21 अगस्त 2012

अलिप्त

मिथिला में एक बड़े ही धर्मात्मा एवं ज्ञानी राजा थे। राजकाज के विभिन्न कार्य और राजमहल के भारी ठाट-बाट के उपरांत भी वे उसमें लिप्त नहीं थे। राजॠषि की यह ख्याति सुनकर एक साधु उनसे मिलने आया। राजा ने साधु का हृदय से स्वागत सम्मान किया और दरबार में आने का कारण पूछा।

साधु ने कहा, "राजन्! सुना है कि इतने बड़े महल में आमोद प्रमोद के साधनों के बीच रहते हुए भी आप इनके सुखोपभोग से अलिप्त रहते हैं, ऐसा कैसे कर पाते है? मैंने वर्षों हिमालय में तपस्या की, अनेक तीर्थों की यात्राएं कीं, फिर भी मन को इतना नहीं साध सका। जबकि संसार के श्रेष्ठतम सुख साधन व समृद्धि के सहज उपलब्ध रहते यह बात आपने कैसे साध ली?"

राजा ने उत्तर दिया, "महात्माजी! आप असमय में आए हैं। यह मेरे काम का समय है। आपके सवाल का जवाब मैं थोड़ी देर बाद ही दे पाउँगा। तब तक आप इस राजमहल का भ्रमण क्यों नहीं कर लेते? आप इस दीये को लेकर पूरा महल देख आईए। एक बात का विशेष ध्यान रखें कि दीया बुझने न पाए, अन्यथा आप रास्ता भटक जाएंगे।"

साधु दीया लेकर राजमहल को देखने चल दिए। कईं घन्टे बाद जब वे लौटे तो राजा ने मुस्करा कर पूछा, "कहिए, महात्मन् ! मेरा महल कैसा लगा?"

साधु बोला, "राजन्! मैं आपके महल के हर भाग में गया। सब कुछ देखा, किन्तु फिर भी वह अनदेखा रह गया।"

राजा ने पूछा, "क्यों?"

साधु ने कहा, "राजन्! मेरा सारा ध्यान इस दीये पर लगा रहा कि कहीं यह बुझ न जाय!"

राजा ने उत्तर दिया, "महात्माजी! इतना बड़ा राज चलाते हुए मेरे साथ भी यही होता है। मेरा सारा ध्यान अपनी आत्मा पर लगा रहता है। कहीं मेरे आत्मज्ञान की ज्योति मंद न हो जाय। किसी अनुचित कर्म की तमस मुझे घेर न ले, अन्यथा मैं मार्ग से भटक जाउंगा। चलते-फिरते, उठते-बैठते, कार्य करते यह बात स्मृति में रहती है। मेरा ध्यान चेतन रहता है कि सुखोपभोग के प्रलोभन में कहीं मै अपने आत्म को मलीन न कर दूँ। इसलिए साक्षी भाव से सारे कर्तव्य निभाते हुए भी संसार के मोहजाल से अलिप्त रह पाता हूँ।

साधु राजा के चरणों में नत मस्तक हो गया। आज उसे नया ज्ञान प्राप्त हुआ था, आत्मा की सतत जागृति, प्रतिपल स्मृति ही अलिप्त रहने में सहायक है।

17 अगस्त 2012

आत्मरक्षा में की गई हिंसा, हिंसा नहीं होती ????

‘हिंसा’ चाहे कितने ही उचित कारणों से की जाय कहलाती ‘हिंसा’ ही है। उसका किसी भी काल, कारण, स्थिति, के कारण ‘अहिंसा’ में परिवर्तन नहीं हो जाता। वैसे तो प्रतिकार या आत्मरक्षा में हिंसा का हो जाना सम्भव है,  तब भी वह विवशता में की गई ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। ऐसी हिंसा के लाख अवश्यंभावी कारण जता कर भी उसे ‘अहिंसा’ रूप में स्थापित नहीं जा सकता। प्रतिरक्षात्मक हिंसा को भी सर्वसामान्य सहज बनाया भी नहीं जाना चाहिए, अन्यथा अनियंत्रित अराजकाता ही फैल जाएगी। इस तरह तो प्रतिरक्षा या प्रतिशोध को आगे कर प्रत्येक व्यक्ति हिंसा में रत रहने लगेगा और उसे अभिमान पूर्वक 'अहिंसा' कहने लगेगा।

विधि-नियमानुसार भी अभियोग में, आत्मरक्षार्थ हिंसा हो जाने पर मात्र अपराध की तीव्रता कम होती है, समूचा अपराध ही सुकृत्य में नहीं बदल जाता न ही उस कृत्य को अहिंसा स्वरूप स्वीकार किया जाता है। कानून किसी को भी दंडित कर देने की जनसामान्य को  अनुमति नहीं देता, चाहे दंड देना कितना भी न्यायसंगत हो। अदालती भाषा में इसे ‘कानून हाथ में लेना’ कहते है। अन्यथा लोग स्वयं न्यायाधीश बन, प्रतिरक्षार्थ एक दूसरे को दंडित ही करते ही रहेंगे। और बाकी जो बच जाय उन्हें प्रतिशोध में दंडित करेंगे। इस तरह तो हिंसा का ही राज स्थापित हो जाएगा। इसीलिए अत्याचार और अन्याय के बाद भी प्रतिशोध में दंडित करने का अधिकार अत्याचार भोगी को भी नहीं दिया गया है। हिंसक विचारधारा और हिंसा की यह व्यवस्था सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं होती।

इसका भी कारण है सभी तरह के कारणों कारकों पर समुचित विचार करने के बाद ही अपराध निश्चित किया जाता है। प्रतिरक्षा में हिंसा अपवाद स्वरूप है प्रतिरक्षात्मक हिंसा से पहले भी अन्य सभी विकल्पों पर विचार किया जाता है। यह सुनिश्चित करने के लिए ही  न्यायालय व्यवस्था होती है। अन्यथा सामन्य जन द्वारा तो जल्दबाजी आवेश क्रोध आदि वश निरपराधी की हिंसा हो सकती है। धैर्य, सहनशीलता या समता हमेशा विवेक को सक्रिय करने के उद्देश्य से ही होती है।

पालतू नेवले और माँ की वह बोध-कथा है जिसमें सोए बच्चे को बचाने के लिए नेवला सांप से लडता है और उसको मार देता है, घड़ा भरकर घर आते ही द्वार पर मां नेवले के मुँह में रक्त देखकर निर्णय कर लेती है कि इसने बच्चे को काट खाया है। आवेश में नेवले पर घड़ा गिराकर मार देती है किन्तु जब भीतर जाकर देखती है कि बच्चा तो सुख की निंद सो रहा है और पास ही साँप मरा पड़ा है। उसे होश आता है, नेवला अपराधी नहीं रक्षक था। अब पश्चाताप ही शेष था। हिंसा तो हो चुकी। नेवला जान से जा चुका।

इसीलिए न्यायालयों का अलिखित नियम होता है कि भले 100 अपराधी बच जाय, एक निरपराधी को सजा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि सुसंस्कृत मानव जानता है जीवन अमूल्य है। एक बार जान जाने के बाद किसी को जीवित नहीं किया जा सकता।

गौतम बुद्ध का एक दृष्टांत है सहनशीलता में निडरता के लिए भी और जीवन के मूल्य (अहिंसा) के लिए भी।

अंगुलिमाल नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उंगलियां काट लेता था और उनकी माला पहनता था। इसी से उसका यह नाम पड़ा था। आदमियों को लूट लेना, उनकी जान ले लेना, उसके बाएं हाथ का खेल था। लोग उससे डरते थे। उसका नाम सुनते ही उनके प्राण सूख जाते थे।

संयोग से एक बार भगवान बुद्ध उपदेश देते हुए उधर आ निकले। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि वह वहां से चले जायं। अंगुलिमाल ऐसा डाकू है, जो किसी के आगे नहीं झुकता।

बुद्ध ने लोगों की बात सुनी,पर उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वह बेधड़क वहां घूमने लगे।जब अंगुलिमाल को इसका पता चला तो वह झुंझलाकर बुद्ध के पास आया। वह उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन जब उसने बुद्ध को मुस्कराकर प्यार से उसका स्वागत करते देखा तो उसका पत्थर का दिल कुछ मुलायम हो गया।

बुद्ध ने उससे कहा, "क्यों भाई, सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड़ लाओगे?"

अंगुलिमाल के लिएयह काम क्या मुश्किल था! वह दौड़ कर गया और जरा-सी देर में पत्ते तोड़कर ले आया।

"बुद्ध ने कहा, अब एक काम करो। जहां से इन पत्तों को तोड़कर लाये हो, वहीं इन्हें लगा आओ।"

अंगुलिमाल बोला, "यह कैसे हो सकता?"

बुद्ध ने कहा, "भैया! जब जानते हो कि टूटा जुड़ता नहीं तो फिर तोड़ने का काम क्यों करते हो?"

इतना सुनते ही अंगुलिमाल को बोध हो गया और उसने सदैव के लिए उस हिंसा और आतंक को त्याग दिया।

सही भी है किसी को पुनः जीवन देने का सामर्थ्य नहीं तो आपको किसी का जीवन हरने का कोई अधिकार नहीं। आज फांसी की न्यायिक सजा का भी विरोध हो रहा है। कारण वही है एक तो सजा सुधार के वांछित परिणाम नहीं देती और दूसरा जीवन ले लेने के बाद तो कुछ भी शेष नहीं रहता न सजा न सुधार।

एक सामान्य सी सजा के भी असंख्य विपरित परिणाम होते है। ऐसे में चुकवश सजा यदि निरपराधी को दे दी जाय तो परिणाम और भी भयंकर हो सकते है। सम्भावित दुष्परिणामों के कारण अहिंसा का महत्व अनेक गुना बढ़ जाता है। किसी भी तरह की हिंसा के पिछे कितने ही उचित कारणों हो, हिंसा प्रतिशोध के एक अंतहीन चक्र को जन्म देती है। प्रतिरक्षा में भी जो सुरक्षा भाव निहित है उसका मूल उद्देश्य तो शान्तिपूर्ण जीवन ही है। जिस अंतहीन चक्र से अशान्ति और संताप  उत्पन्न हो और समाधान स्थिर न हो तो क्या लाभ?

प्रतिरक्षा में हिंसा हमेशा एक ‘विवशता’ होती है, यह विवशता भी गर्भित ही रहनी भी चाहिए। इस प्रकार की हिंसा का सामान्ययीकरण व सार्वजनिक करना हिंसा को प्रोत्साहन देना है। ऐसी हिंसा की संभावना एक अपवाद होती है। सभ्य मानवों में अन्य उपाय के न होने पर ही सम्भावनाएं बनती है। अतः विवशता की हिंसा को अनावश्यक रूप से जरूरी नियम की तरह प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। और न ही इसे ‘अहिंसा’ नाम देकर भ्रम मण्डित किया जाना चाहिए। यदि इस प्रकार की हिंसा का सेवन हो भी जाय तो निष्ठापूर्वक हिंसा को हिंसा ही कहना/मानना चाहिए उसे वक्रता से अहिंसा में नहीं खपाया जाना चाहिए।
  • हिंसा नाम भवेद् धर्मो न भूतो न भविष्यति।  (पूर्व मीमांसा) 
    अर्थात् :- हिंसा में धर्म माना जाए, ऐसा न कभी भूतकाल में था, न कभी भविष्य में होगा।


अन्य अहिंसा सूत्र......
हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।
हिंसा का बीज़
धुंध में उगता अहिंसा का सूरज
अहिंसा का आलोक
अहिंसा की सार्वभौम शक्ति
सहिष्णुता

15 अगस्त 2012

बुराई और भलाई

उभरती बुराई ने दबती-सी अच्छाई से कहा, "कुछ भी हो, लाख मतभेद हों, है तो तू मेरी सहेली हो। मुझे अपने सामने तेरा दबना अच्छा नहीं लगता। आ, अलग खड़ी न हो, मुझ में मिल जा, मैं तुझे भी अपने साथ बढ़ा लूंगी, समाज में फैला लूंगी।"

भलाई ने शांति से उत्तर दिया, "तुम्हारी हमदर्दी के लिए धन्यवाद, पर रहना मुझे तुमसे अलग ही है।"

"क्यों?" आश्चर्यभरी अप्रसन्नता से बुराई ने पूछा।

"बात यह है कि मैं तुमसे मिल जाऊं तो फिर मैं कहां रहूंगी, तब तो तुम-ही-तुम होगी सब जगह।" अच्छाई ने और भी शान्त होकर उत्तर दिया।

गुस्से से उफन कर बुराई ने अपनी झाड़ी अच्छाई के चारों ओर जकड़ कर फैला दी और फुंकार कर कहा, "ले, भोग मेरे निमन्त्रण को ठुकराने का नतीजा! अब पड़ी रह मिट्टी में मुंह दुबकाये! दुनिया में तेरे फैलने का अब कोई मार्ग नहीं।"

अच्छाई ने अपने नन्हे अंकुर की आंख से जहाँ भी झांका, उसे बुराई की जकड़बंध झाड़ी के तेज कांटे, भाले के समान तने हुए दिखाई दिए। सचमुच आगे कदम भर सरकाने की भी जगह न थी।

बुराई का अट्टहास चारों ओर गूंज गया। परिस्थितियां निश्चय ही प्रतिकूल थीं। फिर भी पूरे आत्म्-विश्वास से अच्छाई ने कहा, "तुम्हारा फैलाव आजकल बहुत व्यापक है, बहन! जानती हूं इस फैलाव से अपने अस्तित्व को बचाकर मुझे वृद्धि और प्रसार पाने में पूरा संघर्ष करना पड़ेगा, पर तुम यह न भूलना कि कांटे-कांटे के बीच से गुजर कर जब मैं तुम्हारी झाड़ी के ऊपर पहुंचूंगी तो मेरे कोमल फूलों की महक चारों ओर फैल जायगी और सभी की दृष्टि मोहक फूलों पर जमेगी, तब तेरा अस्तित्व ओझल ही रहेगा। अन्ततः यह जानना भी कठिन होगा कि तुम हो कहाँ।"

व्यंग्य की शेखी से इठलाकर बुराई ने कहा, "दिल के बहलाने को यह ख्याल अच्छा है।"

गहन सन्तुलन में अपने को समेटकर अच्छाई ने कहा, "तुम हंसना चाहो, तो जरुर हंसो, मुझे आपत्ति नहीं, पर जीवन के इस सत्य को कृत्रिम हंसी में झुठलाया नहीं जा सकता कि तुम्हारे प्रसार और प्रशंसकों की भी एक सीमा है, क्योंकि उस अति की सीमा तक तुम्हारे पहुंचते-न-पहुंचते तुम्हारे सहायकों और अंगरक्षकों का ही दम घुटने लगता है। जबकि इसके विपरित मेरे फैलाव की कोई सीमा ही प्रकृति ने नहीं बांधी, बुराई बहन!!"

बुराई गंभीर हो गई और उसे लगा कि उसके काँटों की शक्ति स्वयंमेव पहले से कम होती जा रही है और अच्छाई का अंकुर तेजी से वृद्धि पा रहा है।

9 अगस्त 2012

समता की धोबी पछाड़

एक नदी तट पर स्थित बड़ी सी शिला पर एक महात्मा बैठे हुए थे। वहाँ एक धोबी आता है किनारे पर वही मात्र शिला थी जहां वह रोज कपड़े धोता था। उसने शिला पर महात्मा जी को बैठे देखा तो सोचा- अभी उठ जाएंगे, थोड़ा इन्तजार कर लेता हूँ अपना काम बाद में कर लूंगा। एक घंटा हुआ, दो घंटे हुए फिर भी महात्मा उठे नहीं अतः धोबी नें हाथ जोड़कर विनय पूर्वक निवेदन किया कि – महात्मन् यह मेरे कपड़े धोने का स्थान है आप कहीं अन्यत्र बिराजें तो मै अपना कार्य निपटा लूं। महात्मा जी वहाँ से उठकर थोड़ी दूर जाकर बैठ गए।

धोबी नें कपड़े धोने शुरू किए, पछाड़ पछाड़ कर कपड़े धोने की क्रिया में कुछ छींटे उछल कर महात्मा जी पर गिरने लगे। महात्मा जी को क्रोध आया, वे धोबी को गालियाँ देने लगे। उससे भी शान्ति न मिली तो पास रखा धोबी का डंडा उठाकर उसे ही मारने लगे। सांप उपर से कोमल मुलायम दिखता है किन्तु पूंछ दबने पर ही असलियत की पहचान होती है। महात्मा को क्रोधित देख धोबी ने सोचा अवश्य ही मुझ से कोई अपराध हुआ है। अतः वह हाथ जोड़ कर महात्मा से माफी मांगने लगा। महात्मा ने कहा - दुष्ट तुझ में शिष्टाचार तो है ही नहीं, देखता नहीं तूं गंदे छींटे मुझ पर उड़ा रहा है? धोबी ने कहा - महाराज शान्त हो जाएं, मुझ गंवार से चुक हो गई, लोगों के गंदे कपड़े धोते धोते मेरा ध्यान ही न रहा, क्षमा कर दें। धोबी का काम पूर्ण हो चुका था, साफ कपडे समेटे और महात्मा जी से पुनः क्षमा मांगते हुए लौट गया। महात्मा नें देखा धोबी वाली उस शिला से निकला गंदला पानी मिट्टी के सम्पर्क से स्वच्छ और निर्मल होकर पुनः सरिता के शुभ्र प्रवाह में लुप्त हो रहा था, लेकिन महात्मा के अपने शुभ्र वस्त्रों में तीव्र उमस और सीलन भरी बदबू बस गई थी।

कौन धोबी कौन महात्मा?

यथार्थ में धोबी ही असली महात्मा था, संयत रह कर समता भाव से वह लोगों के दाग़ दूर करता था।

15 जुलाई 2012

शान्ति की खोज

हम क्यों लिखते है?

- ताकि पाठक हमें ज्यादा से ज्यादा पढ़ें।

 

पाठक हमें क्यों पढ़े? 

- ताकि पाठको को नवतर चिंतन दृष्टि मिले।

 

पाठको को नई चिंतन दृष्टि का क्या फायदा?

- एक निष्कर्ष युक्त सफलतापेक्षी दृष्टिकोण से अपना मार्ग चयन कर सके।

 

सही मार्ग का चयन क्यों करे?

- यदि अनुभव और मंथन युक्त दिशा निर्देश उपलब्ध हो जाय तो शान्तिमय संतोषप्रद जीवन लक्ष्य को सिद्ध कर सके।

 

कोई भी जो दार्शनिक, लेखक, वक्ता हो उनके लेख, कथा, कविता, सूचना, जानकारी या मनोरंजन सभी का एक ही चरम लक्ष्य है। अपना अनुभवजन्य ज्ञान बांटकर लोगों को खुशी, संतोष, सुख-शान्ति के प्रयास की सहज दृष्टि देना। बेशक सभी अपने अपने स्तर पर बुद्धिमान ही होते है। तब भी कोई कितना भी विद्वान हो, किन्तु सर्वाधिक सहज सफल मार्ग के दिशानिर्देश की सभी को आकांक्षा होती है।

 

यह लेखन की अघोषित जिम्मेदारी होती है। ब्लॉगिंग में लेखन खुशी हर्ष व आनन्द फैलाने के उद्देश्य से होता है और होना भी चाहिए। अधिकांश पाठक अपने रोजमर्रा के तनावों से मुक्त होने और प्रसन्नता के उपाय करने आते है। लेकिन हो क्या रहा हैं? जिनके पास दिशानिर्देश की जिम्मेदारी है वे ही दिशाहीन दृष्टिकोण रखते है। शान्ति और संतुष्टि की चाह लेकर आए लेखक-पाठक, उलट हताशा में डूब जाते है। घुटन से मुक्ति के आकांक्षी, विवादों में घिर कर विषादग्रस्त हो जाते है। अभी पिछले दिनों एक शोध से जानकारी हुई कि ब्लॉग सोशल साईट आदि लोगो में अधैर्य और हताशा को जन्म दे रहे है।

 

यह सही है कि जगत में अत्याचार, अनाचार, अन्याय का बोलबाला है किन्तु विरोध स्वरूप भी लोगों में द्वेष आक्रोश और प्रतिशोध के भाव भरना उस अन्याय का निराकरण नहीं है। आक्रोश सदाचारियों में तो दुष्कृत्यों के प्रति अरूचि घृणा आदि  पैदा कर सकते है पर अनाचारियों में किंचित भी आतंक उत्पन्न नहीं कर पाते। द्वेष, हिंसा, आक्रोश और बदला समस्या का समाधान नहीं देते, उलट हमारे मन मस्तिष्क में इन बुरे भावों के अवशेष अंकित कर ढ़ेर सारा विषाद छोड जाते है।

 

 

मैं समझता हूँ मशीनी जीवन यात्रा और प्रतिस्पर्द्धात्मक जीवन के तमाम तनाव झेलते पाठकों के मन में द्वेष, धृणा, विवाद, हिंसा, आक्रोश, प्रतिशोध, और अन्ततः विषाद पैदा करे ऐसी सामग्री से भरपूर बचा जाना चाहिए।

12 जुलाई 2012

सद्बुद्धि

पुराने समय की बात है एक सेठ नें न्याति-भोज का आयोजन किया। सभी गणमान्य और आमन्त्रित अतिथि आ चुके थे, रसोई तैयार हो रही थी इतने में सेठ नें देखा कि भोजन पंडाल में एक तरफ एक बिल्ली मरी पडी थी। सेठ नें सोचा यह बात सभी को पता चली तो कोई भोजन ही ग्रहण नहीं कर पाएगा। अब इस समय उसे बाहर फिकवाने की व्यवस्था करना भी सम्भव न था। अतः सेठ नें पास पडी कड़ाई उठा कर उस बिल्ली को ढ़क दिया। सेठ की इस प्रक्रिया को निकट खडे उनके पुत्र के अलावा किसी ने नहीं देखा। समारम्भ सफल रहा।
 
कालान्तर में सेठ स्वर्ग सिधारे, उन्ही के पुण्यार्थ उनके पुत्र ने मृत्यु भोज का आयोजन किया। जब सब तैयारियों के साथ भोजन तैयार हो गया तो वह युवक इधर उधर कुछ खोजने लगा। लोगों ने पूछा कि क्या खोज रहे हो? तो उस युवक नें कहा – बाकी सभी नेग तो पूरे हो गए है बस एक मरी हुई बिल्ली मिल जाय तो कड़ाई से ढक दूँ। लोगों ने कहा - यहाँ मरी बिल्ली का क्या काम? युवक नें कहा – मेरे पिताजी नें अमुक जीमनवार में मरी बिल्ली को कड़ाई से ढ़क रखा था। वह व्यवस्था हो जाय तो भोज समस्त रीति-नीति से सम्पन्न हो। 
 
लोगों को बात समझ आ गई, उन्होंने कहा – 'तुम्हारे पिता तो समझदार थे उन्होने अवसर के अनुकूल जो उचित था किया पर तुम तो निरे बेवकूफ हो जो बिना सोचे समझे उसे दोहराना चाहते हो।' 
 
कईं रूढियों और परम्पराओं का कुछ ऐसा ही है। बडों द्वारा परिस्थिति विशेष में समझदारी पूर्वक किए गए कार्यों को अगली पीढ़ी मूढ़ता से परम्परा के नाम निर्वाह करने लगती है और बिना सोचे समझे अविवेक पूर्वक प्रतीको का अंधानुकरण करने लग जाती है। मात्र इसलिए - “क्योंकि मेरे बाप-दादा ने ऐसा किया था” कुरितियाँ इसी प्रकार जन्म लेती है। कालन्तर से अंधानुकरण की मूर्खता ढ़कने के उद्देश्य से कारण और वैज्ञानिकता के कुतर्क गढ़े जाते है। फटे पर पैबंद की तरह, अन्ततः पैबंद स्वयं अपनी विचित्रता की कहानी कहते है।

17 जून 2012

ब्लॉग-जगत और पात्र का आधारभूत तल्ला

एक राजकुमार बहुत ही चंचल और नट्खट था। दासियों से चुहलबाजी करना और कर्मचारियों से गाली गलोच और तुच्छकार भरा वाणीव्यवहार उसका प्रिय शगल था। राजा नें उसे युवराज बनाया तब भी उसकी चंचलता कम न हुई। राजा ने सोचा – कल को जब यह राजा बनेगा, निश्चित ही यह प्रजापालन निति-नियम से नहीं करेगा। सोचने लगा युवराज की इन बुरी आदतों से छुटकारा कैसे हो? उसने एक निर्णय किया और उसकी सेवा में रत एक दासी को आदेश दिया कि युवराज दिन भर में जो भी वचन बोले दुर्व्यवहार करे उसे लिखकर शाम को मेरे सामने प्रस्तुत किया जाय। अब राजकुमार जो भी बोलता, पूर्व में ही विचार करता कि मेरे वचन रिकार्ड किए जा रहे हैं, परिणाम स्वरूप वह वाणी-व्यवहार में अतिरिक्त सावधान हो गया। कुछ ही दिनों में उसकी वाणी और व्यवहार दोनों शालीन और कुलीन हो गए। 

आज ब्लॉग-जगत में लेख व टिप्पणियों के माध्यम से जो भी हम अभिव्यक्त हो रहे है। सब कुछ रिकार्ड पर जा रहा है जो हमारे एक व्यक्तित्व का निरन्तर निर्माण कर रहा है। जिसका प्रभाव हमारे जीवन पर पडना ही है। पर हम इस रिकार्ड से सजग नहीं है। हम समझते है यह मनमौज का मनोरंजन माध्यम है। दो घडी मौज ली, अपने मान-अभिमान को पोषा और खेल खत्म!! किन्तु इसके जीवन पर पडते असर से हम बेदरकार है। अपने व्यक्तित्व पर जरा से आरोप पर हमारा इगो चित्कार कर उठता है और प्रतिक्रियात्मक तंज के साथ साथ, अपना मान बचाने के लिए हम हर अच्छा बुरा उपाय कर गुजरते है। किन्तु हमारे ही कटु-शब्दों से, ओछी वाणी से स्वयं हमारा 'मान' ही घायल और क्षत-विक्षित हो जाता है, हम नहीं देखते कि व्यक्तित्व के मान को अखण्ड रखने के मिथ्या प्रयासों में, हमारा वही व्यक्तित्व विकृत प्रतिबिम्बित होता जा रहा है जिसका मद के कारण हमें रत्तिभर भी भान नहीं रहता। मान-मद में चूर हम जिस डिब्बे में 'सम्मान' इक्कट्ठा करने का भ्रमित प्रयास कर रहे है, यह भी नहीं देखते कि उस डिब्बे का तो तल्ला है ही नहीं है। सारा का सारा, स्वमान, सरे राह बिखर कर धूल में मिल रहा है। जिस पात्र के आधारभूत तल्ला नहीं होता, उस पात्र में सम्मान भला कैसे ठहरेगा? चरित्र के प्रति सजग वाणी-व्यवहार भरा व्यक्तित्व ही पात्र का आधारभूत तल्ला है।

8 जून 2012

एक चिट्ठा-चर्चा ऐसी भी… :)


'ब्लॉगशीर्षक' और उसकी वर्तमान 'पोस्ट शीर्षक' में गजब की तुक जम रही है। लिंक पोस्ट पर जाने से पहले एक नज़र अवलोकन करके तो देखिए………………………………














कडुवा सच : इत्तफाकन ...

न यह व्यंग्य है न परिहास,  बस पठन-पाठन के बीच कुछ क्षण आनन्द के जुटा लेना मक़सद है।

18 मई 2012

लेखकीय स्वाभिमान के निहितार्थ


हम प्रायः सोचते है विचार या मुद्दे पर चर्चा करते हुए विवाद अक्सर व्यक्तिगत क्यों हो जाता है। किन्तु हम भूल जाते है कि जिसे हम लेखन का स्वाभिमान कहते है वह व्यक्तिगत अहंकार ही होता है। इसी कारण स्वाभिमान की ओट में छिपा व्यक्तिगत अहंकार पहचान लिया जाता है और उस पर होती चर्चा स्वतः व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप का रूप ग्रहण कर लेती है। अभिमानी व्यक्ति निरर्थक और उपेक्षणीय बातों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अनावश्यक परिश्रम से भी अन्तत: कलह व झगड़ा ही उत्पन्न करता हैं। प्रायः ब्लॉगर/लेखक भी अपने लेखकीय स्वाभीमान की ओट में अहंकार का सेवन और पोषण ही करते है।

बल का दम्भ बुरा है, धन का दम्भ बहुत बुरा किन्तु ज्ञान का दम्भ तो अक्षम्य अपराध है।

हमारी व्यक्तिगत ‘मान’ महत्वाकांशाएँ विचार भिन्नता सहन नहीं कर पाती। विचार विरोध को हम अपना मानमर्दन समझते है। इसी से चर्चा अक्सर विवाद का रूप ले लेती है। इतना ही नहीं लेखन पर प्रतिक्रिया करते हुए टिप्पणीकार भी अपनी ‘मान’ महत्वाकांशा के अधीन होकर विचार विरोध की ओट में लेखक के मानखण्डन का ही प्रयास करते देखे जाते है। स्वाभिमान के नाम पर अपना सम्मान बचानें में अनुरक्त सज्जन चिंतन ही नहीं कर पाते कि जिस सम्मान के संरक्षण के लिए वे यह उहापोह कर रहे है उलट इन विवादों के कारण वही सम्मान नष्ट हो जाएगा। सम्मानजनक स्थिति को देखें तो हिंदी ब्लॉग जगत के विवादित मित्रों का प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने है।

जितना भी सम्मान सुरक्षा की ललक में हम उठापटक करेंगे सम्मान उतना ही छिटक कर हमसे दूर चला जाएगा।

मैं यह नहीं कह सकता कि मैं अहंकार से सर्वथा अलिप्त हूँ। यह दंभी दुर्गुण ही महाजिद्दी व हठी है। इसलिए सामान्यतया कम या ज्यादा सभी में पाया जाता है। इतना आसान भी नहीं कि संकल्प लेते ही जादू की तरह यह हमारे चरित्र से गायब हो जाय। किन्तु यह भी इतना ही सही है कि पुरूषार्थ से इस अहंकार का शनै शनै क्षय किया जा सकता है। निरन्तर जागृत अभ्यास आवश्यक है। अभिमान का शमन आपके सम्मान को अक्षय अजर बना सकता है।

निराभिमान गुण, सम्मानजनक चरित्र का एक ऐसा आधार स्तम्भ है जो सुदृढ़ तो होता ही है लम्बे काल तक साथ निभाता है।

28 मार्च 2012

“क्रोध पर नियंत्रण” प्रोग्राम को चलाईए अपने सिस्टम पर तेज - कुछ ट्रिक और टिप्स

पिछले अध्याय में पाठकों नें कहा कि क्रोध बुरी बला है किन्तु इस पर नियंत्रण नही चलता। ‘क्रोध पर नियंत्रण’ एक जटिल और हैवी सॉफ्ट्वेयर है जिसे आपके सिस्टम पर सक्षम होना अनिवार्य है। अगर यह आपके सिस्टम पर स्थापित है तो निश्चित रूप से यह आपकी प्रोफाइल को उत्कृष्ट और अद्यतन बना देता है। किन्तु इस भारी और प्रयोग-कठिन प्रोग्राम को हेंडल करने में वाकई बहुत ही समस्या आती है।

पाठकों की इस समस्या के निवारण हेतु कुछ ‘ट्रिक और टिप्स’ यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे है  आसान सी प्रक्रिया है, अपनी प्रोफाइल में सावधानी व सजगता के साथ मामूली से परिवर्तन कीजिए फिर देखिए ‘क्रोध पर नियंत्रण’ नामक यह प्रोग्राम कैसे तेज काम करता है।

यह मात्र 7 के.बी. का टूल है, आपको अपने HTML (मानवीय सोच व मानसिकता लेखा) में कुछ परिवर्तन करने है। उसे करने के लिए निम्न स्टेप्स को फोलो करें……

1- सर्वप्रथम अपनी प्रोफाइल को स्कैन करें और स्व-निरपेक्ष होकर गुण-दोषों का अध्ययन समीक्षा कर लें। जो आपको आगे चल कर परिवर्तन विकल्प के चुनाव में सहायक सिद्ध होगा। समीक्षा के बाद वर्तमान प्रोफाइल को सुरक्षित सेव करलें ताकि परिवर्तनों में कुछ गड़बड़ या त्रृटि आने की दशा में पुनः अपनी पुरानी प्रोफ़ाइल पर लौटा जा सके।

2- अब अपने प्रोफाइल के HTML कोड-लेख में <शीर्ष>  कोड को ढ़ूंढ़े और उसके ठीक नीचे इस कोड़ को पेस्ट करलें…

<   href="समता”> <प्रतिक्रिया=”0”> <तत्क्षण उबाल गति= “0”> <आवेश अवरोध अवधि= 10 सैकण्ड> <त्वरित विवेक सजगता= सक्रिय> <परिणामो पर चिन्तन=100%> <दृष्टिकोण=समस्त>

3- ध्यान रहे इस कोड को कहीं भी /> बंद नहीं करना है।

4- यह बताना रह गया कि - आपके सिस्टम पर “मिथ्या धारणा ध्वंशक” एंटीवायरस प्रोग्राम सक्षम होना चाहिए। यदि अभी तक यह इन्सटॉल नहीं है तो कर लीजिए, बेहतरीन फायदेमंद यह छोटा सा उपकरण बिलकुल मुफ्त है। इस “मिथ्या धारणा ध्वंशक” एंटीवायरस प्रोग्राम की सहायता से प्रोफाइल HTML में <स्वाभिमान> कोड ढ़ूंढ़े आपको सर्च रिजल्ट में <अहंकार> दिखाई देगा, चौंक गए न? वस्तुतः यह ‘मिथ्या धारणा’ नामक वायरस का कमाल है यह वायरस गुणों के छ्द्म नाम के पिछे दूषणों को स्थापित कर अपना काम करता है। अब यहाँ <अहंकार> हो या <स्वाभिमान> जो भी हो, इसे तत्काल <ॠजुता> कोड से बदल दीजिए, साथ ही इसके ठीक आगे देखिए- उस <स्वाभिमान> को < href=" श्रेष्ठता, दर्प, घमंड”> से लिंक किया गया होगा,और <target="_ ईष्या द्वेष और हिंसा”> होगा। यह वायरस इसी तरह के कुपाथ निर्देशित छद्म लिंक बना देता है। इस कुपाथ की जगह आप  <ॠजुता> कोड को < href=" सहजता सरलता और न्याय”> से  लिंक कर दीजिए वस्तुतः यही इसका प्रमाणिक सुपाथ है। यह परिवर्तन शुरू शुरू में ‘निस्तेज’ से लगने वाले परिणाम दे सकता है पर घबराएं नहीं, <सरलता=__> कोड के तीन स्तर होते है यथा 1<सरलता=समझदारी>2 <सरलता=अबोध>3<सरलता=मूर्खता> यदि वहाँ अबोध या मूर्खता है तो इसे 'समझदारी' पर सैट कर लीजिए। प्रारंभिक आउटपुट अस्पष्ट और विभ्रमदर्शी हो सकते है, तात्कालिक प्रभावो से निश्चल रहते हुए, लगातार दृढ़ संकल्प से प्रयोग करने पर यह सब भी सुगम और 'लोकप्रिय' हो जाते है।

5- अब ठीक उसी तरह <सफल_क्रोध> कोड को ढ़ूंढ़े आपको वहाँ भी फाईंड रिजल्ट में छद्म कोड का असल रूप <अहंकारी_जीत> लिखा मिलेगा इसे भी < href="त्वरित-आवेश, प्रतिशोध-प्रेरित-आक्रोश”> और target="_ क्षणिक दर्पसंतोष और शेष पश्चाताप”> से क्रमशः लिंक व टार्गेट किया मिलेगा। तत्काल <अहंकारी_जीत> को <सफल_क्षमा> कोड से बदल दीजिए और < href="समता,क्षमत्व,धीर-गम्भीर> से लिंक करते हुए  टार्गेट - target="_  शान्ति,सुख व आमोद-प्रमोद भरा जीवन, ”> कर दीजिए।

6- अगला कदम प्रोफाइल छायाचित्र में परिवर्तन करना है। वर्तमान इमेज-< “रक्तिम_नयन.gif को <“सुधारस_झरना.gif इमेज से बदल डालिए। ध्यान रहे हमेशा (.gif) इमेज का ही प्रयोग करें यह किसी भी तरह के बैकग्राउण्ड पर स्थापित हो सकती है

7- अब सारे परिवर्तनों को सेव कर दीजिए, आपका सिस्टम ‘क्रोध पर नियंत्रण” प्रोग्राम के 'मित्रवत उपयोग' के लिए तैयार है।

निश्चित ही इस विरल प्रयोग से आपकी प्रोफाइल उन्नत व उत्कृष्ट हो जाएगी। सभी नियमों का सावधानी से प्रयोग करने के बाद भी यदि आप के साथ कोई त्रृटि होती है, और आपको लगे कि उलट यह तो दुविधाग्रस्त हो गया, पहले जो कार्य रक्तिम नयन से सहज ही समपन्न हो जाते थे, अब कोई घास भी नहीं डालता और सुधारस तो लोग झपट झपट उठा ले जाते है और आभार तक व्यक्त नहीं करते!! जैसे ‘धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का!!’ किन्तु इस स्तरीय विचार को निकाल फैकिए। घबराकर जल्दबाज़ी में पुरानी प्रोफाइल पर लौटने की कोई आवश्यकता नहीं है। दृढता से परिवर्तन स्थापित होने की प्रतीक्षा कीजिए। टिके रहिए और अभ्यास जारी रखिए। ‘क्रोध पर नियंत्रण’ प्रोग्राम पर जब एक बार हाथ जमा कि फिर आप भी इसके बिना नहीं चला पाएंगे। इसके उपरांत भी यदि समस्याएँ आती है तो हमें लिख भेजिए, आपके समाधान का पूर्ण प्रयास किया जाएगा।
तकनीकी शब्दावली का प्रयोग लेख को रोचक बनाने के उद्देश्य से किया गया है। लेख में वर्णित प्रोफ़ाइल का आपके फ़ेसबुक, ब्लॉगर, प्लस आदि के प्रोफ़ाइल से कोई लेना-देना नहीं है कृपया वहाँ का कोड न बदलें :)

पिछला सूत्र
 क्रोध

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