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25 जुलाई 2010
सुख-दुःख
दुख के दिनों की दीनता, सुख के दिनों का दंभ ।
मानवता की मौत सम, तुच्छ बोध प्रारंभ ॥1॥
कर्म शत्रु संघर्ष से, जगे सुप्त सौभाग ।
दुख में दर्द लुप्त रहे, सुख में जगे विराग ॥2॥
दरिद्रता में दयावान बन, वैभव में विनयवान ।
सतवचनों पर श्रद्धावान बन, पुरूषार्थ चढे परवान ॥3॥
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