आज मेरा चिंतन दिवस है। निश्चित ही बहुमूल्य मनुष्य जीवन पाना अतिदुर्लभ है। पता नहीं कितने ही शुभकर्मों के पश्चात यह मनुष्यायु प्राप्त होती है। कठिन शुभकर्मों से उपार्जित इस प्रतिफल को मुझे वेस्ट करना है या पुनः उत्थान विकास के लिये इनवेस्ट करना है।
क्या मेरा उद्देश्य निरंतर विकास नहीं होना चाहिए? यदि साधना विकास है तो साध्य क्या है? चरम परिणिति क्या है। क्या है जो मुझे पाना चाहिए? यदि लक्ष्य निर्धारित हो जाय तो मै उस और सामर्थ्यानुसार गति कर पाऊँ।
वस्तुतः मै परम् सुख चाहता हूँ, ऐसा सुख जो स्थाई रहे, जिसके बाद पुनः दुख न आए। अनंत सुख जहाँ सुख-दुख का भेद ही समाप्त हो जाए। क्षणिक सुखों की तरह नहीं कि आए और जाए। वो सुख भी नहीं, जिसे इन सांसारिक सुखों से तुलना कर परिभाषित किया जाय। इन भौतिक सुखो के समान प्रलोभन दिया जाय अथवा लॉलीपॉप की तरह दूर से दर्शाया जाय।
क्या मैं किसी ‘जजमेंट डे’ के भरोसे जिऊँ, जहाँ अच्छे या बुरे कर्म में भेद तय करने का अवसर ही नहीं मिलेगा? सीधी ही सजा मुक्कर्र हो जायेगी।और मेरे पास अपने कर्म में सुधार, परिमार्जन का समय ही नहीं होगा? नहीं अब तो मेरा हर पल आखरत होना चाहिए। मुझे हर क्षण शुभ कर्म और सार्थक गुण अपनाने चाहिए बिना किसी भय या संशय के। मेरा विवेक हर पल जाग्रत रहना चाहिए। चिंतन मनन मेरे गवाह रहने चाहिए। मेरे विचारों का क्षण क्षण, प्रतिलेखन, समीक्षा और शुद्धिकरण अनवरत जारी रहना चाहिए। क्षण मात्र का प्रमाद किए बिना।
जीवन के 50 वर्ष मैने बालक अवस्था में ही खो दिए। कब आयेगी मुझ में पुख्तता? पुरूषार्थ की इच्छाएँ तो बहुत है पर इस मार्ग पर इतनी बाधाएँ क्यों? मनोरथ तो मात्र तीन है…… निस्पृह, संयम और समाधी!!
आज मेरा जन्मदिन है। यही चिंतन चल रहा है। मुझे मनुष्य जन्म क्यों मिला? क्या है मेरा प्रयोजन?
मेरे आत्मोत्थान में मददगार उदगार देकर, मेरे प्रेरकबल बनें। मुझे प्रेरणा व प्रोत्साहन दें……।
______________________________________________________
______________________________________________________
