28 अप्रैल 2011

ईश्वर हमारे काम नहीं करता…

(ईश्वर एक खोज के तीन भाग के बाद यह उपसंहार रूप भाग-4)

ईश्वर हमारे काम नहीं करता

कस्बे में जब बात आम हो गई कि उस ईश्वर की बुकलेट का मैने गहराई से अध्यन किया है। तो लोगों ने अपनी अपनी समस्या पर चर्चा हेतू एक सभा का आयोजन किया, और मुझे व्याख्याता के रूप में आमंत्रित किया। अपनी विद्वता पर मन ही मन गर्व करते हुए, मैं सभा स्थल पर  आधे घंटे पूर्व ही पहुँच गया। सभी मुझे उपस्थित देखकर प्रश्न लेकर पिल पडे। सभी प्रश्नों के पिछे भाव एक ही था, उनका स्वयं का निष्कर्म स्वार्थ। बस यही कि ‘ईश्वर हमारे काम नहीं करता’।

मैने कहा आप सभी का समाधान मैं अपने वक्तव्य में अवश्य दुंगा। समय भी हो चुका था मैने वक्तव्य प्रारम्भ किया…
आशान्वित भक्त जनों,
सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ठ कर दूँ कि मैं स्वयं नहीं जानता कि ईश्वर क्या है। किन्तु यह अवश्य जान पाया हूँ कि निश्चित ही जैसा आपने कल्पित किया है  वह ऐसा हरगिज नहीं है। ईश्वर की कल्पना करने में, आपकी मानवीय प्रकृति ने ही खेल रचा है। आपने सभी मानवीय गुण-दोष उसमें आरोपित कर दिए है। अब कल्पना तो तुम करो और खरी न उतरे तो गाली ईश्वर को?

आपने मान लिया जो वस्तुएं या बातें मानव को खुश करती है, बस वे ही बातें ईश्वर को खुश करती होगी। आप पूजा-पाठ-प्रसाद-कीर्तन-भक्ति यह मानकर अर्पित करते है कि वह खुश होगा और खुश होकर आपको बिना पुरूषार्थ के ही वांछित फल दे देगा। जब ऐसा नहीं होता तो आप रूठ जाते है और नास्तिक बन लेते है। पर इन सब बातों से उसे कोई सरोकार नहीं हैं। उसने तो सभी तरह से सशक्त, सुचारू, न्यायिक व क्रियाशील नियम लागू कर छोडे है। एक ऐसे पिता की वसीयत की तरह कि जो गुणवान सद्चरित्र पुरूषार्थी पुत्र होगा उसे उसी अनुसार लाभ मिलता रहेगा। जो अवगुणी दुश्चरित्र प्रमादी होगा उसे नुकसान भोगना होगा। दिखावा या शोर्टकट का किसी को कोई भी लाभ न होगा। प्रलोभन तो उसको चलेगा ही नहीं।

निराकार की कल्पना करके भी आप लोग तो मानवीय स्वभाव से उपर उठकर, ईश्वर की समुचित अभिन्न कल्पना तक नहीं कर पाए। कभी-कभार कर्म पर विश्वास करके भी पुनः आप कह उठते है ‘जैसी उसकी इच्छा’। अरे! वह हर इच्छा से परे है, हर आवश्यक्ता से विरत, हर प्रलोभन और क्रोध से मुक्त। उसने प्रकृति के नियमों की तरह ही अच्छे बुरे के अच्छे बुरे फल प्रोग्रामिग कर छोड दिये है। सर्वांग सुनियोजित महागणित के साथ। कोई वायरस इस प्रोग्राम को जरा भी प्रभावित करनें में सक्षम नहीं। इस प्रकार ईश्वर निराकार निर्लिप्त है्।

अब आपको प्रश्न होगा कि जब वह एक सिस्टम है या निराकार निर्लिप्त है, तो उसे पूजा,कीर्तन,भक्ति और आस्था की क्या आवश्यकता? किन्तु आवश्यकता उसे नहीं हमें है, मित्रों। क्योंकि वही मात्र गुणों का स्रोत है, वही हमारे आत्मबल का स्रोत है। सभी के मानस ज्ञान गम्भीर नहीं होते, प्राथमिक आलंबन की आवश्यकता तो रहेगी ही। सुफल पाने के लिए गुण अंगीकार करने होंगे। गुण उपार्जन के लिये पुरूषार्थ की प्रेरणा चाहिए होगी। यह आत्मबल हमें आस्था से ही प्राप्त होगा। गुण अपनाने है तो सदैव उन गुणों का महिमा गान करना ही पडेगा। पूजा भक्ति अब मात्र सांकेतिक नहीं, उन गुणों को स्मरण पर जीवन में उतारने के रूप में करनी होगी। गुण अभिवर्धन में चुक न हो जाय, इसलिए नियमित ऐसी पूजा-भक्ति की आवश्यक्ता रहेगी। श्रद्धा हमें इन गुणों पर आसक्त रखेगी। और हमारे आत्मविश्वास का सींचन करती रहेगी। ईश्वर जो भी है जैसा भी है, इसी तरह हमें मनोबल, बुद्धि और विवेक प्रदान करता रहेगा। अन्ततः पुरूषार्थ तो हमें ही करना होगा। सार्थकता इसी श्रद्धा में निहित है। श्रद्धा और पुरुषार्थ ही सफलता के सोपान है।

27 अप्रैल 2011

ईश्वर को देख के करना क्या है?


(हमने देखा पिछ्ली दो कडियों में, जिसमें पहली तो ईश्वर को लेन देन का व्यापारी समझ,अटल नियम विरूद्ध मांगने का परिणाम नास्तिकता आता है। और दूसरी में जो अधिक बुरे कर्मो में रत हो उसे इतना ही अधिक डराना आवश्यक नियम महसुस होता है। अब आगे…)
(ईश्वर एक खोज-भाग…3)

ईश्वर को देख के करना क्या है?

कस्बे के वाम छोर पर मजदूरों की बस्ती है, उसी के सामने एक सम्भ्रांत इलाका है बीच से सडक गुजरती है। सडक के उस पार ‘दुर्बोध दासा’ का बंगला है। दुर्बोध दासा, हर रात मजदूर को उनके हित में भाषण अवश्य देते है। बंगले के पास ही उनकी अपनी पान की दुकान है। मजदूर कॉलनी के सभी लोग उनके ग्राहक है। गरीब और रक्त की कमी से पीडित मजदूरों को दुर्बोध दासा नें  ‘कत्था खाकर मुंह लाल’ रखने के नुक्खे का आदी बना दिया है। पान में कोई ‘शोषणविरोध’ की कडक सुपारी डालते है जिसे चुभलाते जाओ खत्म ही नहीं होती। यह चुभलाना मजदूरों को भी रास आने लगा है। आभासी लालिमा प्रदान करता यह पान मजदूरों में लोकप्रिय है। दुर्बोध दासा ने पान पर ही यह बंगला खडा किया है।

आज कल उनके ग्राहकों की संख्या कम होने लगी है, रात कॉलोनी से ढोल, तांसे, मजीरे और भजन की स्वर-लहरिया आती है, उनका भाषण सुनने भी अब लोग प्रायः कम ही आते है। पान का धंधा चोपट होने के कगार पर है। दुर्बोध दासा की आजीविका खतरे में है, उन्होंने पुछ-ताछ की तो पता चला आज-कल लोग उस ‘ईश्वरीय ऑफिस’ जाने लगे है। दुर्बोध दासा को यकीन हो गया, जरूर वे सभी मजदूर वहाँ अफीम खाते है।

उनके खबरियों से उन्हे सूचना मिली कि मैं ही उस कार्यालय का दलाल हूँ। दो-चार लोगों के मामले निपटाने के लिये मुझे वहां आते जाते देख लिया होगा। दुर्बोध दासा गुस्से से लाल झंडे सम बने,  मेरे पास आए और ‘ईश्वर का चमचा’, ‘ईश्वर का दलाल’, ‘अफीम का धंधेबाज़’ नारे की लय में न जाने क्या क्या सुनाने लगे। मैने उन्हें पानी पिला पिला कर…… शान्त किया और आने का कारण पूछा।

वे लगभग उफनते से बोले- देख बे आँखो वाले अंधे, ‘ईश्वर विश्वर कुछ नहीं होता, क्यों लोगों को झांसा दे रहा है तूं? और इस धर्म-अफ़ीम का गुलाम बना रहा है। मैने सफाई देते कहा –मैने किसी को भी प्रेरित नहीं किया सदस्य बनने के लिये, लोग स्वतः जाते होंगे। दुर्बोध दासा बीच में बात काटते हुए फिर उबले- ‘ कौन होते हो तुम उन्हें यथास्थितिवाद में धकेलने वाले?, यह हमारा काम है पर दूसरे तरीके से। तुम्हे मालूम नहीं, तुम लोग जिस ईश्वर को अन्नदाता कहते हो, उसका वैचारिक अस्तित्व ही हमारे जैसे लाखों लोगों के पेट पर लात मारता है। जानते हो जो पान की दुकान लोगों के होठों पर लाली लाती थी, आज बंद होने के कगार पर है। मुझे बोलने का अवसर दिए बिना ही छूटते ही प्रश्न किया- क्या तुमने ईश्वर को देखा है?

मैने कहा -दुर्बोध जी! मैं ईश्वर का प्रचार नहीं कर रहा, ईश्वर है या नहीं इस बात से न तो हमें या न ईश्वर को कोई फर्क पडता है। लेकिन जो बडी वाली नियमावली मैं लेकर आया था, और जिसका मैंने अध्यन किया है, उसमें ईश्वर ने भी अपने होने न होने की चर्चा को कोई महत्व नहीं दिया है। इसमें तो सभी अटल प्राकृतिक नियम है। और जीवन को सरल, सहज, शान्त, सन्तोषमय बनाने के तरीके मात्र है। सच्चा आनंद पाने का अन्तिम उपाय है। लोग अगर श्रद्धा के सहारे स्वयं में आत्मबल का उत्थान करते है तो आपको क्या एतराज है। चलो आप लोग ईश्वर को मत मानो पर जो उसनें गुणवान बननें के उपदेश और उपाय बताएं हैं उस पर चलने में क्या आपत्ति है? उसके निर्देशानुसार सार्थक कंट्रोल में जीवन जीनें से क्या एतराज है। आत्मसंयम को अफीम संज्ञा क्यों देते हो।

दुर्बोध दासा अपने गर्भित स्वार्थ से उँचा उठकर न सोच पाया। मनमौज और स्वार्थ के खुमार में झुंझलाता, हवा को गालियाँ देता चलता बना।

26 अप्रैल 2011

ईश्वर डराता है।


(ईश्वर एक खोज-भाग-2)

ईश्वर डराता है

जनाब नादान साहब को पता चला कि मैं ईश्वर की ऑफ़िस से बडा वाला प्रोस्पेक्टर ले आया हूँ। जिज्ञासावश वे भी चले आए। आते ही कहने लगे, 'मैं भी उस कार्यालय का सदस्य बना हूँ', लेकिन यार ‘ईश्वर डराता बहुत है’ मुझे फिर आश्चर्य हुआ, भई मेरे पास की बुकलेट में तो ऐसा कुछ नहीं है। वह तो दयालु है, भला डरायेगा क्यों। नादान साहब फट पडे, बोले ‘वही तो’…बात बात पे डराता है, क्यो?…मुझे भी समझ नहीं आ रहा। यह देख लो किताब। आपने तो वह बडी वाली उसके कायदे कानून की बुक पढ़ी है, आप ही बताएं। और अमां यार आप ईश्वर की फ़्रेचाईजी क्यों नहीं ले लेते। मैने टालते हुए कि इस फ़्रेचाईजी पर बाद में चर्चा करेंगे, पहले चलो कार्यालय चलते है, आपकी वह पुस्तिका साथ ले लो, उसी ऑफ़िसर से पूछेंगे, इस समस्या का कारण।

हम पहुँचे ऑफ़िस, नादान साहब को सदस्य बनाने वाले ऑफ़िसर ड्यूटी पर थे। मैने शिकायती लहजे में कहा- जनाबे-आली, आपने नादान साहब को यह कौनसी बुकलेट थमा दी जो हर समय डरे सहमें रहते है, और तो और भय की प्रतिक्रिया में उल्टा उनका स्वभाव आक्रमक होने लगा है।

ऑफ़िसर माज़रा समझ गया, उसने ईशारा कर मुझे अन्दर के कमरे में बुलाया। शायद वह नादान साहब के समक्ष बात नहीं करना चाह रहा था। ऑफ़िसर ने मुझसे कहा- देखिए, साहब, सभी को पाप करने से पहले डरना ही चाहिए। और ईश्वर का यह अटल नियम है कि पापों से डरो, पापों का परिणाम बुरा है, बुराई के कुफल बताना जरूरी है। जो आप जानते ही होंगे। हम यहां कुछ नहीं कर सकते। हम तो आदमी देखकर, उसकी मानसिकता परख कर उसी अनुरूप बुकलेट देते है। जो लोग पहले से ही घोर पापों में सलग्न हो उन्हे यही सदस्यता दी जाती है, और हर पाप पर तेज खौफ दर्शाया जाता है। आपके यह मित्र नादान साहब, जब यहाँ सदस्य बनने तशरीफ लाए तो सहज ही दोनो कान पकड तौबा तौबा का तकिया कलाम पढे जा रहे थे। हम समझ गये, बंदा अच्छे-बुरे का भेद नहीं जानता, और सदस्य भी मात्र इसलिये बन रहा है कि कुछ भी किये धरे बिना, मात्र सदस्यता के आधार पर सुख-चैन मिल जाए। जनाब यह क्या 'त्याग' अर्पण करेगा, ईश्वर को? नादान खुद दुष्कृत्यों का त्याग नहीं कर पाया। और बुराईयों में गले तक डूबा है। आपका मित्र यह न भूले कि ईश्वर नें भी अन्याय करने का त्याग ले रखा है। ऐसे लोगों को खौफ से ही नियम-अनुशासन में ढाला जा सकता है। यह खौफजदा बुकलेट उनके लिये समुचित योग्य है। आप महरबानी कर उसके मन से खौफ दूर न करें, अन्यथा अनर्थ हो जायेगा। अब उसके समक्ष तो उस बुकलेट को ही सर्वदा अन्तिम सच बताएँ। ऑफ़िसर गिडगिडाने लगा। मैने भी स्थिति को समझा और चुप-चाप बाहर चला आया।

जनाब नादान साहब को यह समझाते हुए, हम घर की ओर चल दिए कि यह सही बुकलेट है,फाईनल!! ईश्वर ने नया एडिशन छापना बंद कर दिया है। इसलिये जनाब नादान साहब आप क्यों चिंता करते है, यह डर सीधे-सरल लोगों के लिए कतई नहीं है, और फिर आप ही कहिए बुरे लोगों को डराना कोई गुनाह थोडे ही हैं? अगर हम सीधे हो जाएँ तो यकिन मानो, ईश्वर करूणानिधान ही है। सर्वांग न्यायी है।

नादान साहब उसी हालात में अपने 'घर' छोडकर, अपने स्टडी-रूम में, मैं पुनः बडी बुकलेट पढ़नें में व्यस्त हो गया…

बादमें सुना कि नादान साहब ने एक रेश्मी कपडे में उस बुकलेट को जकड के बांध, उँची ताक पर सज़ा के रख दिया है, अब भी कभी उसे खोलने की आवश्यकता पडती है तो उनकी घिग्घी बंध जाती है।

25 अप्रैल 2011

ईश्वर रिश्वत लेते है?


(ईश्वर एक खोज- भाग-1)

ईश्वर रिश्वत लेते है

अबोध शाह आते ही कहने लगे- “ईश्वर रिश्वत लेते है”  मुझे आश्चर्य हुआ, ईश्वर और रिश्वत? अबोध शाह ने विस्तार से बताया- अपने कस्बे के मध्य जो ईश्वरीय कार्यालय है, वहां मैं अपने आवश्यक कार्य के लिये गया था। वहाँ के ऑफिसर ने बताया इस काम के लिये माल तो देना ही पडेगा ‘हमारे उपरी ईश्वर को बडा हिस्सा पहुँचाना होता है’। मुझे विश्वास नहीं हुआ और उन्हें साथ लेकर हम पहुँच गये कार्यालय।

मैने वहां कार्यरत ऑफिसर से पूछ-ताछ प्रारंभ की,- ‘साहब’ आज तक किसी ने ईश्वर को देखा नहीं, फिर आपने उसके एवज में रिश्वत कैसे ग्रहण की? ऑफिसर नें उलटा प्रश्न दागा- क्या ईश्वर ने आपसे शिकायत की् है? कि उन्हें हिस्सा नहीं पहुँचा? मेरे पास जवाब नहीं था, मैं बगलें झाकते हुए इधर उधर देखने लगा, कार्यालय में चारों और सूचना पटल लगे थे। इन पर ईश्वर के कायदे कानून नियम संक्षिप्त में लिखे थे। उपर ही पंच-लाईन की तरह बडे अक्षरों में लिखा था-“ईश्वर परम दयालु कृपालु है”

मैने जरा दृढ बनते हुए पुनः प्रश्न किया, जब वह परम दयालु है, हमें खुश रखना उसका कर्तव्य है। तो अपना फर्ज़ निभाने की रिश्वत कैसे ले सकता है? ‘देखिये’, ऑफिसर बोला- आप जरा समझदार है सो आपको विस्तार से बताता हूँ पुछो जरा अपने इस मित्र से कि वह काम क्या करवाने आया था? नियम विरुद्ध काम ईश्वर के कर्तव्य नहीं होते। जब काम नियम विरुद्ध करवाने होते है तो रिश्वत तो लगेगी ही। ईश्वर लेता है या नहीं यह बाद की बात, किन्तु नियम विरुद्ध जाकर हमें आप लोगों के दिल को तसल्ली देनी श्रम साध्य कार्य है। इस रिश्वत को आप तो बस तसल्ली का सर्विस चार्ज ही समझो।
यह लो बुक-लेट इस में ईश्वर के सभी नियम कायदे कानून विस्तार से लिखे हुए है। सभी अटल है, साफ़ साफ़ लिखा है।अर्थात् बदले नहीं जा सकते, स्वयं ईश्वर भी नहीं बदल सकते। आपके डेढ़ सयाने मित्र अबोध शाह ने पता है क्या अर्जी लगाई थी? ‘अपने स्वजनों की सलामती के लिये’ जबकि नियम अटल है, मृत्यु शास्वत सत्य है, आज तक जो संसार में आया उसे मरना ही है, युगों युगों के इतिहास में एक भी अमर व्यक्ति बता दो तो हम मान लेंगे ईश्वर के नियम परिवर्तनशील है। फिर भला इसके स्वजन सदैव सलामत कैसे रह सकते है? या तो आप लोग यह नियमावली भली भांति समझ लो और नियमानुसार चलो, कोई रिश्वत की जरूरत नहीं, यह चेतावनी भी इस बुकलेट में स्पष्ठ लिखी हुई है। ईश्वर के आकार-प्रकार पर सर खपाने की जगह उसके बनाए नियमों का ईमानदारी से पालन करो, यही उसका प्रधान निर्देश है।

मैं जान गया, ऑफ़िसर एक स्पष्ठ वक्ता है। उसे यह ट्रेनिंग मिली है कि सभी को उनके पेट की क्षमता के आधार पर ही भोजन दिया जाय। मुझे अच्छा फंडा लगा।
मेरी जिज्ञासा बलवती हो गई कि मुझे इस बुकलेट का अध्यन करना चाहिए, जैसे जैसे समझुंगा आपसे शेयर करूँगा…

12 अप्रैल 2011

पश्चाताप

(आज प्रस्तुत है मेरे पसंदीदा कवि ‘भृंग’ की एक रचना)


आसक्ति परिणाम

जग के जंजाल बीच, कूद पड़ा आंख मींच, 

सपनों को सींच सींच, बे-लगाम हो गया। 

जोश में तो होश भूल, खुशियों के झूले झूल, 

समय के प्रतिकूल, बे-नकाब हो गया। 

 

सुन के रसीली राग, खेलने लगा हूँ फाग, 

बात बात में हूँ आग, मैं अलाम हो गया। 

इन्द्रियों के वशीभूत, कैसे होऊं फलीभूत, 

करमों की करतूत, मैं गुलाम हो गया। 

 

आँख साख झूठी देवे, कान किये हथलेवे, 

मुख निरा मुसकावे, कटि वाम हो गया। 

सांस फूलने लगा है, डील झूलने लगा है, 

बात भूलने लगा है, पांव जाम हो गया। 

 

प्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर, 

जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया। 

इन्द्रियों के वशीभूत, “भृंग” कैसे फलीभूत, 

कैसी करतूत, तन तामजाम हो गया॥ 


-कवि भंवरलाल ‘भृंग’

5 अप्रैल 2011

आत्मश्रद्धा से भर जाऊँ, प्रभुवर ऐसी भक्ति दो।

(चारों और फ़ैली आशा, निराशा, विषाद, श्रद्धा-अश्रद्धा के बीच एक जीवट भरी अभिव्यक्ति)


आत्मश्रद्धा से भर जाऊँ, प्रभुवर ऐसी भक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

कईं जन्मों के कृतकर्म ही, आज उदय में आये है।
कष्टो का कुछ पार नहीं, मुझ पर सारे मंडराए है।
डिगे न मन मेरा समता से, चरणो में अनुरक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

कायिक दर्द भले बढ जाय, किन्तु मुझ में क्षोभ न हो।
रोम रोम पीड़ित हो मेरा, किंचित मन विक्षोभ न हो।
दीन-भाव नहीं आवे मन में, ऐसी शुभ अभिव्यक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥


दुरूह वेदना भले सताए, जीवट अपना ना छोडूँ।
जीवन की अन्तिम सांसो तक, अपनी समता ना छोडूँ।
रोने से ना कष्ट मिटे, यह पावन चिंतन शक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥


अर्चना चावजी की मधुर आवाज में सुनें यह प्रार्थना…





22 मार्च 2011

अस्थिर आस्था के लूटेरे

एक विशाल नगर में हजारों भीख मांगने वाले थे। अभावों में भीख मांगकर आजिविका चलाना उनका पेशा था। उनमें कुछ अन्धे भी थे। उस नगर में एक ठग आया और भीखमंगो में सम्मलित हो गया। दो तीन दिन में ही उसने जान लिया कि उन भीखारियों में अंधे भीखारी अधिक समृद्ध थे। अन्धे होने के कारण दयालु लोग उन्हे कुछ विशेष ही दान देते थे। उनका धन देखकर ठग ललचाया। वह अंधो के पास पहुंच कर कहने लगा-“सूरदास महाराज ! धन्य भाग जो आप मुझे मिल गये। मै आप जैसे महात्मा की खोज में था ! गुरूवर, आप तो साक्षात भगवान हो। मैं आप की सेवा करना चाहता हूँ ! लीजिये भोजन ग्रहण कीजिए, मेरे सर पर कृपा का हाथ रखिए और मुझे आशिर्वाद दीजिये।“

अन्धे को तो जैसे बिन मांगी मुराद मिल गई। वह प्रसन्न हुआ और भक्त पर आशिर्वाद की झडी लगा दी। नकली भक्त असली से भी अधिक मोहक होता है। वह सेवा करने लगा। अंधे सभी साथ रहते थे। वैसे भी उन्हे आंखो वाले भीखमंगो पर भरोसा नहीं था। थोडे ही दिनों में ठग ने अंधो का विश्वास जीत लिया। अनुकूल समय देखकर उस भक्त ने, अंध सभा को कहा-“ महात्माओं मुझे आप सभी को तीर्थ-यात्रा करवाने की मनोकामना है। आपकी यह सेवा कर संतुष्ट होना चाहता हूँ। मेरा जन्म सफल हो जाएगा। सभी अंधे ऐसा श्रवणकुमार सा योग्य भक्त पा गद्गद थे। उन्हे तो मनवांछित की प्राप्ति हो रही थी। वे सब तैयार हो गये।सभी ने आपना अपना संचित धन साथ लिया और चल पडे। आगे आगे ठगराज और पिछे अंधो की कतार।

भक्त बोला- “महात्माओं, आगे भयंकर अट्वी है, जहाँ चोर डाकुओं का उपद्रव रहता है। आप अपने अपने धन को सम्हालें”। अंध-समूह घबराया ! हम तो अंधे है अपना अपना धन कैसे सुरक्षित रखें? अंधो ने निवेदन किया – “भक्त ! हमें तुम पर पूरा भरोसा है, तुम ही इस धन को अपने पास सुरक्षित रखो”, कहकर सभी ने नोटों के बंडल भक्त को थमा दिये। ठग ने इस गुरुवर्ग को आपस में ही लडा मारने की युक्ति सोच रखी थी। उसने सभी अंधो की झोलीयों में पत्थर रखवा दिये और कहा – “आप लोग मौन होकर चुपचाप चलते रहना, आपस में कोई बात न करना। कोई मीठी मीठी बातें करे तो उस पर विश्वास न करना और ये पत्थर मार-मार कर भगा देना। मै आपसे दूरी बनाकर नजर रखते हुए चलता रहूंगा”। इस प्रकार सभी का धन लेकर ठग चलते बना।

उधर से गुजर रहे एक राहगीर सज्जन ने, इस अंध-समूह को इधर उधर भटकते देख पूछा –“सूरदास जी आप लोग सीधे मार्ग न चल कर, उन्मार्ग - अटवी में क्यों भटक रहे हो”? बस इतना सुनते ही सज्जन पर पत्थर-वर्षा होने लगी. पत्थर के भी कहाँ आँखे होती है, एक दूसरे अंधो पर भी पत्थर बरसने लगे। अंधे आपस में ही लडकर समाप्त हो गये।

आपकी डाँवाडोल, अदृढ श्रद्धा को चुराने के लिए,  सेवा, परोपकार और सरलता का स्वांग रचकर ठग, आपकी आस्था को लूटेने के लिए तैयार बैठे है। यथार्थ दर्शन चिंतन के अभाव में हमारा ज्ञान भी अंध है। अज्ञान का अंधापा हो तो अस्थिर आस्था जल्दी विचलित हो जाती है। एक बार आस्था लूट ली जाती है तो सन्मार्ग दिखाने वाला भी शत्रु लगता है. अज्ञानता के कारण ही अपने  समृद्ध दर्शन की कीमत हम नहीं जान पाते। हमेशा डाँवाडोल श्रद्धा को सरल-जीवन, सरल धर्म के पालन का प्रलोभन देकर आसानी से ठगा जा सकता है। विचलित विचारी को गलत मार्ग पर डालना बड़ा आसान है। आस्था टूट जाने के भय में रहने वाले ढुल-मुल  अंधश्रद्धालु को सरलता से आपस में लडाकर खत्म किया जा सकता है।

अस्थिर आस्थाओं की ठग़ी ने आज जोर पकड़ा हुआ है। निष्ठा पर ढुल-मुल नहीं सुदृढ बनें।

12 मार्च 2011

मैं इतना बुरा भी नहीं लग रहा हूँ

कोई पन्द्रह वर्ष पहले की बात है,हमने अपने मित्र मनोज मेहता के साथ तिरूपति दर्शनार्थ जाने की योजना बनाई। हम तीन दम्पति थे। तिरूपति में दर्शन वगैरह करके हम प्रसन्नचित थे। मैने व मनोज जी ने केश अर्पण करने का मन बनाया।

मन्दिर के सामने स्थित बडे से हॉल में हम दोनो नें मुंडन करवाया। मुंडन के बाद हम तिरूपति के बाज़ार घुमने लगे। मैने महसुस किया कि मनोज जी  कुछ उदास से है, वे अनमने से साथ चल रहे थे। जबकि मेरा मन प्रफुल्लित था। और वहाँ के वातावरण का आनंद ले रहा था। मनोज जी का मुड ठीक न देखकर, हम गाडी लेकर नीचे तलहटी में स्थित होटल में लौट आए।

मै थकान से वहीं सोफे पर पसर गया। किन्तु मैने देखा कि मनोज जी आते ही शीशे के सामने खडे हो गये, सर पे हाथ फेरते और स्वयं को निहारते हुए बोल पडे – ‘हंसराज जी मैं इतना बुरा भी नहीं लग रहा हूँ?’
उनके इस अप्रत्याशित प्रश्न से चौकते हुए मैने प्रतिप्रश्न किया- ‘किसने कहा आप मुंडन में बुरे लग रहे है?’
वे अपने मनोभावो से उपजे प्रश्न के कारण मौन रह गये। अब वे प्रसन्न थे। उनके प्रश्न से मुझे भी जिज्ञासा हुई और शीशे की तरफ लपका। मेरा मुँह लटक गया। सम गोलाई के अभाव में  मेरा मुंडन, खुबसूरत नहीं लग रहा था। अब प्रश्न की मेरी बारी थी- मनोज जी, मेरा मुंडन जँच नहीं रहा न?
मनोज जी नें सहज ही कहा- ‘हाँ, मैं आपको देखकर परेशान हुए जा रहा था। कि मैं आप जैसा ही लग रहा होऊंगा’
मैने पुछा- ‘अच्छा तो आप इसलिये उदास थे’ ?
मनोज जी- हाँ, लेकिन आप तो बडे खुश थे??
जब मुझे वास्तविकता समझ आई, मै खिलखिला कर हँस पडा- ‘मनोज जी, मैं आपका  टकला देखकर बडा खुश था कि मेरा भी मुंड शानदार ही दिखता होगा’। अब हताशा महसुस करने की, मेरी बारी थी।

तो,बुरा सा टकला लेकर भी सुन्दर टकले की भ्रांत धारणा में मैं खुश था। वहां मनोज जी शानदार टकला होते हुए भी बुरे टकले की भ्रांत धारणा से दुखी थे।

हम देर तक अपनी अपनी मूर्खता पर हँसते रहे। इसी बात पर हम दर्शनशास्त्र की गहराई में उतर गये। क्या सुख और दुख ऐसे ही आभासी है? क्या हम दूसरों को देखकर उदासीयां मोल लेते है। या दूसरो को देखकर आभासी खुशी में ही जी लेते है। 
ज्ञानी सही कहते है, सुख-दुख भ्रांतियां है। और असली सुख-दुख हमारे मन का विषय है।

2 मार्च 2011

आहार आवास और आवरण की उच्छ्रंखलता



मनुष्य की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ है, आहार आवास और आवरण (वस्त्र)। इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ही मानव प्रकृति का दोहन करता है। लेकिन जब तक वह इनका अपनी जरूरतों तक सीमित उपभोग, संयमपूर्वक करता है तब तक प्रकृति उसकी सहयोगी बनी रहती है। लेकिन जब वह अपनी आवश्यकताओं का अतिक्रमण करने लगता है, उपयोग कम और व्यर्थ अधिक करने लगता है, तृष्णाधीन होकर संग्रह के माध्यम से वस्तुओं को अनावश्यक सडन-गलन में झोंक देता है। संयम और अनुशासन को भूल, अनियंत्रित और स्वछंद भोग-उपभोग करता है। मानव की स्वयं की प्रकृति, विकृति में रूपांतरित हो जाती है, तब प्रकृति अपना सहयोग गुण तज देती है और मानव का अपना असंयम ही उसके अस्तित्व शत्रु साबित होता है।

मनुष्य सर्वाधिक हिंसा और प्रकृति का विनाश अपनी आहार जरूरतों के लिये करता है। किन्तु अपने आहार-चुनाव में ही उसे सर्वाधिक संयम और अनुशासन की आवश्यकता होती है।

दुखद पहलू यह है कि कथित प्रगतिशील, इन तीनों (आहार आवास और आवरण)  में स्वतंत्रता-स्वच्छंदता के पक्षधर होते है, और स्वांत संयम के घोर विरोधी। वे असंयमित भोग उपभोग को बल देते है। वे मानवीय तृष्णा की अगन ज्वाला को निरन्तर प्रदीप्त रखने का दुष्प्रचार करते है। भोगी संस्कृति के प्रसारक न केवल प्रकृति-द्रोही बल्कि मानवता विरोधी भी हैं।

28 फ़रवरी 2011

इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, सहनशीलता दिखलाएँ...


जिसने राग द्वेष सब जीते, और सर्वजग जान लिया।
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया।
बुद्ध वीर जिन हरि हर ब्रह्मा, या उनको स्वाधीन कहो।
गुणानुवाद से प्रेरित होकर, सद् चित उन में लीन रहो॥

विषयों से निरपेक्ष है जो, साम्यभाव मन रखते है।
स्व-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते है।
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या,बिना खेद जो करते है।
ऐसे ज्ञानी संत जगत् के, दुख समूह का हरते है॥

सदा रहे सत्संग गुणी का, गुणों पर मैं आसक्त रहूँ।
उनके जैसी चर्या में ही, आत्म-चित अनुरक्त रहूँ।
सताऊँ न किसी जीव को, झूठ कभी ना जिया करूँ।
परधन वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ॥

अहंकार का भाव न रखूं, नहीं किसी पर क्रोध करूँ।
देख दूसरों की बढती को, कभी न ईर्ष्या द्वेष धरूँ।
रहे भावना ऐसी मेरी, सत्य सरल व्यवहार करूँ।
बने वहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ॥

मैत्री भाव जगत् में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे
दीन दुखी जीवों पर मेरे, उर से करूणा स्रोत बहे
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आए।
साम्यभाव रखूँ मैं उनपर, ऐसी परिणिति हो जाए॥

कोई बुरा कहे या अच्छा, लक्ष्मी आए या जाए।
सौ वर्ष जीऊँ या फिर, मृत्यु आज ही आ जाए।
अथवा कोई कैसा भी भय, या लालच देने आए।
किंचित न्यायमार्ग से मेरा, मन विचलित न हो पाए॥

होकर सुख में मग्न न फूलें, दुख में कभी न घबराएँ।
पर्वत नदी श्मशान भयानक, अटवी से न भय खाएँ।
रहें अडोल अकम्प निरंतर, यह मन दृढतर बन जाए।
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, सहनशीलता दिखलाएँ॥

इति भीति न व्यापे जग में, सत्य धर्म बस हुआ करे।
धर्मनिष्ट बन राजतंत्र भी, न्याय प्रजा का किया करे।
महामारी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे।
नैतिकता सहयोग सभी बस, देशोन्नति में दिया करे॥

सुखी रहे सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।
जिए कृतज्ञ होकर यह जीवन, प्रकृति द्रोह न उर आवे।
वैर पाप अभिमान छोड जग, नित्य नये मंगल गावे।
ज्ञान चरित्र उन्नत कर अपना, मनुष्य जन्म सफल पावे।।

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