25 जनवरी 2011

जब वक्त ही न रहा पास तो फिर क्या होगा?

अप्रमाद-पुरूषार्थ

जब वक्त ही न रहा पास तो फिर क्या होगा?
लुट गई दौलते अहसास तो फिर क्या होगा?
कौन सी सुबह जलाओगे तमन्नाओं का चराग़?
शाम से ही टूट गई आस तो फिर क्या होगा?

सांस लेना ही केवल जिन्दगानी नहीं है।
उस बीस साल की उम्र का नाम जवानी नहीं है।
ज्योत बन जीना घड़ी भर का भी सार्थक,
जल के दे उजाला उस दीप का सानी नहीं है।

19 टिप्‍पणियां:

  1. सजग करती पंक्तियां. ('धड़ी' को 'घड़ी' सुधार करने पर विचार कर लें)

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  2. सही चेतावनी सुज्ञ जी ! शुभकामनायें !

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  3. ज्योत बन जीना धड़ी भर का भी सार्थक,
    जल के दे उजाला उस दीप का सानी नहीं है.

    वाह वाह .
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

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  4. बिल्कुल सही सोच। आभार।

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  5. वाह, क्या बात कही है
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

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  6. .

    वाह भाई !
    उचित उपदेश को कहती कमाल की कवितायी.

    .

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  7. वाह ! क्या बात कही है…………बहुत सुन्दर्।

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  8. सही बात है! समय चूकि पुनि का पछतानि!!

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  9. सुज्ञ जी! जब यहाँ आता हूँ, ख़ाली हाथ नहीं जाता हूँ..

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  10. कौन सी सुबह जलाओगे तमन्नाओं का चराग़?
    शाम से ही टूट गई आस तो फिर क्या होगा?
    bahut hi bavpurn pratuti.......

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  11. ज्योत बन जीना घड़ी भर का भी सार्थक,
    जल के दे उजाला उस दीप का सानी नहीं है------------ कितनी गहरी बात कह दी आपने!

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  12. बहुत सुन्दर रचना है

    आप को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं!

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  13. जब वक्त ही न रहा पास तो फिर क्या होगा?

    बहुत सही कहा..सभी वक्त के गुलाम हैं..गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनायें !

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  14. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.....बहुत सुन्दर विचार......बहुत सुन्दर
    आभार................

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  15. बहुत सुन्दर रचना........... गहरी बात.... वाह

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