3 फ़रवरी 2015

मानस प्रभाव

प्रजा का हाल-चाल जानने के उद्देश्य से, हर माह की पहली तिथि को, नगर बाज़ार में राजा की सवारी निकलती थी। बाजार में एक दूकान पर बैठे एक व्यापारी को देखकर, आजकल राजा असहज महसूस करने लगे। उन्हें उस व्यापारी की सूरत देखते ही अप्रीति उत्पन्न होती।
राजा समझदार था, अकारण उपजते द्वेषभाव ने उसे चिंतित कर दिया। दरबार में पहुँचकर राजा ने अपने बुद्धिमंत प्रधान को यह बात बताई। प्रधान नें राजा को कारण जानकर, समाधान का भरोसा दिलाया।
दूसरे ही दिन प्रधान, उस व्यापारी की दूकान पर गया और हालचाल पूछा। व्यापारी ने बताया कि वह चन्दन की लकड़ी का व्यापारी है, आजकल इस धंधे में घोर मंदी है और बिक्री बिलकुल भी नहीं हो रही, वह परेशान है।
प्रधान ने तत्काल राजमहल में उपयोग हेतु प्रति दिन 10 किलो चन्दन पहुँचाने का आदेश दिया एवम् राजकोष से प्रतिदिन भुगतान ले जाने की सूचना कर दी।
अगले ही नगर-भ्रमण के दौरान, उस व्यापारी को देखकर राजा को स्नेह और उत्साह महसूस हुआ। राजा ने प्रसन्न मुद्रा में प्रधान की और दृष्टि घुमाई, प्रधान ने भी मुस्कराकर अभिवादन किया।
प्रधान ने एकांत में राजा को बताया कि बिक्री न होने के कारण व्यापारी के मन में बुरे विचार उठते थे। वह सोचता कि यदि यह राजा मर जाए तो मेरी बहुत सारी चन्दन की लकड़ी बिक जाए। उसके इसी बुरे चिंतन के फलस्वरूप आपको उसे देखकर घृणा उपजती थी। मैंने आपकी तरफ से प्रतिदिन लकड़ी खरीदने की व्यवस्था करके, उसके चिंतन की दिशा बदल दी। अब वह आपके दीर्घ जीवन की कामना करता है।

मन के विचारों का प्रभाव जोरदार होता है।

2 फ़रवरी 2015

सहिष्णुता सद्भाव

एक नगर में एक जुलाहा रहता था। वह स्वाभाव से अत्यंत शांत, नम्र एवं निष्ठावान था। क्रोध उसके स्वभाव में ही नहीं था। एक बार कुछ लड़कों को शरारत सूझी वे सब उस जुलाहे के पास यह सोचकर पहुँचे कि देखें इसे गुस्सा कैसे नहीं आता ?
उन में एक लड़का धनवान माता-पिता का पुत्र था। वहाँ पहुँचकर वह बोला - "यह साड़ी कितने की दोगे ?"
जुलाहे ने कहा - "दस रुपये की।"
उस लडके ने उसे चिढ़ाने के उद्देश्य से साड़ी के दो टुकड़े कर दिये और एक टुकड़ा हाथ में लेकर बोला - "मुझे पूरी साड़ी नहीं चाहिए, आधी चाहिए। इसका क्या दाम लोगे ?"
जुलाहे ने बड़ी शान्ति से कहा, "पाँच रुपये।"
लडके ने उस टुकड़े के भी दो भागों में विभक्त किया और दाम पूछा।जुलाहा अब भी शांत था। उसने बताया - "ढाई रुपये।"
लड़का इसी प्रकार साड़ी के टुकड़े करता गया। अंत में बोला - "अब मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए। यह टुकड़े अब मेरे किस काम के?"
जुलाहे ने शांत भाव से कहा - "बेटे ! अब यह टुकड़े तुम्हारे ही क्या, किसी के भी काम के नहीं रहे।"
अब लडका बड़ा लज्जित हुआ, कहने लगा - "मैंने आपका नुकसान किया है। अतः मैं आपकी पूरी साड़ी का मूल्य चुका देता हूँ।"
जुलाहे ने स्नेह भाव से कहा,  "जब अपने साड़ी ली ही नहीं तो मैं आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ ?"
लडके के धन दर्प ने सिर उठाया, "मैं बहुत धनिक व्यक्ति हूँ और आप बहुत ही गरीब इन्सान है। यदि मैं रुपये दे दूँगा तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, किन्तु आप यह घाटा कैसे सहोगे ? और नुकसान मैंने किया है, अतः घाटे की भरपाई भी मुझे ही करनी चाहिए।"
जुलाहे ने मुस्कुराते हुए कहा, - "तुम यह घाटा पूरा नहीं कर सकते। जरा सोचो, किसान का कितना श्रम लगा तब कपास पैदा हुई। फिर मेरी पत्नी ने कठिन परिश्रम से उस कपास को बीना और सूत काता। फिर मैंने उसे  बुना, स्वच्छ किया और रंगा भी।"
"इसमें बहुत से लोगों की महनत लगती है। यह श्रम तभी सफल होता जब इसे कोई पहनता, इसका उपयोग करता, इससे लाभ उठाता। किन्तु तुमने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। श्रम व सदुपयोग का घाटा रुपयों से कैसे पूरा हो सकता है ?" - जुलाहे की वाणी में आक्रोश के स्थान पर धैर्य समता और करूणा थी।
लड़का शर्म से पानी-पानी हो गया। पश्चाताप से उसकी आँखे भर आयी। वह विनत होकर उन जुलाहे संत के पैरो में गिर पड़ा।
जुलाहे ने स्नेह से उसे उठाकर, उसकी पीठ सहलाते हुए कहा - "बेटा, यदि मैं तुम्हारे रुपये ले लेता तो निशचित ही मेरा काम निकल जाता। किन्तु तुम्हारे जीवन का वही हाल होता जो उस साड़ी का हुआ। वह किसी के लिए भी लाभाकारी नहीं होता। साड़ी एक गई, मैं दूसरी बना दूँगा। पर तुम्हारी गढती ज़िन्दगी इस अहंकार से विखण्डित हो जाती तो दूसरी कहाँ से आती ?"
तुम्हारा पश्चाताप और यह शिक्षा ही महत्वपूर्ण है  मेरे लिए यही अत्यन्त कीमती है।

संत तिरुवल्लुवर की इस उँची सोच-समझ भरी सीख ने लडके का जीवन ही बदल दिया।

31 जनवरी 2015

विश्वास ही विषमता को दूर रखता है।


संत कबीर रोज सत्संग किया करते थे। दूर-दूर से लोग उनकी बात सुनने आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने पर भी एक आदमी बैठा ही रहा। कबीर ने इसका कारण पूछा तो वह बोला, ‘मुझे आपसे कुछ पूछना है। मैं गृहस्थ हूं, घर में सभी लोगों से मेरा झगड़ा होता रहता है। मैं जानना चाहता हूं कि मेरे यहां गृह क्लेश क्यों होता है और वह कैसे दूर हो सकता है?’

कबीर थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘लालटेन जलाकर लाओ’। कबीर की पत्नी लालटेन जलाकर ले आई। वह आदमी भौंचक देखता रहा। सोचने लगा इतनी दोपहर में कबीर ने लालटेन क्यों मंगाई। थोड़ी देर बाद कबीर बोले, ‘कुछ मीठा दे जाना।’ इस बार उनकी पत्नी मीठे के बजाय नमकीन देकर चली गई। उस आदमी ने सोचा कि यह तो शायद पागलों का घर है। मीठा के बदले नमकीन, दिन में लालटेन। वह बोला, ‘कबीर जी मैं चलता हूं।’

कबीर ने पूछा, ‘आपको अपनी समस्या का समाधान मिला या अभी कुछ संशय बाकी है?’ वह व्यक्ति बोला, ‘मेरी समझ में कुछ नहीं आया।’ कबीर ने कहा, ‘जैसे मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी घरवाली कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो। इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत। लेकिन नहीं, उसने सोचा कि जरूर किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी। मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गई। हो सकता है घर में कोई मीठी वस्तु न हो। यह सोचकर मैं चुप रहा। इसमें तकरार क्या? आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार में न फंसने से विषम परिस्थिति अपने आप दूर हो गई।’ उस आदमी को हैरानी हुई। वह समझ गया कि कबीर ने यह सब उसे बताने के लिए किया था। कबीर ने फिर कहा,’ गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो पति उसे नजरअंदाज कर दे। यही सुखी गृहस्थी का मूल मंत्र है।’

मित्रता और रिश्तों में भी अवज्ञा पर तकरार से विषमता और विवाद पैदा होता है। प्रतिकूल व्यवहार का भी कोई कारण होगा, अकारण कोई प्रतिकूल नहीं जाता। यदि निष्ठा से संतुलित चिन्तन हो जाय तो कभी सम्बन्ध नहीं बिगड़ते!!

19 जनवरी 2015

रघुनाथ पटेल की छास

रघुनाथ पटेल एक छोटे से गांव के मुखिया थे, उनके यहाँ अच्छी संख्या में दूधारु गाय भैस आदि थे। गांव में बाकि लोग तो दूध बेच दिया करते थे, किन्तु बिलौना मात्र रघुनाथ पटेल के यहाँ ही होता था। अतः गांव के लोग अपने जरुरत की छास, रघुनाथ पटेल के यहाँ से ही लाते थे।

 एक बार उस गांव में कोई आचार्य महाराज, अपने शिष्य समुदाय सहित पधारे। जब शिष्य गांव में गोचरी (भिक्षा) के लिए घूमे, उन्हें रघुनाथ पटेल सहित बहुत से घरों से छास प्राप्त हुई। आहार ग्रहण करते हुए शिष्यों नें देखा, सभी घरों से मिली छास अलग अलग है। उन्होने आचार्य महाराज से पूछा, गुरूदेव जब छास का मूल स्रोत एक मात्र रघुनाथ पटेल का घर है तो फिर भी सभी की छास अलग अलग क्यों? स्वाद में इतना भारी अन्तर क्यों?

गुरूदेव ने कहा, निश्चित ही छास तो मूल से रघुनाथ पटेल के बिलौने की ही है। और सभी गांव वाले अपने अपने उपयोग हेतू वहीं से छास लाते है। किन्तु वे उसे घर लाकर, अपनी अपनी आवश्यकता अनुसार उसमें पानी मिलाते है। किसी के कुटुम्ब में सदस्य संख्या अधिक होने के कारण, कोई ज्यादा मिला देते है, तो कोई कम। कोई अपने अपने स्वाद के अनुसार नमक की कम ज्यादा मात्रा मिला देते है, तो कोई भिन्न भिन्न प्रकार के मसाले मिला देते है। इसी कारण छास में यह अन्तर है।

लगे हाथ गुरू नें विभिन्न धर्म दर्शनों में पाए जाने वाले अन्तर के कारण को स्पष्ट किया। गुरू नें कहा, धर्म का मूल स्रोत तो 'रघुनाथ पटेल की छास' समान एक ही है किन्तु लोगों ने अपनी अपनी अवश्यकता, सहजता, अनुकूलता अनुसार भिन्नताएं पैदा कर दी है।

17 जनवरी 2015

मानस अनुकूलन


एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बड़ा ही रोचक परीक्षण किया..
उन्होंने पाँच बन्दरों को एक बड़े से पिंजरे में बंद कर दिया और बीचों-बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसा की अनुमानित था, एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
जैसे ही बन्दर ने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर वैज्ञानिक यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बन्दरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाकया हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया, ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब वैज्ञानिकों ने एक और मज़ेदार चीज़ की..
पिंजरे के अंदर बंद, बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के नियम नहीं जानता था.
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
प्रयोग के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर, अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका व्यवहार भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..

अनास्थावादी इसी तरह मानसिक अनूकूलन करते है। आपकी आस्थाओं को, विश्वास को बार बार असफल दर्शाते है। कर्मफल के न्याय के प्रति आपको संदेहग्रस्त बना देते है। आपको यथार्थ भी आडम्बर प्रतीत होने लगता है। कष्टों की बरम्बारता आपके मानस में असफलता को रूढ़ कर देती है। फिर न तो आप सम्यक् आस्थावान रहते है न अपने आसपास के किसी को रहने देते है।

16 जनवरी 2015

अकिंचन


सड़क के किनारे, मिट्टी के बर्तन व कलाकृतियाँ सजा कर, कुम्हार खाट पर पसरा हुआ था।
एक विदेशी उन कलाकृतियों का तन्मयता से अवलोकन कर रहा था। उसने मोल पूछा और कुम्हार ने लेटे लेटे ही मूल्य बता दिया।
विदेशी उसकी लापरवाही से बड़ा क्षुब्ध हुआ। उसे आश्चर्य हो रहा था। उसने कुम्हार को टोकते हुए कहा, “तुम काम में तत्परता दर्शाने के बजाय आराम फरमा रहे हो?”
कुम्हार ने कहा, "जिसको लेना होगा वह तो खरीद ही लेगा, आतुरता से आखिर क्या होगा?"
“इस तरह आराम से पडे रहने से बेहतर है तुम ग्राहकों को पटाओ, उन्हें अपनी यह सुन्दर वस्तुएं बेचो। तुम्हे शायद मालूम ही नहीं तुम्हारी यह कलाकृतियां विशेष और अभिन्न है। अधिक बेचोगे तो अधिक धन कमाओगे।“, विदेशी ने कहा।
कुम्हार ने पूछा, "और अधिक धन कमाने से क्या होगा?"
विदेशी ने समझाते हुए कहा, “तुम अधिक धन कमाकर, इन वस्तुओं का उत्पादन बढा सकते हो, बडा सा शोरूम खोल सकते हो, अपने अधीन कर्मचारी, कारीगर रख कर और धन कमा सकते हो।“
कुम्हार नें पूछा, “फिर क्या होगा?”
"तुम अपने व्यवसाय को ओर बढा सकते हो, देश विदेश में फैला सकते हो, एक बड़ा बिजनस एम्पायर खड़ा कर सकते हो", विदेशी ने कहा।
“उससे क्या होगा”, कुम्हार ने फिर पूछा।
विदेशी ने जवाब दिया, “तुम्हारी बहुत बडी आय होगी, तुम्हारे पास आलिशान सा घर, आरामदायक गाडियां और बहुत सारी सम्पत्ति होगी।“
कुम्हार ने फिर पूछा, “उसके बाद?”
"उसके बाद क्या, उसके बाद तुम आराम से जीवनयापन करोगे, आराम ही आराम, और क्या?"

कुम्हार ने छूटते ही पूछा, "तो अभी क्या कर रहा हूँ? जब इतना उहापोह, सब आराम के लिए ही करना है तब तो मै पहले से ही आराम कर रहा हूँ।"

क्या पाना है, यदि लक्ष्य निर्धारित है, अन्तः सुख प्राप्त करना ही ध्येय है, तो भ्रमित करने वाले छोटे छोटे सुख साधन मृगतृष्णा है। वे साधन मार्गभ्रष्ट कर अनावश्यक लक्ष्य को दूर करने वाले और मार्ग की दूरी बढाने वाले होते है। यदि सुख सहज मार्ग से उपलब्ध हो तो सुविधाभोग, भटकन के अतिरिक्त कुछ नहीं।

19 अगस्त 2014

शहर बनाने के चक्कर में घर बना खण्डहर

एक सेठ जी थे, जो दिन-रात अपना काम-धँधा बढ़ाने में लगे रहते थे। उन्हें तो बस, शहर का सबसे अमीर आदमी बनना था। धीरे-धीरे पर आखिर वे नगर के सबसे धनी सेठ बन ही गए।

इस सफलता की ख़ुशी में उन्होने एक शानदार घर बनवाया। गृह प्रवेश के दिन, उन्होने एक बहुत शानदार पार्टी का आयोजन किया। जब सारे मेहमान चले गए तो वे भी अपने कमरे में सोने के लिए चले आए। थकान से चूर, जैसे ही बिस्तर पर लेटे, एक आवाज़ उन्हें सुनायी पड़ी...

"मैं तुम्हारी आत्मा हूँ, और अब मैं तुम्हारा शरीर छोड़ कर जा रही हूँ !!"

सेठ घबरा कर बोले, "अरे! तुम ऐसा नहीं कर सकती!!, तुम्हारे बिना तो मैं मर ही जाऊँगा। देखो!, मैंने वर्षों के तनतोड़-परिश्रम के बाद यह सफलता अर्जित की है। अब जाकर इस सफलता को आमोद प्रमोद से भोगने का अवसर आया है। सौ वर्ष तक टिके, ऐसा मजबूत मकान मैने बनाया है। यह करोड़ों रूपये का, सुख सुविधा से भरपूर घर, मैंने तुम्हारे लिए ही तो बनाया है!, तुम यहाँ से मत जाओ।"    

आत्मा बोली, "यह मेरा घर नहीं है, मेरा घर तो तुम्हारा शरीर था, स्वास्थ्य ही उसकी मजबूती थी, किन्तु करोड़ों कमाने के चक्कर में, तुमने इसके रख-रखाव की अवहेलना की है। मौज-शौक के कबाड़ तो भरता रहा, पर मजबूत बनाने पर किंचित भी ध्यान नहीं दिया। तुम्हारी गैर जिम्मेदारी ने इस अमूल्य तन का नाश ही कर डाला है।"

आत्मा नें स्पष्ट करते हुए कहा, "अब इसे ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, थायरॉइड, मोटापा, कमर दर्द जैसी बीमारियों ने घेर लिया है। तुम ठीक से चल नहीं पाते, रात को तुम्हे नींद नहीं आती, तुम्हारा दिल भी कमजोर हो चुका है। तनाव के कारण, ना जाने और कितनी बीमारियों का घर बन चुका है, ये तुम्हारा शरीर!!"

"अब तुम ही बताओ, क्या तुम किसी ऐसे जर्जरित घर में रहना चाहोगे, जिसके चारो ओर कमजोर व असुरक्षित दीवारें हो, जिसका ढाँचा चरमरा गया हो, फर्नीचर को दीमक खा रही हो, प्लास्टर और रंग-रोगन उड़ चुका हो, ढंग से सफाई तक न होती हो, यहाँ वहाँ गंदगी पड़ी रहती हो। जिसकी छत टपक रही हो, जिसके खिड़की दरवाजे टूटे हों!! क्या रहना चाहोगे ऐसे घर में? नहीं रहना चाहोगे ना!! ...इसलिए मैं भी ऐसे आवास में नहीं रह सकती।"

सेठ पश्चाताप मिश्रित भय से काँप उठे!! अब तो आत्मा को रोकने का, न तो सामर्थ्य और न ही साहस सेठ में बचा था। एक गहरी निश्वास छोड़ते हुए आत्मा, सेठ जी के शरीर से निकल पड़ी... सेठ का पार्थिव बंगला पडा रहा।

मित्रों, ये कहानी आज अधिकांश लोगों की हकीकत है। सफलता अवश्य सर कीजिए, किन्तु स्वास्थ्य की बलि देकर नहीं। अन्यथा सेठ की तरह मंजिल पा लेने के बाद भी, अपनी सफलता का लुत्फ उठाने से वंचित रह जाएँगे!!
 "पहला सुख निरोगी काया"

16 अगस्त 2014

परोपकार

एक बार एक लड़का अपने स्कूल फीस के बंदोवस्त के लिए घरों के द्वार द्वार जाकर कुछ सामान बेचा करता था।

एक दिन उसका कोई सामान नहीं बिका और उसे बड़े जोर से भूख भी लग रही थी। उसने तय किया कि अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा, उससे खाना मांग लेगा।

पहला दरवाजा खटखटाते ही एक लड़की ने दरवाजा खोला, जिसे देखकर वह घबरा गया और बजाय खाना माँगने के, उसने पानी का एक
गिलास माँगा....

लड़की ने भांप लिया था कि वह क्षुधा संतप्त है, वह एक बड़ा गिलास दूध का ले आई. लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया...

"कितने पैसे दूं?" - लड़के ने पूछा।
"पैसे किस बात के?" - लड़की ने प्रतिप्रश्न करते कहा, "माँ ने मुझे सिखाया है कि जब भी किसी पर उपकार करो तो उसके पैसे नहीं लेने चाहिए."

"तो फिर मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूँ."

जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा, उसे न केवल शारीरिक तौर पर शक्ति मिल चुकी थी , बल्कि उसका ईश्वर और मनुष्य पर भरोसा और भी बढ़ गया था।

वर्षों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़
गयी। लोकल डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में इलाज के लिए भेज दिया।

विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया. जैसे ही उसने लड़की के कस्बे का नाम सुना, उसकी आँखों में चमक आ गयी।

वह एकदम सीट से उठा और उस लड़की के कमरे में गया। उसने उस लड़की को देखा, एकदम पहचान लिया और तय कर लिया कि वह उसकी जान बचाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देगा। उसकी मेहनत और लग्न रंग लायी और उस लड़की कि जान बच गयी।

डॉक्टर ने अस्पताल के ऑफिस में जा कर उस
लड़की के इलाज का बिल लिया और उस बिल के कोने में एक नोट लिखा और उसे उस लड़की के पास भिजवा दिया।

लड़की बिल का लिफाफा देखकर परेशान हो उठी उसे मालूम था कि वह बीमारी से तो वह उभर गयी है किन्तु बिल की भारी राशि उसकी जान ही ले लेगी। फिर भी उसने हिम्मत बटोर कर बिल देखा, उसकी नज़र बिल के कोने में हस्तलिखित टिपण्णी पर गयी...

वहाँ लिखा था, "एक गिलास भर दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है." नीचे उस डॉक्टर, होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे।

आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के मारे उस लड़की की आँखों से आंसू टपक पड़े। उसने ऊपर की और दोनों हाथ उठा कर कहा, " हे भगवान..! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!!"

हमारे दिल की अनुकम्पा, करुणा और वात्सल्य भी एक नेटवर्क की तरह समाज में प्रसरित होता है।

"परोपकार किसी न किसी स्वरूप में आप तक अवश्य लौटता है।"

15 अगस्त 2014

अनर्थक बोझ

फेसबुक पर एक सुन्दर दृष्टान्त पढ़ने में आया……

एक मनोवैज्ञानिक श्रोताओं को स्ट्रेस मैनेजमेंट समझा रही थी।  बात करते करते उसने पानी का ग्लास उठाया और सवालिया निगाह कमरे में मौजूद लोगों पे घुमाई.. लोग समझे फिर वही पुराना "आधा भरा या आधा खाली" वाला सवाल आएगा!! मगर प्रश्न हुआ, "इस ग्लास का वजन क्या होगा??" किसी ने कहा 50 ग्राम, किसी ने कहा 80.. ज्यादा से ज्यादा 100 ग्राम।

"दरअसल ग्लास का असली भार ज्यादा ध्यान देने लायक नहीं है",  वक्ता ने समझाया, "असली मुद्दा है कि आप इस वजन को कितनी देर उठाए रहते हैं। अगर एक दो मिनट की बात है तो कोई समस्या नहीं, किन्तु घंटे भर में मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा। अगर मैं यही वजन दिन भर उठाये रखूँ तो शायद मेरा हाथ सुन्न पड़ जायेगा। किसी भी अवधि में ग्लास का वजन नहीं बदलता, मगर जितनी देर मैं इसे उठाये रखूँ .. मेरे लिए कठिनाई उतनी ही बढ़ जाएगी.."

"जीवन की परेशानियाँ, जीवन के तनाव भी ऐसे ही हैं.. एक दो मिनट की चिंता से अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जैसे जैसे आप ज्यादा देर तक उसे ढोते रहते हैं, आपकी परेशानी बढती जाती है.. अगर दिन भर लगा दें तो सर दर्द हो जाए और ज्यादा लगाया तो और कुछ करने लायक ही नहीं रहते आप.."

"उम्मीद है ग्लास नीचे रखना याद रखेंगे आप!! ... "

यह दृष्टांत केवल तनाव या परेशानियों के बोझ को उतारने के लिए ही नहीं, मोह आसक्ति, आलोचना, कटुवचन, सामान्य से शौक, मामूली लगती बुरी आदतें, अनावश्यक उपभोग, चारित्रिक कमियाँ सभी के लिए यह आदर्श दृष्टांत है........

  • कुछ समय के लिए मोह सुहाता है किन्तु इसे हर समय उठाए रहना अति दुष्कर व दुष्परिणामी बन जाता है।
  • कुछ समय के लिए शौक सुहाता है किन्तु जब ये लत बन जाता है इसका बोझ असहनीय बन जाता है।
  • कुछ समय के लिए मामूली सी बुरी आदतें मनरंजन करती है किन्तु वे जब स्वभाव का हिस्सा बन जाती है, व्यक्तित्व बैठ जाता है।
  • कुछ समय के लिए गैरजरूरी उपभोग आनन्द देता है पर उसका भार हमेशा के लिए ढोया नहीं जा सकता।
  • कुछ समय तक किसी की आलोचना हमारी चतुरता का सुख दे जाती है पर हर समय आलोचना निन्दक स्वभाव सम बोझ बन जाती है।
  • उसी तरह कुछ चारित्रिक कमियाँ जीवन में कुछ समय के लिए सहज सामान्य प्रतीत होती है, यदि लगातार बनी रहे तो चरित्र को ही तोड़ के रख देती है।
इन सभी विकारों का हमारे जीवन में आ जाना सहज है किन्तु इन विकारों के बोझ को ढ़ोते जाना चरित्र को धराशायी कर देता है। इसलिए यह भार असहनीय बने इतना अवसर नहीं देना है।

12 अगस्त 2014

वैचारिक क्षमता

एक राजमहल के द्वार पर एक वृद्ध भिखारी आया। द्वारपाल से उसने कहा, ‘भीतर जाकर राजा से कहो कि तुम्हारा भाई मिलने आया है।’ द्वारपाल ने समझा कि शायद कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो। सूचना मिलने पर राजा ने भिखारी को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया। उसने राजा से पूछा, ‘कहिए बड़े भाई! आपके क्या हालचाल हैं?’ राजा ने मुस्कराकर कहा, ‘मैं तो आनंद में हूं। आप कैसे हैं?’ भिखारी बोला,  ‘मैं जरा संकट में हूं। जिस महल में रहता हूं, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे बत्तीस नौकर थे, वे भी एक एक कर चले गए। पांचों रानियां भी वृद्ध हो गईं। यह सुनकर राजा ने भिखारी को सौ रुपए देने का आदेश दिया। भिखारी ने सौ रुपए कम बताए, तो राजा ने कहा, ‘इस बार राज्य में सूखा पड़ा है।’

तब भिखारी बोला, ‘मेरे साथ सात समंदर पार चलिए। वहां सोने की खदानें हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा। मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।’ अब राजा ने भिखारी को एक हजार रुपए देने का आदेश दिया। भिखारी के जाने के बाद राजा बोला, ‘भिखारी बुद्धिमान था। भाग्य के दो पहलू होते हैं राजा व रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा। जर्जर महल से आशय उसके वृद्ध शरीर से था, बत्तीस नौकर दांत और पांच रानियां पंचेंद्रीय हैं। समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि, राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा खजाना सूख गया, इसलिए मैं उसे सौ रुपए दे रहा हूं। उसकी बुद्धिमानी देखकर मैंने उसे हजार रुपए दिए और कल मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूंगा।’

कई बार अति सामान्य लगने वाले लोग भीतर से बहुत गहन गम्भीर और कुशल होते हैं, इसलिए व्यक्ति की परख उसके बाह्य रहन-सहन से नहीं, बल्कि वैचारिक क्षमता और चातुर्य भरे आचरण से करनी चाहिए।


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