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6 सितंबर 2013

समाज सुधार कैसे हो?


"पहले स्वयं सुधरो, फिर दुनिया को सुधारना" एवं "क्या करें दुनिया ही ऐसी है"। वस्तुतः यह दोनो कथन विरोधाभासी है। या यह कहें कि ये दोनो कथन मायावी बहाने मात्र है। स्वयं से सुधार इसलिए नहीं हो सकता कि दुनिया में अनाचार फैला है, स्वयं के सदाचारी बनने से कार्य सिद्ध नहीं होते और दुनिया इसलिए सदाचारी नहीं बन पा रही कि लोग व्यक्तिगत रूप से सदाचारी नहीं है। व्यक्ति और समाज दोनों परस्पर सापेक्ष है। व्यक्ति के बिना समाज नहीं बन सकता और समाज के बिना व्यक्ति का चरित्र उभर नहीं सकता। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत सुधार के लिए सुधरे हुए समाज की अपेक्षा रहती है और समाज सुधार के लिए व्यक्ति का सुधार एक अपरिहार्य आवश्यकता है।

ऐसी परिस्थिति में सुधार की हालत यह है कि 'न नौ मन तैल होगा, न राधा नाचेगी'। तो फिर क्या हो?……

"उपदेश मत दो, स्वयं का सुधार कर लो दुनिया स्वतः सुधर जाएगी।"  हमें जब किसी उपदेशक को टोकना होता है तो प्रायः ऐसे कुटिल मुहावरों का प्रयोग करते है। इस वाक्य का भाव कुछ ऐसा निकलता है जैसे यदि सुधरना हो तो आप सुधर लें, हमें तो जो है वैसा ही रहने दें। उपदेश ऐसे प्रतीत होते है जैसे उपदेशक हमें सुधार कर, सदाचारी बनाकर हमारी सदाशयता का फायदा उठा लेना चाहता है। यदि कोई व्यक्ति अभी पूर्ण सदाचारी न बन पाया हो, फिर भी नैतिकताओ को श्रेष्ठ व आचरणीय मानता हुआ, लोगो को शिष्टाचार आदि के लिए प्रेरित क्यों नहीं कर सकता?

निसंदेह सदाचारी के कथनो का अनुकरणीय प्रभाव पडता है। लेकिन यदि कोई मनोबल की विवशता के कारण पूर्णरुपेण सदाचरण हासिल न कर पाए, उसके उपरांत भी वह सदाचार को जगत के लिए अनुकरणीय ग्रहणीय मानता हो। दुनिया में नैतिकताओं की आवश्यकता पर उसकी दृढ आस्था हो, विवशता से पालन न कर पाने का खेदज्ञ हो, नीतिमत्ता के लिए संघर्षरत हो और दृढता आते ही अपनाने की मनोकामना रखता हो, निश्चित ही उसे सदाचरण पर उपदेश देने का अधिकार है। क्योंकि ऐसे प्रयासों से नैतिकताओं का औचित्य स्थापित होते रहता है। वस्तुतः कर्तव्यनिष्ठा और नैतिक मूल्यों के प्रति आदर, आस्था और आशा  का बचे रहना नितांत ही आवश्यक है। आज भले एक साथ समग्रता से पालन में या व्यवहार में न आ जाय, यदि औचित्य बना रहा तो उसके व्यवहार में आने की सम्भावना प्रबल बनी रहेगी।

समाज से आदर्शों का विलुप्त होना, सदाचारों का खण्डित होना या नष्ट हो जाना व्यक्तिगत जीवन मूल्यों का भी विनाश है। और नैतिकताओं पर व्यक्तिगत अनास्था, सामाजिक चरित्र का पतन है.

इसलिए सुधार व्यक्तिगत और समाज, दोनो स्तर पर समानांतर और समान रूप से होना बहुत ही जरूरी है.

8 अक्टूबर 2012

जिजीविषा और विजिगीषा

मानव ही क्यों, प्राणीमात्र में मुख्यतः 'जिजीविषा' और 'विजिगीषा' दो वृतियाँ कार्यशील होती है। अर्थात् जीने की और जीतने की इच्छा। दीर्घकाल तक जीने की और ऐश्वर्यपूर्वक दूसरों पर अधिपत्य जमाने की स्वभाविक इच्छा मनुष्य मात्र में पाई जाती है। वस्तुतः 'जीने' की इच्छा ही 'जीतने' की इच्छा को ज्वलंत बनाए रखती है। एक छोटे से 'जीवन' के लिए, क्या प्राणी क्या मनुष्य, सभी आकाश पाताल एक कर देते है।

भौतिकवादी प्राय: इस 'जीने' और 'जीतने' के आदिम स्वभाव को, प्रकृति या स्वभाविकता के नाम पर संरक्षण और प्रोत्साहन देने में लगे रहते है। वे नहीं जानते या चाहते कि इस आदिम स्वभाव को सुसंस्कृत किया जा सकता है या किया जाय। इसीलिए प्राय: वे सुसंस्कृतियों का विरोध करते है और आदिम इच्छाओं को प्राकृतिक स्वभाव के तौर पर आलेखित/रेखांकित कर उसे बचाने का भरपूर प्रयास करते है। इसीलिए वे संस्कृति और संयम प्रोत्साहक धर्म का भी विरोध करते है। वे चाहते है मानव सदैव के लिए उसी जिजीविषा और विजिगीषा में लिप्त रहे, इसी में संघर्ष करता रहे, आक्रोशित और आन्दोलित बना रहे। जीने के अधिकार के लिए, दूसरों का जीना हराम करता रहे। और अन्ततः उसी आदिम इच्छाओं के अधीन अभिशप्त रहकर हमेशा अराजक बना रहे। 'पाखण्डी धर्मान्ध' व 'लोभार्थी धर्मद्वेषियों' ने विनाश का यही मार्ग अपनाया हुआ है।

दुर्भाग्य से "व्यक्तित्व विकास" और "व्यक्तिगत सफलता" के प्रशिक्षक भी इन्ही वृतियों को पोषित करते नजर आते है। इसीलिए प्रायः ऐसे उपाय नैतिकता के प्रति निष्ठा से गौण रह जाते है।

वस्तुतः इन आदिम स्वभावों या आदतों का संस्करण करना ही संस्कृति या सभ्यता है। धर्म-अध्यात्म यह काम बखुबी करता है। वह 'जीने' के स्वार्थी संघर्ष को, 'जीने देने' के पुरूषार्थ में बदलने की वकालत करता है। "जीओ और जीने दो" का यही राज है। बेशक! आप जीने की कामना कर सकते है, किन्तु प्रयास तो 'जीने देने' का ही किया जाना चाहिए। उस दशा में दूसरो का भी यह कर्तव्य बन जाएगा कि वे आपको भी जीने दे। अन्यथा तो गदर मचना निश्चित है। क्योंकि प्रत्येक अपने जीने की सामग्री जुटाने के खातिर, दूसरो का नामोनिशान समाप्त करने में ही लग जाएंगा। आदिम जंगली तरीको में यही तो होता है। और यही  विनाश का कारण भी है। जैसे जैसे सभ्यता में विकास आता है ‘जीने देने’ का सिद्धांत ‘जीने की इच्छा’ से अधिक प्रबल और प्रभाव से अधिक उत्कृष्ट होते चला जाता है। दूसरी 'जीतने की इच्छा' भी अधिपत्य जमाने की महत्वाकांक्षा त्याग कर, दिल जीतने की इच्छा के गुण में बदल जाती है।


(जिजीविषा-सहयोग) सभी को सहजता से जीने दो।
( हृदय-विजिगीषा) सभी के हृदय जीतो।

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥


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