28 अक्तूबर 2010

श्रेष्ठ खानदान है हमारा………



खाते है जहाँ गम सभी, नहिं जहाँ पर क्लेश।
निर्मल गंगा बह रही, प्रेम की  जहाँ विशेष॥

हिं व्यसन-वृति कोई, खान-पान विवेक।
सोए-जागे समय पर, करे कमाई नेक॥

दाता जिस घर में सभी, निंदक नहिं नर-नार।
अतिथि का आदर करे, सात्विक सद्व्यवहार॥

मन गुणीजनों को करे, दुखीजन के दुख दूर।
स्वावलम्बन समृद्धि धरे, हर्षित रहे भरपूर॥
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15 टिप्‍पणियां:

  1. नमन गुणीजनों को करे, दुखीजन के दुख दूर।
    स्वावलम्बन समृद्धि धरे, हर्षित रहे भरपूर॥

    सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  2. स्नेह. शांति, सुख, सदा ही करते वहां निवास
    निष्ठा जिस घर मां बने, पिता बने विश्वास। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    विचार-नाकमयाबी

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  3. दाता जिस घर में सभी--- निंदक नहीं नर-नार --
    बहुत समृद्ध शाली कबिता भारतीयता पर आधारित बहुत सुन्दर

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  4. बहुत सुन्दर है घर का यह परिवेश
    सच है कि ऐसा खानदान है विशेष ....अच्छी प्रस्तुति

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  5. @सुज्ञ जी
    बेहद सुन्दर परिभाषा है

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