26 सितंबर 2011

सही निशाना


पुराने समय की बात है, चित्रकला सीखने के उद्देश्य से एक युवक, कलाचार्य गुरू के पास पहुँचा। गुरू उस समय कला- विद्या में पारंगत और सुप्रसिद्ध थे। युवक की कला सीखने की तीव्र इच्छा देखकर, गुरू नें उसे शिष्य रूप में अपना लिया। अपनें अविरत श्रम से देखते ही देखते यह शिष्य चित्रकला में पारंगत हो गया।  अब वह शिष्य सोचने लगा, मैं कला में पारंगत हो गया हूँ, गुरू को अब मुझे दिक्षान्त आज्ञा दे देनी चाहिए। पर गुरू उसे जाने की आज्ञा नहीं दे रहे थे। हर बार गुरू कहते अभी भी तुम्हारी शिक्षा शेष है। शिष्य तनाव में रहने लगा। वह सोचता अब यहां मेरा जीवन व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा है।  मैं कब अपनी कला का उपयोग कर, कुछ बन दिखाउंगा? इस तरह तो मेरे जीवन के स्वर्णिम दिन यूंही बीत जाएंगे।

विचार करते हुए, एक दिन बिना गुरू को बताए, बिना आज्ञा ही उसने गुरूकुल छोड दिया और निकट ही एक नगर में जाकर रहने लगा। वहाँ लोगों के चित्र बनाकर आजिविका का निर्वाह करने लगा। वह जो भी चित्र बनाता लोग देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते। हर चित्र हूबहू प्रतिकृति। उसकी ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी। उसे अच्छा पारिश्रमिक मिलता। देखते देखते वह समृद्ध हो गया। उसकी कला के चर्चे नगर में फैल गए। उसकी कीर्ती राजा तक पहुँची।

राजा नें उसे दरबार में आमंत्रित किया और उसकी कलाकीर्ती की भूरि भूरि प्रसंसा की। साथ ही अपना चित्र बनाने का निवेदन किया।  श्रेष्ठ चित्र बनाने पर पुरस्कार देने का आश्वासन भी दिया। राजा का आदेश शिरोधार्य करते हुए 15 दिन का समय लेकर, वह युवा कलाकार घर लौटा। घर आते ही वह राजा के अनुपम चित्र रचना के लिए रेखाचित्र बनानें में मशगूल हो गया। पर सहसा एक विचार आया और अनायास ही वह संताप से घिर गया।

वस्तुतः राजा एक आँख से अंधा अर्थात् काना था। उसने सोचा, यदि मैं राजा का हूबहू चित्र बनाता हूँ, और उसे काना दर्शाता हूँ तो निश्चित ही राजा को यह अपना अपमान लगेगा और वह तो राजा है, पारितोषिक की जगह वह मुझे मृत्युदंड़ ही दे देगा। और यदि दोनो आँखे दर्शाता हूँ तब भी गलत चित्र बनाने के दंड़स्वरूप वह मुझे मौत की सजा ही दे देगा। यदि वह चित्र न बनाए तब तो राजा अपनी अवज्ञा से कुपित होकर सर कलम ही कर देगा।किसी भी स्थिति में मौत निश्चित थी।  वह सोच सोच कर तनावग्रस्त हो गया, बचने का कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा था। इसी चिंता में न तो वह सो पा रहा था न चैन पा रहा था।

अन्ततः उसे गुरू की याद आई। उसने सोचा अब तो गुरू ही कोई मार्ग सुझा सकते है। मेरा उनके पास जाना ही अब अन्तिम उपाय है। वह शीघ्रता से आश्रम पहुंचा और गुरू चरणों में वंदन किया, अपने चले जाने के लिए क्षमा मांगते हुए अपनी दुष्कर समस्या बताई। गुरू ने स्नेहपूर्ण आश्वासन दिया। और चित्त को शान्त करने का उपदेश दिया।  गुरू नें उसे मार्ग सुझाया कि वत्स तुम राजा का घुड़सवार योद्धा के रूप में चित्रण करो, उन्हें धनुर्धर दर्शाओ। राजा को धनुष पर तीर चढ़ाकर निशाना साधते हुए दिखाओं, एक आँख से निशाना साधते हुए। ध्यान रहे राजा की जो आँख नहीं है उसी आंख को बंद दिखाना है। कलाकार संतुष्ट हुआ।

शिष्य, गुरू के कथनानुसार ही चित्र बना कर राजा के सम्मुख पहुँचा। राजा अपना वीर धनुर्धर स्वरूप का अद्भुत चित्र देखकर बहुत ही प्रसन्न और तुष्ट हुआ। राजा ने कलाकार को 1 लाख स्वर्ण मुद्राएं ईनाम दी। कलाकार नें ततक्षण प्राण बचाने के कृतज्ञ भाव से वे स्वर्ण मुद्राएं गुरू चरणों में रख दी। गुरू नें यह कहते हुए कि "यह तुम्हारे कौशल का प्रतिफल है, इस पर तुम्हारा ही अधिकार है।" आशिर्वाद देते हुए विदा किया।

कथा का बोध क्या है?

1-यदि गुरू पहले ही उपदेश देते  कि- 'पहले तुम परिपक्व हो जाओ', तो क्या शिष्य गुरू की हितेच्छा समझ पाता?  आज्ञा होने तक विनय भाव से रूक पाता?

2-क्या कौशल के साथ साथ बुद्धि, विवेक और अनुभव की शिक्षा भी जरूरी है?

3-निशाना साधते राजा का चित्र बनाना, राजा के प्रति सकारात्म्क दृष्टि से प्रेरित है, या  समाधान की युक्ति मात्र?

6 सितंबर 2011

मधुबिन्दु


मैने एक कथा सुनी………

एक व्यक्ति घने जंगल में अंधेरे से भागा जा रहा था कि एक कुंए में गिरने को हुआ। गिरते गिरते उसके हाथ में कुएं पर झुके वृक्ष की ड़ाल आ गई। वहां कुछ प्रकाश भी था। उसनें नीचें झांका तो कुएं में चार विकराल अजगर मुंह फाड़े उपर ताक रहे थे। वे उसके गिरने का इन्तज़ार ही कर रहे थे। उसनें आस पास देखा तो, जिस डाल को पकड़ वह लटक रहा था, दो चुहे, एक काला एक सफेद, उसी डाल को कुतर रहे थे। इतनें में एक विशाल हाथी कहीं से चला आया और अपनी सूंढ़ से वृक्ष के तने को पकड़ कर हिलाने लगा। वह व्यक्ति डर से सिहर उठा। ठीक उपर की शाखा पर मधुमक्खी का छत्ता था, हाथी के हिलाने से मक्खियाँ उडने लगी। 

छत्ते से शहद-बिंदु टपकने लगा। एक बिंदु टपककर उसकी नाक से होता हुआ होठों तक आ पहुँचा। उस व्यक्ति ने प्यास से सूख रही अपनी जीभ को होठों पर फेरा, एक छोटे से मधु बिन्दु में अनंत आनन्द भरा मधुर स्वाद था। उसे लगा जैसे जीवन में मुझे इसी मिठास की तलाश थी, यही मेरा चीर-प्रतिक्षित उद्देश्य था। उसने मुंह उपर किया, कुछ क्षणों बाद फ़िर मधु-बिन्दु मुंह में टपका। वह मस्त हो गया। बेताबी से अगली बूंद का इन्तजार करता। और फिर रसास्वादन कर प्रसन्न हो उठता। आस पास खड़ी विपत्तियों को भूल चुका था। हवा में लटका, हाथी पेड गिराने पर आमदा, चुहे डाल कुतरने में व्यस्त और नीचे चार अज़गर उसका निवाला बना देने को आतुर। किन्तु वह तो एक एक बिन्दु का स्वाद लेने में मस्त था। 

उसी जंगल से शिव-पार्वती अपने विमान से गुज़र रहे थे। पार्वती नें उस मानव की दुखद स्थिति को देखा और शिव से उसे बचा लेने का अनुरोध किया। भगवान शिव नें विमान को उसके निकट ले जाते हुए हाथ बढाया और उस व्यक्ति को कहा- मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं, आओ, विमान में आ जाओ, मै तुम्हें तुम्हारे इच्छित स्थान पर छोड दूँगा। उस व्यक्ति नें कहा- ठहरिए भगवन् एक शहद बिन्दु चाट लूं तो चलुं। एक बिन्दु फिर एक बिन्दु। हर बिन्दु के बाद, अगले बिन्दु के लिए उसकी प्रतिक्षा प्रबल हो जाती। उसके आने की प्रतिक्षा में थक कर आखिर, भगवान शिव ने विमान आगे बढ़ा दिया।

आप इस कथा का सटीक भावार्थ बताएं, क्या कहना चाहती है यह कथा?

प्रतीक हिंट्स:
  • घने जंगल का अंधेरा = अज्ञान
  • डाली = आयुष्य
  • काले सफेद चुहे = दिन रात
  • चार अज़गर = चार गति
  • हाथी =घमंड़, अभिमान
  • मधु बिन्दु = संसार-सुख
  • शिव = कल्याण (मुक्ति) उपदेश
  • पार्वती = शक्ति, पुरूषार्थ प्रेरणा

आप कथा के अपने दृष्टिकोण से भाव प्रकट करने में स्वतंत्र है।

29 अगस्त 2011

पर्यावरण का अहिंसा से सीधा सम्बंध




पर्यावरण आज विश्व की गम्भीर समस्या हो गई है। प्रकृति को बचाना अब हमारी ज्वलंत प्राथमिकता है। लेकिन प्राकृतिक सन्तुलन को विकृत करने में स्वयं मानव का ही हाथ है। पर्यावरण और प्रदूषण मानव की पैदा की हुई समस्या है। प्रारम्भ में पृथ्वी घने वनों से भरी थी। लेकिन जनसंख्या वृद्धि और मनुष्य के सुविधाभोगी मानस ने, बसाहट,खेती-बाडी आदि के लिए वनों की कटाई शुरू की। औद्योगिकीकरण के दौर में मानव नें पर्यावरण को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। जीवों के आश्रय स्थल उजाड़ दिए गये। न केवल वन सम्पदा और जैव सम्पदा का विनाश किया, बल्कि मानव नें जल और वायु को भी प्रदूषित कर दिया। कभी ईंधन के नाम पर तो कभी इमारतों के नाम पर। कभी खेती के नाम पर तो कभी जनसुविधा के नाम पर, मानव प्राकृतिक संसाधनो का विनाशक दोहन करता रहा।

वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। अप्राकृतिक रूप से जब इस कड़ी को खण्डित करने का दुष्कर्म होता है, प्रकृति में विनाशक विकृति उत्पन्न होती है जो अन्ततः स्वयं मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बन खड़ी हो जाती है। जीव-जन्तु हमारी ही भांति इस प्रकृति के आयोजन-नियोजन का अटूट हिस्सा होते है। वे पूरे सिस्टम को आधार प्रदान करते है। प्रकृति पर केवल मानव का मालिकाना हक़ नहीं है। मानव को समस्त प्रकृति के संरक्षण की शर्तों के साथ ही अतिरिक्त उपयोग बुद्धि मिली है। मानव पर, प्रकृति के नियंत्रित उपयोगार्थ विधानों का आरोपण किया गया है, जिसे हम धर्मोपदेश के नाम से जानते है। वे शर्तें और विधान, यह सुनिश्चित करते है कि सुख सभी को समान रूप से उपलब्ध रहे।

इसीलिए विश्व के सभी धर्मों के प्रणेता व महापुरूष, हिंसा, क्रूरता, जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा देने को गुनाह कहते है। वे प्रकृति के संसाधनों के मर्यादित उपभोग की सलाह देते है। अपरिग्रह का उपदेश देते है। मन वचन काया से संयमित,अनुशासित रहने की प्रेरणा देते है। इसी भावना से वे प्राणी मात्र में अपनी आत्मा सम झलक देखते/दिखलाते है। जब वे कण कण में भगवान होने की बात करते है,तो अहिंसा का ही आशय होता है । सभी को सुख प्रदान करने के उद्देश्य से ही वे यह सूत्र देते है कि ‘आत्मा सो परमात्मा’ या हर जीव में परमात्मा का अंश होता है। यह भी कहा जाता है कि सभी को ईश्वर नें पैदा किया अतः सभी जीव ईश्वर की सन्तान है। इसीलिए जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों के साथ दया, करूणा का व्यवहार करनें की शिक्षा दी जाती है। सारी बुराईयां किसी न किसी के लिए पीड़ादायक हिंसा बनती है। अतः सभी सद्गुणों को अहिंसा में समाहित किया जा सकता है। यही धर्म है। यही प्रकृति का धर्म है। यही सुनियोजित जीवन का विधान है। अर्थात्, अहिंसा पर्यावरण का संरक्षण विधान है।

16 अगस्त 2011

निष्प्रयोजन परम्परा : रूढ़ि



पिछले लेख में हमने सप्रयोजन परम्परा के औचित्य को स्थापित करने का प्रयास किया। जीवन मूल्यों में विकास के सार्थक उद्देश्य से किसी योग्य कार्य-विधि का निर्वहन ‘सप्रयोजन परम्परा’ कहलाता है। जैसे- 'एकाग्रचित' चिन्तन के प्रयोजन से, 'ध्यान' परम्परा का पालन किया जाता है, इसे हम ‘सप्रयोजन परम्परा' कहेंगे। आज तो जीवन शैली के लिए, मेडिटेशन की उपयोगिता प्रमाणित हो गई है। इसी कारण इसका उदाहरण देना सरल सहज-बोध हो गया है्। अतः परम्परा का औचित्य सिद्ध करना आसान हो गया है। अन्यथा कईं उपयोगी परम्पराएं असिद्ध होने से अनुपयोगी प्रतीत होती है। कई मान्यताओं में प्रतिदिन एक मुहर्त पर्यन्त ध्यान करने की परम्परा है, एकाग्रचित्त अन्तर्मन्थन के लिए इससे अधिक उपयोगी कौनसी विधि हो सकती है। 

पहले कभी, प्रतिदिन प्रातः काल योग – आसन करनें की परम्परा थी। जिसे दुर्बोध तर्कवादियों नें सांसो की उठा-पटक और अंगो की तोड़-मरोड़ कहकर दुत्कार दिया था। वे सतही सोच बुद्धि से उसे रूढ़ि कहते थे। आज अच्छे स्वास्थ्य के लिए योगासनो को स्वीकार कर लिया गया है। मन को सकारात्मक संदेश प्रदान करने के लिए भजनों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। दया की भावना का विकास करने के लिए दान के उपक्रम का महत्व है। श्रद्धा और विश्वास को सफलता का मुख्य कारण माना जाने लगा है। कई लोगों को स्वीकार करते पाया है कि उन्हें धर्म-स्थलों में अपार शान्ति का अनुभव होता है। कई लोग भक्ति-भाव के अभ्यास से, अहंकार भाव में क्षरण अनुभव करते है। हम आस-पास के वातावरण के अनुसार ही व्यक्ति्त्व ढलता देखते है। इन सभी लक्षणों पर दृष्टि करें तो, परम्परा और संस्कार का  सीधा सम्बंध देखा जा सकता है। प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाने के लिए, संस्कार युक्त परम्पराओं के योगदान को  भला कैसे नकारा जाएगा?

लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि सभी परम्पराएं आंख मूंद कर अपनाने योग्य ही होती है। कई परम्पराएं निष्प्रयोजन होती है। अकारण होती है। वस्तुतः सुविधाभोगी लोगों नें कुछ कठिन परम्पराओं को पहले प्रतीकात्मक और फिर विकृत बना दिया होता है। ये सुविधाभोगी भी और कोई नहीं, प्रारम्भ में तर्कशील होते है। रेश्नलिस्ट बनकर शुरू में, कष्टदायक कठिन परम्पराओं को लोगों के लिए दुखद बताते है। पुरूषार्थ से कन्नी काटते हुए, प्रतीकात्मक रूप देकर, कठिनता से बचने के मार्ग सुझाते है। और अन्ततः पुनः उसे प्रतीक कहकर और उसके तर्कसंगत न होने का प्रमाण देकर परम्परा का समूल उत्थापन कर देते है।

भले आज हम सुविधाभोगियों को दोष दे लें, पर समय के साथ साथ ऐसी निष्प्रयोजन परम्पराओं का अस्तित्व में आ जाना एक सच्चाई है। परम्पराएँ पहले प्रतीकात्मक बनती है, और अंत में मात्र 'प्रतीक' ही बचता है। 'प्रयोजन' सर्वांग काल के गर्त में खो जाता है। ऐसी निष्प्रयोजन परम्पराएँ ही रूढ़ि बन जाती है। हालांकि रूढ़िवादी प्रायः इन प्रतीको के पिछे छुपे 'असल विस्मृत प्रयोजन' से उसे सार्थक सिद्ध करने का असफल प्रयास करते है, पर प्रतीकात्मक रूढ़ि आखिर प्रतीक ही होती है। उसके औचित्य को प्रमाणित करना निर्थक प्रयास सिद्ध होता है। अन्ततः ऐसी रूढ़ि को ‘आस्था का प्रश्न’ कहकर तर्कशीलता से पिंड़ छुड़ाया जाता है। जब उसमें प्रयोजन रूपी जान ही नहीं रहती, तो तर्क से सिद्ध भी कैसे होगी। अन्ततः ‘आस्था’ के इस प्रकार दुरपयोग से, मूल्यवान आस्था स्वयं भी ‘निष्प्रयोजन आस्था’ सिद्ध हो जाती है।

ऐसी रूढ़ियों के लिए दो मार्ग ही बचते है। पहला तो इन रूढ़ियों को पुर्णतः समाप्त कर दिया जाय अथवा फिर उनके असली प्रयोजन सहित विस्मृत हो चुकी, कठिन कार्य-विधी का पुनर्स्थापन किया जाय।

आपका  इस प्रकार की रूढ़ियों के प्रति क्या मानना है?

अगले लेख में हम कुप्रथा या कुरीति पर विचार करेंगे………

15 अगस्त 2011

परम्परा


श्रुत के आधार पर किसी क्रिया-प्रणाली का यथारूप अनुगमन करना परम्परा कहलाता है। परम्परा के भी दो भेद है। पूर्व प्रचलित क्रिया-विधि के तर्क व्याख्या में न जाते हुए, उसके अभिप्रायः को समझ लेना। और उसके सप्रयोजन ज्ञात होने पर उसका अनुसरण करना, ‘सप्रयोजन परम्परा' कहलाती है। दूसरी, निष्प्रयोजन ही किसी विधि का, गतानुगति से अन्धानुकरण करना 'रूढ़ि' कहलाता है। आज हम ‘सप्रयोजन परम्परा’ के औचित्य पर विचार करेंगे।

मानव नें अपने सभ्यता विकास के अनवरत सफर में कईं सिद्धांतो का अन्वेषण-अनुसंधान किया और वस्तुस्थिति का निष्कर्ष स्थापित किया। उन्ही निष्कर्षों के आधार पर किसी न किसी सैद्धांतिक कार्य-विधि का प्रचलन अस्तित्व में आया। जिसे हम संस्कृति भी कहते है। ऐसी क्रिया-प्रणाली, प्रयोजन सिद्ध होने के कारण, हम इसे ‘सप्रयोजन परम्परा’ कह सकते है।

आज के आधुनिकवादी इसे भी रूढ़ि में खपाते है। यह पीढ़ी प्रत्येक सिद्धांत को तर्क के बाद ही स्वीकार करना चाहती है। हर निष्कर्ष को पुनः पुनः विश्लेषित करना चाहती है। यदि विश्लेषण सम्भव न हो तो, उसे अंधविश्वास में खपा देने में देर नहीं करती। परम्परा के औचित्य पर विचार करना इनका मक़सद ही नहीं होता।

ऐसे पारम्परिक सिद्धांत, वस्तुतः बारम्बार के अनुसंधान और हर बार की विस्तृत व्याख्या से बचने के लिए ही व्यवहार में आते है। समय और श्रम के अपव्यय को बचाने के उद्देश्य से ही स्थापित किए जाते है। जैसे- जगत में कुछ द्रव्य विषयुक्त है। विष मानव के प्राण हरने या रुग्ण करने में समर्थ है। यह तथ्य हमने, हमारे युगों युगों के अनुसंधान और असंख्य जानहानि के बाद स्थापित किया। आज हमारे लिए बेतर्क यह मानना  पर्याप्त है कि ‘विष मारक होता है’। यह अनुभवों का निचोड़ है। विषपान से बचने का 'उपक्रम' ही सप्रयोजन परम्परा है। ‘विष मारक होता है’ इस तथ्य को हम स्व-अनुभव की कसौटी पर नहीं चढ़ा सकते। और न ही  समाधान के लिए,प्रत्येक बार पुनः अनुसंधान किया जाना उचित होगा।

परम्परा का निर्वाह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक अभिगम है। विज्ञ वैज्ञानिक भी सिद्धान्त इसलिए ही प्रतिपादित करते है कि एक ही सिद्धांत पर पुनः पुनः अनुसंधान की आवश्यकता न रहे।  उन निष्कर्षों को सिद्धांत रूप स्वीकार कर, आवश्यकता होने पर उन्ही सिद्धांतो के आधार पर उससे आगे के अनुसंधान सम्पन्न किए जा सके। जैसे- वैज्ञानिकों नें बरसों अनुसंधान के बाद यह प्रमाणित किया कि आणविक क्रिया से विकिरण होता है। और यह विकिरण जीवन पर बुरा प्रभाव करता है। जहां आणविक सक्रियता हो मानव को असुरक्षित उसके संसर्ग में नहीं जाना चाहिए। उन्होंने सुरक्षा की एक क्रिया-प्रणाली विकसित करके प्रस्तुत की। परमाणविक विकिरण, उसका दुष्प्रभाव, उससे सुरक्षा के उपाय सब वैज्ञानिक प्रतिस्थापना होती है। किंतु प्रत्येक व्यक्ति बिना उस वैज्ञानिक से मिले, बिना स्वयं प्रयोग किए। मात्र पढ़े-सुने आधार पर सुरक्षा-उपाय अपना लेता है। यह सुरक्षा-उपाय का अनुसरण, परम्परा का पालन ही है। ऐसी अवस्था में मुझे नहीं लगता कोई भी समझदार, सुरक्षा उपाय पालने के पूर्व आणविक उत्सर्जन के दुष्प्रभाव को जाँचने का दुस्साहस करेगा।

बस इसीतरह प्राचीन ज्ञानियों नें मानव सभ्यता और आत्मिक विकास के उद्देश्य से सिद्धांत प्रतिपादित किए। और क्रिया-प्रणाली स्वरूप में वे निष्कर्ष हम तक पहुँचाए। हमारी अनुकूलता के लिए, बारम्बार के तर्क व अनुशीलन से मुक्त रखा।हमारे लिए उन सिद्धांतों से प्राप्य प्रतिलाभ का उपयोग कर लेना, सप्रयोजन परम्परा का निर्वाह है।

परम्पराओं पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

'निष्प्रयोजन परम्परा' अर्थात् 'रूढ़ि' का विवेचन हम अगले लेख में करेंगे………

10 अगस्त 2011

अभिप्रायः बोध : नयज्ञान -अनेकान्तवाद


अनेकांतवाद शृंखला के इस लेख से जुड़ने के लिए, जिन बंधुओ ने पिछ्ले लेख न देखे हो, कृपया एक बार दृष्टि अवश्य डालें। ताकि आप विषय से जुड़ सकें।

सत्य की आवश्यकता पर देखे : सत्य की गवेषणा
अनेकांत विषय में प्रवेश के लिए पढें दृष्टांत : छः अंधे और हाथी - अनेकांतवाद
दृष्टिकोण में सत्यांश के महत्व पर  : सत्यखोजी उपकरण - अनेकांतवाद
अनेकांत के बारे में भ्रांतियाँ और ‘नय’ की भूमिका : सत्यान्वेषण लैब – अनेकांतवाद
‘अपेक्षा’ का स्पष्टिकरण  और अनेकांत की परिभाषा : तथ्य की परीक्षण-विधि -अनेकांतवाद
नय ज्ञान पर सप्तनय की व्याख्या : अपेक्षा-बोध : नयज्ञान - अनेकान्तवाद

जिस में हमने सात में से मात्र दो नय ‘नैगमनय’ और ‘संग्रहनय’ के बारे में उदाहरण सहित जाना, अब……

3-व्यवहारनय – संग्रहनय से ग्रहण हुए पदार्थों अथवा तथ्यों का योग्य रिति से पृथकत्व करने वाला अभिप्रायः व्यवहार नय है। संग्रह नय के अर्थ का विशेष रूप से बोध करने के लिए उसका पृथक् करण आवश्यक हो जाता है। हर वस्तु के भेद-प्रभेद करना इस नय का कार्य है यह नय सामान्य की उपेक्षा करके विशेष को ग्रहण करता है।जैसे-ज्वर एक सामान्य रोग है किन्तु मस्तिष्क ज्वर से किसी ज्वर विशेष का बोध होता है।सामान्य एक समूह है जबकि विशेष उसका एक विशिष्ट भाग. सामान्य से विशिष्ट की खोज में निरंतर सूक्ष्मता की आवश्यकता होती है।

4-ॠजुनय – मात्र वर्तमान कालवर्ती प्रयाय को मान्य करने वाले अभिप्रायः को ॠजुनय कहते है। क्योंकि भूतकाल विनिष्ट और भविष्यकाल अनुत्पन्न होने के कारण, केवल वर्तमान कालवर्ती पर्याय को ही ग्रहण करता है। जैसे- वर्तमान में यदि आत्मा सुख अनुभव कर रही हो तो ही यह नय उस आत्मा को सुखी कहेगा। यानि यहाँ क्षण स्थायी पर्याय से सुखी दुखी मान लिया जाता है।

5-शब्दनय – यह नय शब्दप्रधान नय है। पर्यायवाची शब्दों में भी काल,कारक, लिंग, संख्या और उपसर्ग भेद से अर्थ भेद मानना शब्दनय है। जैसे- काल भेद से ‘गंगा थी,गंगा है,गंगा होगी’ इन शब्दों को तीन अर्थ-भेद से स्वीकार करेगा। यदि काल, लिंग, और वचनादि भेद नहीं हो तो यह नय भिन्न अर्थ होने पर भी शब्द के भेद नहीं करता। अर्थात् पर्यायवाची शब्दों का एक ही अर्थ मानता है।

6-समभिरूढनय – यह शब्दनय से भी सूक्ष्म है। शब्दनय जहाँ अनेक पर्यायवाची शब्द का एक ही अर्थ मानता है, उसमें भेद नहीं करता, वहाँ समभिरूढनय पर्यायवाची शब्द के भेद से अर्थ-भेद मानता है। इसके अभिप्रायः से कोई भी दो शब्द, एक अर्थ के वाचक नहीं हो सकते। जैसे- इन्द्र और पुरन्दर पर्यायवाची है फिर भी इनके अर्थ में अन्तर है। ‘इन्द्र’ शब्द से ऐश्वर्यशाली का बोध होता है और ‘पुरन्दर’ शब्द से ‘पुरों अर्थात् नगरों का नाश करने वाला’ ग्रहण होता है। यह नय शब्दों के मूल अर्थ को ग्रहण करता है, प्रचलित अर्थ को नहीं। इस प्रकार अर्थ भिन्नता को मुख्यता देकर समभिरूढनय अपना अभिप्रायः प्रकट करता है।

7-एवंभूतनय – यह नय समभिरूढनय से भी सूक्ष्म है। जिस समय पदार्थों में जो क्रिया होती है, उस समय क्रिया के अनुकूल शब्दों से अर्थ के प्रतिपादन करने को एवंभूत नय कहते है। यह सक्रियता के आधार पर उसी अनुकूल अर्थ पर बल देता है। जैसे- जब इन्द्र नगरों का नाश कर रहा हो तब उसे इन्द्र कहना व्यर्थ है, तब वह पुरन्दर है। जब वह ऐश्वर्य भोग रहा हो उसी समय उसमें इन्द्रत्व है। यथा खाली दूध की भगोली को दूध की भगोली कहना व्यर्थ है। जिस समय उसमें दूध हो उसे दूध की भगोली कहा जा सकता है। इस नय में उपयोग सहित क्रिया ही प्रधान है। यह वस्तु की पूर्णता को ही ग्रहण करता है। वस्तु में एक अंश कमी हो तो इस नय के विषय से बाहर रहती है।

इस प्रकार हर प्रतिक्रिया किसी न किसी नय से अपेक्षित होती है। नय समझ जाने पर हमें यह समझ आ जाता है कि कथन किस अपेक्षा से किया गया है। और हमें वक्ता के अभिप्राय: का निर्णय हो जाता है।

9 अगस्त 2011

अपेक्षा-बोध : नयज्ञान - अनेकान्तवाद


पिछले लेखों में हमने अनेकांत का भावार्थ समझने का प्रयास किया कि किसी भी कथन के अभिप्रायः को समझना आवश्यक है। अभिप्रायः इस बात पर निर्भर करता है कि कथन किस अपेक्षा से किया गया है। वस्तुतः कथन असंख्य अपेक्षाओं से किया जाता है किन्तु मुख्यतया सात अपेक्षाएँ होती है जिसका विवेचन यहाँ किया जा रहा है। अपेक्षाओं को जानने के सिद्धांत को नय कहते है।

“नय” सिद्धांत वक्ता के आशय या कथन को तत्कालिक संदर्भ में सम्यक प्रकार से समझने की पद्धति है।

जैसा पहले बताया गया कि प्रत्येक द्रव्य में अनंत गुण-धर्म रहे हुए होते है। उन अनंत गुण-धर्मों में से किसी एक को प्रमुखता देना, दूसरों को गौण रखते हुए और अन्य गुण-धर्मों का निषेध न करते हुए, एक को मुख्यता से व्यक्त करना या जानना ‘नय ज्ञान’ कहलाता है।

सात नय (सप्तनय) इस प्रकार है:-

1-नैगमनय
2-संग्रहनय
3-व्यवहारनय
4-ॠजुनय
5-शब्दनय
6-समभिरूढनय
7-एवंभूतनय

1-नैगमनय – नैगमनय संकल्प मात्र को पूर्ण कार्य अभिव्यक्त कर देता है। उसके सामान्य और प्रयाय दो भेद होते है। काल की अपेक्षा से भी नैगमनय के तीन भेद, भूत नैगमनय, भविष्य नैगमनय और वर्तमान नैगमनय होते है।

विषय के उलझाव से बचने के लिए यहाँ विस्तार में जाना अभी उचित नहीं है। कल उदाहरण दिया ही था कि ‘नैगमनय’ निगम का अर्थ है संकल्प। नैगम नय संकल्प के आधार पर एक अंश स्वीकार कर अर्थघटन करता है। जैसे एक स्थान पर अनेक व्यक्ति बैठे हुए है। वहां कोई व्यक्ति आकर पुछे कि आप में से कल मुंबई कौन जा रहा है? उन में से एक व्यक्ति बोला – “मैं जा रहा हूँ”। वास्तव में वह जा नहीं रहा है, किन्तु जाने के संकल्प मात्र से कहा गया कि ‘जा रहा हूँ’। इस प्रकार संकल्प मात्र को घटित कथन कहने पर भी उसमें सत्य का अंश रहा हुआ है। नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

भूत नैगमनय - भूतकाल का वर्तमान काल में संकल्प करना जैसे दशहरे के दिन कहना आज रावण मारा गया। जबकि रावण को मारे गए बहुत काल बीत गया। यह भूत नैगमनय की अपेक्षा सत्य है।

भविष्य नैगमनय - जैसे डॉक्टरी पढ रहे विद्यार्थी को भविष्य काल की अपेक्षा से ‘डॉक्टर साहब’ कह देना भविष्य नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

वर्तमान नैगमनय – जैसे सोने की तैयारी करते हुए कहना कि ‘मैं सो रहा हूँ’ वर्तमान नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

इस प्रकार नैगमनय के परिप्रेक्ष्य में कथन की अपेक्षा को परख कर, सत्यांश लेकर, कथन के अभिप्रायः को निश्चित करना अनेकांत या अपेक्षावाद का नैगमनय है।

2-संग्रहनय – संग्रहनय एक शब्द मात्र में एक जाति की अनेक वस्तुओं में एकता या संग्रह लाता है।
जैसे कहीं व्यक्ति प्रातः काल अपने सेवक से कहे- ‘ब्रश लाना तो’ और मात्र ‘ब्रश’ कहने से सेवक ब्रश, पेस्ट, जिव्हा साफ करनें की पट्टी, पानी की बोतल, तौलिया आदि वस्तुएं ला हाजिर करे तो वह सभी दातुन सामग्री की वस्तुएँ ब्रश शब्द में संग्रहित होने से ब्रश कहना संग्रहनय की अपेक्षा सत्य है।
इस प्रकार कई शब्द एक वस्तुनाम के भीतर समाहित होने से संग्रहनय की अपेक्षा से सत्य है इस सत्यांश द्वारा अभिप्रायः सुनिश्चित करना अपेक्षावाद या सापेक्षता नियम है।

क्रमशः……………

6 अगस्त 2011

तथ्य की परीक्षण विधि - अनेकान्तवाद


सत्य तथ्य पर पहुँचने के लिए हमें वक्ता के कथन का आशय (अभिप्रायः) समझना आवश्यक हो जाता है। आशय समझने के लिए, यह जानना आवश्यक हो जाता है कि वक्ता ने कथन किस 'परिप्रेक्ष्य' में किया है, किस 'अपेक्षा' से किया है। क्योंकि प्रत्येक कथन किसी न किसी अपेक्षा से ही किया जाता है। वाच्य का अभिप्रायः जानने के लिए भी, पठन कुछ इस प्रकार किया जाता है कि यह सुस्पष्ट हो जाय,लेखक नें कथन किस अपेक्षा से किया है। वक्ता या लेखक के अभिप्रायः को ताड़ लेना ही सत्य पर पहुँचने का सीधा मार्ग है। सत्य जानने के लिए, अभिप्रायः ताड़नें की विधि को ही अनेकांतवाद कहते है।


जैसे किसी व्यक्ति विशेष के बारे में सूचनाएं देते हुए कोई वक्ता कहता है कि- ‘यह व्यक्ति अच्छा है’। अब इस सूचना के आधार पर, उसके कथन में अन्तर्निहित अपेक्षा को परख कर, हमें तय करना है कि वक्ता ने किस अभिप्रायः से कहा कि 'वह व्यक्ति अच्छा है'। आईए समझने का प्रयास करते है……

1-उसके ‘सुंदर दिखने’ की ‘अपेक्षा’ से वह अच्छा है?
2-उसकी ‘मधुरवाणी’ की ‘अपेक्षा’ से वह अच्छा है?
3-उसके हर समय ‘मददतत्पर’ रहने की ‘अपेक्षा’ से वह अच्छा है?
4-या मात्र ‘मिलनसार’ होने की ‘अपेक्षा’ से वह अच्छा है?
5-मात्र ‘दिखावे’ (प्रदर्शन) की ‘अपेक्षा’ से वह अच्छा है?
6-अथवा वक्ता के प्रति 'मोह' की 'अपेक्षा' से ही वह अच्छा है?
7-या ‘व्यंग्य शैली’ की ‘अपेक्षा’ से किया गया कथन है कि वह 'अच्छा' है?

इस प्रकार वक्ता के ‘अभिप्रायः’ को पहचान लेना, उस दूसरे व्यक्ति के ‘अच्छे होने’ के सत्य को जानना हुआ।

प्राय: हम देखते है, किसी ठग की धूर्तता से कईं लोग बच जाते है, और कईं लोग फंस भी जाते है। धूर्तता से बचने वाले हमेशा धूर्त की मीठी बातों और तर्कसंगत प्रस्तुति के बाद भी उसमें छुपे धूर्त के अभिप्रायः को पहचान लेते है। और फंसने वाले उसके अभिप्रायः को पहचानने में भूल कर जाते है, या चूक जाते है। कहने का आशय है कि कथन के सत्यांश को गहराई से पकड़ने की विधि ही अनेकांत है।

इस सिद्धान्त की गहराई में जाने के पूर्व, एक बार पुनः दोहराव का जोखिम लेते हुए, अनेकांत की संक्षिप्त परिभाषा प्रस्तुत कर रहा हूँ। क्योंकि एक बार शब्दशः यह परिभाषा आत्मसात होने के बाद अगला गूढ़ वर्गीकरण और विवेचन, सहज बोध हो सकता है।

“समस्त व्यवहार या ज्ञान के लेन-देन का मुख्य साधन भाषा है। भाषा अनेक शब्दों से बनती है। एक ही शब्द, प्रयोजन एवं प्रसंग के अनुसार, अनेक अर्थों में प्रयुक्त होते है। हर कथन किसी अभिप्रायः से किया जाता है, अभिप्रायः इस बात से स्पष्ट होता है कि कथन किस अपेक्षा से किया गया है। कथ्यार्थ या वाच्यार्थ का निर्धारण अपेक्षा से ही सम्भव है। अतः अनेकांत को अपेक्षावाद भी कहते है। अनेकांत दृष्टि कथन को समझने की एक सटीक पद्धति है”।

3 अगस्त 2011

सत्यान्वेषण लैब – अनेकान्तवाद


अनेकांत – स्याद्वाद का सिद्धान्त प्रत्येक व्यवहार में अनुभव किया जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि जब तक पदार्थ/दृष्टि के स्वरूप को सम्पूर्ण न समझ लिया जाय, अपने आपको सम्पूर्ण न समझना ही जीवन विकास का प्रतीक बन सकता है।

सम्पूर्ण विश्व में “ही” और “भी” का साम्राज्य व्याप्त है। जहाँ ‘ही’ का बोलबाला है वहाँ कलह, तनाव, विवाद है। और जहाँ इसके विपरित ‘भी’ का व्यवहार होता है, वहाँ सभी का सम्यक समाधान हो जाता है। और यह उत्थान की स्थिति का निर्माण करता है। सापेक्षदृष्टि मण्डनात्मक प्रवृति की द्योतक है जबकि एकांतदृष्टि खण्डनात्मक प्रक्रिया। इसिलिए सापेक्षतावाद अपने आप में सम्पूर्ण माना जाता है।

सापेक्षतावाद के बारे में कुछ भ्रांतियाँ व्याप्त है उन्हें दूर किए बिना इस सिद्धान्त को समझना कठिन है।

1-स्तरीय जानकारी और शब्द साम्यता के आधार पर लोग यह समझते है कि अनेकांतवाद का अभिप्राय अनेकेश्वर या अनेक आत्मा जैसा होगा और एकांतवाद का अभिप्राय एक ईश्वर या अद्वेत जैसा होगा। किन्तु अनेकांतवाद का इस प्रकार की आस्था से कुछ भी लेना देना नहीं है। अनेकांत शुद्ध रूप से ‘ज्ञान के विश्लेषण’ का सिद्धान्त है।

2-लोग प्रायः यह मानते है, कि अनेकांतवाद मतलब ‘यह भी सही, वो भी सही, सभी सही’ या ‘सभी अपनी अपनी जगह सही’ पर यह भी गलत अवधारणा है। वस्तुतः अनेकांत सभी के सत्य का अभिप्राय तय करके, विश्लेषण करने के प्रयोजन से संकलित करता है। और संशोधन के बाद सत्य स्वरूप का प्रतिपादन करता है।

3-स्याद्वाद को लोग अक्सर संशयवाद समझनें की भूल करते है। स्याद् आस्ति, स्याद् नास्ति, स्याद् आस्ति नास्ति रूप सप्तभंगी में कथंचित् को देखकर प्रथम दृष्टि संशयपूर्ण वाक्य से संशयवाद मान बैठते है। पर वास्तव में यह वस्तु की विभिन्न दृष्टियों से अपेक्षा-अभिप्राय समझ कर शुद्ध स्वरूप जानने का साधन है।

सामान्य रूप से कठिन है यह समझना कि जिस कारण से इसे सापेक्षतावाद कहा जाता है, वह ‘दृष्टिकोण की अपेक्षा’ क्या चीज है?

इसे समझने के लिए अनेकांतवाद का पहला रूप है सप्तनय। ‘नय’ वक्ता के अभिप्राय को समझने की ‘प्रमाण’ के बाद दूसरी पद्धति है। जैसे प्रत्येक द्रव्य में अनंत गुण-धर्म रहे हुए है। उन अनंत गुण-धर्मों में से किसी एक गुण-धर्म को मुख्यता देकर, शेष गुण-धर्मों को गौण रखकर, किन्तु निषेध न करते हुए कथन करना, या कथन का अभिप्राय समझना नय-ज्ञान कहलाता है। नय पर हम अगले आलेख में विस्तृत चर्चा करेंगे, सातों नय के आलेखन के साथ। उदाहरण के लिए पहला नय है, ‘नैगमनय’ निगम का अर्थ है संकल्प। नैगम नय संकल्प के आधार पर एक अंश स्वीकार कर अर्थघटन करता है। जैसे एक स्थान पर अनेक व्यक्ति बैठे हुए है। वहां कोई व्यक्ति आकर पुछे कि आप में से कल मुंबई कौन जा रहा है? उन में से एक व्यक्ति बोला – “मैं जा रहा हूँ”। वास्तव में वह जा नहीं रहा है, किन्तु जाने के संकल्प मात्र से कहा गया कि ‘जा रहा हूँ’। यह नैगम नय की अपेक्षा से सत्य है।

अगले लेखों में 7 नय, 4 प्रमाण, 4 निक्षेप और स्याद्वाद की सप्तभंगी का विवेचन किया जाना है।

पाठक कृपया प्रतिक्रिया दें कि यदि विषय जटिल और गूढ लग रहा हो, ग्रहित करना सहज न हो तो यहां विराम देते है और फिर कभी इस पर बात करेंगे। आपके प्रतिभाव से ही निर्धारित हो सकता है।

2 अगस्त 2011

सत्यखोजी उपकरण - अनेकान्तवाद


प्रायः यह कहा जाता है………

“सबका अपना अपना नज़रिया होता है”
“सबका अपना अपना दृष्टिकोण होता है”
“Everybody has their own Point of view”

ठीक है……


एकांगी दृष्टि के बंधन से मुक्ति ही उपाय है।
हर नज़रिए में सत्य का अंश होता है।

किन्तु, हर दृष्टिकोण को यथारूप स्वीकार करना मिथ्या हो सकता है।

एक ही दृष्टिकोण को सब-कुछ (पूर्ण-सत्य) मानना एकांगी सोच (एकांतवाद) है। जो अपूर्ण या गलत है।


यथार्थ में, हर दृष्टिकोण किसी न किसी अपेक्षा के आधार से होता है।
अपेक्षा समझ आने पर दृष्टिकोण का तात्पर्य समझ आता है।
दृष्टिकोण का अभिप्राय समझ आने पर सत्य परिशुद्ध बनता है।
परिशुद्ध अभिप्रायों के आधार पर परिपूर्ण सत्य ज्ञात होता है।



सापेक्षतावाद का सिद्धांत हमारे लिए नया नहीं है। हम इस सिद्धान्त को अच्छी तरह से जानते भी है। अनेकांत,वस्तुतः सत्य को जानने समझने का सर्वश्रेष्ठ उपकरण है, इसका  कोई अन्य जोड़ नहीं है। बस सही समय पर इसका उपयोग नहीं हो पाता। “सबका अपना अपना दृष्टिकोण होता है” अनेकांत मार्ग पर बस यहां तक पहुँच कर पुनः लौट जाते है। पर अनेकांत का वास्तविक उपयोग तो इसके बाद शुरू होता है। अलग अलग दृष्टिकोण का अपेक्षा के आधार पर विश्लेषण करते हुए अन्ततः तो पूर्ण सत्य तक पहुँचना ही लक्ष्य होना चाहिए।

हम अक्सर देखते है कोई व्यक्ति किसी की ‘बात सुननें’ में बड़ा धैर्य दिखाते है। दूसरों को ‘समझते’ है। उनका व्यवहार बड़ा ‘परिपक्व’ नज़र आता है। वे अपने कथन को बड़ा ही ‘संतुलित’ प्रस्तुत करते है। हम उसे साधु सज्जन या ज्ञानी की उपमा देते है। लेकिन यथार्थ में, वह जाने अनजाने में अनेकांत, अपेक्षावाद या कहें कि दृष्टिवाद का व्यवहार में प्रयोग कर रहे होते है। अगर अनजानें में ही सापेक्षतावाद रूपी साधन, उत्तम व्यक्तित्व प्रदान करने में समर्थ होता है तो इस सिद्धान्त के गहन विस्तृत अध्यन और फिर उसके अनुपालन के बाद तो ज्ञानी बनाना सम्म्भव ही है।

छ: अंधे और हाथी के दृष्टांत में समरूप सत्यांश थे, अब देखते है परस्पर विपरित सत्यांश का दृष्टांत……

दो मित्र अलग अलग दिशा से आते है और पहली बार एक मूर्ती को अपने बीच देखते है। पहला मित्र कहता है यह पुरूष की प्रतिमा है जबकि दूसरा मित्र कहता है नहीं यह स्त्री का बिंब है। दोनो में तकरार होती है। पहला कहे पुरूष है दूसरा कहे स्त्री है। पास से गुजर रहे राहगीर नें कहा ‘सिक्के का दूसरा पहलू भी देखो’। मित्र समझ गए, उन्होंने स्थान बदल दिए। अब पहले वाला कहता है हां यह स्त्री भी है। और दूसरा कहता है सही बात है यह पुरूष भी है।

वस्तुतः किसी कलाकार नें वह प्रतिमा इस तरह ही बनाई थी कि वह एक दिशा से पुरूष आकृति में तो दूसरी दिशा से स्त्री आकार में थी।

यहां हम यह नहीं कह सकते कि दोनो सत्य थे। बस दोनो की बात में सत्य का अंश था। तो पूर्ण सत्य क्या था? पूर्ण सत्य वही था जो कलाकार ने बनाया। वह प्रतिमा एक तरफ स्त्री और दूसरी तरफ पुरूष था, यही बात पूर्ण सत्य थी।

अब आप बताएँ कि आपके दृष्टिकोण से अनेकांतवाद/ सापेक्षतावाद/दृष्टिवाद क्या है?

31 जुलाई 2011

छः अंधे और हाथी - अनेकान्तवाद


अनेकांतवाद के सिद्धांत को स्पष्ठ करने के पूर्व, जो दृष्टांत अनेकांतवाद के लिए दिया जाता है। यहां प्रस्तुत करता हूँ।

एक गांव में जन्मजात छः अन्धे रहते थे। एक बार गांव में पहली बार हाथी आया। अंधो नें हाथी को देखने की इच्छा जतायी। उनके एक अन्य मित्र की सहायता से वे हाथी के पास पहुँचे। सभी अंधे स्पर्श से हाथी को महसुस करने लगे। वापस आकर वे चर्चा करने लगे कि हाथी कैसा होता है। पहले अंधे ने कहा हाथी अजगर जैसा होता है। दूसरे नें कहा नहीं, हाथी भाले जैसा होता है। तीसरा बोला हाथी स्तम्भ के समान होता है। चौथे नें अपना निष्कर्ष दिया हाथी पंखे समान होता है। पांचवे ने अपना अभिप्राय बताया कि हाथी दीवार जैसा होता है। छठा ने विचार व्यक्त किए कि हाथी तो रस्से समान ही होता है। अपने अनुभव के आधार पर अड़े रहते हुए, अपने अभिप्राय को ही सही बताने लगे। और आपस में बहस करने लगे। उनके मित्र नें उन्हें बहस करते देख कहा कि तुम सभी गलत हो, व्यथा बहस कर रहे हो। अंधो को विश्वास नहीं हुआ। 

पास से ही एक दृष्टिवान गुजर रहा था। वह अंधो की बहस और मित्र का निष्कर्ष सुनकर निकट आया और उस मित्र से कहने लगा, यह छहो सही है, एक भी गलत नहीं।

उन्होंने जो देखा-महसुस किया वर्णन किया है, जरा सोचो सूंढ से हाथी अजगर जैसा ही प्रतीत होता है। दांत से हाथी भाले सम महसुस होगा। पांव से खंबे समान तो कान से पंखा ही अनुभव में आएगा। पेट स्पर्श करने वाले का कथन भी सही है कि वह दीवार जैसा लगता है। और पूँछ से रस्से के समान महसुस होगा। यदि सभी अभिप्रायों का समन्वय कर दिया जाय तो हाथी का आकार उभर सकता है। जैसा कि सच में हाथी है।

प्रस्तुत दृष्टांत आपने अवश्य सुना पढा होगा, विभिन्न दर्शनों ने इसका प्रस्तुतिकरण किया है।

इस कथा का कृपया विवेचन करें……

  • प्रस्तुत दृष्टांत का ध्येय क्या है?
  • इस कथा का अन्तिम सार क्या है?
  • विभिन्न प्रतीकों के मायने क्या है?
  • क्या कोई और उदाहरण है जो इसका समानार्थी हो?
  • यह दृष्टांत किस तरह के तथ्यों पर लागू किया जा सकता है?

29 जुलाई 2011

सत्य की गवेषणा - अनेकान्तवाद



सत्य पाने का मार्ग अति कठिन है। सत्यार्थी अगर सत्य पाने के लिए कटिबद्ध है, तो उसे बहुत सा त्याग चाहिए। और अटूट सावधानी भी। कईं तरह के मोह उसे मार्ग चलित कर सकते है। उसके स्वयं के दृष्टिकोण भी उसके सत्य पाने में बाधक हो सकते है।

  • मताग्रह न रखें

सत्य खोजी को चाहिए, चाहे कैसे भी उसके दृढ और स्थापित पूर्वाग्रह हो। चाहे वे कितने भी यथार्थ प्रतीत होते हो। जिस समय उसका चिंतन सत्य की शोध में सलग्न हो, उस समय मात्र के लिए तो उसे अपने पूर्वाग्रह या कदाग्रह को तत्क्षण त्याग देना चाहिए। अन्यथा वे पूर्वाग्रह, सत्य को बाधित करते रहेंगे।

सोचें कि मेरा चिंतन ,मेरी धारणाओं, मेरे आग्रहों से प्रभावित तो नहीं हो रहा? कभी कभी तो हमारी स्वयं की 'मौलिक विचारशीलता' पर ही अहं उत्पन्न हो जाता है। और अहं, यथार्थ जानने के बाद भी स्वयं में, विचार परिवर्तन के अवसर को अवरोधित करता है। सोचें कि कहीं मैं अपनी ही वैचारिकता के मोहजाल में, स्वच्छंद चिंतन में तो नहीं बह रहा? कभी कभी तो अजानते ही हमारे विश्लेषण मताग्रह के अधीन हो जाते है। प्रायः ऐसी स्थिति हमें, सत्य तथ्य से भटका देती है।

  • पक्षपात से बचें

प्रायः हमारी वैचारिकता पर किसी न किसी विचारधारा का प्रभाव होता है। तथ्यों की परीक्षा-समीक्षा करते हुए, अनायास ही हमारा पलड़ा सत्य विरूद्ध  झुक सकता है। और अक्सर हम सत्य के साथ 'वैचारिक पक्षपात' कर बैठते है। इस तरह के पक्षपात के प्रति पूर्ण सावधानी जरूरी है। पूर्व स्थापित निष्कर्षों के प्रति निर्ममता का दृढ भाव चाहिए। सम्यक दृष्टि से निरपेक्ष ध्येय आवश्यक है।

  • सत्य के प्रति निष्ठा

"यह निश्चित है कि कोई एक 'परम सत्य' अवश्य है। और सत्य 'एक' ही है। सत्य को जानना समझना और स्वीकार करना हमारे लिए नितांत ही आवश्यक है।" सत्य पर इस प्रकार की अटल श्रद्धा होना जरूरी है। सत्य के प्रति यही आस्था, सत्य जानने का दृढ मनोबल प्रदान करती है। उसी विश्वास के आधार पर हम अथक परिश्रम पूर्व सत्य मार्ग पर डटे रह सकते है। अन्यथा जरा सी प्रतिकूलता, सत्य संशोधन को विराम दे देती है।

  • परीक्षक बनें।

परीक्षा करें कि विचार, तर्कसंगत-सुसंगत है अथवा नहीं। वे न्यायोचित है या नहीं। भिन्न दृष्टिकोण होने कारण हम प्रथम दृष्टि में ही विपरित विश्लेषण पर पहुँच जाते है। जैसे सिक्के के दो पहलू होते है। दूसरे पहलू पर भी विचार जरूरी है। जल्द निर्णय का प्रलोभन त्याग कर, कम से कम एक बार तो विपरित दृष्टिकोण से चिंतन करना ही चाहिए। परिक्षक से सदैव तटस्थता की अपेक्षा की जाती है। सत्य सर्वेक्षण में तटस्थ दृष्टि तो आवश्यक ही है।

  • भेद-विज्ञान को समझें

जो वस्तु जैसी है, उसे यथारूप में ही मनन करें और उसे प्रस्तुत भी उसी यथार्थ रूप में करें। न उसका कम आंकलन करें न उसमें अतिश्योक्ति करें न अपवाद मार्ग का अनुसरण करें। तथ्यों का नीर-क्षीर विवेक करें। उसकी सार्थक समीक्षा करते हुए नीर-क्षीर विभाजन करें। और हेय, ज्ञेय, उपादेय के अनुरूप व्यवहार करें। क्योंकि जगत की सारी सूचनाएँ, हेय, ज्ञेय और उपादेय के अनुसार व्यवहार में लानी चाहिए। अर्थात् ‘हेय’ जो छोड़ने लायक है उसे छोड़ें। ‘ज्ञेय’ जो मात्र जानने लायक है उसे जाने। और ‘उपादेय’ जो अपनाने लायक है उसे अपनाएँ।

वस्तुएँ, कथन आदि को समझने के लिए, अनेकांत जैसा एक अभिन्न सिद्धांत हमें उपलब्ध है। संसार में अनेक विचारधाराएं प्रचलित है। वादी अपनी एकांत दृष्टि से वस्तु को देखते है। इससे वे वस्तु के एक अंश को ही व्यक्त करते है। प्रत्येक वस्तु को विभिन्न दृष्टियों, विभिन्न अपेक्षाओं से पूर्णरूपेण समझने के लिए अनेकांत दृष्टि चाहिए। अनेकांतवाद के नय, निक्षेप, प्रमाण और स्याद्वाद अंग है। इनके भेद-विज्ञान से सत्य का यथार्थ निरूपण सम्भव है।
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24 जुलाई 2011

धर्म अर्थात् 'आत्मा का शुद्ध स्वभाव'

धन, सम्पत्ति, सुख-सुविधा और कीर्ती  प्राप्त करनें के बाद भी जीवन में असंतोष की प्यास शेष रह जाती है। कारण कि जीवन में शान्ति नहीं सधती। और आत्म का हित शान्ति में स्थित है। आत्मिक दृष्टि से सदाचरण ही शान्ति का एक मात्र उपाय है।

धर्माचरण अपने शुद्ध रूप में सदाचरण ही है। धर्म की परिभाषा है ‘वत्थुसहावो धम्मो ’ अर्थात् वस्तु का 'स्वभाव' ही धर्म है। स्वभाव शब्द में भी बल ‘स्व’ पर है ‘स्व’ के भाव को स्वभाव कहते है। यदि हमारा स्वभाव ही धर्म है तो प्रश्न उठता है, हमारा स्वभाव क्या है? हम निश दिन झूठ बोलते है, कपट करते है, येन केन धन कमाने में ही लगे रहते है अथवा आपस में लड़ते रहते है, क्या यह हमारा स्वभाव है? हम क्रोध करते है, लोभ करते है, हिंसा करते है, क्या यह हमारा स्वभाव है? वास्तव में यह हमारा स्वभाव नहीं है। क्योंकि प्रायः हम सच बोलते है मात्र लोभ या भयवश झूठ बोलते है। यदि हम दिन भर क्रोध करें तो जिंदा नहीं रह सकते। थोडी देर बाद जब क्रोध शान्त हो जाता है, तब हम कहते है कि हम सामान्य हो गए। अतः हमारी सामान्य दशा क्रोध नहीं, शान्त रहना है। क्रोध विभाव दशा है और शान्त रहना स्वभाव दशा है। अशान्ति पैदा करने वाले सभी आवेग-आवेश हमारी विभाव दशा है। शान्तचित सदाचार में रत रहना ही हमारा स्वभाव है। और अपने 'स्वभाव' में रहना ही हमारा धर्म है।

धर्म की यह भी परिभाषा है "यतस्य धार्यती सः धर्मेण "  धारण करने योग्य धर्म है। यह भी स्वभाव अपेक्षा से ही है। सदाचार रूप शुद्ध 'स्वभाव' को धारण करना ही धर्म है। इसिलिए यह निर्देश है कि स्वभाव में स्थिर रहो। यही तो धर्म है। और हमारा शाश्वत स्वभाव, सदाचरण ही है। क्योंकि जीवन के लिए लक्षित शान्ति ही है।

16 जुलाई 2011

सम्मान किसे अधिक मिलता है?


एक बार राजा के पुरोहित के मन में विचार आया कि राजा जो मुझे आदर भाव से देखता है, वह सम्मान मेरे ज्ञान का है या मेरे सदाचार का? अगले दिन पुरोहित ने राजकोष से एक सिक्का उठा लिया, जिसे कोष-मंत्री ने देख लिया। उसने सोचा पुरोहित जैसा महान व्यक्ति सिक्का उठाता है तो कोई विशेष प्रयोजन होगा। दूसरे दिन भी यही घटना दोहराई गई। फ़िर भी मंत्री कुछ नहीं बोला तीसरे दिन पुरोहित नें कोष से मुट्ठी भर सिक्के उठा लिए। तब मंत्री ने राजा को बता दिया। राजा नें दरबार में राज पुरोहित से पुछा- क्या मंत्री जी सच कह रहे है?

राज पुरोहित ने उत्तर दिया-‘हां महाराज’ राजा नें राज पुरोहित को तत्काल दंड सुना दिया। तब राजपुरोहित बोला-महाराज! मैने सिक्के उठाए पर मैं चोर नहीं हूँ। मैं यह जानना चाहता था कि सम्मान मेरे ज्ञान का हो रहा है या मेरे सदाचार का? वह परीक्षा हो गई। सम्मान अगर ज्ञान का होता तो आज कटघरे में खड़ा न होता। ज्ञान जितना कल था, उतना ही आज भी मेरे पास सुरक्षित है। पर मेरा केवल सदाचार खण्ड़ित हुआ और मैं सम्मान की जगह दंड योग्य अपराधी निश्चित हो गया। सच ही है चरित्र ही सम्मान पाता है।

मित्रों!! आप क्या सोचते है, सम्मान ज्ञान को अधिक मिलता है या सदाचार को?

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