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24 जून 2013
9 जुलाई 2010
मात्र सच्चा दान ही नहीं, दान का महिमा वर्धन भी जरूरी
सदाचारों में दानशीलता का महत्व निर्विवाद है। इस्लाम में जक़ात फ़र्ज़ है तो हिन्दुत्व में पुण्यकर्म। बुद्धिजीवी इसे कहते हैं जरूरतमंद की मदद!!
इस बात को सभी मानते है कि दान देकर जताना नहीं चाहिए, दाएं हाथ से दो तो बाएं हाथ को खबर भी न हो। वैसे तो दान देकर शुक्रगुजारी पाने की अपेक्षा निर्थक है। लेकिन दाता भले न चाहे, लेने वाले को अहसान फ़रामोश बिककुल नहीं होना चाहिए, जब वह अहसानफ़रामोश बनता है तो, न केवल दाता का दान देने का हौसला पस्त होता है, बल्कि दान का महत्व भी घट जाता है।
जैसे नमाज जक़ात आदि हम पर फ़र्ज़ है,और जब हम इन्हें अदा कर रहे हो, तब उसका महिमावर्धन भी करते है,क्यो? क्योकि इस शुभ कर्म को देखकर अन्य लोग भी प्रोत्साहित हो। और ऐसे फ़र्ज़वान की प्रशंसा भी करते है,ताकि उसका व अन्य का हौसला बुलंद रहे। भले उसका फ़र्ज़ था, पर मालिक ने उसे मुक़रर तो किया है, अपनी रहमतों के लिये। साथ ही इन अच्छे कार्यो में कोई बाधक बनता है, दान के महत्व को खण्डित करने का प्रयास करता है वह भी दोष का भागी बनता है। ईष्या व द्वेष ग्रसित होकर जो पुण्य कर्म को छोटा व निरुत्साहित करता है,वह भी गुनाह है।मालिक की आज्ञानुसार नेकीओं के प्रसार को अवरूद्ध करना नाफ़र्मानी है।
इस बात को सभी मानते है कि दान देकर जताना नहीं चाहिए, दाएं हाथ से दो तो बाएं हाथ को खबर भी न हो। वैसे तो दान देकर शुक्रगुजारी पाने की अपेक्षा निर्थक है। लेकिन दाता भले न चाहे, लेने वाले को अहसान फ़रामोश बिककुल नहीं होना चाहिए, जब वह अहसानफ़रामोश बनता है तो, न केवल दाता का दान देने का हौसला पस्त होता है, बल्कि दान का महत्व भी घट जाता है।
जैसे नमाज जक़ात आदि हम पर फ़र्ज़ है,और जब हम इन्हें अदा कर रहे हो, तब उसका महिमावर्धन भी करते है,क्यो? क्योकि इस शुभ कर्म को देखकर अन्य लोग भी प्रोत्साहित हो। और ऐसे फ़र्ज़वान की प्रशंसा भी करते है,ताकि उसका व अन्य का हौसला बुलंद रहे। भले उसका फ़र्ज़ था, पर मालिक ने उसे मुक़रर तो किया है, अपनी रहमतों के लिये। साथ ही इन अच्छे कार्यो में कोई बाधक बनता है, दान के महत्व को खण्डित करने का प्रयास करता है वह भी दोष का भागी बनता है। ईष्या व द्वेष ग्रसित होकर जो पुण्य कर्म को छोटा व निरुत्साहित करता है,वह भी गुनाह है।मालिक की आज्ञानुसार नेकीओं के प्रसार को अवरूद्ध करना नाफ़र्मानी है।
पानी बढे जो नाव में, घर में बढे जो दाम।
दोनों हाथ उडेलिये, यही अक़्ल का काम॥
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