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29 नवंबर 2012

आसक्ति की मृगतृष्णा

हमारे गांव में एक फकीर घूमा करता था, उसकी सफेद लम्बी दाढ़ी थी और हाथ में एक मोटा डण्डा रहता था। चिथड़ों में लिपटा उसका ढीला-ढाला और झुर्रियों से भरा बुढ़ापे का शरीर। कंधे पर पेबंदों से भरा झोला लिये रहता था। वह बार-बार उस गठरी को खोलता, उसमें बड़े जतन से लपेटकर रखी, रंगीन कागज की गड्डियों को निकालता, हाथ फेरता और पुनः थेले में रख देता। जिस गली से वह निकलता और जहां भी रंगीन कागज दिखता, वह बड़ी सावधानी से उसे उठा लेता, कोने सीधे करता, तह कर हाथ फेरता और उसकी गड्डी बना कर रख लेता।

फिर वह किसी दरवाजे पर बैठ जाता और कागजों को दिखाकर कहा करता, "ये मेरे प्राण हैं।" कभी कहता, "ये रुपये हैं। इनसे गांव के गिर रहे, अपने किले का पुनर्निर्माण कराऊंगा।" फिर अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरकर स्वाभिमान से कहता, "उस किले पर हमारा झंडा फहरेगा और मैं राजा बनूंगा।"

गांव के बालक उसे घेरकर खड़े हो जाते, उस पर हँसा करते। वयस्क और वृद्ध लोग भी उसकी खिल्ली उड़ाते। कहते, "पागल है, तभी तो रंगीन रद्दी कागजों से किले बनवाने की बात कर रहा है।"

मुझे अनुभूति हुई कि हम भी तो वही करते है। उस फकीर की तरह, हम भी रंग बिरंगे कागज संग्रह करने में व्यस्त है,  उनसे किले बनाने  के दिवास्वप्न में मस्त है। पागल तो हम है, जिन सुखों के पिछे बेतहासा भाग रहे है, अन्तत: वह सुख तो हमें मिलता ही नहीं। सारे ही प्रयास निर्थक स्वप्न ही साबित होते है। यह फकीर जैसे हम संसार के प्राणियों से कहता है, "तुम सब पागल हो, जो माया में लिप्त, तरह-तरह के किले बनाते हो और सत्ता के सपने देखते रहते हो, इतना ही नही, मोहासक्त तुम अपने पागलपन को बुद्धिमत्ता समझते हो"

ऐसे फकीर हर गांव- शहर में घूमते हैं, किन्तु हमने अपनी आंखों पर आसक्ति की पट्टी बांध रखी है और कान मोह मद से बंद कर लिये हैं। इसी से न हम यथार्थ को देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। वास्तव में पागल वह नहीं, हम हैं।

29 अगस्त 2011

पर्यावरण का अहिंसा से सीधा सम्बंध




पर्यावरण आज विश्व की गम्भीर समस्या हो गई है। प्रकृति को बचाना अब हमारी ज्वलंत प्राथमिकता है। लेकिन प्राकृतिक सन्तुलन को विकृत करने में स्वयं मानव का ही हाथ है। पर्यावरण और प्रदूषण मानव की पैदा की हुई समस्या है। प्रारम्भ में पृथ्वी घने वनों से भरी थी। लेकिन जनसंख्या वृद्धि और मनुष्य के सुविधाभोगी मानस ने, बसाहट,खेती-बाडी आदि के लिए वनों की कटाई शुरू की। औद्योगिकीकरण के दौर में मानव नें पर्यावरण को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। जीवों के आश्रय स्थल उजाड़ दिए गये। न केवल वन सम्पदा और जैव सम्पदा का विनाश किया, बल्कि मानव नें जल और वायु को भी प्रदूषित कर दिया। कभी ईंधन के नाम पर तो कभी इमारतों के नाम पर। कभी खेती के नाम पर तो कभी जनसुविधा के नाम पर, मानव प्राकृतिक संसाधनो का विनाशक दोहन करता रहा।

वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। अप्राकृतिक रूप से जब इस कड़ी को खण्डित करने का दुष्कर्म होता है, प्रकृति में विनाशक विकृति उत्पन्न होती है जो अन्ततः स्वयं मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बन खड़ी हो जाती है। जीव-जन्तु हमारी ही भांति इस प्रकृति के आयोजन-नियोजन का अटूट हिस्सा होते है। वे पूरे सिस्टम को आधार प्रदान करते है। प्रकृति पर केवल मानव का मालिकाना हक़ नहीं है। मानव को समस्त प्रकृति के संरक्षण की शर्तों के साथ ही अतिरिक्त उपयोग बुद्धि मिली है। मानव पर, प्रकृति के नियंत्रित उपयोगार्थ विधानों का आरोपण किया गया है, जिसे हम धर्मोपदेश के नाम से जानते है। वे शर्तें और विधान, यह सुनिश्चित करते है कि सुख सभी को समान रूप से उपलब्ध रहे।

इसीलिए विश्व के सभी धर्मों के प्रणेता व महापुरूष, हिंसा, क्रूरता, जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा देने को गुनाह कहते है। वे प्रकृति के संसाधनों के मर्यादित उपभोग की सलाह देते है। अपरिग्रह का उपदेश देते है। मन वचन काया से संयमित,अनुशासित रहने की प्रेरणा देते है। इसी भावना से वे प्राणी मात्र में अपनी आत्मा सम झलक देखते/दिखलाते है। जब वे कण कण में भगवान होने की बात करते है,तो अहिंसा का ही आशय होता है । सभी को सुख प्रदान करने के उद्देश्य से ही वे यह सूत्र देते है कि ‘आत्मा सो परमात्मा’ या हर जीव में परमात्मा का अंश होता है। यह भी कहा जाता है कि सभी को ईश्वर नें पैदा किया अतः सभी जीव ईश्वर की सन्तान है। इसीलिए जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों के साथ दया, करूणा का व्यवहार करनें की शिक्षा दी जाती है। सारी बुराईयां किसी न किसी के लिए पीड़ादायक हिंसा बनती है। अतः सभी सद्गुणों को अहिंसा में समाहित किया जा सकता है। यही धर्म है। यही प्रकृति का धर्म है। यही सुनियोजित जीवन का विधान है। अर्थात्, अहिंसा पर्यावरण का संरक्षण विधान है।

2 मार्च 2011

आहार आवास और आवरण की उच्छ्रंखलता



मनुष्य की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ है, आहार आवास और आवरण (वस्त्र)। इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ही मानव प्रकृति का दोहन करता है। लेकिन जब तक वह इनका अपनी जरूरतों तक सीमित उपभोग, संयमपूर्वक करता है तब तक प्रकृति उसकी सहयोगी बनी रहती है। लेकिन जब वह अपनी आवश्यकताओं का अतिक्रमण करने लगता है, उपयोग कम और व्यर्थ अधिक करने लगता है, तृष्णाधीन होकर संग्रह के माध्यम से वस्तुओं को अनावश्यक सडन-गलन में झोंक देता है। संयम और अनुशासन को भूल, अनियंत्रित और स्वछंद भोग-उपभोग करता है। मानव की स्वयं की प्रकृति, विकृति में रूपांतरित हो जाती है, तब प्रकृति अपना सहयोग गुण तज देती है और मानव का अपना असंयम ही उसके अस्तित्व शत्रु साबित होता है।

मनुष्य सर्वाधिक हिंसा और प्रकृति का विनाश अपनी आहार जरूरतों के लिये करता है। किन्तु अपने आहार-चुनाव में ही उसे सर्वाधिक संयम और अनुशासन की आवश्यकता होती है।

दुखद पहलू यह है कि कथित प्रगतिशील, इन तीनों (आहार आवास और आवरण)  में स्वतंत्रता-स्वच्छंदता के पक्षधर होते है, और स्वांत संयम के घोर विरोधी। वे असंयमित भोग उपभोग को बल देते है। वे मानवीय तृष्णा की अगन ज्वाला को निरन्तर प्रदीप्त रखने का दुष्प्रचार करते है। भोगी संस्कृति के प्रसारक न केवल प्रकृति-द्रोही बल्कि मानवता विरोधी भी हैं।

23 नवंबर 2010

अहसान फ़रामोश ये तूने क्या किया।बहाने तो मत बना कृतघ्न।

तेरे जीवन निर्वाह के लिये, तेरी आवश्यकता से भी अधिक संसाधन तुझे प्रकृति ने दिए। किन्तु तुने उसका अनियंत्रित, अनवरत दोहन व शोषण आरंभ कर दिया। तुझे प्रकृति ने धरा का मुखिया बनाया, तुने अन्य सदस्यों के मुंह का निवाला भी छीन लिया। तेरी सहायता के लिये प्राणी बने, मगर तुने उन्हे पने पेट का खड्डा भरने का साधन बनाया। सवाल मात्र पेट का होता तो जननी धरा इतनी दुखी न होती। पर स्वाद की खातिर, तूँ इतना भ्रष्ट हुआ कि अखिल प्रकृति पाकर भी तूं  तुष्ट न हुआ, धृष्टता से भूख और अभाव के बहाने रोता ही रहा। तेरे पेट की तृष्णा तो कदाचित शान्त हो जाय, पर तेरी बेलगाम इच्छाओं की तृष्णा कभी शान्त न हुई, कृतघ्न मानव।

जितना लिया इस प्रकृति से, उसका रत्तीभर अंश भी लौटाने की तेरी नीयत न रही। लौटाना तो क्या, संयत उपयोग भी तेरी सद्भावना न हुई। प्रकृति ने तुझे संतति विस्तार का वरदान दिया कि तूं अपनी संतान को माँ प्रकृति के संरक्षण में नियुक्त करता,अपनी संतति को प्रकृति के मितव्ययी उपभोग की शिक्षा देता। इस विध संतति विस्तार के वरदान का ॠण चुकाता। किन्तु निर्लज्ज!! तुने अपनी औलादों से लूटेरो की फ़ौज़ बनाई और छोड दिया कृपालु प्रकृति को रौंदने के लिए। वन लूटे, जीव-प्राण लूटे, पहाड के पहाड लूटे।निर्मल बहती नदियाँ लूटी,उपजाऊ जमीने लूटी। समुद्र का खार लूटा, स्वर्णधूल अंबार लूटा। इससे भी तेरा  पेट न भरा तो, खोद तरल तेल रक्त लूटा।

तूने एक एक कर प्रकृति के सारे गहने उतार, उसे विरान बना दिया। अरे! बंजरप्रिय!! कृतघ्न मानव!!! प्रकृति तो तब भी ममतामयी माँ  है, उससे तो तुझ कपूत का  कोई दुख देखा नहीं जाता, उसे  यह चिंता सताती है कि मेरे उजाड पर्यावरण से भी बच्चो को कोई तकलीफ न हो।अभी भी गोद में आश्रय दिए हुए है। थपकी दे दे  वह  संयम का संदेश देती है, गोद से गिर पड़ता है पर सीखता नहीं। भोगलिप्त अंधा बना भूख भूख चिल्लाता रहता है। पोषक के  कर्ज़  से मुक्त होने की तेरी कभी नीयत ही न रही। हे! अहसान फ़रामोश इन्सान!! कृतघ्न मानव!!! ______________________________________________________________________

27 जुलाई 2010

शृंगार करो ना ...

सिर का शृंगार तभी है, जब सत्य समक्ष नतमस्तक हो।
भाल का शृंगार तभी है, जब यश दीन दुखी के मुख हो॥
नयनों का शृंगार तभी है, जब वह करूणा से सज़ल हो।
नाक का शृंगार तभी है, जब वह परोपकार से उत्तंग हो॥
कान का शृंगार तभी है, जब वह आलोचना सुश्रुत हो।
होठो का शृंगार तभी है, हिले तो मधूर वचन प्रकट हो॥
गले का शृंगार तभी है, जब विनय पूर्ण नम जाय।
सीने का शृंगार तभी है, जिसमें आत्मगौरव बस जाय॥
हाथों का शृंगार तभी है, पीडित सहायता में बढ जाए।
हथेली का शृंगार तभी है, मिलन पर प्रेम को पढ जाए॥
कमर का शृंगार तभी है, जब बल मर्यादा से खाए।
पैरों का शृंगार तभी है, तत्क्षण मदद में उठ जाए॥

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