2 अगस्त 2011

सत्यखोजी उपकरण - अनेकान्तवाद


प्रायः यह कहा जाता है………

“सबका अपना अपना नज़रिया होता है”
“सबका अपना अपना दृष्टिकोण होता है”
Everybody has their own Point of view

ठीक है……


एकांगी दृष्टि के बंधन से मुक्ति ही उपाय है।
हर नज़रिए में सत्य का अंश होता है।

किन्तु, हर दृष्टिकोण को यथारूप स्वीकार करना मिथ्या हो सकता है।

एक ही दृष्टिकोण को सब-कुछ (पूर्ण-सत्य) मानना एकांगी सोच (एकांतवाद) है। जो अपूर्ण या गलत है।


यथार्थ में, हर दृष्टिकोण किसी न किसी अपेक्षा के आधार से होता है।
अपेक्षा समझ आने पर दृष्टिकोण का तात्पर्य समझ आता है।
दृष्टिकोण का अभिप्राय समझ आने पर सत्य परिशुद्ध बनता है।
परिशुद्ध अभिप्रायों के आधार पर परिपूर्ण सत्य ज्ञात होता है।



सापेक्षतावाद का सिद्धांत हमारे लिए नया नहीं है। हम इस सिद्धान्त को अच्छी तरह से जानते भी है। अनेकांत,वस्तुतः सत्य को जानने समझने का सर्वश्रेष्ठ उपकरण है, इसका  कोई अन्य जोड़ नहीं है। बस सही समय पर इसका उपयोग नहीं हो पाता। “सबका अपना अपना दृष्टिकोण होता है” अनेकांत मार्ग पर बस यहां तक पहुँच कर पुनः लौट जाते है। पर अनेकांत का वास्तविक उपयोग तो इसके बाद शुरू होता है। अलग अलग दृष्टिकोण का अपेक्षा के आधार पर विश्लेषण करते हुए अन्ततः तो पूर्ण सत्य तक पहुँचना ही लक्ष्य होना चाहिए।

हम अक्सर देखते है कोई व्यक्ति किसी की ‘बात सुननें’ में बड़ा धैर्य दिखाते है। दूसरों को ‘समझते’ है। उनका व्यवहार बड़ा ‘परिपक्व’ नज़र आता है। वे अपने कथन को बड़ा ही ‘संतुलित’ प्रस्तुत करते है। हम उसे साधु सज्जन या ज्ञानी की उपमा देते है। लेकिन यथार्थ में, वह जाने अनजाने में अनेकांत, अपेक्षावाद या कहें कि दृष्टिवाद का व्यवहार में प्रयोग कर रहे होते है। अगर अनजानें में ही सापेक्षतावाद रूपी साधन, उत्तम व्यक्तित्व प्रदान करने में समर्थ होता है तो इस सिद्धान्त के गहन विस्तृत अध्यन और फिर उसके अनुपालन के बाद तो ज्ञानी बनाना सम्म्भव ही है।

छ: अंधे और हाथी के दृष्टांत में समरूप सत्यांश थे, अब देखते है परस्पर विपरित सत्यांश का दृष्टांत……

दो मित्र अलग अलग दिशा से आते है और पहली बार एक मूर्ती को अपने बीच देखते है। पहला मित्र कहता है यह पुरूष की प्रतिमा है जबकि दूसरा मित्र कहता है नहीं यह स्त्री का बिंब है। दोनो में तकरार होती है। पहला कहे पुरूष है दूसरा कहे स्त्री है। पास से गुजर रहे राहगीर नें कहा ‘सिक्के का दूसरा पहलू भी देखो’। मित्र समझ गए, उन्होंने स्थान बदल दिए। अब पहले वाला कहता है हां यह स्त्री भी है। और दूसरा कहता है सही बात है यह पुरूष भी है।

वस्तुतः किसी कलाकार नें वह प्रतिमा इस तरह ही बनाई थी कि वह एक दिशा से पुरूष आकृति में तो दूसरी दिशा से स्त्री आकार में थी।

यहां हम यह नहीं कह सकते कि दोनो सत्य थे। बस दोनो की बात में सत्य का अंश था। तो पूर्ण सत्य क्या था? पूर्ण सत्य वही था जो कलाकार ने बनाया। वह प्रतिमा एक तरफ स्त्री और दूसरी तरफ पुरूष था, यही बात पूर्ण सत्य थी।

अब आप बताएँ कि आपके दृष्टिकोण से अनेकांतवाद/ सापेक्षतावाद/दृष्टिवाद क्या है?

26 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. सही कहा सूज जी , सत्य तो वो होता है जो देश और काल की सीमाओं से मुक्त हो और शायद इसी लिए सत्य कुछ होता ही नहीं है , प्रसिद्द पुस्तक "समय का संक्षिप्त इतिहास " में लिखा है की "भौतिक विज्ञान के नियमों का अस्तित्व केवल हमारे मष्तिष्क के अन्दर ही होता है "
    ज्ञान का मुक्त प्रवाह या धन नियंत्रित ज्ञान

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  3. सत्य जानने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना ज़रुरी है ..

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  4. हर व्यक्ति 'बहुरूपिया' है... अपनी ही बचपन से जन्म से वर्तमान तक की तसवीरें देख लीजिये,,, और किसी एक समय विशेष पर भी यदि आप अपनी माँ से बात करते हैं तो वो अंदाज़ अलग होता है, पिता से अलग, और अन्य अनेकों, प्रत्येक से, भी अलग अलग...

    बचपन में एक शाम दिल्ली के टाउन हॉल में बनारस (शिव की 'काशी') के प्रसिद्द गायक पंडित ओंकार नाथ ठाकुर को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ... उन्होंने आम बोल चाल और संगीत में समानता को दर्शाने हेतु उदहारण दिया कि कैसे यदि आप सड़क में किसी मित्र को मिलें और दूसरी ओर एक बिस्तर पर लेटे बीमार मित्र को उसके घर पर भी, तो संभव है आप दोनों को कहेंगे, "क्यूँ भाई, कैसे हो"?
    लेकिन बीमार को यह वाक्य बोलते समय चेहरे का भाव और वाणी, यानी स्वर, दोनों गंभीर होंगे,,, किन्तु सड़क पर मिले मित्र को यही वाक्य कहते हुए चेहरे का भाव और स्वर (ऊंचे सप्तक पर), दोनों आनंद दर्शाते, भिन्न होंगे!...

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  5. आपका भी जबाब नहीं है सुज्ञ जी.
    हमेशा सार्थक सोच करने और करवाने के लिए प्रयासरत रहतें है आप.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
    आता जाता रहूँगा सभी के विचारों से अवगत होने के लिए.

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  6. सुग्य जी
    एक नई दिशा दी है चिंतन की

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  7. सुज्ञ जी! पहले भी कहा था कि यहाँ आकार हमेशा कुछ सीखने को मिलता है साथ ही यह अनुभव भी होता है कि मैं मिटना अज्ञानी हूँ.. विद्वज्जन अपनी टिप्पणियों में जो बताते हैं वह पोस्ट की पूरक प्रतीत होती है!!ज्ञानवर्धन में सहायक तथा एक नया दृष्टिकोण प्रदान करने में सफल!!

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  8. सुंदर चिन्तन.... संगीताजी की बात से सहमत हूँ

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  9. @ संगीता स्वरुप ( गीत ) जी, आपने कहा, "सत्य जानने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना ज़रुरी है..." इसी को ध्यान में रख, 'मैंने' मानव को ध्यान में रख मिटटी की, झंडे की, फटे पांच रुपये के नोट, मच्छर, आदि की दृष्टि से एक समय (शायद अस्सी के दशक में) देखने का प्रयास किया...
    बात पुरानी हो गयी, और कागजों में लिखी 'मेरी' कवितायेँ पढने का सौभाग्य कुछेक मित्र आदि को ही केवल मिल पाया...

    उदाहरणतया, संक्षिप्त में, मिटटी के माध्यम से मैंने समानता देखी कि जब आप झाड़ू लगाते हैं तो फर्श पर पड़ी मिटटी उड़ के कुर्सी में बैठ जाती है, किन्तु कुर्सी साफ़ करने से फिर नीचे पहुँच जाती है (सारा चक्कर जिसका राजनीति में देखा जा सकता है!)... और जिस प्रकार आदमी ऊंचे से ऊंचे स्थान पर पहुंचना चाहता है तो पायेगा कि मिटटी भी वातावरण में बहुत ऊँचाई पर पहुंची रहती है!...

    तिरंगे को वर्षों १९४७/ '५० से सलामी प्रति वर्ष देता आया था,,, किन्तु एक दिन अचानक झंडे में मानव का, अपना ही, प्रतिबिम्ब दिखा कि कैसे तिरंगे में गुलाब की पंखुड़ियां रख, उसे लपेट रस्सी से बाँध दिया जाता है (गुलाम किन्तु ह्रदय में अच्छइयां समेटे), और लगभग धरा के स्तर पर रख किसी 'वी आई पी' के द्वारा रस्सी खींच बंधन मुक्त हो आनन् फानन में पंखुड़ियां फेंक झंडा आकाश में हवा लगते ही लहराने, (गर्व से फड़फड़ाने), लगता है... अब ऊंचाई से उसे सलामी देते तुच्छ लगने लगते हैं,,, किन्तु 'हवा' रुकते ही अपने आधार (शक्ति के प्रतीक, डंडे पर) शाष्टांग प्रणाम करते मानव समान लेट जाता है, जैसे सोचता हो की सलामी मुझको, यानि झंडे को थी, कि शक्ति रुपी आधार डंडे को!...

    शेष कभी और... :)

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  10. जो सामने दीखता है , वही सत्य नहीं या प्रत्येक व्यक्ति का सत्य अलग ??
    गुरु की आवश्यकता इसलिए ही महसूस की गयी की वह दृश्य और अदृश्य एक साथ देख सकते हैं !

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  11. सत्य के बहुत रूप हैं, हम एक को ही अपना सत्य मान बैठते हैं।

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  12. @ "जो सामने दीखता है , वही सत्य नहीं या प्रत्येक व्यक्ति का सत्य अलग ??"

    वाणी जी,

    जो सामने दिखता है वह भी सत्य है। अगर वह दृष्टिभ्रम भी है तो उसका "दृष्टिभ्रम" होना सत्य है। और अगर वह दृष्टिसीमा के कारण अंश या टुकडा है तो वह अंशरूप सत्य है। (प्रत्येक व्यक्ति का सत्य अलग किन्तु सत्यांश) प्रस्तुत लेख का अभिप्राय भी यही है कि अंशरूप सत्य की उपस्थिति मानना। और विभिन्न अंशो के संयुक्तिकरण से और विश्लेषण से पूर्ण सत्य को जानना (हां, मात्र जानना) और उपादेय हो तो ही ग्रहित करना, या अनुकरण करना।

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  13. वाणी जी,

    सत्यांश को एक उदाहरण से समझते है, एक विशाल फलक पर वन्यजीवन शिर्षक से चित्र बना है जिसमें असंख्य वन्यजीवों के चित्र है। हमारी दृष्टि सीमित है।(हालांकि उसको विकसित विस्तृत किया जा सकता है)उस सीमित दृष्टि वृत के कारण हम किसी एक जीव पर ही फोकस कर पाते है, कैमरे की तरह उस सीमित वृत को फ्रेम कर एक अलग चित्र अंकित करते है। और मानते है वह एक जीव ही वन्यजीवन है। वह वन्यजीवन रूप सत्य होते हुए भी उस विशाल फलक (पूर्ण-सत्य) का एक टुकड़ा है
    इसतरह यदि विभिन्न लोगों ने उस विशाल फलक के अलग अलग अपने अपने फ्रेम(चित्र-पहेली की तरह) बना लिए तो सभी उस एक विशाल चित्र (पूर्ण-सत्य) के अंश (सत्यांश) है। चित्र-पहेली की तरह उन्हें सही जगह जोडा जाय तो वन्यजीवन का वह विशाल फलक दृष्टिगोचर हो जाएगा। वही होगा पूर्ण सत्य।

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  14. इससे याद आई एक गौथम शहर के छः विद्वानों की कहानी, जो बहुत पहले पढ़ी थी इस लिए संभव है यह एक दम मूल रूप न हो...

    वे साथ साथ घूमने गए और जब लौटने लगे तो विचार आया कि वे गिनती करलें कि कोई खो न गया हो... किन्तु हर कोई अपने को नहीं गिन अन्य को ही गिन केवल पांच ही तक गिन पाए और चिंता में पड़ गए कि एक व्यक्ति खो गया था!

    संयोगवश उधर से एक आम आदमी गुजरा तो उसने इनको परेशान देख कारण पूछा तो उन्होंने कहा वे जब अपने कसबे से चले थे तो छः थे किन्तु अब केवल पांच ही रह गए थे!

    उस व्यक्ति ने जब गिना तो छः निकले! तब उन्हें पता चला कि हर कोइ अपने को ही नहीं गिन रहा था:)

    शायद यह लेखक का इशारा था कि मानव जीवन में हर 'बुद्धिमान व्यक्ति' स्वयं अपने को नहीं जानता था किन्तु बाहरी जगत की पूरी खबर रखता था... और अपने दृष्टिकोण से अन्य के दोष बड़े बड़े देखता है और स्वयं अपने बड़े दोष भी उसे नहीं दिखाई पड़ते - "चिराग तले अँधेरा" कथन को सत्यार्थ करते...

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  15. 'मैं' अपनी पत्नी को स्कूटर पर बिठा स्कूटर-कार मेकैनिक आदि की दुकानों के सामने से जा रहा था, तो अचानक एक गली से एक बच्चा एक कटी पतंग को लूटने उसके पीछे भागता आया,,, तेजी से मेरे सामने से निकल गया और बड़ी कठिनाई से 'मैं' स्कूटर को रोक पाया - बच्चे को भी नहीं लगी और हमें भी कोई हानि नहीं हुई...

    मेरी पत्नी ने पूछा की आपने उसे पकड़ पीटा क्यूँ नहीं? वो और हम भी दुर्घटना ग्रस्त हो सकते थे और कठिनाई में पड़ जाते!
    'मैंने' कहा उस में मुझे अपने बचपन की छवि दिखाई दी, और मुझे आज पता चला कि मैं भी कभी ऐसा पागलपन करता था! वो तो हमारा सौभाग्य था कि तब इतनी भीड़ और इतना ट्रैफिक नहीं था!...
    (कटी पतंग के माध्यम से 'मुझे' आम आदमी का जीवन दीखता है, सतयुग से कलियुग कि यात्रा करते, ऊपर से किसी भी क्षण धरा पर गिरने को तैयार, किन्तु इस आशा से कि शायद कोई अदृश्य शक्ति कृपा कर हमारी डोर थाम ले और फिर से हमें सतयुग पर पहुंचा दे, अथवा हमें अपने साथ बैठ नाटक देखने का मौका दे :)

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  16. परम सत्‍य तो यही है ...जो आपने कहा ...आभार ।

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  17. bahut shantidayak blog hai aapka......
    accha lagta hai aakar aur pad kar....

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  18. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ .. अवाक हूँ , बहुत सुद्नर ब्लॉग , बहुत ही सुन्दर बाते .. मन को भा गयी .... बहुत कुछ सीखने को मिलेंगा , जानने को मिलेंगा ..

    धन्यवाद.

    आभार
    विजय

    कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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  19. pahli baar aapke blog pe aaya hoon...behad accha laga..apne blog pe amantran ke sath

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  20. अपने अपने सत्य के साथ दीगर का सत्य भी परख लेने से ही शाश्वत सत्य के दर्शन हो सकते हैं.... शायद...!!
    अन्यथा.... मेरा कुआं ही सबसे बड़ा...

    आद सुज्ञ जी, खुबसूरत उदाहरण के साथ सार्थक चिंतन...
    सादर....

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  21. sujh ji bahut sunder ,sarthak lekh ,bahut hi accha laga......

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  22. aabhaar

    १. हर नज़रिए में सत्य का अंश होता है।

    २. किन्तु, हर दृष्टिकोण को यथारूप स्वीकार करना मिथ्या हो सकता है।

    ३. हर दृष्टिकोण किसी न किसी अपेक्षा के आधार से होता है।

    ४. अलग अलग दृष्टिकोण का अपेक्षा के आधार पर विश्लेषण करते हुए अन्ततः तो पूर्ण सत्य तक पहुँचना ही लक्ष्य होना चाहिए।

    thanks again ..

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