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14 जून 2024

गार्बेज ट्रक (कूडा-वाहन)

कूडा-वाहन

एक दिन एक व्यक्ति टैक्सी से एअरपोर्ट जा रहा था।  टैक्सी वाला कुछ गुनगुनाते हुए बड़े मनोयोग से गाड़ी चला रहा था कि सहसा एक दूसरी कार, पार्किंग से निकल कर तेजी से रोड पर आ गयी। टैक्सी वाले ने तेजी से ब्रेक लगाया, गाड़ी स्किड करने लगी और मात्र एक -आध इंच भर से,  सामने वाली कार से भिड़ते -भिड़ते बची।

यात्री ने सोचा कि अब टैक्सी वाला उस कार वाले को भला -बुरा कहेगा …लेकिन इसके उलट सामने वाला ही पीछे मुड़ कर उसे गलियां देने लगा।  इसपर टैक्सी वाला नाराज़ होने की बजाये उसकी तरफ हाथ हिलाते हुए मुस्कुराने लगा, और धीरे -धीरे आगे बढ़ गया। यात्री ने आश्चर्य से पूछा “ तुमने ऐसा क्यों किया ? गलती तो उस कार वाले की थी ,उसकी वजह से तुम्हारी गाडी लड़ सकती थी और हम होस्पिटलाइज भी हो सकते थे!”

“सर जी ”, टैक्सी वाला बोला, “बहुत से लोग गार्बेज ट्रक की तरह होते हैं। वे बहुत सारा गार्बेज उठाये हुए चलते हैं, फ्रस्ट्रेटेड, निराशा से भरे हुए, हर किसी से नाराज़।  और जब गार्बेज बहुत ज्यादा हो जाता है, तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए उसे दूसरों पर फैकने का मौका खोजने लगते हैं। किन्तु जब ऐसा कोई व्यक्ति मुझे अपना शिकार बनाने की कोशिश करता हैं, तो मैं बस यूँही मुस्कुराकर हाथ हिलाते हुए उनसे दूरी बना लेता हूँ।

ऐसे किसी भी व्यक्ति से उनका गार्बेज नहीं लेना चाहिए, अगर ले लिया तो समझो हम भी उन्ही की तरह उसे इधर उधर फेंकने में लग जायेंगे। घर में, ऑफिस में, सड़कों पर …और माहौल गन्दा कर देंगे, दूषित कर देंगे। हमें इन गार्बेज ट्रक्स को, अपना दिन खराब करने का अवसर नहीं देना चाहिए। ऐसा न हो कि हम हर सुबह किसी अफ़सोस के साथ उठें। ज़िन्दगी बहुत छोटी है, इसलिए उनसे प्यार करो जो हमारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं। किन्तु जो नहीं करते, उन्हें माफ़ कर दो।”

मित्रों, बहुत ही गम्भीराता से सोचने की बात है, हम सौद्देश्य ही कूडा वाहन से कूडा उफनवाते है। फिर उसे स्वीकारते है, उसे उठाए घुमते है और फिर यत्र तत्र बिखेरते चलते है।  ऐसा करने के पूर्व ही हमें, गार्बेज ट्रक की अवहेलना नहीं कर देनी चाहिए??? और सबसे बड़ी बात कि कहीं हम खुद गार्बेज ट्रक तो नहीं बन रहे ???

इस कहानी से सीख लेते हुए, हमें विषादग्रस्त व कुंठाग्रस्त लोगों को उत्प्रेरित करने से बचना चाहिए। स्वयं क्रोध कर उनसे उलझने की बजाए उन्हें माफ करने की आदत डालनी चाहिए। सहनशीलता, समता और सहिष्णुता वस्तुतः हमारे अपने व्यक्तित्व को ही स्वच्छ और शुद्ध रखने के अभिप्राय से है, न कि अपने ही गुण-गौरव अभिमान की वृद्धि के लिए। समाज में शिष्टाचार, समतायुक्त आचरण से ही प्रसार पाता है। और इसी आचरण से चारों ओर का वातावरण खुशनुमा और प्रफुल्लित बनता है।

26 जून 2013

सहिष्णुता

यह एक भ्रामक धारणा है कि भड़ास या क्रोध निस्तारण से तनाव मुक्ति मिलती है। उलट, क्रोध तो तनाव के अन्तहीन चक्र को जन्म देता है। क्योंकि भड़ास निकालने, आवेश अभिव्यक्त करने या क्रोध को मुक्त करने से प्रतिक्रियात्मक द्वेष ही पैदा होता है और द्वेष से तो वैर की परम्परा का ही सर्जन होता है। इस तरह प्रतिशोध की प्रतिपूर्ति के लिए व्यक्ति निरन्तर तनाव में रहता है। क्रोध का ईलाज आवेशों को मंद करके, क्रोध के शमन या दमन में ही है। क्षमा ही परमानेंट क्योर है। क्योंकि क्षमा ही वह शस्त्र है जो वैर के दुष्चक्र को खण्डित करता है। क्षमा के बाद किसी तरह के तनाव-बोझ को नहीं झेलना पड़ता। अर्थात् सहिष्णुता ही तनाव मुक्ति का उपाय है।

अहिंसा पर आम सोच बहुत ही सतही होती है। लोग गांधी के चिंतन, 'दूसरा गाल सामने करने' का परिहास करते है। वस्तुतः दूसरा गाल सामने करने का अभिप्राय है, धैर्यपूर्वक सहनशीलता से कोई ऐसा व्यवहार करना जिससे बदले की परम्परा प्रारम्भ होने से पहले ही थम जाय। ईट का जवाब पत्थर से देना तो तात्कालिक सरल और सहज है, किंतु निराकरण तो तब है जब हिंसा-प्रतिहिंसा की श्रंखला बनने से पूर्व ही तोड दी जाय। कईं लोगों के मानस में हिंसा और अहिंसा की अजीब अवधारणा होती है, वे सभी से हर हाल में अपने साथ तो अहिंसक व्यवहार की अपेक्षा रखते है, दूसरे किसी आक्रोशी को सहनशीलता का पाठ पढा लेते है, दूसरे लोगों के धैर्य सहित शिष्टाचार की भूरि भूरि प्रशंसा भी करते है। किन्तु अपने साथ पेश आती, जरा सी प्रतिकूलता का प्रतिक्रियात्मक हिंसा से ही जवाब देना उचित मानते है। सभी से सहिष्णु व्यवहार तो चाहते है, किन्तु अन्याय अत्याचार का जबाब तो त्वरित प्रतिहिंसा से ही देना उपयुक्त मानते है। हिंसा की प्रतिक्रिया हिंसा से न हो तो उसे कायरता मान बैठते है। अधैर्य से, सहिष्णुता एक ओर फैक कर, अतिशीघ्र क्रोध के अधीन हो जाते है और प्रतिहिंसा का दामन थाम लेते है। जबकि सबसे ज्यादा, उसी पल-परिस्थिति में क्षमा की आवश्यकता होती है। स्वार्थी सुध-बुध का आलम यह है कि यदि कोई उन्हें धैर्य की सलाह देकर, सहिष्णु बनने का आग्रह करे और अहिंसा अपनाने को प्रेरित करे तो उस सद्वचन में भी लोगों को आक्रमक वैचारिक हिंसा नजर आती है। ऐसे ही लोगों को क्षमा सदैव कायरता प्रतीत होती है। व प्रतिक्रियात्मक हिंसा ही उन्हें प्रथम व अन्तिम उपाय समझ आता है। यह सोच, प्रतिशोध शृंखला को जीर्ण शीर्ण नहीं होने देती और शान्ति का मनोरथ कभी भी पूर्ण नहीं हो पाता।

क्रोध प्रेरित द्वेष के साथ साथ, कभी-कभी ईर्ष्या जनित द्वेष भी पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों के  कारण बनते है। राग की भाँति द्वेष भी अंधा होता है। राग हमको प्रेमपात्र के अवगुणों की ओर से अंधा कर देता है और द्वेष, अप्रिय पात्र के गुणों की ओर से। इसलिए प्रतिहिंसा न तो अन्याय अत्याचार रोकने का साधन है न प्रतिशोध और द्वेष के निवारण का समुचित उपाय। प्रत्येक सदाचरण कठिन ही होता है, अहिंसा और क्षमा भी कठिन राजमार्ग है, किसी भी परिस्थिति में समतावान व धैर्यवान ही इस महामार्ग पर चल पाते है। 'मन की शान्ति' तो निश्चित ही क्षमावान-सहिष्णु लोगों को ही प्राप्त होती है और वे ही इसके अधिकारी भी है।

सम्बंधित अन्य सूत्र…
  1. क्रोध विकार
  2. क्रोध कषाय
  3. सद्भाव
  4. क्षमा-सूत्र
  5. बोध कथा : समता की धोबी पछाड़
  6. समता
  7. बोध कथा : सहन-शक्ति
  8. क्षमा, क्षांति

3 जून 2013

क्षमा, क्षांति

क्षमा आत्मा का नैसर्गिक गुण है. यह आत्मा का स्वभाव है. जब हम विकारों से ग्रस्त हो जाते है तो स्वभाव से विभाव में चले जाते है. यह विभाव क्रोध, भय, द्वेष, एवं घृणा के विकार रूप में प्रकट होते है. जब इन विकारों को परास्त किया जाता है तो हमारी आत्मा में क्षमा का शांत झरना बहने लगता है.

क्रोध से क्रोध ही प्रज्वल्लित होता है. क्षमा के स्वभाव को आवृत करने वाले क्रोध को, पहले जीतना आवश्यक है. अक्रोध से क्रोध जीता जाता है. क्योंकि क्रोध का अभाव ही क्षमा है. अतः क्रोध को धैर्य एवं विवेक से उपशांत करके, क्षमा के स्वधर्म को प्राप्त करना चाहिए. बडा व्यक्ति या बडे दिल वाला कौन कहलाता है? वह जो सहन करना जानता है, जो क्षमा करना जानता है. क्षांति जो आत्मा का प्रथम और प्रधान धर्म है. क्षमा के लिए ”क्षांति” शब्द अधिक उपयुक्त है. क्षांति शब्द में क्षमा सहित सहिष्णुता, धैर्य, और तितिक्षा अंतर्निहित है.

क्षमा में लेश मात्र भी कायरता नहीं है. सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव व उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरूषार्थ हीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते. निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही प्रायः क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते है. यह अधीरों का, कठिन पुरूषार्थ से बचने का उपक्रम होता है. जबकि क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करता है. वस्तुतः आत्मा के मूल स्वभाव क्षमा पर छाये हुए क्रोध के आवरण को अनावृत करने के लिए, दृढ पुरूषार्थ, वीरता, निर्भयता, साहस, उदारता और दृढ मनोबल चाहिए, इसीलिए “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहा जाता है.

दान करने के लिए धन खर्चना पडता है, तप करने के लिए काया को कष्ट देना पडता है, ज्ञान पाने के लिए बुद्धि को कसना पडता है. किंतु क्षमा करने के लिए न धन-खर्च, न काय-कष्ट, न बुद्धि-श्रम लगता है. फिर भी क्षमा जैसे कठिन पुरूषार्थ युक्त गुण का आरोहण हो जाता है.

क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है. क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है. और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम व संतोष की प्रवृतियों को विकसित करती है.

क्षमापना से निम्न गुणों की प्राप्ति होती है-

1. चित्त में आह्लाद - मन वचन काय के योग से किए गए अपराधों की क्षमा माँगने से मन और आत्मा का बोझ हल्का हो जाता है. क्योंकि क्षमायाचना करना उदात्त भाव है. क्षमायाचक अपराध बोध से मुक्त हो जाता है परिणाम स्वरूप उसका चित्त प्रफुल्ल हो जाता है.

2. मैत्रीभाव ‌- क्षमापना में चित्त की निर्मलता ही आधारभूत है. क्षमायाचना से वैरभाव समाप्त होकर मैत्री भाव का उदय होता है. “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सद्भाव ही मैत्रीभाव की आधारभूमि है.

3. भावविशुद्धि – क्षमापना से विपरित भाव- क्रोध,वैर, कटुता, ईर्ष्या आदि समाप्त होते है और शुद्ध भाव सहिष्णुता, तितिक्षा, आत्मसंतोष, उदारता, करूणा, स्नेह, दया आदि उद्भूत होते है. क्रोध का वैकारिक विभाव हटते ही क्षमा का शुद्ध भाव अस्तित्व में आ जाता है.

4. निर्भयता – क्रोध, बैर, ईर्ष्या और प्रतिशोध में जीते हुए व्यक्ति भयग्रस्त ही रहता है. किंतु क्रोध निग्रह के बाद सहिष्णुता और क्षमाशीलता से व्यक्ति निर्भय हो जाता है. स्वयं तो अभय होता ही है साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त सत्व भूत प्राणियों और लोगों को अभय प्रदान करता है.

5. द्विपक्षीय शुभ आत्म परिणाम – क्रोध शमन और क्षमाभाव के संधान से द्विपक्षीय शुभ आत्मपरिणाम होते है. क्षमा से सामने वाला व्यक्ति भी निर्वेरता प्राप्त कर मैत्रीभाव का अनुभव करता है. प्रतिक्रिया में स्वयं भी क्षमा प्रदान कर हल्का महसुस करते हुए निर्भय महसुस करता है. क्षमायाचक साहसपूर्वक क्षमा करके अपने हृदय में निर्मलता, निश्चिंतता, निर्भयता और सहृदयता अनुभव करता है. अतः क्षमा करने वाले और प्राप्त करने वाले दोनो पक्षों को सौहार्द युक्त शांति का भाव स्थापित होता है.

क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है. जगत में शांति सौहार्द सहिष्णुता सहनशीलता और समता को प्रसारित करने का अमोघ उपाय है.

23 मई 2011

समता


समता का अर्थ है मन की चंचलता को विश्राम, समान भाव को जाग्रत और दृष्टि को विकसित करें तो ‘मैं’ के सम्पूर्ण त्याग पर समभाव स्थिरता पाता है। समभाव जाग्रत होने का आशय है कि लाभ-हानि, यश-अपयश भी हमें प्रभावित न करे, क्योंकि कर्मविधान के अनुसार इस संसार के रंगमंच के यह विभिन्न परिवर्तनशील दृश्य है। हमें एक कलाकार की भांति विभिन्न भूमिकाओं को निभाना होता है। इन पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं है। कलाकार को हर भूमिका का निर्वहन तटस्थ भाव से करना होता है। संसार के प्रति इस भाव की सच्ची साधना ही समता है।

समता का पथ कभी भी सुगम नहीं होता, हमने सदैव इसे दुर्गम ही माना है। परन्तु क्या वास्तव में धैर्य और समता का पथ दुष्कर है? हमने एक बार किसी मानसिकता को विकसित कर लिया तो उसे बदलने में वक्त और श्रम लगता है। यदि किसी अच्छी वस्तु या व्यक्ति को हमने बुरा माननें की मानसिकता बना ली तो पुनः उसे अच्छा समझने की मानसिकता तैयार करने में समय लगता है। क्योंकि मन में एक विरोधाभास पैदा होता है,और प्रयत्नपूर्वक मन के विपरित जाकर ही हम अच्छी वस्तु को अच्छी समझ पाएंगे। तब हमें यथार्थ के दर्शन होंगे।

जीवन में कईं बार ऐसे मौके आते है जब हमें किसी कार्य की जल्दी होती है और इसी जल्दबाजी और आवेश में अक्सर कार्य बिगड़ते हुए देखे है। फिर भी क्यों हम धैर्य और समता भाव को विकसित नहीं करते। कईं ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सामने उपस्थित होते है जब आवेश पर नियंत्रण, सपेक्ष चिंतन और विवेक मंथन से कार्य सुनियोजित सफल होते है और प्रमाणित होता है कि समता में ही श्रेष्ठता है।

समता रस का पान सुखद होता है। समता जीवन की तपती हुई राहों में सघन छायादार वृक्ष है। जो ‘प्राप्त को पर्याप्त’ मानने लगता है, उसके स्वभाव में समता का गुण स्वतः स्फूरित होने लगता है। समता की साधना से सारे अन्तर्द्वन्द्व खत्म हो जाते है, क्लेश समाप्त हो जाते है। उसका समग्र चिंतन समता में एकात्म हो जाता है। चित्त में समाधि भाव आ जाता है।

2 सितंबर 2010

क्षमा-सूत्र

 
  • प्रतिशोध लेने का आनंद मात्र एक दिन का होता है, जबकि क्षमा करने का गौरव सदा बना रहता है।
  • सच्ची क्षमा समस्त ग्रंथियों को विदीर्ण करने का सामर्थ्य रखती है।
  • हर परिस्थिति में स्वयं को संयोजित संतुलित रखना भी क्षमा ही है।
  • क्षमा देने व क्षमा प्राप्त करने का सामर्थ्य उसी में है जो आत्म निरिक्षण कर सकता है
  • क्षमापना आत्म शुद्धि का प्रवाहमान अनुष्ठान है, सौम्यता, विनयसरलता, नम्रता शुद्ध आत्म में स्थापित होती है।

26 जुलाई 2010

सत्य-क्षमा

चलिये चल कर देखिये, सच का दामन थाम ।
साहस का यह काम है, किन्तु सुखद परिणाम ॥1॥

धर्म तत्व में मूढता, संसार तर्क में शूर ।
दुखदायक कारकों पर!, गारव और गरूर? ॥2॥

क्षमा भाव वरदान है, वैर भाव ही शाप ।
परोपकार बस पुण्य है, पर पीडन ही पाप ॥3॥

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