बनाने के हजारों तरीके हैं आपके पास। मसलन, मरे हुए पौधों का अनाज एक पसंद हो सकती है। और आगे जाना चाहते हैं तो दूध पियें और सिर्फ़ पेड़ से टपके हुए फल खाएं और उसमें भी गुठली को वापस धरा में लौटा दें। नहीं कर सकते हैं तो कोई बात नहीं - शाकाहारी रहकर आपने जितनी जानें बख्शी हैं वह भी कोई छोटी बात नहीं है। दया और करुणा का एक दृष्टिकोण होता है जिसमें जीव-हत्या करने या उसे सहयोग करने का कोई स्थान नहीं है।
                                                                                                                                          -अनुराग शर्मा
दृष्टव्य : सुज्ञ: क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है

3 जुलाई 2010

मांसाहार प्रचार का भण्डाफ़ोड (तुलनात्मक क्रूरता)

मांसाहारी प्रचारक:- हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित

“हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.”

प्रत्युत्तर : वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

इस सच्चाई को जानने के बाद जैन-मार्ग से प्रभावित मानने का प्रश्न ही नहीं उठता। हां, कभी बाद में प्रवर्तित यज्ञों में पशुबलि रूप कुरीति का विरोध अवश्य जैन मत या बौद्ध मत नें किया होगा, लेकिन वह कुरीति का मात्र परिमार्जन था, वह अपने ही सिद्धान्तों का जीर्णोद्धार था। फिर भी अगर प्रभावित भी हुआ हो तो  इसमें बुरा क्या है? विकार और संस्कार का चक्र तो गतिमान रहता ही है। सुसंस्कृति किसी भी विचार के संसर्ग से और भी प्रगाढ होती है तो  यह उत्कर्ष है। सर्वे भवन्तु सु्खिनः सूक्त के लिए धर्म का मूल ही अहिंसा है। अहिंसा में कमी बेसी आने पर पुनः अहिंसा की ओर लौटना सिद्धांतोद्धार है।

मांसाहारी प्रचारक:- - पेड़ पौधों में भी जीवन

“कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.”

प्रत्युत्तर : अतीत में ऐसी किन 'ज़ाहिल' सभ्यताओं का मानना था कि पेड़-पौधो में जीवन नहीं है? आर्यावर्त में तो सभ्यता युगारम्भ में ही पुख्त बन चुकी थी, अहिंसा में आस्था रखने वाली आर्य सभ्यता तो आदिअकाल से ही न केवल वनस्पति में बल्कि पृथ्वी, वायु, जल और अग्नी में भी जीवन को प्रमाणित कर चुकी थी। जबकि विज्ञान को अभी वहां तक पहुंचना शेष है। अहिंसा की अवधारणा, हिंसा को न्यून से न्यूनत्तम, सुक्ष्म से सुक्ष्मतर करने की है और उस अवधारणा के लिए शाकाहार ही श्रेष्ठ माध्यम है।

मांसाहारी प्रचारक:- - पौधों को भी पीड़ा होती है

“वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञान कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं …………अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.”

प्रत्युत्तर : हाँ, उसके उपरांत भी बडी हिंसा की तुलना सूक्ष्म हिंसा कम अपराध ही है, इसी में अहिंसक मूल्यों की सुरक्षा है। एक उदा्हरण से समझें- यदि प्रशासन को कोई मार्ग चौडा करना हो, उस मार्ग के एक तरफ विराट निर्माण बने हुए हो, जबकि दूसरी तरफ छोटे साधारण छप्परनुमा अवशेष हो तो प्रशासन किस तरफ के निर्माण को ढआएगा? निश्चित ही वे साधारण व कम व्यय के निर्माण को ही हटाएंगे।  जीवन के विकासक्रम की दृष्टि से अविकसित या अल्पविकसित जीवन की तुलना में अधिक विकसित जीवों को मारना बड़ा अपराध है। रही बात पीड़ा की तो, अगर जीवन है तो पीडा तो होगी ही, वनस्पति जीवन को तो छूने मात्र से उन्हे मरणान्तक पीडा होती है। लेकिन यहां उनकी पीडा से भी अधिक जरूरी है अपनी सम्वेदनशीलता को बचाए रखना, अनुकम्पा महसुस करना। दूसरों की पीडा पर करूणा भाव को सुरक्षित रखना। यदि तडपते पशु को देख सम्वेदनाओं को पहुँचती चोट पहुचती है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण है,जैसे अगर किसी कारण से बालक की गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो, जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो। कहिए किस मृत्यु पर हमें अधिक दुख होगा? निश्चित ही अधिक विकसित होने पर दुख अधिक ही होगा। छोटे से बडे में क्रमशः  हमारे दुख व पीडा महसुस करने में अधिकता आएगी। क्योंकि इसका सम्बंध हमारे भाव से है। जितना दुख ज्यादा, उसे मारने के लिए इतने ही अधिक क्रूर भाव की जरूरत रहती है। अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा करने पर क्रूर भाव का स्तर बढता जाता है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक असम्वेदनशीलता की आवश्यकता रहती है, अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। इसलिए बार बार तडपते, प्राणहीन होते जीव की पीड़ा से हमारी सम्वेदनाएं कहीं अधिक कुंद होती है, मर जाती है। इसलिए सवाल हमारी मरती सम्वेदनाओं का है और उसकी जगह लेती क्रूरता का है।

मांसाहारी प्रचारक:- - दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!

“एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.”

"कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए."

प्रत्युत्तर : एकेन्द्रिय  और पंचेन्द्रिय को समझना आपके बूते से बाहर की बात है, क्योकि आपके उदाहरण से ही लग रहा है कि उसे समझने की न तो आपमें दृष्टि है न वह सामर्थ्य। किसी भी पंचेन्द्रिय प्राणी में, एक दो या तीन इन्द्रिय कम होने से, वह चौरेन्द्रिय,तेइन्द्रिय,या बेइन्द्रिय नहीं हो जाता, रहेगा वह पंचेन्द्रिय ही। वह विकलांग (अपूर्ण इन्द्रिय) तो माना जा सकता है, किन्तु पाँचो इन्द्रिय धारण करने की योग्यता वाला जीव  पंचेन्द्रिय ही रहता है। उसके मात्र इन्द्रिय अव्यव सक्रीय नहीं,  इन्द्रिय शक्ति व सामर्थ्य विद्यमान रहता है। जीव के एकेन्द्रीय से पंचेन्द्रीय श्रेणी का आधार, उसके इन्द्रिय अव्यव नहीं बल्कि उसकी इन्द्रिय शक्तियाँ है। नाक कान आदि तो उपकरण है, शक्तियाँ तो आत्मिक है।और रही बात सहानुभूति की तो निश्चित ही विकलांग के प्रति सहानुभूति अधिक ही होगी। अधिक कम क्या, दया और करूणा तो प्रत्येक जीव मात्र के प्रति होनी चाहिए, किन्तु व्यवहार का यथार्थ उपर दिए गये पीड़ा व दुख के उदाहरण से स्पष्ट है। भारतीय संसकृति में अभयदान देय है, न्यायाधीश बनकर सजा देना लक्ष्य नहीं है। क्षमा को यहां वीरों का गहना कहा जाता है, भारतिय संसकृति को यूँ ही उदार व सहिष्णुता की उपमाएं नहीं मिल गई। विवेक यहाँ साफ कहता है कि अधिक इन्द्रीय समर्थ जीव की हत्या, अधिक क्रूर होगी।

आपको तो आपके ही उदाह्रण से समझ आ सकता है………

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, आप के दूसरे भाई के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं। वह जवान होता है, और वह किसी आरोप में फांसी की सजा पाता है ।तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह उस भाई को छोड दें, क्यूंकि इसकी दो इन्द्रियाँ कम हैं, और वह सज़ा-ए-फांसी की पीड़ा को महसुस तो करेगा पर चिल्ला कर अभिव्यक्त नहीं कर सकता, इसलिए यह फांसी उसके बदले, इस दूसरे भाई को दे दें जिसकी सभी इन्द्रियाँ परिपूर्ण हैं, यह मर्मान्तक जोर से चिल्लाएगा, तडपेगा, स्वयं की तड़प देख, करूण रुदन करेगा, इसे ही मृत्यु दंड़ दिया जाय। क्या आप ऐसा करेंगे? किन्तु वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे। क्योंकि आप तो समझदार(?) जो है। ठीक उसी तरह वनस्पति के होते हुए भी बड़े पशु की घात कर मांसाहार करना बड़ा अपराध है।

यह एक यथार्थ है कि हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है। किन्तु विवेक यह कहता है कि जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। न्यून से न्यूनतम हिंसा का विवेक रखना ही मानवीय जीवन मूल्य है। वनस्पति आदि सुक्ष्म को आहार बनाने के समय हमें क्रूर व निष्ठुर भाव नहीं बनाने पडते, किन्तु पंचेन्द्रिय प्राणी का वध कर उसे अपना आहार बनाने से लेकर,आहार ग्रहण करने तक, हमें बेहद क्रूर भावों और निष्ठुर मनोवृति में संलिप्त रहना पडता है। अपरिहार्य हिंसा की दशा में भी अपने मानस को, द्वेष व क्रूर भावों से पडने वाले  दुष्प्रभाव से  सुरक्षित रखना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । इसी को भाव अहिंसा कहते है। अहिंसक मनोवृति का निर्माण करना है तो हमें बुद्धि, विवेक और सजगता से,  हिंसकभाव से सर्वथा दूर रहना पडेगा। साथ ही विवशता भरी अपरिहार्य हिंसा को भी छोटी से छोटी बनाए रखना, सुक्ष्म से सुक्ष्मतर करना, न्यून से न्यूनत्तम करना ही श्रेष्ठ उपाय है। अपने भोग को संयमित करना अहिंसा पालन ही है।

अब रही बात जैन मार्ग की तो, जैन गृहस्थ भी प्रायः जैसे जैसे त्याग में समर्थ होते जाते है, वैसे वैसे, योग्यतानुसार शाकाहार में भी, अधिक हिंसाजन्य पदार्थो का त्याग करते जाते है। वे शाकाहार में भी हिंसा का त्याग बढ़ाने के उद्देश्य से कन्दमूल, हरी पत्तेदार सब्जीओं आदि का भी त्याग करते है।और इसी तरह स्वयं को कम से कम हिंसा की ओर बढ़ाते चले जाते है। हिंसा को अल्प करते जाना ही अहिंसा का सोपान है।

जबकि मांसाहार में, मांस केवल क्रूरता और प्राणांत की उपज ही नहीं, बल्कि उस उपजे मांस में सडन गलन की प्रक्रिया भी तेज गति से होती है। परिणाम स्वरूप जीवोत्पत्ति भी तीव्र व बहुसंख्य होती है।सबसे भयंकर तथ्य तो यह है कि पकने की प्रक्रिया के बाद भी उसमे जीवों की उत्पत्ति निरन्तर जारी रहती है। अधिक जीवोत्पत्ति और रोग की सम्भावना के साथ साथ यह महाहिंसा का कारण है। अपार हिंसा और हिंसक मनोवृति के साथ क्रूरता ही मांसाहार निषेध का प्रमुख कारण है।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...