‘हिंसा’ चाहे कितने ही उचित कारणों से की जाय कहलाती ‘हिंसा’ ही है।
उसका किसी भी काल, कारण, स्थिति, के कारण ‘अहिंसा’ में परिवर्तन नहीं हो
जाता। वैसे तो प्रतिकार या आत्मरक्षा में हिंसा का हो जाना सम्भव है, तब
भी वह विवशता में की गई ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। ऐसी हिंसा के लाख अवश्यंभावी
कारण जता कर भी उसे ‘अहिंसा’ रूप में स्थापित नहीं जा सकता। प्रतिरक्षात्मक
हिंसा को भी सर्वसामान्य सहज बनाया भी नहीं जाना चाहिए, अन्यथा अनियंत्रित
अराजकाता ही फैल जाएगी। इस तरह तो प्रतिरक्षा या प्रतिशोध को आगे कर
प्रत्येक व्यक्ति हिंसा में रत रहने लगेगा और उसे अभिमान पूर्वक 'अहिंसा'
कहने लगेगा।
विधि-नियमानुसार भी अभियोग में, आत्मरक्षार्थ
हिंसा हो जाने पर मात्र अपराध की तीव्रता कम होती है, समूचा अपराध ही
सुकृत्य में नहीं बदल जाता न ही उस कृत्य को अहिंसा स्वरूप स्वीकार किया
जाता है। कानून किसी को भी दंडित कर देने की जनसामान्य को अनुमति नहीं
देता, चाहे दंड देना कितना भी न्यायसंगत हो। अदालती भाषा में इसे ‘कानून
हाथ में लेना’ कहते है। अन्यथा लोग स्वयं न्यायाधीश बन, प्रतिरक्षार्थ एक
दूसरे को दंडित ही करते ही रहेंगे। और बाकी जो बच जाय उन्हें प्रतिशोध में
दंडित करेंगे। इस तरह तो हिंसा का ही राज स्थापित हो जाएगा। इसीलिए
अत्याचार और अन्याय के बाद भी प्रतिशोध में दंडित करने का अधिकार अत्याचार
भोगी को भी नहीं दिया गया है। हिंसक विचारधारा और हिंसा की यह व्यवस्था
सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं होती।
इसका भी कारण है सभी
तरह के कारणों कारकों पर समुचित विचार करने के बाद ही अपराध निश्चित किया
जाता है। प्रतिरक्षा में हिंसा अपवाद स्वरूप है प्रतिरक्षात्मक हिंसा से
पहले भी अन्य सभी विकल्पों पर विचार किया जाता है। यह सुनिश्चित करने के
लिए ही न्यायालय व्यवस्था होती है। अन्यथा सामन्य जन द्वारा तो जल्दबाजी
आवेश क्रोध आदि वश निरपराधी की हिंसा हो सकती है। धैर्य, सहनशीलता या समता
हमेशा विवेक को सक्रिय करने के उद्देश्य से ही होती है।
पालतू
नेवले और माँ की वह बोध-कथा है जिसमें सोए बच्चे को बचाने के लिए नेवला
सांप से लडता है और उसको मार देता है, घड़ा भरकर घर आते ही द्वार पर मां
नेवले के मुँह में रक्त देखकर निर्णय कर लेती है कि इसने बच्चे को काट खाया
है। आवेश में नेवले पर घड़ा गिराकर मार देती है किन्तु जब भीतर जाकर देखती
है कि बच्चा तो सुख की निंद सो रहा है और पास ही साँप मरा पड़ा है। उसे होश
आता है, नेवला अपराधी नहीं रक्षक था। अब पश्चाताप ही शेष था। हिंसा तो हो
चुकी। नेवला जान से जा चुका।
इसीलिए न्यायालयों का अलिखित
नियम होता है कि भले 100 अपराधी बच जाय, एक निरपराधी को सजा नहीं होनी
चाहिए। क्योंकि सुसंस्कृत मानव जानता है जीवन अमूल्य है। एक बार जान जाने
के बाद किसी को जीवित नहीं किया जा सकता।
गौतम बुद्ध का एक दृष्टांत है सहनशीलता में निडरता के लिए भी और जीवन के मूल्य (अहिंसा) के लिए भी।
अंगुलिमाल
नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उंगलियां काट लेता
था और उनकी माला पहनता था। इसी से उसका यह नाम पड़ा था। आदमियों को लूट
लेना, उनकी जान ले लेना, उसके बाएं हाथ का खेल था। लोग उससे डरते थे। उसका
नाम सुनते ही उनके प्राण सूख जाते थे।
संयोग से एक बार
भगवान बुद्ध उपदेश देते हुए उधर आ निकले। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि वह
वहां से चले जायं। अंगुलिमाल ऐसा डाकू है, जो किसी के आगे नहीं झुकता।
बुद्ध
ने लोगों की बात सुनी,पर उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वह बेधड़क वहां
घूमने लगे।जब अंगुलिमाल को इसका पता चला तो वह झुंझलाकर बुद्ध के पास आया।
वह उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन जब उसने बुद्ध को मुस्कराकर प्यार से
उसका स्वागत करते देखा तो उसका पत्थर का दिल कुछ मुलायम हो गया।
बुद्ध ने उससे कहा, "क्यों भाई, सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड़ लाओगे?"
अंगुलिमाल के लिएयह काम क्या मुश्किल था! वह दौड़ कर गया और जरा-सी देर में पत्ते तोड़कर ले आया।
"बुद्ध ने कहा, अब एक काम करो। जहां से इन पत्तों को तोड़कर लाये हो, वहीं इन्हें लगा आओ।"
अंगुलिमाल बोला, "यह कैसे हो सकता?"
बुद्ध ने कहा, "भैया! जब जानते हो कि टूटा जुड़ता नहीं तो फिर तोड़ने का काम क्यों करते हो?"
इतना सुनते ही अंगुलिमाल को बोध हो गया और उसने सदैव के लिए उस हिंसा और आतंक को त्याग दिया।
सही
भी है किसी को पुनः जीवन देने का सामर्थ्य नहीं तो आपको किसी का जीवन हरने
का कोई अधिकार नहीं। आज फांसी की न्यायिक सजा का भी विरोध हो रहा है। कारण
वही है एक तो सजा सुधार के वांछित परिणाम नहीं देती और दूसरा जीवन ले लेने
के बाद तो कुछ भी शेष नहीं रहता न सजा न सुधार।
एक सामान्य सी सजा के भी असंख्य विपरित परिणाम होते है। ऐसे में चुकवश
सजा यदि निरपराधी को दे दी जाय तो परिणाम और भी भयंकर हो सकते है। सम्भावित
दुष्परिणामों के कारण अहिंसा का महत्व अनेक गुना बढ़ जाता है। किसी भी तरह
की हिंसा के पिछे कितने ही उचित कारणों हो, हिंसा प्रतिशोध के एक अंतहीन
चक्र को जन्म देती है। प्रतिरक्षा में भी जो सुरक्षा भाव निहित है उसका मूल
उद्देश्य तो शान्तिपूर्ण जीवन ही है। जिस अंतहीन चक्र से अशान्ति और
संताप उत्पन्न हो और समाधान स्थिर न हो तो क्या लाभ?
प्रतिरक्षा
में हिंसा हमेशा एक ‘विवशता’ होती है, यह विवशता भी गर्भित ही रहनी भी
चाहिए। इस प्रकार की हिंसा का सामान्ययीकरण व सार्वजनिक करना हिंसा को
प्रोत्साहन देना है। ऐसी हिंसा की संभावना एक अपवाद होती है। सभ्य मानवों
में अन्य उपाय के न होने पर ही सम्भावनाएं बनती है। अतः विवशता की हिंसा को
अनावश्यक रूप से जरूरी नियम की तरह प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। और न
ही इसे ‘अहिंसा’ नाम देकर भ्रम मण्डित किया जाना चाहिए। यदि इस प्रकार की
हिंसा का सेवन हो भी जाय तो निष्ठापूर्वक हिंसा को हिंसा ही कहना/मानना
चाहिए उसे वक्रता से अहिंसा में नहीं खपाया जाना चाहिए।
हिंसा नाम भवेद् धर्मो न भूतो न भविष्यति। (पूर्व मीमांसा)
अर्थात् :- हिंसा में धर्म माना जाए, ऐसा न कभी भूतकाल में था, न कभी भविष्य में होगा।
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