5 जनवरी 2011

ब्लॉगिंग ज्ञानतृषा का निदान ही नहीं, ज्ञान का निधान है।


ब्लॉग अथवा चिट्ठा एक जालस्थान है, जो आपको विचार और जानकारी साझा करने के लिये त्वरित सक्षम बनाता है चिट्ठो में दिनांक अनुक्रम से लेख-प्रविष्ठियां होती हैं। यह डायरी की तरह लिखा जाने वाला आपके विचारो का सार्वजनिक पत्र है। आपका सार्वजनिक किया हुआ व्यक्तिगत जालपृष्ठ है।

ब्लॉग को मात्र निजि डायरी मानना नितांत गलत है। अब वह किसी भी दृष्टिकोण से निजि डायरी नहीं रही। भला, कोई रात-बेरात, किसी अन्य के अध्यन-कक्ष में अपनी निजि डायरी छोड जाता है कि अगला पढकर अपने प्रतिभाव देगा?

ब्लॉग अब केवल डायरी ही नहीं, पुस्तक से भी आगे बढकर है। यह लेखक-पाठक के सीधे संवाद का प्रभावशाली माध्यम है। ब्लॉग आज अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन कर उभरा है यह न केवल विचार -विमर्श के लिये प्रभावशाली हैं, बल्कि सामान्य से विचारो की सरल प्रस्तूति का इकलौता माध्यम है। ब्लॉग लेखन निजि विचारो पर भी चर्चा के क्षेत्र खोलता है। इतना ही नहीं विचारो को परिष्कृत परिमार्जित करने के अवसर उपलब्ध कराता है। यहां तक कि स्थापित विचारो को पूर्ण परिवर्तित कर देने का माद्दा भी रखता है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर तथ्यपूर्ण सूचनाएं सहज ही उपलब्ध होती है।

लोगों को पहले किसी भी विषय पर तार्किक सारगर्भित दृष्टिकोण सहज उपलब्ध नहीं थे, अथाग श्रम और अध्यन के बाद भी वस्तुस्थिति संशय पूर्ण रहती है। समाचार-पत्र, दूरदर्शन भी प्रति-जिज्ञासा शान्त करने में असमर्थ है। अन्तर्जालीय ब्लॉग माध्यम ऐसी तमाम, प्रति-प्रति-जिज्ञासाओं को शान्त करने में समर्थ है।

निस्संदेह हिंदी ब्लॉगजगत का विकास संतोषजनक नहीं है अभी हमारे देश में अन्तरजाल की पहूँच और ब्लॉग अभिरूचि अपर्याप्त है। आज दायरा छोटा है, यह निरंतर विकासगामी है। किन्तु हिंदी ब्लोगर  अपर्याप्त साधन सूचनाओं के भी समाज और देश हित में जन चेतना जगाने में तत्पर है हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हिन्दी ब्लोगर्स की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। हिन्दी ब्लॉगिंग के शानदार भविष्य की शुरुआत हो चुकी है, हिन्दी ब्लॉग लेखन में आज साहित्यिक सृजनात्मकता, नियोजित प्रस्तुतीकरण, गंभीर चिंतन-विवेचन, समसामयिक विषयों पर  सूक्ष्मदृष्टि, , सामाजिक कुरितियों पर प्रहार आदि सफल गतिविधियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं। 

ब्लॉग एक सार्वजनिक मंच का स्वरुप ग्रहण कर चुका है, इस मंच से जो भी विचार परोसे जाते हैं पूरी दुनिया द्वारा आत्मसात होने की पूरी संभावनाएं है। ऐसे में ब्लोगर की जिम्मेदारी और भी बढ जाती है वह सामाजिक सरोकार के परिपेक्ष में लिखे तो सुधार की अनंत सम्भावनाएं है। हर ब्लॉगर अनुकूलता अनुसार अपना वैचारिक योगदान अवश्य दे। हिन्दी ब्लॉगिंग की विकासशील स्थिति में भी किये गये प्रयास, एक सुदृढ समर्थ वातावरण निर्मित करेंगे। इस माध्यम से एक विलक्षण वैचारिक विकास सम्भव है। जीवन मूल्यो को नये आयाम और उसकी पुनः स्थापना सम्भव है। 

ब्लॉगिंग ज्ञानतृषा का निदान ही नहीं, ज्ञान का निधान है।

2 जनवरी 2011

दुर्गंध

पुराने समय की बात है, एक राजा अपने नगर का हाल-चाल जानने के लिये नगर भ्रमण को निकला। धुमते हुए चमारों के मोहल्ले में पहूंच गया। वहां चमडे की तीव्र दुर्गंध से उसका सर फटने लगा। गंध असह्य थी। उसने सोचा ऐसी तेज दुर्गंध में यह लोग रहते कैसे होंगे। उसी समय राजा ने सेवक को बुला कर आदेश दे दिया कि अब रोजाना सफाई कामदारो से इस क्षेत्र को साफ कर, पानी से सडकें धुलवाओ और सुगंधित इत्र युक्त जल का छिडकाव करो, जिससे लोग यहां आराम से रह सके।
दूसरे ही दिन प्रातः काल से यह कार्य प्रारम्भ हो गया। चार छः दिन बाद ही सभी चर्मकार इक्कठा हुए और राजदरबार जाने का निश्चित किया। दरबार में पहूंच कर राजा से निवेदन किया कि महाराज हमारा मुहल्ले में रहना दूभर हो गया है, पूरा मुहल्ला दुर्गंध मारता है। इस दुर्गंध के मारे हमारे सर फ़टते है, काम करना मुस्किल हो गया है।
महाराज को कामचोरी का अंदेशा हुआ, उन्होनें तत्काल उस सेवक को बुलाया और पुछा कि आज्ञा का पालन क्यों नहीं हुआ? सेवक कांपते हुए बोला- महाराज नित्य प्रतिदिन सफ़ाई बराबर हो रही है और आपके आदेश का पूरा पालन किया जा रहा है।
चर्मकारों ने कहा- महाराज विश्वास न हो तो आप स्वयं चल कर देख लिजिये, आप तो एक घड़ी भी सह नहीं पाएंगे।
राजा ने तत्काल चलने की व्यवस्था करवाई और चर्मकारो के साथ ही चमारों के मोहल्ले में पहूँचे। वहां जाते ही राजा को कोई दुर्गंध महसुस न हुई, राजा ने चमारो से पुछा- कहाँ है दुर्गंध? चर्मकारों ने कहा- क्या आपको यहां दुर्गंध नहीं लग रही? हमारा तो दुर्गंध के मारे सर फट रहा है। और यह दुर्गंध आपके आदमी ही यहां, रोज रोज फैला के जाते है।
राजा के साथ चल रहे मंत्री को माजरा समझ आ गया, उसने राजा के कान में हक़ीकत बयां कर दी।
हमेशा चमडे की दुर्गंध से अभ्यस्त व्यक्ति को मनभावन सौरभ सुगंध भी प्रायः असह्य लगती है।

1 जनवरी 2011

चिंतन कण : सद्भाव



इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग के समय ही, आत्मा में दुःस्थिति पैदा होती हैं। उस स्थिति में चित को स्थिर करने का, पुरूषार्थी चिंतन ही, सद्भाव कहलाता है।

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31 दिसंबर 2010

विज्ञ बनो, अनभिज्ञ नहीं..

वीर बनो, क्रूर नहीं!

दृढ़ बनो, हठी नहीं!

खरे बनो, खारे नहीं!

भले बनो, भोले नहीं!

धीर बनो, सुस्त नहीं!

प्रेमी बनो, पागल नहीं!

गम्भीर बनो, गूंगे नहीं!

चुस्त बनो, अधीर नहीं!

न्यायी बनो, निर्दयी नहीं!

सावधान बनो, संदेही नहीं!

विवेकी बनो, मायावी नहीं!

स्वाधीन बनो, स्वछंद नहीं!

निरपेक्ष बनो, उदासीन नहीं!

मितव्ययी बनो, कंजूस नहीं!

वितराग बनो, अकर्मण्य नहीं!

समालोचक बनो, निंदक नहीं!

आस्थावान बनो, अंधभक्त नहीं!


27 दिसंबर 2010

ब्लॉगजगत में स्थान

एक ब्लॉगर कपडे सिलवाने के उद्देश्य से दर्जी के पास गया। दर्जी अपने काम में व्यस्त था। उसे व्यस्त देखकर वह उसका निरिक्षण करने लगा, उसने देखा वह सुई जैसी छोटी चीज को सम्हाल कर अपने कॉलर में लगा देता और कैंची को वह अपनें पांव तले दबाकर रखता था।

दर्जी दार्शनिक था, उसनें कहा- वैसे तो उद्देश्य यह है कि आवश्यकता होने पर सहज उपल्ब्ध रहे, किन्तु यह वस्तुएँ अपने गुण-स्वभाव के कारण ही उपयुक्त स्थान पाती है। सुई जोडने का कार्य करती है अतः वह कॉलर में स्थान पाती है और कैची काटने का, जुदा करने का कार्य करती है अतः वह पैरो तले स्थान पाती है।

ब्लॉगर सोचने लगा कितना गूढ रहस्य है, सही तो है ब्लॉगर भी अपने इन्ही गुणो के कारण उचित महत्व प्राप्त करते है। जो लोग जोडने का कार्य करते है, ब्लॉगजगत में सम्मान पाते है। और जो तोडने का कार्य करते है, उन्हें कोई सभ्य ब्लॉगर महत्व नहीं देता।

जैसे गुण वैसा स्थान, अनावश्यक हाय-तौबा मचाने का क्या फायदा?

कैंची, आरा, दुष्टजन जुरे देत विलगाय !
सुई,सुहागा,संतजन बिछुरे देत मिलाय !!

25 दिसंबर 2010

ब्लॉगजगत, संतब्लॉगर और आशिर्वाद


ब्लॉगजगत में एक संत ब्लॉगर, ब्लॉग दर ब्लॉग घूम रहे थे। साथ एक शिष्यब्लॉगर भी था। संतब्लॉगर छांट-छांट कर ब्लॉग्स पर आशिर्वाद - टिप्पणियाँ कर रहे थे। अच्छे विचारों वाले ब्लॉग्स पर आशिर्वाद देते “आपका ब्लॉग न जमें”  और दुर्विचारों वाले ब्लॉग्स पर आशिर्वाद देते “आपका ब्लॉग, पोस्ट-दर-पोस्ट से हरा भरा रहे”

शिष्यब्लॉगर को बडा आश्चर्य हो रहा था, उसने पूछा महात्मन् यह क्या? आप बुरे विचार फ़ैलाने वालों को तो पोस्टों से भरने-फूलने का आशिर्वाद दे रहे है, और अच्छे ब्लॉग्स को उजडने का?

संतब्लॉगर ने शिष्य को समझाते हुए कहा- अच्छे विचारवान ब्लॉगर कहीं भी जाय, हमेशा अच्छे विचारों का प्रसार ही करेंगे, जब उनके ब्लॉग नहीं जमेंगे तो वे निश्चित ही दूसरे ब्लॉग पर अच्छे विचारों की टिप्पणियाँ करेंगे, जिससे अच्छे विचारों का प्रसार होगा।

शिष्यब्लॉगर- तो फ़िर दुर्विचारों वाले ब्लॉग्स को अधिक पोस्ट का आशिर्वाद क्यों?

संतब्लॉगर- वे दुर्विचार वाले ब्लॉगर, मात्र अपने ब्लॉग पर लिखने में ही व्यस्त रहेंगे। इसतरह उन्हें दूसरे ब्लॉग्स पर कुविचार टिप्पणियाँ करने का समय ही नहीं मिलेगा। जिससे दुर्विचार का फैलाव न होगा, और दुर्विचार उनके अपने ब्लॉग तक सीमित हो जाएँगे। जिन पाठको का सद्विचार से दूर दूर तक कोई नाता न होगा, वे पाठक ही उन ब्लॉग्स पर जाएगें। और इस तरह दुर्विचारों का प्रसार व प्रचार न हो पाएगा।

शिष्यब्लॉगर, संतब्लॉगगुरू  की औजस्वी निर्मलवाणी में छिपी दूरदृष्टि देख नतमस्तक हो गया।
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15 दिसंबर 2010

गंतव्य की दुविधा



यात्री पैदल रवाना हुआ, अंधेरी रात का समय, हाथ में एक छोटी सी टॉर्च। मन में विकल्प उठा, मुझे पांच मील जाना है,और इस टॉर्च की रोशनी तो मात्र पांच छः फ़ुट ही पडती है। दूरी पांच मील लम्बी और प्रकाश की दूरी-सीमा अतिन्यून। कैसे जा पाऊंगा? न तो पूरा मार्ग ही प्रकाशमान हो रहा है न गंतव्य ही नजर आ रहा है। वह तर्क से विचलित हुआ, और पुनः घर  में लौट आया। पिता ने पुछा क्यों लौट आये? उसने अपने तर्क दिए - "मैं मार्ग ही पूरा नहीं देख पा रहा, मात्र छः फ़ुट प्रकाश के साधन से पांच मील यात्रा कैसे सम्भव है। बिना स्थल को देखे कैसे निर्धारित करूँ गंतव्य का अस्तित्व है या नहीं।" पिता ने सर पीट लिया……
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13 दिसंबर 2010

ब्लॉग मैं लिखता हूँ बस सुमार्ग के लिए


निरीह जीवहिंसा में जिनको शर्म नहीं है।
बदनीयत के  बहाने, सच्चा कर्म नहीं है।
भूख स्वाद की कुतर्की में मर्म नहीं है।
‘जो मिले वह खाओ’ सच्चा धर्म नहीं है।
मनों से अनुकम्पा कहीं नष्ट हो न जाए।
सभ्यता विकास आदिम भ्रष्ट हो न जाए।
इसलिये मैं लिखता दुर्भाव त्याग के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ बस सुमार्ग के लिए।
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11 दिसंबर 2010

ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए






मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।
अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।
जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए।
इसलिए मैं लिखता अन्तिम दीन के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए॥
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10 दिसंबर 2010

ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिलाषा के लिए

आभिव्यक्ति का अक्षत अनुशासन है हिन्दी।
सहज सरल बोध सा संभाषण है हिन्दी।
समभाषायी छत्र में सबको एक करती है।
कई लोगों का भारती अब भी पेट भरती है।
प्रलोभन में हिन्दी का कहीं हास  हो न जाए। 
मेरी मातृ वाणी का उपहास  हो न जाय।
इसलिए मैं लिखता मेरी भाषा के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिलाषा के लिए॥
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