दृष्टांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दृष्टांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

14 जून 2024

गार्बेज ट्रक (कूडा-वाहन)

कूडा-वाहन

एक दिन एक व्यक्ति टैक्सी से एअरपोर्ट जा रहा था।  टैक्सी वाला कुछ गुनगुनाते हुए बड़े मनोयोग से गाड़ी चला रहा था कि सहसा एक दूसरी कार, पार्किंग से निकल कर तेजी से रोड पर आ गयी। टैक्सी वाले ने तेजी से ब्रेक लगाया, गाड़ी स्किड करने लगी और मात्र एक -आध इंच भर से,  सामने वाली कार से भिड़ते -भिड़ते बची।

यात्री ने सोचा कि अब टैक्सी वाला उस कार वाले को भला -बुरा कहेगा …लेकिन इसके उलट सामने वाला ही पीछे मुड़ कर उसे गलियां देने लगा।  इसपर टैक्सी वाला नाराज़ होने की बजाये उसकी तरफ हाथ हिलाते हुए मुस्कुराने लगा, और धीरे -धीरे आगे बढ़ गया। यात्री ने आश्चर्य से पूछा “ तुमने ऐसा क्यों किया ? गलती तो उस कार वाले की थी ,उसकी वजह से तुम्हारी गाडी लड़ सकती थी और हम होस्पिटलाइज भी हो सकते थे!”

“सर जी ”, टैक्सी वाला बोला, “बहुत से लोग गार्बेज ट्रक की तरह होते हैं। वे बहुत सारा गार्बेज उठाये हुए चलते हैं, फ्रस्ट्रेटेड, निराशा से भरे हुए, हर किसी से नाराज़।  और जब गार्बेज बहुत ज्यादा हो जाता है, तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए उसे दूसरों पर फैकने का मौका खोजने लगते हैं। किन्तु जब ऐसा कोई व्यक्ति मुझे अपना शिकार बनाने की कोशिश करता हैं, तो मैं बस यूँही मुस्कुराकर हाथ हिलाते हुए उनसे दूरी बना लेता हूँ।

ऐसे किसी भी व्यक्ति से उनका गार्बेज नहीं लेना चाहिए, अगर ले लिया तो समझो हम भी उन्ही की तरह उसे इधर उधर फेंकने में लग जायेंगे। घर में, ऑफिस में, सड़कों पर …और माहौल गन्दा कर देंगे, दूषित कर देंगे। हमें इन गार्बेज ट्रक्स को, अपना दिन खराब करने का अवसर नहीं देना चाहिए। ऐसा न हो कि हम हर सुबह किसी अफ़सोस के साथ उठें। ज़िन्दगी बहुत छोटी है, इसलिए उनसे प्यार करो जो हमारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। किन्तु जो नहीं करते, उन्हें माफ़ कर दो।”

मित्रों, बहुत ही गम्भीराता से सोचने की बात है, हम सौद्देश्य ही कूडा वाहन से कूडा उफनवाते है। फिर उसे स्वीकारते है, उसे उठाए घुमते है और फिर यत्र तत्र बिखेरते चलते है।  ऐसा करने के पूर्व ही हमें, गार्बेज ट्रक की अवहेलना नहीं कर देनी चाहिए??? और सबसे बड़ी बात कि कहीं हम खुद गार्बेज ट्रक तो नहीं बन रहे ???

इस कहानी से सीख लेते हुए, हमें विषादग्रस्त व कुंठाग्रस्त लोगों को उत्प्रेरित करने से बचना चाहिए। स्वयं क्रोध कर उनसे उलझने की बजाए उन्हें माफ करने की आदत डालनी चाहिए। सहनशीलता, समता और सहिष्णुता वस्तुतः हमारे अपने व्यक्तित्व को ही स्वच्छ और शुद्ध रखने के अभिप्राय से है, न कि अपने ही गुण-गौरव अभिमान की वृद्धि के लिए। समाज में शिष्टाचार, समतायुक्त आचरण से ही प्रसार पाता है। और इसी आचरण से चारों ओर का वातावरण खुशनुमा और प्रफुल्लित बनता है।

25 मई 2015

ईमानदारी की अपेक्षा

गाँव में एक पशुपालक रहता था जो दूध से दही और मक्खन बना, बेचकर रोजी चलाता था। हमेशा की तरह आज भी उसकी पत्नी ने  मक्खन तैयार करके दिया, और वह  उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ निकल पड़ा।  मक्खन गोल पिंड़ी के आकार में होता था और प्रत्येक पिंड़ी का वज़न एक किलो था। शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह अपने रोज के दुकानदार को बेच दिया। बदले में दुकानदार से चायपत्ती, चीनी, तेल,  साबुन, मसाले व दालें वगैरहा खरीदकर वापस अपने गाँव चला गया।

किसान के जाने के बाद, दुकानदार को मक्खन फ्रिज़र मे रखते हुए सहसा खयाल आया कि क्यूँ ना आज एक पिंड़ी का वज़न कर ही लिया जाए। वज़न करने पर पिंड़ी सिर्फ 900 ग्राम उतरी।  हैरत और संदेह से उसने सारी पिंडियाँ तोल डाली। प्रत्येक पिंड़ी 900-900 ग्राम ही थी। व्यापारी छले जाने के विषाद से भर उठा।

अगले हफ्ते किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा। दुकानदार आक्रोश में चिल्लाते हुए, किसान से कहा, कि वह दफा हो जाए, उसे किसी बे-ईमान और धोखेबाज़ व्यक्ति से व्यापार नहीं करना!! एक किलो बताकर, 900 ग्राम मक्खन थामानेवाले धूर्त की वह शक्ल भी देखना नही चाहता।

किसान ने अनुनय विनय की। बड़ी ही विनम्रता से दुकानदार से कहा "मेरे भाई मैं धूर्त नहीं हूं। मुझ पर संदेह न करो, हम गरीब अवश्य है किन्तु ठग नहीं। हमारे पास एक पुरानी सी तुला है, तोलने के लिए बाट (वज़न) खरीदने की हमारी हैसियत नहीं, इसलिए जो एक किलो चीनी आपसे तुलवाकर ले जाता हूँ, उसी पैकेट को तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर, दूसरे पलड़े मे भारोभार मक्खन तोल लेता हूँ।

दुनिया से ईमानदारी चाहने से पहले, हमें अपने गिरेबान में झांक कर अवश्य देख लेना चाहिए कि हम स्वयं दुनिया के साथ कितने ईमानदार है। अक्सर स्वयं की बेईमानी तो हमें चतुरता लगती है, या बौद्धिक चालाकी लगती है, किन्तु जब दुनिया से वही पलटकर हमारे सामने आए, तो हमारा क्रोध और आक्रोश नियंत्रण में ही नहीं रहता।

यदि हम चाहते है जगत में ईमानदारी का प्रचलन हो, तो सर्वप्रथम हमें दृढता और  निष्ठापूर्वक ईमानदार रहना होगा।

16 मार्च 2015

दुष्परिणाम

एक बार शीत ऋतु में राजा श्रेणिक अपनी पत्नी चेलना के साथ भगवान महावीर के दर्शन कर वापस महल की तरफ लौट रहे थे। रास्ते में एक नदी के किनारे उन्होंने एक मुनि को ध्यान में लीन देख। उन्हें देख कर रानी ने सोचा, धन्य हैं ये मुनि जो इतनी भयंकर सर्दी में भी निर्वस्त्र ध्यान कर रहे हैं। मुझे तो इतने कम्बल ओढने के बाद भी ठण्ड के मारे कंपकंपी छुट रही है।

ऐसा चिन्तन करते हुए, रानी श्रद्धा पूर्वक उन्हें प्रणाम कर राजा के साथ अपने महल लौट आयी। रानी के मन में उन मुनि की बात घर कर गई, जब भी उनको भयंकर ठण्ड का अनुभव होता, श्रद्धा से उनका मन मुनि के प्रति नतमस्तक हो जाता। रात्रि में रानी अपने कक्ष में बहुत से कम्बल अच्छे से ओढ कर सो रही थी, नींद में उनका एक हाथ कम्बल से बाहर चला गया, जब उनकी आँख खुली तो उन्होंने देखा की उनका हाथ ठण्ड के मारे अकड़ सा गया है, उन्हे मुनि का स्मरण हो आया, सम्वेदना से वह सहज ही बोल पडी, "उनका क्या हाल हो रहा होगा"।

राजा श्रेणिक जो पास में सो रहे थे, महारानी के ये शब्द कानों में पडे। उन्होंने सोचा, हो न हो, महारानी किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम सम्बन्ध है और अभी यह उसी के बारे में सोच रही है। इस स्थिति से उन्हें बहुत क्रोध आया। वे सोचने लगे की स्त्री जाति का कोई भरोसा नहीं, अगर मेरी पटरानी ही ऐसी है तो बाकि रानियों का क्या हाल होगा? इनके सतीत्व पर विश्वास नहीं किया जा सकता।

प्रातः काल क्रोधावेश में राजा जैसे ही कक्ष से बाहर आए, उन्हें सामने से आता महामंत्री अभयकुमार दिखाई दिया। उन्होने महामंत्री को आज्ञा दी कि तुम अंत:पुर को रानियों समेत जला कर भस्म कर दो। कहते हुए महाराज वहां से चले गए। अभयकुमार बुद्धिमान व्यक्ति था, वह जानता था कि क्रोध विवेक का नाश कर देता है। क्रोधावेश में किए गए कार्य पर बाद में पछताना भी पड़ सकता है्। अतः  उन्होंने महल के पास स्थित गजशाला को खाली करवा कर, उसमे आग लगवा दी। जिससे कोई अनर्थ भी न हो और महाराज की आज्ञा का उल्लंघन भी न हो।

आज्ञा देकर महाराज उपवन में घुमने चले गए, लेकिन उनके मन को शांति नहीं मिल रही थी। अपने मन के विषाद एवं प्रश्नों का हल जानने वे भगवान महावीर के पास पंहुचे। भगवान को वंदन कर उन्होंने पूछा की “भगवन ! वैशाली गणराज्य के राजा चेटक की पुत्री के एक पति है या अनेक पति” तब महावीर बोले “ राजन ! चेटक की एक क्या सातों ही पुत्रियों के एक ही पति है। तुम्हारे अंत:पुर की सभी रानियाँ पवित्र पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली है।” श्रेणिक को किंकर्तव्यविमूढ़ देख कर महावीर बोले, “ राजन ! कल तुमने अपनी पत्नी चेलना के साथ नदी के तट पर एक मुनि के दर्शन किये थे?”, "हाँ प्रभु ! किये थे" श्रेणिक बोले। तब महावीर ने रात में हुई घटना को बताते हुए कहा “जिसे तुम अपनी रानी का किसी पुरुष के लिए स्नेह समझ रहे थे वो तो असल में उन मुनि की सहनशीलता के लिए सम्वेदना का अनुभव था” इतना सुनते ही श्रेणिक के पावों तले ज़मीन खिसक गई। वे उलटे पाँव भागते हुए वापस अपने महल पंहुचे, परन्तु महल की तरफ से उठती हुई लपटों को देख कर उनका दिल बैठ गया।

वे मन ही मन अपने आप को कोस रहे थे। यह तो घोर अनर्थ हो गया ! स्त्री हत्या वो भी निरपराध की ! महापाप हो गया। तभी राजा को सामने से आता हुआ अभयकुमार दिखाई दिया। राजा ने क्रुद्ध होकर उससे कहा “ अभय ! आज तेरी बुद्धि को क्या हो गया था। जल्दबाजी में भयंकर गलत कार्य किया। मैने निरपराध अबलाओं का अग्निदाह करवा दिया। जा मेरी नज़रों से दूर हो जा।" यह सुनते ही अभयकुमार को मानो मन मांगी मुराद मिल गई । अभयकुमार तो कब से संसार त्याग कर दीक्षित होना चाहता था, परन्तु राजा श्रेणिक उसे नहीं छोड़ रहे थे, आज राजा की आज्ञा मिलते ही वो तुरंत वहां से निकल कर भगवान महावीर की शरण में पंहुच गया। इधर जब राजा को अपने महल पंहुच कर सच्चाई का पता चला तो मन ही मन उन्हें अभय की सूझ बुझ तथा विवेक पर गर्व महसूस हुआ। साथ ही अपनी मुर्खता, वहम तथा उतावलेपन पर उन्हें बहुत लज्जा आयी। उन्होंने मन में सोचा “मेरे वहम तथा अविवेक से कितनी बड़ी दुर्घटना घट जाती, निश्चित ही क्रोध आँख वाले को भी अँधा बना देता है।"

14 मार्च 2015

सीमाएँ

एक कुएं में मेंढकों का एक समूह रहता था। समूह क्या उनका पूरा संसार ही था। एक समय की बात है जोरदार वर्षा के कारण कुआं पानी से लबालब भर गया। एक क्षमतावान मेंढक ने अपने पूरे सामर्थ्य से छलांग लगाई, परिणामस्वरूप वह कुएं से बाहर था। भीतर के मेंढक स्वयं को कुएं के सुरक्षा घेरे में सुरक्षित रखने में सफल रहे। एक जिज्ञासु बुद्धिमान मेंढक ने अपने मुखिया से प्रश्न किया, "चाचा, क्या दुनिया इतनी ही है जो हमें दिखाई देती है?"
मुखिया ने जवाब दिया, "हां, ये संसार इतना ही है जो हमें दिखायी देता है। अन्य विद्वानों से भी मैने यही जाना है, मैने अपने उम्र भर के अनुभव से भी इसे प्रमाणित किया है।"
"चाचा, दुनिया इससे बडी क्यों नहीं हो सकती?", युवा मेंढक ने फिर प्रश्न किया। चाचा ने मुस्काते हुए कहा, "उपर देख! क्या दिखाई देता है? आसमान? कितना बडा है आसमान?"
"वह तो हमारे कुएं के बराबर ही है, युवा ने जवाब दिया।
"फिर बताओ जो आसमान हमें साफ साफ सीमांत तक दिखायी देता है तो दुनिया उससे बडी कैसे हो सकती है?"
युवा के लगातार प्रश्नों से परेशान होकर बूढे मुखिया ने कहा, "जो सामने है उस पर विश्वास करना चाहिए, व्यर्थ की कल्पनाएं नहीं गढ़नी चाहिए।" युवा मैंढक भी बुद्धिमान था और जिज्ञासु भी। उसने अनुमान व्यक्त किया, "चाचा हो सकता है हमारे पास ही एक और कुंआ हो, उसका भी अपना आकाश हो? कभी कभी में निकट से हल्की सी आवाजें सुनता हूं।"
"हो सकता है, किन्तु वह सब जानना असंभव है अतः इन फालतू की बातों में सर खपाना व्यर्थ काम है। तुम्हारे पास छोटा सा जीवन है, यह हमारा संसार भी पूरी तरह नहीं देख पाए हो, अतः खाओ पिओ और मौज करो।"

कुएं से बाहर गए मेंढक ने विराट संसार प्रत्यक्ष देखा, उसने रमणीय वन, विशाल सरोवर व असीम सागर देखे, आहार की प्रचूरता और स्वछंद असीमित भ्रमण देखा था। वह उसी समय अपने कुएं की मुंडेर पर था। उसने अपने मित्रों की सीमित सोच को सुना। वह यथार्थ बताना चाहता था। किन्तु उसकी आवाज खुले में फैल जाती थी और कुएं के मेंढको तक नहीं पहूंच पा रही थी। कुएं के भीतर की आवाजे, ध्वनि विस्तरण के कारण स्पष्ट सुनायी दे रही थी। एक बार तो उसने सोचा, कुएं में छलांग लगा कर, उन्हे यथार्थ बता दूं , उनके कल्याण का मार्ग बता दूं। किन्तु नीचे गिरने में नुक्सान ही नुक्सान था, या तो वह जान से जाता या फिर पुनः सीमाओं में कैद हो जाता। इसीकारण यथार्थ कभी पुनः कुए में नहीं पहूंचता, कभी पहूंच भी जाए तो उसपर विश्वास नहीं किया जाता।

ठीक उसी तरह हमारा ज्ञान कुएं जैसा क्षुद्र और हमारा अहंकार कुएं की गहराई जैसा विशाल है। जिसका ज्ञान कुएं समान सीमित और अन्धकार में डूबा हो, वह अनजाने अनन्त को कैसे समझ सकेगा? अहंकार सदा अज्ञान में ही होता है। अहंकार हटाकर अज्ञानता की सीमाओं से आगे की सोच प्रारम्भ हो तो अनंतता के समक्ष कुएं की क्षुद्रता स्वयं भंग हो जाती है। किन्तु अनंतता के दर्शन तभी संभव हैं जब कुएं की देखी भाली सीमाओं का आग्रह टूटे। जो विचार अपने को किसी आग्रह की चारदीवारी में बांध लेता है, वह कभी सत्य पा नहीं सकता।

12 मार्च 2015

भाव परिणाम

एक बार जब राजा श्रेणिक भगवान महावीर के दर्शनार्थ जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें एक मुनि घोर तपस्या में लीन दिखाई दिए। कायोत्सर्ग की अवस्था में सूर्य की ओर मुख करके वो पर्वत के सामान स्थिर अपने ध्यान में लीन थे। राजा श्रेणिक ने उनको वंदन किया तथा प्रभु महावीर की देशना सुनने चल दिये। वितराग वानी का श्रवण करने के पश्चात राजा श्रेणिक ने पुछा “भगवन ! आज आते समय रस्ते में एक महान तेजस्वी मुनि के दर्शन हुए, उन ध्यान में लीन मुनि की तपस्या कितनी महान होगी, हे भगवन, वे मुनि किस उत्तम गति को प्राप्त होंगे?” महावीर बोले “यदि वे अभी, इसी क्षण मरण करें तो सातवीं नर्क में जाएँगे “

राजा श्रेणिक चकित होकर बोले “ इतने महान तपस्वी, इतनी उग्र साधना और सांतवी नर्क, ये कैसे संभव है भगवन ?” महावीर बोले “ यदि वह इस समय मृत्यु को प्राप्त करे तो वो छठी नर्क में जाएँगे” श्रेणिक बोले “ यह कैसे, एक क्षण में सातवीं से छठी नर्क ?” “हाँ राजन ! अभी उनके पाँचवी नर्क के कर्म बंधन हो रहे हें” श्रेणिक को बहुत आश्चर्य हुआ, वह कौतुहलवश पूछने लगा “ प्रभु ! अब ..” “अब उसके कर्म चौथी नर्क के योग्य हें” इस प्रकार श्रेणिक पूछता रहा और महावीर उत्तर देते रहे तथा कुछ ही क्षणों में वो तीसरी, दूसरी तथा पहली नर्क को पार कर ऊपर की ओर तीव्र गति से बढ़ने लगे। महावीर बोले “श्रेणिक! अब वह साधक देवभूमि तक पंहुच गया है” एक ओर जहाँ साधक का अन्दर ही अन्दर आरोहण चालू था तो दूसरी तरफ श्रेणिक के प्रश्न तथा प्रभु के उत्तर। “श्रेणिक ! अब वह सौधर्म देवलोक से भी आगे निकल गया है तथा सर्वार्थ सिद्धि की तरफ बढ़ रहा है” प्रभु का वाक्य पूरा होते होते देव दुंदुभी बज उठी और देवी देवता पृथ्वी पे जहाँ वो साधक था वहां पुष्प वर्षा करने लगे। महावीर बोले “उस साधक को केवल ज्ञान प्राप्त हो गया है”

श्रेणिक ने पुछा "भगवन ! जो साधक कुछ क्षण पहले सातवीं नर्क ये योग्य था, उसे केवल ज्ञान प्राप्त हो गया? यह कैसा रहस्य है" तब महावीर बोले “ जब तुमने सबसे पहले ये प्रश्न पुछा तब वो साधक बाहर से भले ही साधना में लीन दिखाई दे रहा था पर अपने अंतर्मन में वह एक भयंकर युद्ध लड़ रहा था| वह साधक कोई और नहीं बल्कि राजा प्रसन्नचन्द्र थे जिन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र को सुपुर्द कर दीक्षा ग्रहण कर ली थी। आज जब वह ध्यान में लीन थे तब उनके कानों में दो सैनिकों के शब्द पड़े, "देखो एक तरफ ये राजा अपने राज्य को अनुभवहीन पुत्र को देकर यहाँ ध्यान में लीन है और दूसरी तरफ पड़ोसी राजा ने नए राजा की अनुभवहीनता का फायदा उठा कर राज्य पर आक्रमण कर दिया है। उसकी सेना ने राज्य को चारों तरफ से घेर लिया है, सेनाएं आगे बढ़ रहीं हैं और कुछ ही समय में इस राजा प्रसन्नचन्द्र का पुत्र या तो भाग जाएगा या वहीँ समाप्त हो जाएगा।"

इतना सुनते ही प्रसन्नचन्द्र का मन विचलित हो गया, वो वैराग्य के मार्ग से भटक कर राग द्वेष के रास्ते पे चला पड़ा। वह मन ही मन पड़ोसी राज्य की सेना के साथ युद्ध लड़ने चला गया और उसकी सेना से भयंकर युद्ध करने लग। जब तुमने मुझसे उसकी गति के बारे में पुछा तब वह तीव्र क्रोध में भर कर महाहिंसा में अनुरक्त था। नहाया हुआ महाकाल की तरह भयंकर युद्ध कर रहा था, वो अपने वीतराग के मार्ग से पूरी तरह हट चुका था| इसीलिए वो उस समय सातवीं नर्क के योग्य था। उसके मन के युद्ध में एक समय ऐसा आया जब उसके सारे शस्त्र समाप्त हो गए परन्तु एक शत्रु अभी भी सामने बचा था, तो राजा ने अपने मुकुट से ही उस पर वार करने का निश्चय किया। मुकुट लेने के लिए जैसे ही हाथ अपने सर पर ले गया, वहां मुकुट नहीं बल्कि संयम युक्त मुण्डित सर था। वीतराग चरित्र के लिए लुन्चित सर था, हाथ स्पर्श करते ही उसके मन की धारा ने पलटा खाया। वह सोचने लगा कौनसा पुत्र, कैसा राज्य और कौन शत्रु ? मैंने तो समस्त सांसारिकता का त्याग करके, अहिंसा-धर्म अंगीकार किया है। मैं कैसा कायर जरा से संयोग से विचलित हो संयम मार्ग से भटकने लगा। वे दुष्चिन्तन के पश्चाताप से भर उठे। आत्मग्लानी के ताप से विचारों के बुरे कर्म को जलाने लगे। अब बाहर के शत्रु से युद्ध करने के स्थान पर वे अपने अन्दर के शत्रु से युद्ध करने लगे। जैसे जैसे वे अपने अन्दर का कलुष धो रहे थे, वैसे वैसे उनके अन्तरमन का तम नष्ट होता जा रहा था। वे नर्क से स्वर्ग और अंततः साधना की परम सिद्धि के द्वार तक पंहुच गए।"

यह सुन कर श्रेणिक मन में सोचने लगे “मन कितना विचित्र है ! संकल्प कितने बलवान होते हें! विचार जब अधोमुखी हों तो सातवीं नर्क तक ले जाते हैं और जब उर्ध्वमुखी हों तो मुक्ति का द्वार खोल देते है।

मांस का मूल्य


मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि - "देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है?"

मंत्रि-परिषद्  तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।

उसने मुस्कराते हुए कहा, "राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।"

सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।

श्रेणिक ने उससे कहा, "तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारे में क्या मत है?"

प्रधान मंत्री ने कहा, "यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।"

रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था। अभय ने द्वार खटखटाया।

सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।

प्रधान मंत्री ने कहा,- "संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।"

यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!

उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।

श्रेणिक ने पूछा, "ये मुद्राएं किसलिए हैं?"

प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बो्ले,- " दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?"

जीवन का मूल्य अनन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सबको अपनी जान प्यारी होती है।
निरामिष पर
(Price Versus Cost of Meat - English translation of this article is available at Niramish English)

10 मार्च 2015

परिमार्जन ऋजुता

किसी समय वाणिज्य नामक शहर में आनंद नामक व्यापारी रहता था। वह अपार धन संपदा का स्वामी था तथा राजा भी उसका सम्मान करता था| एक बार उस शहर में भगवान महावीर स्वामी पधारे। आनंद भी उनके प्रवचन को सुनने पहुंचा। भगवान के प्रवचन को सुनकर उसने श्रावक धर्म स्वीकार कर लिया।

चौदह वर्ष तक श्रावक धर्म का पालन करने के पश्चात, उसने सारे सांसारिक कार्यों से विरक्त होने का निश्चय किया। उसने अपने पुत्रों को अपने व्यापार तथा परिवार की ज़िम्मेदारी सुपुर्द करते हुए कहा, "अब उसके धर्मध्यान में किसी तरह का व्यवधान न डाला जाए।" इस प्रकार वो अपना शेष जीवन धर्मध्यान में व्यतीत करने लगा।

धर्म का आचरण करते हुए उसे 'अवधिज्ञान' की प्राप्ति हो गई। कुछ समय पश्चात् वहाँ, भगवान महावीर का पुन: पधारना हुआ। जब उनके शिष्य गौतम स्वामी गोचरी के लिए शहर में भ्रमण कर रहे थे,  उन्होंने आनंद के गिरते हुए स्वास्थ्य एवं उसके 'अवधिज्ञान' प्राप्ति के बारे में सुना तो उनसे मिलने का निश्चय किया। स्वयं गौतम स्वामी को अपने घर आया देख आनंद बड़ा प्रसन्न हुआ। उन्होने विवशता में बिस्तर पर लेटे लेटे ही गौतमस्वामी का वंदन किया। चर्चा के मध्य आनंद ने अपने अवधिज्ञान उपार्जन के बारे में गौतम स्वामी को बताते हुए कहा कि वह बारहवे देवलोक तक देख सकता है्।

अवधिज्ञान का विस्तार जान गौतमस्वामी को संशय हुआ। गौतम स्वामी बोले, गृहस्थ को अवधिज्ञान होना तो संभव है, किन्तु वह इतनी दूर तक नहीं देख सकता। तुम्हारा यह कहना असत्य संभाषण है। तुम्हें सत्य व्रत को खण्डित करने के लिए, अर्थात् असत्य बोलने के लिए प्रायश्चित लेना चाहिए। यह सुनकर आनंद अचम्भित हो गए, वे जानते थे, वे सत्य बोल रहे हैं। उन्होने भगवान महावीर के प्रधान गणधर गौतम स्वामी से निवेदन किया,  “हे भगवन ! क्या सत्य बोलने पर भी प्रायश्चित किया जाना आवश्यक है?”

यह सुनते ही गौतम स्वामी त्वरित सचेत हुए। अपना संदेह दूर करने के लिए वे प्रभु महावीर स्वामी के समीप पंहुचे और अपने व आनंद के सम्वाद का वृतांत कह सुनाया। तब महावीर स्वामी बोले, "गौतम!! आनंद सत्य कह रहा हैं। आप जैसा ज्ञानी व्यक्ति, ऐसी भूल कैसे कर सकता है?" यह सुनते ही गौतम स्वामी उलटे पैर वापस आनंद के पास पंहुचे तथा अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। साथ ही कहा, "प्रायश्चित का भागी मैं हूँ आनन्द!!" आनंद को योग्य समाधान से संतोष उपजा।

उसे धर्म-मूल्यों के संरक्षण का साक्षात अनुभव हुआ,  भगवान के प्रथम गणधर स्वयं गौतम स्वामी जैसे महाज्ञानी, महात्मा भी भूल होने पर एक साधारण गृहस्थ से भी क्षमायाचना करने में नहीं हिचकिचाते, अपने ज्ञान का उनको किंचित भी अहंकार नहीं था। उसने सोचा, ऐसा धर्म तथा ऐसे ज्ञानी की संगति मिलने से वह धन्य हो गया।
आर्जव, ऋजुता या सरलता ही आपके चरित्र को विमल करती है। ये गुण-साधना, चरित्र व व्रतों का परिमार्जन कर, उन्हे परिशुद्ध करते रहते है।

8 मार्च 2015

अधूरप

भादो की काली अंधियारी रात में घने काले बादल गरज गरज कर बरस रहे थे, चारों ओर अंधकार छाया था और अत्यंत तीव्र बारिश हो रही थी, बिजलियाँ रह रह कर कौंध रही थ। महाराज श्रेणिक और महारानी चेलना अपने झरोखे से वर्षा का आनंद ले रहे थे। तभी रात्रि के गहन अंधकार को चीरते हुए, दूर एक बिजली चमकी, राजा व रानी ने बिजली की रौशनी में देखा की एक वृद्ध व्यक्ति, बारिश में उफनती नदी के तट से लकड़ियाँ बीन रहा है।

उस वृद्ध का श्रम देख दोनों चिंतित हो गए। हमारे राज्य में ऐसा भी कोई दरिद्र है जो दिन भर के कठिन परिश्रम के उपरांत भी दो वक्त की रोटी का जुगाड नहीं कर पा रहा, तभी तो इतनी भीषण वर्षा में, अपने प्राणों की परवाह न करते हुए, ये वृद्ध लकड़ियाँ इक्कठी कर रहा है। सम्पन्न मगध राज्य में इतनी दरिद्रत? ऐसी बारिश व अंधेरे में तो जानवर भी बाहर नहीं निकलते और यहाँ तो आदमी को अपने पेट की आग बुझाने के लिए मौत से खेलना पड़ता हैै!! सोचकर राजा का हृदय दुखी हो गया, उन्हे उस वृद्ध पर दया आ गई। राजा श्रेणीक ने तुरंत अपने सेवकों को बुलाकर निर्देश दिया कि जाओ और नदी पर जो वृद्ध व्यक्ति लकड़ियाँ इक्कठी कर रहा है, उसका पता लगाओ और प्रातःकाल उसे राज दरबार में उपस्थित करो। वृद्ध की दरिद्रता के बारे में सोच सोच कर राजा को रात भर नींद नहीं आई, तूफानी बारिश में ठंड से काँपता वह वृद्ध काय शरीर बार बार स्मृति को झंझोड़ रहा था।

प्रात: सेवकों ने एक व्यक्ति को महल में पेश करते हुए राजा से कहा, “महाराज यही वह व्यक्ति है जो कल रात नदी से बह आई लकड़ियाँ इक्कठी कर रहा था।” राजा ने उस व्यक्ति का अवलोकन किया। शरीर पर बेशकीमती रेश्मी वस्त्र, कानों में मणि जड़ित कुंडल तथा हाथों में हीरों की अंगूठियाँ देख, राजा को लगा कि सेवक गलती से किसी अन्य व्यक्ति को पकड़ लाए हैं। उसने सेवकों को क्रोध में कहा “ये किन्हें पकड़ कर लाए हो, तुम लोगों से कुछ भूल हुई है” सेवक बोले “ नहीं महाराज! यही वो व्यक्ति है जो कल रात बारिश में नदी के किनारे पर लकड़ियाँ इक्कठी कर रहा था, हमसे कोई भूल नहीं हुई है|” राजा ने आश्चर्यचकित होकर उस व्यक्ति से उसका परिचय पुछा।

वह व्यक्ति बोला “ महाराज ! मैं आपके ही राज्य का एक व्यापारी हूँ, मुझे लोग "मम्मण सेठ" के नाम से जानते हैं।” राजा बोले “आप दिखने में तो समृद्ध व सुखी लगते हैं, फिर इतनी बारिश में नदी के किनारे जाकर अपने प्राणों को दांव पे लगाने की क्या ज़रूरत थी।” इस पर मम्मण सेठ बोला “महाराज! दिखने में तो मैं बड़ा ही सम्पन्न व सुखी हूँ पर मेरे मन की पीड़ा को बस मैं ही जनता हूं। मैं एक बहुत बड़े अभाव से ग्रस्त हूँ, जिसकी पूर्ती के लिए मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है, ये सुन्दर वस्त्र एवं आभूषण तो मात्र, कहीं आने जाने के लिए रखे हैं, अन्यथा मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। सब कुछ लगाकर भी मेरी कमी पूरी नहीं हो रही है। इसी कारण में रात्री श्रम से नदी पर लकड़ियाँ इक्कठी करने में लगा रहता हूं। जब तक वह अभाव, वह कमी पूरी नहीं हो जाती, मुझे कठोर परिश्रम करते रहना होगा” राजा बोले, “ऐसी कौनसी कमी है आपको? मुझे बताइए, हो सकता है मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ।”

सेठ बोला “महाराज मेरे पास एक परम सुन्दर बैल है, उसी की जोड़ी का दूसरा बैल मुझे चाहिए। इसीलिए ये कठोर परिश्रम कर रहा हूँ।” राजा बोले “ अगर इतनी सी बड़ी बात ह तो आप हमारी वृषभशाला में जाइये और जो भी बैल पसंद आए ले जाइये “ सेठ बोला “ महाराज! आपकी इस कृपा के लिए धन्यवाद, किन्तु मेरे बैल की जोड़ी का एक भी बैल आपकी वृषभशाला में नहीं है।” यह सुनकर महाराज सोच में पड़ गए कि ऐसा कैसा बैल है जिसकी जोड़ का कोई बैल हमारी विशाल वृषभशाला में भी नहीं है। राजा बोले “ऐसा कैसा बैल है आपके पास, उसे लेकर आइये, हम उस अद्वितीय बैल को देखना चाहेंगे।” सेठ बोला “महाराज ! मेरा बैल यहाँ नहीं आ सकता, उसे देखने के लिए तो आपको मेरा घर ही पवित्र करना पड़ेगा”

राजा की उत्सुकता और बढ़ गई। उन्होंने अपने मंत्री अभयकुमार से मंत्रणा कर, अगले दिन ही सेठ के घर जाना निश्चित किया। जब रानी ने राजदरबार में घटा पूरा वृत्तांत सुना तो वह भी उत्सुक हुई और साथ चलने के लिए तत्पर हुई। अगले दिन महाराज श्रेणिक अपने मंत्री अभयकुमार तथा पत्नी चेलना के साथ सेठ के घर पहूँचे। मम्मण सेठ ने महाराज का यथायोग्य स्वागत किया। उत्सु्क राजा ने कहा  “सेठ ! सीधे ही अपनी गौशाला में ले चलो, हमें केवल तुम्हारा बैल देखना है।” तब सेठ ने कहा कि उसका बैल गौशाला में नहीं बल्कि घर में है। राजा ने मन ही मन सोचा, कैसा मूर्ख है ये सेठ जो बैल को घर में रखता है।

सेठ तीनों को लेकर अपने मकान के तहखाने में गया, आगे बढ़कर जैसे ही एक कक्ष का पर्दा हटाया की चारों और रंग बिरंगा प्रकाश फ़ैल गया। सामने  हीरे, मोती तथा रत्नों से जड़ित एक सोने के बैल की मूर्ति थी। जिसकी चमक चारों और आभा फैला रही थी। बैल की आँखों में अत्यंत दुर्लभ मणियाँ थीं। सिंग तथा पूँछ पर नीलम और पन्ने जड़े थे। राजा, रानी एवं मंत्री उस बैल को देखकर आवाक रह गए। उन्होंने ऐसा दुर्लभ बैल आजतक नहीं देखा था। राजा को चकित देखकर सेठ बोला “महाराज ! कई वर्षों पहले मैंने अपने व्यापार से कमाए धन को एक स्थान पर सुरक्षित रखने के लिए यह बैल बनवाया था, परन्तु उस समय मुझे भी नहीं मालूम था की यह इतना सुन्दर बन जाएगा। मैं दिन रात बस इसी के बारे में सोचता रहता। एक दिन मेरे मन से प्रेरणा हुई कि अगर  ऐसा ही दूसरा बैल होता तो इसकी जोड़ी कितनी सुन्दर होती, दोनों साथ में खड़े होते तो इनका सौंदर्य तथा वैभव अद्भुत होता!! बस फिर क्या था,  मैंने  ऐसा ही एक और बैल बनाने की ठानी, परन्तु मेरे पास इतना धन अब शेष नहीं बचा था कि इस अजोड़ की जोड़ का एक और बैल बनाया जा सके। धन इक्कठा करने के लिए मैंने व्यापार में जोरदार परिश्रम करना प्रारम्भ किया, अपने सभी खर्चों को कम कर दिया, रुखी सुखी खाता, फटे पुराने कपड़े पहनता, किसी तरह के सुख-वैभव का नहीं उपभोग करता, परन्तु फिर भी उतना धन इक्कठा नहीं हो पाया। अपनी इस आकांक्षा को पूरण करने के लिए अब में दिन भर व्यापार करता हूँ तथा रात में नदी से लकड़ियाँ लाकर बेचता हूँ ताकि अधिक से अधिक धन इक्कठा हो पाए। यह कहते हुए, व्यापारी तीनों को एक दुसरे कक्ष में ले गया। कक्ष का पर्दा जैसे ही हटा, वहां भी पहले के समान एक हीरे, मोतियों से जड़ा सोने का सुन्दर बैल था।

उसे दिखा कर सेठ बोला “ महाराज ! ये उसकी जोड़ी का बैल है। ये लगभग पूरा बन चुका है, केवल दाहिने सिंग का कुछ हिस्सा बनाना बाकि है, बस उसी के लिए मैं रोज़ नदी पे जाता हूँ।” राजा, रानी तथा मंत्री आश्चर्य से चकित होकर उस सेठ की बातों को सुन रहे थे। अंत में राजा ने कहा, “सेठ ! आप सत्य कहते थे, ऐसा बैल तो मेरी वृषभशाला में हो ही नहीं सकता। इतना कहकर वे वापस अपने महल लौटने लगे। मन ही मन राजा को कभी सेठ के उन बैलों पर विस्मय होता, तो कभी सेठ की बैल बुद्धि पे तरस आता, जिसके कारण वो अपनी अपार धन सम्पदा का सुख भोगने तथा दान पुण्य करने के बजाय, बैल बनाने में लगा है। जो उसके लोभ को और बढाने के अतिरिक्त, किसी काम में नहीं आने वाला।

राजा ने रानी से कहा "देवी ! क्या आप लोभ में अंधे इस सेठ की गरीबी मिटा सकती है?" रानी बोली " लोभ तथा ममत्व में डूबे इस सेठ के एक क्या, अनंत जोड़ियाँ भी बन जाए, तब भी एक जोड़ी तो बाकि रह ही जाएगी। ऐसे व्यक्ति की कोई सहायता नहीं कर सकता।लोभ और तृष्णा का कहीं भी अंत नहीं है।

1 मार्च 2015

सदुपयोग

पुराने समय की बात है, छोटे से गाँव में एक किसान रहता था। वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरने से स्वच्छ पानी लाया करता था। इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था, जिन्हें एक लाठी से कावड़ की तरह कंधे के दोनों ओर लटका लेता था।

उनमे से एक घड़ा तो सही था किन्तु दूसरा कहीं से फूटा हुआ था। इसी वजह से रोज़ घर पहुँचते -पहुचते आधा हो जाता था। किसान घर डेढ़ घड़ा पानी ही ले जा पाता था। ऐसा दो वर्षों तक चलता रहा।

साबूत घड़े को बड़ा घमंड था कि वह अखंड है और पूरा पानी घर पहुंचता है, उसमें कोई कमी नहीं है। वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस पर शर्मिंदा रहता कि वह आधा पानी ही घर पंहुचा पाता था। उसे ग्लानि होती कि उसके कारण किसान की मेहनत बेकार चली जाती है। फूटा घड़ा यह सोच कर परेशान रहने लगा। उससे रहा नहीं गया और एक दिन उसने किसान से कहा ,“मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ”

“क्यों ?", किसान ने पूछा , “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”

“शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ , और पिछले दो सालों से आधा ही पानी पहुंचा पाया हूँ, मुझमें यह बहुत बड़ी कमी है, और इसकारण आपकी मेहनत बर्बाद होती रही है”, फूटे घड़े ने दुखी स्वर में कहा।

किसान को घड़े की बात सुनकर दुःख हुआ और वह बोला, “कोई बात नहीं, मैं चाहता हूँ कि आज तुम लौटते समय रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो”

घड़े ने वैसा ही किया, वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया , खिले हुए फूलों को देखकर उसकी उदासी कुछ दूर हुई मगर घर पहुँचते – पहुँचते फिर वह आधा खाली हो चुका था, वह मायूस हो, पुनः किसान से अफसोस व्यक्त करने लगा।

किसान ने कहा,”शायद तुमने ध्यान नहीं दिया, रास्ते के एक किनारे ही हरियाली व फूल खिले थे। वे फूल केवल तुम्हारी तरफ के किनारे थे। साबूत घड़े की तरफ के किनारे एक भी फूल नहीं था। ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था, मैंने उस कमी का सदुपयोग किया और तुम्हारी तरफ के किनारे भाँती भाँती के फूलों के बीज बिखेर दिए। तुम रोज़ थोडा-थोडा कर उन्हें सींचते रहे और इस तरह तुम्हारे छिद्र से होते स्राव ने रास्ते को खूबसूरत बना दिया। तुम्ही सोचो अगर तुम्हारे में यह छिद्र न होता तो तुम कभी सिंचाई न कर पाते और यह मार्ग इतना मनोरम न बनता।”

फूटा घड़ा अपनी कमी का भी सदुपयोग होते देख आत्मविश्वास से भर उठा।

मित्रों सभी सम्पूर्ण नहीं होते। कोई न कोई कमी हम सभी में होती है। ये कमियां ही हमें अनोखा बनाती हैं। यदि हम किसी कमी पर आत्मग्लानि महसूस करने की जगह उस कमी के भी सदुपयोग का मार्ग निकाल लें तो जीवन किसी भी दशा में मूल्यवान हो जाता है।

31 जनवरी 2015

विश्वास ही विषमता को दूर रखता है।


संत कबीर रोज सत्संग किया करते थे। दूर-दूर से लोग उनकी बात सुनने आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने पर भी एक आदमी बैठा ही रहा। कबीर ने इसका कारण पूछा तो वह बोला, ‘मुझे आपसे कुछ पूछना है। मैं गृहस्थ हूं, घर में सभी लोगों से मेरा झगड़ा होता रहता है। मैं जानना चाहता हूं कि मेरे यहां गृह क्लेश क्यों होता है और वह कैसे दूर हो सकता है?’

कबीर थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘लालटेन जलाकर लाओ’। कबीर की पत्नी लालटेन जलाकर ले आई। वह आदमी भौंचक देखता रहा। सोचने लगा इतनी दोपहर में कबीर ने लालटेन क्यों मंगाई। थोड़ी देर बाद कबीर बोले, ‘कुछ मीठा दे जाना।’ इस बार उनकी पत्नी मीठे के बजाय नमकीन देकर चली गई। उस आदमी ने सोचा कि यह तो शायद पागलों का घर है। मीठा के बदले नमकीन, दिन में लालटेन। वह बोला, ‘कबीर जी मैं चलता हूं।’

कबीर ने पूछा, ‘आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या अभी कुछ संशय बाकी है?’ वह व्यक्ति बोला, ‘मेरी समझ में कुछ नहीं आया।’ कबीर ने कहा, ‘जैसे मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी घरवाली कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो। इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत। लेकिन नहीं, उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी। मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गई। हो सकता है घर में कोई मीठी वस्तु न हो। यह सोचकर मैं चुप रहा। इसमें तकरार क्या? आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार में न फंसने से विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो गई।’ उस आदमी को हैरानी हुई। वह समझ गया कि कबीर ने यह सब उसे बताने के लिए किया था। कबीर ने फिर कहा,’ गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो पति उसे नजरअंदाज कर दे। यही सुखी गृहस्थी का मूल मंत्र है।’

मित्रता और रिश्तों में भी अवज्ञा पर तकरार से विषमता और विवाद पैदा होता है। प्रतिकूल व्यवहार का भी कोई कारण होगा, अकारण कोई प्रतिकूल नहीं जाता। यदि निष्ठा से संतुलित चिन्तन हो जाय तो कभी सम्बन्ध नहीं बिगड़ते!!

19 जनवरी 2015

रघुनाथ पटेल की छास

रघुनाथ पटेल एक छोटे से गांव के मुखिया थे, उनके यहाँ अच्छी संख्या में दूधारु गाय भैस आदि थे। गांव में बाकि लोग तो दूध बेच दिया करते थे, किन्तु बिलौना मात्र रघुनाथ पटेल के यहाँ ही होता था। अतः गांव के लोग अपने जरुरत की छास, रघुनाथ पटेल के यहाँ से ही लाते थे।

 एक बार उस गांव में कोई आचार्य महाराज, अपने शिष्य समुदाय सहित पधारे। जब शिष्य गांव में गोचरी (भिक्षा) के लिए घूमे, उन्हें रघुनाथ पटेल सहित बहुत से घरों से छास प्राप्त हुई। आहार ग्रहण करते हुए शिष्यों नें देखा, सभी घरों से मिली छास अलग अलग है। उन्होने आचार्य महाराज से पूछा, गुरूदेव जब छास का मूल स्रोत एक मात्र रघुनाथ पटेल का घर है तो फिर भी सभी की छास अलग अलग क्यों? स्वाद में इतना भारी अन्तर क्यों?

गुरूदेव ने कहा, निश्चित ही छास तो मूल से रघुनाथ पटेल के बिलौने की ही है। और सभी गांव वाले अपने अपने उपयोग हेतू वहीं से छास लाते है। किन्तु वे उसे घर लाकर, अपनी अपनी आवश्यकता अनुसार उसमें पानी मिलाते है। किसी के कुटुम्ब में सदस्य संख्या अधिक होने के कारण, कोई ज्यादा मिला देते है, तो कोई कम। कोई अपने अपने स्वाद के अनुसार नमक की कम ज्यादा मात्रा मिला देते है, तो कोई भिन्न भिन्न प्रकार के मसाले मिला देते है। इसी कारण छास में यह अन्तर है।

लगे हाथ गुरू नें विभिन्न धर्म दर्शनों में पाए जाने वाले अन्तर के कारण को स्पष्ट किया। गुरू नें कहा, धर्म का मूल स्रोत तो 'रघुनाथ पटेल की छास' समान एक ही है किन्तु लोगों ने अपनी अपनी अवश्यकता, सहजता, अनुकूलता अनुसार भिन्नताएं पैदा कर दी है।

17 जनवरी 2015

मानस अनुकूलन


एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही रोचक परीक्षण किया..
उन्होंने पाँच बन्दरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों-बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसा की अनुमानित था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
जैसे ही बन्दर ने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बन्दरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाकया हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया, ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब वैज्ञानिकों ने एक और मज़ेदार चीज़ की..
पिंजरे के अंदर बंद, बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के नियम नहीं जानता था.
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर, अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका व्यवहार भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..

अनास्थावादी इसी तरह मानसिक अनूकूलन करते है। आपकी आस्थाओं को, विश्वास को बार बार असफल दर्शाते है। कर्मफल के न्याय के प्रति आपको संदेहग्रस्त बना देते है। आपको यथार्थ भी आडम्बर प्रतीत होने लगता है। कष्टों की बरम्बारता आपके मानस में असफलता को रूढ़ कर देती है। फिर न तो आप सम्यक् आस्थावान रहते है न अपने आसपास के किसी को रहने देते है।

16 अगस्त 2014

परोपकार

एक बार एक लड़का अपने स्कूल फीस के बंदोवस्त के लिए घरों के द्वार द्वार जाकर कुछ सामान बेचा करता था।

एक दिन उसका कोई सामान नहीं बिका और उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी। उसने तय किया कि अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा, उससे खाना मांग लेगा।

पहला दरवाजा खटखटाते ही एक लड़की ने दरवाजा खोला, जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाना माँगने के, उसने पानी का एक
गिलास माँगा....

लड़की ने भांप लिया था कि वह क्षुधा संतप्त है, वह एक बड़ा गिलास दूध का ले आई. लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया...

"कितने पैसे दूं?" - लड़के ने पूछा।
"पैसे किस बात के?" - लड़की ने प्रतिप्रश्न करते कहा, "माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर उपकार करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए."

"तो फिर मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूँ."

जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक तौर पर शक्ति मिल चुकी थी , बल्कि उसका ईश्वर और मनुष्य पर भरोसा और भी बढ़ गया था।

वर्षों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़
गयी। लोकल डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया।

विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया. जैसे ही उसने लड़की के कस्बे का नाम सुना, उसकी आँखों में चमक आ गयी।

वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया। उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और तय कर लिया कि वह उसकी जान बचाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देगा। उसकी मेहनत और लग्न रंग लायी और उस लड़की कि जान बच गयी।

डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस
लड़की के इलाज का बिल लिया और उस बिल के कोने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया।

लड़की बिल का लिफाफा देखकर परेशान हो उठी उसे मालूम था कि वह बीमारी से तो वह उभर गयी है किन्तु बिल की भारी राशि उसकी जान ही ले लेगी। फिर भी उसने हिम्मत बटोर कर बिल देखा, उसकी नज़र बिल के कोने में हस्तलिखित टिपण्णी पर गयी...

वहाँ लिखा था, "एक गिलास भर दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है." नीचे उस डॉक्टर, होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे।

आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के मारे उस लड़की की आँखों से आंसू टपक पड़े। उसने ऊपर की और दोनों हाथ उठा कर कहा, " हे भगवान..! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!!"

हमारे दिल की अनुकम्पा, करुणा और वात्सल्य भी एक नेटवर्क की तरह समाज में प्रसरित होता है।

"परोपकार किसी न किसी स्वरूप में आप तक अवश्य लौटता है।"

15 अगस्त 2014

अनर्थक बोझ

फेसबुक पर एक सुन्दर दृष्टान्त पढ़ने में आया……

एक मनोवैज्ञानिक श्रोताओं को स्ट्रेस मैनेजमेंट समझा रही थी।  बात करते करते उसने पानी का ग्लास उठाया और सवालिया निगाह कमरे में मौजूद लोगों पे घुमाई.. लोग समझे फिर वही पुराना "आधा भरा या आधा खाली" वाला सवाल आएगा!! मगर प्रश्न हुआ, "इस ग्लास का वजन क्या होगा??" किसी ने कहा 50 ग्राम, किसी ने कहा 80.. ज्यादा से ज्यादा 100 ग्राम।

"दरअसल ग्लास का असली भार ज्यादा ध्यान देने लायक नहीं है",  वक्ता ने समझाया, "असली मुद्दा है कि आप इस वजन को कितनी देर उठाए रहते हैं। अगर एक दो मिनट की बात है तो कोई समस्या नहीं, किन्तु घंटे भर में मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा। अगर मैं यही वजन दिन भर उठाये रखूँ तो शायद मेरा हाथ सुन्न पड़ जायेगा। किसी भी अवधि में ग्लास का वजन नहीं बदलता, मगर जितनी देर मैं इसे उठाये रखूँ .. मेरे लिए कठिनाई उतनी ही बढ़ जाएगी.."

"जीवन की परेशानियाँ, जीवन के तनाव भी ऐसे ही हैं.. एक दो मिनट की चिंता से अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जैसे जैसे आप ज्यादा देर तक उसे ढोते रहते हैं, आपकी परेशानी बढती जाती है.. अगर दिन भर लगा दें तो सर दर्द हो जाए और ज्यादा लगाया तो और कुछ करने लायक ही नहीं रहते आप.."

"उम्मीद है ग्लास नीचे रखना याद रखेंगे आप!! ... "

यह दृष्टांत केवल तनाव या परेशानियों के बोझ को उतारने के लिए ही नहीं, मोह आसक्ति, आलोचना, कटुवचन, सामान्य से शौक, मामूली लगती बुरी आदतें, अनावश्यक उपभोग, चारित्रिक कमियाँ सभी के लिए यह आदर्श दृष्टांत है........

  • कुछ समय के लिए मोह सुहाता है किन्तु इसे हर समय उठाए रहना अति दुष्कर व दुष्परिणामी बन जाता है।
  • कुछ समय के लिए शौक सुहाता है किन्तु जब ये लत बन जाता है इसका बोझ असहनीय बन जाता है।
  • कुछ समय के लिए मामूली सी बुरी आदतें मनरंजन करती है किन्तु वे जब स्वभाव का हिस्सा बन जाती है, व्यक्तित्व बैठ जाता है।
  • कुछ समय के लिए गैरजरूरी उपभोग आनन्द देता है पर उसका भार हमेशा के लिए ढोया नहीं जा सकता।
  • कुछ समय तक किसी की आलोचना हमारी चतुरता का सुख दे जाती है पर हर समय आलोचना निन्दक स्वभाव सम बोझ बन जाती है।
  • उसी तरह कुछ चारित्रिक कमियाँ जीवन में कुछ समय के लिए सहज सामान्य प्रतीत होती है, यदि लगातार बनी रहे तो चरित्र को ही तोड़ के रख देती है।
इन सभी विकारों का हमारे जीवन में आ जाना सहज है किन्तु इन विकारों के बोझ को ढ़ोते जाना चरित्र को धराशायी कर देता है। इसलिए यह भार असहनीय बने इतना अवसर नहीं देना है।

7 अगस्त 2014

पाखण्डोदय

एक कामचोर भंडारी के कारण राजकोष में बड़ी भारी चोरी हो गई। राजा ने उस भंडारी को तलब किया,और ठीक से जिम्मेदारी न निभाने का कारण पूछा। भंडारी ने उछ्रंखलता से जवाब दिया, "चारों और चोरी बेईमानी फैली है मैं क्या करूँ, मैं तो ईमानदार हूँ।"

राजा ने उसका नाक कटवा कर उसे छुट्टी दे दी। शर्म के मारे वह नकटा किसी दूसरे राज्य में चला गया। लोगों के उपहास से बचने के लिए खुद को साधु बताने लगा। वह चौरे चौबारे प्रवचन देता- "नाक ही अहंकार का मूल है, यह हमारी दृष्टि और ईश्वर के बीच व्यवधान है। ईश्वर के दर्शन में सबसे बड़ी बाधा नाक होती है। इसे हटाए बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते। मैंने वह अवरोध हटा लिया है, मैं ईश्वर के साक्षात दर्शन कर सकता हूँ"

कथनी और करनी की गज़ब एकरूपता देख, लोगों पर उसके प्रवचन का जोरदार प्रभाव पड़ने लगा। लोग तो बस ईश्वर के दर्शन करना चाहते थे, उससे आग्रह करते कि, "भैया हमें भी भगवान् के दर्श करा दो।" वह भक्तों को नाक कटवा आने की सलाह देता। नाक कटवा कर आने वाले चेलों के कान में मंत्र फूंकता, "देखो अब सभी से कहना कि मुझे ईश्वर दिखने लगे है। मैंने तो नकटा न कहलाने के लिए, यही किया था। अगर तुमने कहा कि मुझे तो ईश्वर नहीं दिखते तो लोग नकटा नकटा कहकर तुम्हारा मजाक उडाएंगे,तुम्हारा तिरस्कार करेंगे। इसलिए अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि 'नकटा दर्शन' के सिद्धान्त का प्रचार-प्रसार करो और अपने समुदाय की वृद्धि करो। हमारे 'ईश दर्श सम्प्रदाय' में रहकर उपहास मुक्त जीवन यापन कर सकोगे, और इस तरह तुम नकटे होकर भी सम्मान के सहभागी बने रहोगे"

बहुत ही अल्प समय में यह सम्प्रदाय बढ़ने लगा। एक बार नकटे हो जाने के बाद इस सम्प्रदाय में बने रहना और इसके भेद को अक्षुण्ण रखना विवशता हो गई........

13 जुलाई 2013

अपक्व सामग्री से ही पकवान बनता है.

एक लड़की अपनी माँ के पास आकर अपनी परेशानियों का रोना रो रही थी।

वो परीक्षा में फेल हो गई थी। सहेली से झगड़ा हो गया। मनपसंद ड्रेस प्रैस कर रही थी वो जल गई। रोते हुए बोली, "मम्मी, देखो ना, मेरी जिन्दगी के साथ सब कुछ उलटा - पुल्टा हो रहा है।"

माँ ने मुस्कराते हुए कहा, यह उदासी और रोना छोड़ो, चलो मेरे साथ रसोई में, "तुम्हें आज तुम्हारी मनपसंद दाल कचोडियां खिलाती हूँ।"

लड़की का रोना बंद हो गया और हंसते हुये बोली,"दाल कचोडियां तो मेरा प्रिय व्यंजन है। कितनी देर में बनेगी?", कन्या ने चहकते हुए पूछा।

माँ ने सबसे पहले मैदे का डिब्बा उठाया और प्यार से कहा, "ले पहले मैदा खा ले।" लड़की मुंह बनाते हुए बोली, "इसे कोई खाता है भला।" माँ ने फिर मुस्कराते हुये कहा, "तो ले सौ ग्राम दाल ही खा ले।" फिर नमक और मिर्च मसाले का डिब्बा दिखाया और कहा, "लो इसका भी स्वाद चख लो।"

"माँ!! आज तुम्हें क्या हो गया है? जो मुझे इस तरह की चीजें खाने को दे रही हो?"

माँ ने बड़े प्यार और शांति से जवाब दिया, "बेटा!! कचोडियां इन सभी अरूचक चीजों से ही बनती है और ये सभी वस्तुएं मिल कर, पक कर ही कचोडी को स्वादिष्ट बनाती हैं। अपक्व सामग्री के समायोजन से ही पकवान बनता है। मैं तुम्हें बताना चाह रही थी कि "जिंदगी का पकवान" भी इसी प्रकार की अप्रिय घटनाओं से परिपक्व बनता है।

फेल हो गई हो तो इसे चुनौती समझो और मेहनत करके पास हो जाओ।

सहेली से झगड़ा हो गया है तो अपना व्यवहार इतना मीठा बनाओ कि फिर कभी किसी से झगड़ा न हो।

यदि मानसिक तनाव के कारण "ड्रेस" जल गई तो सदैव ध्यान रखो कि मन की हर स्थिति परिस्थिति में अविचलित रहो।

बिगड़े मन से काम भी तो बिगड़ेंगे। कार्यकुशल बनने के लिए मन के चिंतन को विवेक-कुशल बनाना अनिवार्य है।

कच्चे अनुभवों के बूते पर ही जीवन चरित्र परिष्कृत और परिपक्व बनता है। जीवन के उतार चढाव ही संघर्ष को उर्जा प्रदान करते है। एक बुरा अनुभव आगामी कितने ही बुरे अनुभवों से बचाता है। गलतियां विवेक को सजग रखती है।  बुरे अनुभवों से मायूस होकर बैठना प्रयत्न के पहले ही हार मानने के समान है। हमेशा दूरह मार्ग ही, दुर्गम लक्ष्य का संधान करवाता है।

28 जून 2013

किसका सत्कार?



एक कंजूस सेठ थे। धर्म सभा में आखरी पंक्ति में बैठते थे। कोई उनकी ओर ध्यान भी नहीं देता था। एक दिन अचानक उन्होंने भारी दान की घोषणा कर दी। सब लोगों ने उन्हें आगे की पंक्ति में ले जाकर बैठाया, आदर सत्कार किया।
धनसंचय यदि लक्ष्य है,यश मिलना अति दूर।
यश - कामी को चाहिए,  त्याग  शक्ति  भरपूर ॥

सेठ ने कहा - "यह सत्कार मेरा नहीं, पैसे का हो रहा है।"

तभी गुरू बोले,- "पैसा तो तुम्हारे पास तब भी था, जब तुम पीछे बैठते थे और तुम्हें कोई पूछता नहीं था। आज तुम्हारा आदर इसलिये हो रहा है क्योंकि तुमने पैसे को छोड़ा है , दान किया है। तुम्हारे त्याग का सत्कार हो रहा है।"

अहंकार के भी अजीब स्वरूप होते है।

कभी हम वस्तुस्थिति का बहुत ही संकीर्ण और सतही अर्थ निकाल लेते है। दान अगर प्रकट हो जाय तो हमें दिखावा लगता है लेकिन प्रकटीकरण अन्य के लिए प्रोत्साहन का सम्बल बनता है इस यथार्थ को हम दरकिनार कर देते है, दिखावे और आडम्बर द्वारा श्रेय लेने की महत्वाकांक्षा निश्चित ही सराहनीय नहीं है किन्तु उसी में बसे त्याग और त्याग के प्रोत्साहन  प्रेरणा भाव की अवहेलना भी नहीं की जा सकती।

आसक्ति का त्याग निश्चित ही सराहनीय है।

सम्बन्धित सूत्र…
त्याग शक्ति
प्रोत्साहन हेतू दान का महिमा वर्धन

16 अप्रैल 2013

मैं बेकार क्यों डरुं?

एक मछुआरा समुद्र के तट पर बैठकर मछलियां पकड़ता और अपनी जीविका अर्जित करता।

एक दिन उसके वणिक मित्र ने पूछा, "मित्र, तुम्हारे पिता हैं?"

मछुआरा बोला "नहीं, उन्हें समुद्र की एक बड़ी मछली निगल गई।"

वणिक ने पूछा, "और, तुम्हारा भाई?"

मछुआरे ने उत्तर दिया, "नौका डूब जाने के कारण वह समुद्र की गोद में समा गया।"

वणिक ने दादाजी और चाचाजी के सम्बन्ध में पूछा तो उन्हे भी समुद्र लील गया था।

वणिक ने कहा, "मित्र! यह समुद्र तुम्हारे परिवार के विनाश का कारण है, इस बात को जानते हुए तुम यहां बराबर आते हो! क्या तुम्हें मरने का डर नहीं है?"

मछुआरा बोला, "भाई, मौत का डर किसी को हो या न हो, पर वह तो आयगी ही। तुम्हारे घरवालों में से शायद इस समुद्र तक कोई नहीं आया होगा, फिर भी वे सब कैसे चले गये? मौत कब आती है और कैसे आती है, यह आज तक कोई भी नहीं समझ पाया। फिर मैं बेकार क्यों डरुं?"

वणिक के कानों में भगवान् महावीर की वाणी गूंजने लगी-"नाणागमो मच्चुमुहस्स अत्थि।" मृत्यु का आगमन किसी भी द्वार से हो सकता है।

वज्र-निर्मित मकान में रहकर भी व्यक्ति मौत की जद से नहीं बच सकता, वह तो अवश्यंभावी है। इसलिए प्रतिक्षण सजग रहने वाला व्यक्ति ही मौत के भय से ऊपर उठ सकता है।


बोध कथा: आत्म-चिंतन

1 जुलाई 2011

नीर क्षीर विवेक


प्रायः लोग कहते है कि हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। किसी को भला, और किसी को बुरा कहना राग-द्वेष है। सही भी है किसी से अतिशय राग अन्याय को न्योता देता है। और किसी की निंदा विद्वेष ही पैदा करती है।

दूसरों की निंदा बुरी बात है किन्तु, भले और बुरे सभी को एक ही तराजु पर, समतोल में तोलना मूर्खता है। उचित अनुचित में सम्यक भेद करना विवेकबुद्धि है।  भला-बुरा, हित-अहित और सत्यासत्य का विवेक रखकर,  बुरे, अहितकारी और असत्य का त्याग करना। भले, हितकारी और सत्य का आदर करना एक उपादेय आवश्यक गुण है। जो जैसा है, उसे वैसा ही, बिना किसी अतिश्योक्ति के निरूपित करना, कहीं से भी बुरा कर्म नहीं है।

एक व्यापारी को एक अपरिचित व्यक्ति के साथ लेन-देन व्यवहार करना था। रेफरन्स के लिए उसने,  अपने एक मित्र जो उसका भी परिचित था, को पूछा- “यह व्यक्ति कैसा है? इसके साथ लेन देन व्यवहार करनें में कोई हानि तो न होगी”

उस व्यापारी का मित्र सोचने लगा- मैं किसी के दोष क्यों बताऊँ? दोष दर्शाना तो निंदा है। मुझे तो उसकी प्रसंशा करनी चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए मित्र नें उस रेफर धूर्त की प्रशंसा ही कर दी। सच्चाई और ईमानदारी गुण, जो कि उसमें तनिक भी नही थे, व्यापारी के मित्र नें उस धूर्त के लिए गढ दिए। मित्र की बात पर विश्वास करके व्यापारी ने उस धूर्त व्यक्ति के साथ व्यवहार कर दिया और कुछ ही समय में धूर्त सब कुछ समेट कर गायब हो गया। ठगा सा व्यापारी अपने मित्र के पास जाकर कहनें लगा- “मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, तुमनें तो मुझे बरबाद ही कर दिया। तुम्हारे द्वारा की गई धूर्त की अनावश्यक प्रसंशा नें मुझे तो डूबा ही दिया। कहिए आपने मुझ निरपराध को क्यों धोखा दिया? तुम तो मेरे मित्र-परिचित थे, तुमनें उसकी यथार्थ वास्तविकता का गोपन कर, झूठी प्रसंशा क्यों की?”

प्रशंसक कहने लगा- “मैं आपका शत्रु नहीं, मित्र ही हूँ। और पक्का सज्जन भी हूँ। कोई भी भला व्यक्ति, कभी भी, किसी के दोष नहीं देखता, आलोचना नहीं करता। निंदा करना तो पाप है। मैनें तुम्हें हानि पहूँचाने के उद्देश्य से उसकी प्रशंसा नहीं की, बल्कि यह सोचकर कि, सज्ज्न व्यक्ति सदैव सभी में गुण ही देखता है, मैं भी क्यों बुरा देखन में जाउँ, इसलिए मैने सद्भाव से प्रशंसा की”

“तो क्या उसमें ईमानदारी और सच्चाई के गुण थे?”

-“हाँ, थे न! वह प्रथम ईमानदारी प्रदर्शीत करके ही तो अपनी प्रतिष्ठा जमाता था। वह  सच्चाई व ईमानदारी से साख जमा कर प्रभाव पैदा करता था। धौखा तो उसने मात्र अन्तिम दिन ही दिया जबकि लम्बी अवधी तक वह नैतिक ही तो बना रहा। अधिक काल के गुणों की उपेक्षा करके थोड़े व न्यूनकाल के दोषों को दिखाकर, निंदा करना पाप है। भला मैं ऐसा पाप क्यों करूँ?” उसने सफाई दी।

-“वाह! भाई वाह!, कमाल है तुम्हारा चिंतन और उत्कृष्ट है तुम्हारी गुणग्राहकता!! तुम्हारी इस सज्जनता नें, मेरी तो लुटिया ही डुबो दी। तुम्हारी गुणग्राहकता उस ठग का हथियार ही बन गई। उसकी ईमानदारी और सच्चाई जो प्रदर्शन मात्र थी, धूर्तता छुपाने का आवरण मात्र थी, और जिसे तुम अच्छे से जानते भी थे कि धूर्तता ही उसका मूल गुण था। मैने आज यह समझा कि धूर्तो से भी तुम्हारे जैसे सदभावी शुभचिंतक तो अधिक खतरनाक होते है”। उस पर अविश्वास करता तो शायद बच जाता, पर तुम्हारे पर आस्था नें तो मुझे कहीं का न रखा। व्यापारी अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया।

कोई वैद्य या डॉक्टर, यदि रोग को ही उजागर करना बुरा मानते हुए, रोग लक्षण जानते हुए भी रोग  उजागर न करे। रोग प्रकटन को हीन कृत्य माने, रोग से बचने के उपाय को सेहत की श्रेष्ठता का बखान माने, या फिर सेहत और रोग के लक्षणों को सम्भाव से ग्रहण करते हुए, स्वास्थय व रूग्णता दोनो को समान रूप से अच्छे है कहकर, रोग विश्लेषण ही न करे, तो निदान व ईलाज कैसे होगा? और आगे चलकर वह रोग कारकों से बचने का परामर्श न दे। कुपथ्य से परहेज का निर्देश न करे। उपचार हेतू कड़वी दवा न दे तो रोगी का रोग से पिंड छूटेगा कैसे? ऐसा करता हुआ डॉक्टर कर्तव्यनिष्ट सज्जन या मौत का सौदागर?

कोई भी समझदार कांटों को फूल नहीं कहता, विष को अमृत समझकर ग्रहण नहीं करता। गोबर और हलवे के प्रति समभाव रखकर कौन समाचरण करेगा? छोटा बालक यदि गोद में मल विसर्जन कर कपडे खराब कर दे तो कहना ही पडता है कि ‘उसने गंदा कर दिया’। न कि बच्चे के प्रति राग होते हुए भी यह कहेंगे कि- ‘उसने अच्छा किया’। इस प्रकार गंदा या बुरा कहना, बच्चे के प्रति द्वेष नहीं है। जिस प्रकार गंदे को गंदा और साफ को साफ व्यक्त करना ही व्यवहार है उसी प्रकार बुरे को बुरा कहना सम्यक् आचरण है। निंदा नहीं।

संसार में अनेक मत-मतान्तर है। उसमें से जो हमें अच्छा, उत्तम और सत्य लगे, उसे  अगर मानें, तो यह हमारा अन्य के साथ द्वेष नहीं है बल्कि विवेक है। विवेकपूर्वक हितकारी को अंगीकार करना और अहितकारी को छोडना ही चेतन के लिए कल्याणकारी है।

अनुकरणीय और अकरणीय में विवेक करना ही तो नीर क्षीर विवेक है।

23 नवंबर 2010

धर्म का असर दिखाई नहीं पडता।

धर्म का असर दिखाई नहीं पडता।
(यहां धर्म से आशय, अच्छे गुणो की शिक्षा देने वाला धर्म, न कि कोई निश्चित रूढ उपासना पद्दति।)

एक व्यक्ति ने साधक से पूछा “ क्या कारण है कि आज धर्म का असर नहीं होता?”

साधक बोले- यहाँ से दिल्ली कितनी दूर है?, उसने कहा- दो सौ माईल।

“तुम जानते हो?” हां मै जानता हूँ।

क्या तुम अभी दिल्ली पहूँच गये?

पहूँचा कैसे?,अभी तो यहाँ चलूंगा तब पहुँचूंगा।

साधक बोले, यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है, दिल्ली तुम जानते हो, पर जब तक तुम उस और प्रस्थान नहीं करोगे तब तक दिल्ली नहीं पहुँच सकोगे। यही बात धर्म के लिये है। लोग धर्म को जानते है, पर जब तक उसके नियमों पर नहीं चलेंगे, उस और गति नहीं करेंगे, धर्म पा नहीं सकेंगे, अंगीकार किये बिना धर्म का असर कैसे होगा?

धर्म का प्रभाव नहीं पडता।

शिष्य गुरु के पास आकर बोला, गुरुजी हमेशा लोग प्रश्न करते है कि धर्म का असर क्यों नहीं होता,मेरे मन में भी यह प्रश्न चक्कर लगा रहा है।

गुरु समयज्ञ थे,बोले- वत्स! जाओ, एक घडा शराब ले आओ।

शिष्य शराब का नाम सुनते ही आवाक् रह गया। गुरू और शराब! वह सोचता ही रह गया। गुरू ने कहा सोचते क्या हो? जाओ एक घडा शराब ले आओ। वह गया और एक छलाछल भरा शराब का घडा ले आया। गुरु के समक्ष रख बोला-“आज्ञा का पालन कर लिया”

गुरु बोले – “यह सारी शराब पी लो” शिष्य अचंभित, गुरु ने कहा शिष्य! एक बात का ध्यान रखना, पीना पर शिघ्र कुल्ला थूक देना, गले के नीचे मत उतारना।

शिष्य ने वही किया, शराब मुंह में भरकर तत्काल थूक देता, देखते देखते घडा खाली हो गया। आकर कहा- “गुरुदेव घडा खाली हो गया”

“तुझे नशा आया या नहिं?” पूछा गुरु ने।

गुरुदेव! नशा तो बिल्कुल नहीं आया।

अरे शराब का पूरा घडा खाली कर गये और नशा नहीं चढा?

“गुरुदेव नशा तो तब आता जब शराब गले से नीचे उतरती, गले के नीचे तो एक बूंद भी नहीं गई फ़िर नशा कैसे चढता”

बस फिर धर्म को भी उपर उपर से जान लेते हो, गले के नीचे तो उतरता ही नहीं, व्यवहार में आता नहिं तो प्रभाव कैसे पडेगा।

पतन सहज ही हो जाता है, उत्थान बडा दुष्कर।, दोषयुक्त कर्म प्रयोग सहजता से हो जाता है,किन्तु सत्कर्म के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता होती है।पुरुषार्थ की अपेक्षा रहती ही है। जिस प्रकार वस्त्र सहजता से फट तो सकता है पर वह सहजता से सिल नहीं सकता। बस उसी प्रकार हमारे दैनदिनी आवश्यकताओं में दूषित कार्य संयोग स्वतः सम्भव है, व उस कारण अधोपतन सहज ही हो जाता है, लेकिन चरित्र उत्थान व गुण निर्माण के लिये दृढ पुरुषार्थ की आवश्यकता रहती है।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...