6 जनवरी 2011

हिन्दी ब्लॉग जगत में गुटबाजी?


हिन्दी ब्लॉग जगत में एक शिकायत बडी आम है कि ब्लॉगर गुट बनाते है, और अपने गुट विशेष के सदस्यों की ही सराहना करते है। वैसे तो मैं स्वयं गिरोहबाजी का समर्थक नहीं, पर हमेशा जो दिखता है, वास्तव में वही मात्र यथार्थ नहीं होता।

हिन्दी ब्लॉग जगत में सभी सशक्त साहित्यकार नहीं आते, वस्तुतः अधिसंख्य रूप से वे सामान्य लेखक, सहज अभिव्यक्ति करने वाले ब्लॉगर ही होते है। ऐसे नव-आगंतुको को प्रेरणा व प्रोत्साहन की नितांत ही आवश्यकता होती है। उनकी सराहने योग्य रचनाओं पर जब, ‘बढिया पोस्ट’ ‘उम्दा पोस्ट ‘Nice post’  जैसी टिप्पणियाँ आती है, उनके लिये बहुत मायने रखती है। प्रेरणादायिनी होती है। उनके लिये तो यह भी बहुत होता है, लोगों ने उसका ब्लॉग देखा। स्थापित होने के संघर्ष में वे भी सप्रयत्न दूसरे ब्लॉगर के समर्थक बनते है, बिना लेख पढे ज्यादा से ज्यादा टिप्पणियाँ करते है, इसलिये कि उन्हे भी याद रखा जाय, उन्हे  महत्व दिया जाय, उनकी पहचान स्थापित हो।

इस तरह लेन-देन के प्रयास में पाठकों की नियमितता होती है, जिसे हम अक्सर गुट समझने की भूल करते है, जबकि यह नियमितता प्रेरक सहयोग मात्र होता है, साथ ही सक्रीयता सूचक भी।

अकसर प्रतिष्ठित विद्वान साहित्यक ब्लॉगर्स के ब्लॉग पर भी ऐसा दृष्टिगोचर होता है, कुछ विशेष ब्लॉगर की वहां सक्रीयता दिखती है। किन्तु वहां भी उनकी आवश्यकताएँ होती है। साहित्यक प्रतिभावान ब्लॉगर भी अपेक्षा रखता है उसे साहित्यक समझ वाले पाठक उपलब्ध हो। वह टिप्पणीकर्ता के विचारों से भांप लेता है कि पाठक साहित्यक समझ के योग्य पात्र है। ऐसे में इन ब्लॉगर पाठक के साथ संवाद की निरंतरता बनती है, वे परस्पर लेखादि को सराहते है, जो कि सहज ही होना भी चाहिए। ऐसी आपसी सराहना को हम गुट मान लेते है। हिंदी ब्लॉगजगत की दुविधा यह है कि इस विकासशील दौर में हर ब्लॉगर ही पाठक होता है। अतः आपस में जुडाव सहज है।

स्थापित वरिष्ठ बलॉगर भी वर्षों से ब्लॉगिंग में है। प्रतिदिन के सम्पर्कों और अनुभव के आधार पर वे एक दूसरे को जानने समझने लगते है, ऐसे परिचित ब्लॉगर से सम्पर्क में निरंतरता बनना आम है। इसे भी हम गुट मान लेते है।

कोई भी व्यक्ति विचारधारा से पूर्णतया मुक्त नहीं होता, प्रत्येक ब्लॉगर की भी अपनी पूर्व निर्धारित विचारधारा होती है। सम्पर्क में आनेवाले दूसरे ब्लॉगर में जब वह उसी विचार को पाता है, तो उसके प्रति आकृषण होना सहज सामान्य है। ऐसे में निरंतर सम्वाद बनता है। समान विचारो पर समान प्रतिक्रिया देनेवालों को भी एक गुट मान लिया जाता है।

इस प्रकार के सहज सम्वाद प्रेरित सम्पर्को को यदि हम गुट कहें तब भी ऐसा गुट ध्रुवीकरण हो जाना प्राकृतिक है। जिस तरह मित्रता बनना सहज है उसी तरह कुदरती समूह का अस्तित्व में आना अवश्यंभावी है। यह वर्ग निर्माण की तरह भी हो सकता है। जैसे बौद्धिक अभिजात्य वर्ग, सामान्य वर्ग, सहज अभिव्यक्ति वर्ग। स्थापित ब्लॉगर, साधारण ब्लॉगर, संघर्षशील ब्लॉगर।

लेकिन इस तरह के ध्रुवीकरण से भय खाने की आवश्यकता नहीं। जैसे जैसे ब्लॉगिंग का विस्तार होता जायेगा, पाठक अपनी रूचि अनुसार पठन ढूंढेगा। विषयानुसार केटेगरी बनना तो निश्चित है। इस तरह के सारे गठबंधन, विचार विनिमय को भी आसान कर देते है जो हिन्दी ब्लॉग पाठकों  की सुविधा में अभिवृद्धि ही करेंगे। बस बात जब हिंदी ब्लॉग जगत के उत्थान और विकास की हो सभी गुट को एकजुट हो विकास में योगदान देना चाहिए।

इसलिये बस लिखते चलो………लिखते चलो………

19 टिप्‍पणियां:

  1. सुज्ञ जी!
    क्या बात है कि आज इसी विषय पर यह दूसरी पोस्त पढने को मिली! कई और तथ्य हैं जिनको भी टटोलना आवश्यक है.अच्छा है कि आप ऐसा नहीं सोचते. पर जब हर तरफ ऐसी चर्चा होने लगे तो लगता है कि कहीं न कहीं आग तो है, वर्ना धुँआ नहीं उठता!

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  2. हम आपके विचारों की तहे दिल से
    सराहना करते हैं ..थैंक्स !

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  3. सुज्ञ जी ब्लॉगजगत की गुटबाजी पर आपके विचारों से मेरी भी सहमती है.

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  4. सलिल जी पहली पोस्ट कौन सी है ये भी बता दें. मौका मिला तो मैं भी पढ़ लूँगा.

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  5. सलिल जी,

    निश्चित ही और भी तथ्य है, आने वाले कल की पोस्ट में उस धुंए की मूल आग को ढूंढ्ने का प्रयास करूंगा।

    दीपक पाण्डेय जी,

    मेरी ही 5 दिस्म्स्बर वाली पोस्ट की बात सलिल जी कह रहे है।

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  6. Badiya Prastuti
    सुज्ञ जी !
    बस लिखते चलो………लिखते चलो………

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  7. हम तो गुट बनाने में विश्वास रखते हैं, ऐसे लोगों का गुट जो किसी गुट में न हो ... पर ऐसा मिलता कहां है, इसलिए कवि गुरु के गीत गाता चलता हूं,

    यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
    तबे एकला चलो रे।

    एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!

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  8. @ बिलकुल ठीक कहा आपने ...
    रूचि अनुसार अगर पाठकों के ग्रुप बन भी जाएँ तो इससे भला ही होगा और यह स्वाभाविक भी है ख़राब तो तब है, जब परस्पर विरोधी विचारधाराएँ, रंजिश में बदल जाती हैं !
    सादर

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  9. आप की बात अपनी जगह सही है किन्तु उसके बाद भी कहूँगी की गुट है और उसे बनाया और बढाया जाता है | बहुत सारी और भी बाते तथ्य है पर उन पर ज्यादा बहस करना ही बेकार है सबसे सही वही है जो आप ने कहा की लिखते चलो |

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  10. @विचार शून्य जीः
    आपके लिये लिंक दे रहा हूँ..
    http://uchcharan.uchcharan.com/2011/01/blog-post_06.html

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  11. जहां कही चार लोग प्यार से मिले उन्हे गुट का नाम नही देना चाहिये, अच्छा हे ना...... हमेशा लडते रहने से मिल कर रहे.आप से सहमत हे जी, बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद

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  12. ब्लागिंग की सामयिकी से जुड़ी पोस्ट . भाई , टीपक की मेहनत कौन देखता है , लोगों को तो 'नाइस' नाइस लगता है . और प्रचलित धारा से अलग कुछ कहने वाला कुपाच्य हो जाता है . बहरहाल...

    लीजिये हम टीप दिए . कहीं किसी ग्रुप-संकल्पना को इकाई-स्तरीय चोट तो लगेगी ही :)

    आपकी अगली पोष्ट का इन्तजार ! शुभकामनाएं !

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  13. .

    सुज्ञ जी ,

    एक बेहद सार्थक एवं सामयिक लेख के लिए आभार। इस लेख में गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। लेख बहुत ही सकारात्मक तर्ज पर लिखा गया है। आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ ।

    Indeed very motivating and inspirational post.

    Thanks.

    .

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  14. hns raaj bhaayi aap to hnson ke raaja he chlo hm or aap mil kr is gut baazi ko dur kr pyaar ka sndesh dete hen sb logon ko aap khen to aap ke yhaan nhin to hmare kotaa men akhtta kr aek dusre se pyaar sneh ki baat krte hen bolo thik he naa men jvab ka bhi intizaar krungaa . akhtar khan akela kota rajsthan

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  15. प्रशंसनीय है आपकी यह संतुलित सहजता.

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  16. हम तो पठनीय पोस्‍ट को तलाशते रहते हैं और जब बात अच्‍छी लगती है तो टिप्‍पणी भी कर देते हैं। कभी कोई विचार मांगता है तो भिन्‍न विचार होने पर भी टिप्‍पणी करते हैं। लेकिन कभी यह नहीं देखते कि यह व्‍यक्ति मेरे ब्‍लाग पर आता है या नहीं। पहले किसी किसी ब्‍लाग पर अपना परामर्श भी दे देते थे लेकिन अब अनुभव में आ रहा है कि लोगों को परामर्श रुचते नहीं तो अब बन्‍द कर दिए हैं। बस उस पोस्‍ट का पढ़कर बिना टिप्‍पणी करे ही लौट आते हैं। आपका लेख अच्‍छा है। गुट तो बनेंगे ही। कभी विचारों के अनुरूप कुभी विधा विशेष के अनुरूप।

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  17. सुज्ञ जी ब्लॉगजगत की गुटबाजी पर आपके विचारों से मेरी भी सहमती है.

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