26 मार्च 2012

क्रोध विकार


पांचों विकारों में से क्रोध ही एक ऐसा विकार है……


जिसका दुष्प्रभाव क्रोध करने वाले और जिस पर क्रोध किया जा रहा है उभय पक्षों पर पड़ता है इसके अलावा क्रोध सार्वजनिक रूप से दिखाई भी देता है। अर्थात उस क्रोध की प्रक्रिया को उन दोनों के अलावा अन्य लोगो द्वारा भी देखा जाता है। साथ ही क्रोध के दूसरे लोगों में संक्रमित होने की सम्भावनाएँ प्रबल होती है।


  • क्रोध आने से लेकर इसकी समाप्ति तक इसको चार भागों में बांटा जा सकता है-
1 -क्रोध उत्पन्न होने का कारण ।
मामूली सा अहं, ईष्या, या भय। (कभी-कभी तो बहुत ही छोटा कारण होता है)

2 -क्रोध आने पर उसका रूप।
अहित करना। (स्वयं का, किसी दूसरे का और कभी निर्जीव चीजो को तोड़-फोड़ कर नुक्सान करता है)

3 -क्रोध के बाद उसके परिणाम
पश्चाताप। ( क्रोध हमेशा पछतावे पर ख़त्म होता है)

4 -क्रोध के परिणाम के बाद उसका निवारण
क्षमा। (जो कि हमेशा समझदार लोगो द्वारा किया जाता है)

बात-बेबात क्रोध करने वालों से लोग प्रायः दूरी बना लेते है। क्रोध करने वाले कभी भी दूसरों के साथ न्याय नहीं कर सकते। क्रोध वह आग है जो अपने निर्माता को पहले जला देती है।

विचार करें, क्या चाहते है आप? अपना व दूसरों का अहित या आनन्द अवस्था?

जब आपका अहं स्वयं को स्वाभिमानी कहकर करवट बदलने लगे, सावधान होकर मौन मंथन स्वीकार कर लेना श्रेयस्कर हो सकता है। साधारणतया मौन को भयजनित प्रतिक्रिया कहकर कमजोरी समझा जाता है पर सच्चाई यह है कि उस समय मौन धारण कर पाना वीरों के लिए भी आसान नहीं होता। वस्तुतः मौन के लिए विवेक को सुदृढ़ करना होता है और इसके लिए उच्चतम साहस चाहिए। क्रोध उदय के संकेत मिलते ही व्यक्ति जब मौन द्वारा अनावश्यक अहंकार पर विवेक पूर्वक सोच लेता है तो बुरे विचार, कटु वाणी और बुरे भावों के सही पहलू जानने, समझने, विचारने और हल करने का अवसर भी मिल जाता है।जो निश्चित ही क्रोध, ईर्ष्या और भय को दूर करने में सहायक सिद्ध होता है। क्रोध के उस क्षण में स्वानुशासित विवेक और आत्मावलोकन के लिए मौन हो जाना क्रोध मुक्ति का श्रेष्ठ उपाय है।

दृष्टव्य  सूत्र:-
बर्ग-वार्ता- क्रोध पाप का मूल है ...
सुज्ञ: क्षमा-सूत्र

11 जनवरी 2012

धर्म विकार


धर्म के नाम पर……

या धार्मिक विधानो के तौर पर

कितने ही………


  • अच्छे अच्छे जीवन तरीके अपनालो,

  • सुन्दर वेश, परिवेश, गणवेश धारण कर लो,

  • पुरानी रिति, निति, परम्पराएं और प्रतीक अपना लो,

  • आधा दिन भूखे रहो, और आधा दिन डट कर पेट भरो,

  • या कुछ दिन भूखे रहो और अन्य सभी दिन खाद्य व्यर्थ करो,

  • हिंसा करके दान करो, या बुरी कमाई से पुण्य करो,

  • यात्रा करो, पहाड़ चढ़ो, नदी, पोख़रों,सोतों में नहाओ,
  • भोगवाद को धर्मानुष्ठान बनालो


यदि आपका यह सारा उपक्रम मानवता के हित में अंश भर भी योगदान नहीं करता,


समस्त प्रकृति के जीवन हित में कुछ भी सहयोग नहीं करता,


तो व्यर्थ है, निर्थक है। वह निश्चित ही धर्म नहीं है। मोहांध विकार है, पाखण्ड है।

6 जनवरी 2012

निरामिष पर शाकाहार पहेली

निरामिष के सभी पाठकों व हितैषियों को नववर्ष 2012 की शुभकामनायें! पता ही नहीं चला कि आपसे बात करते-करते कब एक वर्ष बीत गया। शाकाहार, करुणा, और जीवदया मे आपकी रुचि के कारण ही इस अल्पकाल में निरामिष ब्लॉग ने इतनी प्रगति की। एक वर्ष के अंतराल में ही हमारे नियमित पाठकों की संख्या हमारे अनुमान से कहीं अधिक हो गयी है और लगातार बढती जा रही है। इस ब्लॉग पर हम शाकाहार के सभी पक्षों को वैज्ञानिक, स्वास्थ सम्बन्धी, धार्मिक, मानवीय विश्लेषण करके तथ्यों के प्रकाश में सामने रखते हैं ताकि ज्ञानी पाठक अपने विवेक का प्रयोग करके शाकाहार का निष्पाप मार्ग चुनकर संतुष्ट हों।

हमारे पाठक ब्लॉगर श्री सतीश सक्सेना जी, डॉ रूपचन्द शास्त्री जी, राकेश कुमार जी, रेखा जी, वाणी गीत जी, मदन शर्मा जी, तरूण भारतीय जी, सवाईसिंह जी, पटाली द विलेज, संदीप पंवार जी, कुमार राधारमण जी का प्रोत्साहन के लिए आभार व्यक्त करते है।

हमारे सुदृढ़ स्तम्भ, विशेषकर सर्वश्री विरेन्द्र सिंह चौहान, गौरव अग्रवाल, डॉ मोनिका शर्मा, शिल्पा मेहता, आलोक मोहन, प्रश्नवादी  जैसे समर्थकों का विशेषरूप से आभार व्यक्त करना चाहते हैं जिन्होंने लेखकमण्डल से बाहर रहते हुए भी हमें भरपूर समर्थन दिया है। हमारे एक जोशीले पाठक ने निरामिष ब्लॉग के सामने शाकाहार के विरोध में कई भ्रांतियाँ और चुनौतियाँ रखीं। डॉ. अनवर जमाल द्वारा पोषण, शाकाहार, और भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रश्नों ने हमें प्रचलित बहुत सी भ्रांतियों को दूर करने का अवसर प्रदान किया। मांसाहार की बुराइयों को उद्घाटित करने और उनके मन में पल रहे भ्रम के बारे में जानने के कारण हमें शाकाहार सम्बन्धी विषयों की वैज्ञानिक और तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत करने में अपनी प्राथमिकतायें चुनने में आसानी हुई। आशा है कि वे हमें भविष्य में भी झूठे प्रचार की कलई खोलने के अवसर इसी प्रकार प्रदान करते रहेंगे।

पहेली की ओर आगे बढने से पहले हम अभिनन्दन करना चाहते हैं उन सभी महानुभावों का जिन्होने गतवर्ष शाकाहार अपनाकर हमारे प्रयास को बल दिया:
* दीप पांडेय
* इम्तियाज़ हुसैन
* कुमार राधारमण
* शिल्पा मेहता


अपनी पहली वर्षगांठ के अवसर पर आज हम आपका आभार व्यक्त करना चाहते हैं, एक छोटे से आयोजन के साथ। आइये, हल करते हैं आज की निरामिष पहेली अपने निराले शाकाहारी, सात्विक अन्दाज़ में। केवल कुछ सरल प्रश्न और बहुत से पुरस्कार। हमारा प्रयास है कि इस प्रतियोगिता में सम्मिलित प्रश्नों के उत्तर या उनके संकेत आपको निरामिष ब्लॉग की पिछली प्रविष्टियों व टिप्पणियों में मिल जायें।

26 सितंबर 2011

सही निशाना


पुराने समय की बात है, चित्रकला सीखने के उद्देश्य से एक युवक, कलाचार्य गुरू के पास पहुँचा। गुरू उस समय कला- विद्या में पारंगत और सुप्रसिद्ध थे। युवक की कला सीखने की तीव्र इच्छा देखकर, गुरू नें उसे शिष्य रूप में अपना लिया। अपनें अविरत श्रम से देखते ही देखते यह शिष्य चित्रकला में पारंगत हो गया।  अब वह शिष्य सोचने लगा, मैं कला में पारंगत हो गया हूँ, गुरू को अब मुझे दिक्षान्त आज्ञा दे देनी चाहिए। पर गुरू उसे जाने की आज्ञा नहीं दे रहे थे। हर बार गुरू कहते अभी भी तुम्हारी शिक्षा शेष है। शिष्य तनाव में रहने लगा। वह सोचता अब यहां मेरा जीवन व्यर्थ ही व्यतीत हो रहा है।  मैं कब अपनी कला का उपयोग कर, कुछ बन दिखाउंगा? इस तरह तो मेरे जीवन के स्वर्णिम दिन यूंही बीत जाएंगे।

विचार करते हुए, एक दिन बिना गुरू को बताए, बिना आज्ञा ही उसने गुरूकुल छोड दिया और निकट ही एक नगर में जाकर रहने लगा। वहाँ लोगों के चित्र बनाकर आजिविका का निर्वाह करने लगा। वह जो भी चित्र बनाता लोग देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते। हर चित्र हूबहू प्रतिकृति। उसकी ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी। उसे अच्छा पारिश्रमिक मिलता। देखते देखते वह समृद्ध हो गया। उसकी कला के चर्चे नगर में फैल गए। उसकी कीर्ती राजा तक पहुँची।

राजा नें उसे दरबार में आमंत्रित किया और उसकी कलाकीर्ती की भूरि भूरि प्रसंसा की। साथ ही अपना चित्र बनाने का निवेदन किया।  श्रेष्ठ चित्र बनाने पर पुरस्कार देने का आश्वासन भी दिया। राजा का आदेश शिरोधार्य करते हुए 15 दिन का समय लेकर, वह युवा कलाकार घर लौटा। घर आते ही वह राजा के अनुपम चित्र रचना के लिए रेखाचित्र बनानें में मशगूल हो गया। पर सहसा एक विचार आया और अनायास ही वह संताप से घिर गया।

वस्तुतः राजा एक आँख से अंधा अर्थात् काना था। उसने सोचा, यदि मैं राजा का हूबहू चित्र बनाता हूँ, और उसे काना दर्शाता हूँ तो निश्चित ही राजा को यह अपना अपमान लगेगा और वह तो राजा है, पारितोषिक की जगह वह मुझे मृत्युदंड़ ही दे देगा। और यदि दोनो आँखे दर्शाता हूँ तब भी गलत चित्र बनाने के दंड़स्वरूप वह मुझे मौत की सजा ही दे देगा। यदि वह चित्र न बनाए तब तो राजा अपनी अवज्ञा से कुपित होकर सर कलम ही कर देगा।किसी भी स्थिति में मौत निश्चित थी।  वह सोच सोच कर तनावग्रस्त हो गया, बचने का कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा था। इसी चिंता में न तो वह सो पा रहा था न चैन पा रहा था।

अन्ततः उसे गुरू की याद आई। उसने सोचा अब तो गुरू ही कोई मार्ग सुझा सकते है। मेरा उनके पास जाना ही अब अन्तिम उपाय है। वह शीघ्रता से आश्रम पहुंचा और गुरू चरणों में वंदन किया, अपने चले जाने के लिए क्षमा मांगते हुए अपनी दुष्कर समस्या बताई। गुरू ने स्नेहपूर्ण आश्वासन दिया। और चित्त को शान्त करने का उपदेश दिया।  गुरू नें उसे मार्ग सुझाया कि वत्स तुम राजा का घुड़सवार योद्धा के रूप में चित्रण करो, उन्हें धनुर्धर दर्शाओ। राजा को धनुष पर तीर चढ़ाकर निशाना साधते हुए दिखाओं, एक आँख से निशाना साधते हुए। ध्यान रहे राजा की जो आँख नहीं है उसी आंख को बंद दिखाना है। कलाकार संतुष्ट हुआ।

शिष्य, गुरू के कथनानुसार ही चित्र बना कर राजा के सम्मुख पहुँचा। राजा अपना वीर धनुर्धर स्वरूप का अद्भुत चित्र देखकर बहुत ही प्रसन्न और तुष्ट हुआ। राजा ने कलाकार को 1 लाख स्वर्ण मुद्राएं ईनाम दी। कलाकार नें ततक्षण प्राण बचाने के कृतज्ञ भाव से वे स्वर्ण मुद्राएं गुरू चरणों में रख दी। गुरू नें यह कहते हुए कि "यह तुम्हारे कौशल का प्रतिफल है, इस पर तुम्हारा ही अधिकार है।" आशिर्वाद देते हुए विदा किया।

कथा का बोध क्या है?

1-यदि गुरू पहले ही उपदेश देते  कि- 'पहले तुम परिपक्व हो जाओ', तो क्या शिष्य गुरू की हितेच्छा समझ पाता?  आज्ञा होने तक विनय भाव से रूक पाता?

2-क्या कौशल के साथ साथ बुद्धि, विवेक और अनुभव की शिक्षा भी जरूरी है?

3-निशाना साधते राजा का चित्र बनाना, राजा के प्रति सकारात्म्क दृष्टि से प्रेरित है, या  समाधान की युक्ति मात्र?

6 सितंबर 2011

मधुबिन्दु


मैने एक कथा सुनी………

एक व्यक्ति घने जंगल में अंधेरे से भागा जा रहा था कि एक कुंए में गिरने को हुआ। गिरते गिरते उसके हाथ में कुएं पर झुके वृक्ष की ड़ाल आ गई। वहां कुछ प्रकाश भी था। उसनें नीचें झांका तो कुएं में चार विकराल अजगर मुंह फाड़े उपर ताक रहे थे। वे उसके गिरने का इन्तज़ार ही कर रहे थे। उसनें आस पास देखा तो, जिस डाल को पकड़ वह लटक रहा था, दो चुहे, एक काला एक सफेद, उसी डाल को कुतर रहे थे। इतनें में एक विशाल हाथी कहीं से चला आया और अपनी सूंढ़ से वृक्ष के तने को पकड़ कर हिलाने लगा। वह व्यक्ति डर से सिहर उठा। ठीक उपर की शाखा पर मधुमक्खी का छत्ता था, हाथी के हिलाने से मक्खियाँ उडने लगी। 

छत्ते से शहद-बिंदु टपकने लगा। एक बिंदु टपककर उसकी नाक से होता हुआ होठों तक आ पहुँचा। उस व्यक्ति ने प्यास से सूख रही अपनी जीभ को होठों पर फेरा, एक छोटे से मधु बिन्दु में अनंत आनन्द भरा मधुर स्वाद था। उसे लगा जैसे जीवन में मुझे इसी मिठास की तलाश थी, यही मेरा चीर-प्रतिक्षित उद्देश्य था। उसने मुंह उपर किया, कुछ क्षणों बाद फ़िर मधु-बिन्दु मुंह में टपका। वह मस्त हो गया। बेताबी से अगली बूंद का इन्तजार करता। और फिर रसास्वादन कर प्रसन्न हो उठता। आस पास खड़ी विपत्तियों को भूल चुका था। हवा में लटका, हाथी पेड गिराने पर आमदा, चुहे डाल कुतरने में व्यस्त और नीचे चार अज़गर उसका निवाला बना देने को आतुर। किन्तु वह तो एक एक बिन्दु का स्वाद लेने में मस्त था। 

उसी जंगल से शिव-पार्वती अपने विमान से गुज़र रहे थे। पार्वती नें उस मानव की दुखद स्थिति को देखा और शिव से उसे बचा लेने का अनुरोध किया। भगवान शिव नें विमान को उसके निकट ले जाते हुए हाथ बढाया और उस व्यक्ति को कहा- मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं, आओ, विमान में आ जाओ, मै तुम्हें तुम्हारे इच्छित स्थान पर छोड दूँगा। उस व्यक्ति नें कहा- ठहरिए भगवन् एक शहद बिन्दु चाट लूं तो चलुं। एक बिन्दु फिर एक बिन्दु। हर बिन्दु के बाद, अगले बिन्दु के लिए उसकी प्रतिक्षा प्रबल हो जाती। उसके आने की प्रतिक्षा में थक कर आखिर, भगवान शिव ने विमान आगे बढ़ा दिया।

आप इस कथा का सटीक भावार्थ बताएं, क्या कहना चाहती है यह कथा?

प्रतीक हिंट्स:
  • घने जंगल का अंधेरा = अज्ञान
  • डाली = आयुष्य
  • काले सफेद चुहे = दिन रात
  • चार अज़गर = चार गति
  • हाथी =घमंड़, अभिमान
  • मधु बिन्दु = संसार-सुख
  • शिव = कल्याण (मुक्ति) उपदेश
  • पार्वती = शक्ति, पुरूषार्थ प्रेरणा

आप कथा के अपने दृष्टिकोण से भाव प्रकट करने में स्वतंत्र है।

29 अगस्त 2011

पर्यावरण का अहिंसा से सीधा सम्बंध




पर्यावरण आज विश्व की गम्भीर समस्या हो गई है। प्रकृति को बचाना अब हमारी ज्वलंत प्राथमिकता है। लेकिन प्राकृतिक सन्तुलन को विकृत करने में स्वयं मानव का ही हाथ है। पर्यावरण और प्रदूषण मानव की पैदा की हुई समस्या है। प्रारम्भ में पृथ्वी घने वनों से भरी थी। लेकिन जनसंख्या वृद्धि और मनुष्य के सुविधाभोगी मानस ने, बसाहट,खेती-बाडी आदि के लिए वनों की कटाई शुरू की। औद्योगिकीकरण के दौर में मानव नें पर्यावरण को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। जीवों के आश्रय स्थल उजाड़ दिए गये। न केवल वन सम्पदा और जैव सम्पदा का विनाश किया, बल्कि मानव नें जल और वायु को भी प्रदूषित कर दिया। कभी ईंधन के नाम पर तो कभी इमारतों के नाम पर। कभी खेती के नाम पर तो कभी जनसुविधा के नाम पर, मानव प्राकृतिक संसाधनो का विनाशक दोहन करता रहा।

वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। अप्राकृतिक रूप से जब इस कड़ी को खण्डित करने का दुष्कर्म होता है, प्रकृति में विनाशक विकृति उत्पन्न होती है जो अन्ततः स्वयं मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बन खड़ी हो जाती है। जीव-जन्तु हमारी ही भांति इस प्रकृति के आयोजन-नियोजन का अटूट हिस्सा होते है। वे पूरे सिस्टम को आधार प्रदान करते है। प्रकृति पर केवल मानव का मालिकाना हक़ नहीं है। मानव को समस्त प्रकृति के संरक्षण की शर्तों के साथ ही अतिरिक्त उपयोग बुद्धि मिली है। मानव पर, प्रकृति के नियंत्रित उपयोगार्थ विधानों का आरोपण किया गया है, जिसे हम धर्मोपदेश के नाम से जानते है। वे शर्तें और विधान, यह सुनिश्चित करते है कि सुख सभी को समान रूप से उपलब्ध रहे।

इसीलिए विश्व के सभी धर्मों के प्रणेता व महापुरूष, हिंसा, क्रूरता, जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा देने को गुनाह कहते है। वे प्रकृति के संसाधनों के मर्यादित उपभोग की सलाह देते है। अपरिग्रह का उपदेश देते है। मन वचन काया से संयमित,अनुशासित रहने की प्रेरणा देते है। इसी भावना से वे प्राणी मात्र में अपनी आत्मा सम झलक देखते/दिखलाते है। जब वे कण कण में भगवान होने की बात करते है,तो अहिंसा का ही आशय होता है । सभी को सुख प्रदान करने के उद्देश्य से ही वे यह सूत्र देते है कि ‘आत्मा सो परमात्मा’ या हर जीव में परमात्मा का अंश होता है। यह भी कहा जाता है कि सभी को ईश्वर नें पैदा किया अतः सभी जीव ईश्वर की सन्तान है। इसीलिए जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों के साथ दया, करूणा का व्यवहार करनें की शिक्षा दी जाती है। सारी बुराईयां किसी न किसी के लिए पीड़ादायक हिंसा बनती है। अतः सभी सद्गुणों को अहिंसा में समाहित किया जा सकता है। यही धर्म है। यही प्रकृति का धर्म है। यही सुनियोजित जीवन का विधान है। अर्थात्, अहिंसा पर्यावरण का संरक्षण विधान है।

16 अगस्त 2011

निष्प्रयोजन परम्परा : रूढ़ि



पिछले लेख में हमने सप्रयोजन परम्परा के औचित्य को स्थापित करने का प्रयास किया। जीवन मूल्यों में विकास के सार्थक उद्देश्य से किसी योग्य कार्य-विधि का निर्वहन ‘सप्रयोजन परम्परा’ कहलाता है। जैसे- 'एकाग्रचित' चिन्तन के प्रयोजन से, 'ध्यान' परम्परा का पालन किया जाता है, इसे हम ‘सप्रयोजन परम्परा' कहेंगे। आज तो जीवन शैली के लिए, मेडिटेशन की उपयोगिता प्रमाणित हो गई है। इसी कारण इसका उदाहरण देना सरल सहज-बोध हो गया है्। अतः परम्परा का औचित्य सिद्ध करना आसान हो गया है। अन्यथा कईं उपयोगी परम्पराएं असिद्ध होने से अनुपयोगी प्रतीत होती है। कई मान्यताओं में प्रतिदिन एक मुहर्त पर्यन्त ध्यान करने की परम्परा है, एकाग्रचित्त अन्तर्मन्थन के लिए इससे अधिक उपयोगी कौनसी विधि हो सकती है। 

पहले कभी, प्रतिदिन प्रातः काल योग – आसन करनें की परम्परा थी। जिसे दुर्बोध तर्कवादियों नें सांसो की उठा-पटक और अंगो की तोड़-मरोड़ कहकर दुत्कार दिया था। वे सतही सोच बुद्धि से उसे रूढ़ि कहते थे। आज अच्छे स्वास्थ्य के लिए योगासनो को स्वीकार कर लिया गया है। मन को सकारात्मक संदेश प्रदान करने के लिए भजनों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। दया की भावना का विकास करने के लिए दान के उपक्रम का महत्व है। श्रद्धा और विश्वास को सफलता का मुख्य कारण माना जाने लगा है। कई लोगों को स्वीकार करते पाया है कि उन्हें धर्म-स्थलों में अपार शान्ति का अनुभव होता है। कई लोग भक्ति-भाव के अभ्यास से, अहंकार भाव में क्षरण अनुभव करते है। हम आस-पास के वातावरण के अनुसार ही व्यक्ति्त्व ढलता देखते है। इन सभी लक्षणों पर दृष्टि करें तो, परम्परा और संस्कार का  सीधा सम्बंध देखा जा सकता है। प्रभावशाली व्यक्तित्व बनाने के लिए, संस्कार युक्त परम्पराओं के योगदान को  भला कैसे नकारा जाएगा?

लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि सभी परम्पराएं आंख मूंद कर अपनाने योग्य ही होती है। कई परम्पराएं निष्प्रयोजन होती है। अकारण होती है। वस्तुतः सुविधाभोगी लोगों नें कुछ कठिन परम्पराओं को पहले प्रतीकात्मक और फिर विकृत बना दिया होता है। ये सुविधाभोगी भी और कोई नहीं, प्रारम्भ में तर्कशील होते है। रेश्नलिस्ट बनकर शुरू में, कष्टदायक कठिन परम्पराओं को लोगों के लिए दुखद बताते है। पुरूषार्थ से कन्नी काटते हुए, प्रतीकात्मक रूप देकर, कठिनता से बचने के मार्ग सुझाते है। और अन्ततः पुनः उसे प्रतीक कहकर और उसके तर्कसंगत न होने का प्रमाण देकर परम्परा का समूल उत्थापन कर देते है।

भले आज हम सुविधाभोगियों को दोष दे लें, पर समय के साथ साथ ऐसी निष्प्रयोजन परम्पराओं का अस्तित्व में आ जाना एक सच्चाई है। परम्पराएँ पहले प्रतीकात्मक बनती है, और अंत में मात्र 'प्रतीक' ही बचता है। 'प्रयोजन' सर्वांग काल के गर्त में खो जाता है। ऐसी निष्प्रयोजन परम्पराएँ ही रूढ़ि बन जाती है। हालांकि रूढ़िवादी प्रायः इन प्रतीको के पिछे छुपे 'असल विस्मृत प्रयोजन' से उसे सार्थक सिद्ध करने का असफल प्रयास करते है, पर प्रतीकात्मक रूढ़ि आखिर प्रतीक ही होती है। उसके औचित्य को प्रमाणित करना निर्थक प्रयास सिद्ध होता है। अन्ततः ऐसी रूढ़ि को ‘आस्था का प्रश्न’ कहकर तर्कशीलता से पिंड़ छुड़ाया जाता है। जब उसमें प्रयोजन रूपी जान ही नहीं रहती, तो तर्क से सिद्ध भी कैसे होगी। अन्ततः ‘आस्था’ के इस प्रकार दुरपयोग से, मूल्यवान आस्था स्वयं भी ‘निष्प्रयोजन आस्था’ सिद्ध हो जाती है।

ऐसी रूढ़ियों के लिए दो मार्ग ही बचते है। पहला तो इन रूढ़ियों को पुर्णतः समाप्त कर दिया जाय अथवा फिर उनके असली प्रयोजन सहित विस्मृत हो चुकी, कठिन कार्य-विधी का पुनर्स्थापन किया जाय।

आपका  इस प्रकार की रूढ़ियों के प्रति क्या मानना है?

अगले लेख में हम कुप्रथा या कुरीति पर विचार करेंगे………

15 अगस्त 2011

परम्परा


श्रुत के आधार पर किसी क्रिया-प्रणाली का यथारूप अनुगमन करना परम्परा कहलाता है। परम्परा के भी दो भेद है। पूर्व प्रचलित क्रिया-विधि के तर्क व्याख्या में न जाते हुए, उसके अभिप्रायः को समझ लेना। और उसके सप्रयोजन ज्ञात होने पर उसका अनुसरण करना, ‘सप्रयोजन परम्परा' कहलाती है। दूसरी, निष्प्रयोजन ही किसी विधि का, गतानुगति से अन्धानुकरण करना 'रूढ़ि' कहलाता है। आज हम ‘सप्रयोजन परम्परा’ के औचित्य पर विचार करेंगे।

मानव नें अपने सभ्यता विकास के अनवरत सफर में कईं सिद्धांतो का अन्वेषण-अनुसंधान किया और वस्तुस्थिति का निष्कर्ष स्थापित किया। उन्ही निष्कर्षों के आधार पर किसी न किसी सैद्धांतिक कार्य-विधि का प्रचलन अस्तित्व में आया। जिसे हम संस्कृति भी कहते है। ऐसी क्रिया-प्रणाली, प्रयोजन सिद्ध होने के कारण, हम इसे ‘सप्रयोजन परम्परा’ कह सकते है।

आज के आधुनिकवादी इसे भी रूढ़ि में खपाते है। यह पीढ़ी प्रत्येक सिद्धांत को तर्क के बाद ही स्वीकार करना चाहती है। हर निष्कर्ष को पुनः पुनः विश्लेषित करना चाहती है। यदि विश्लेषण सम्भव न हो तो, उसे अंधविश्वास में खपा देने में देर नहीं करती। परम्परा के औचित्य पर विचार करना इनका मक़सद ही नहीं होता।

ऐसे पारम्परिक सिद्धांत, वस्तुतः बारम्बार के अनुसंधान और हर बार की विस्तृत व्याख्या से बचने के लिए ही व्यवहार में आते है। समय और श्रम के अपव्यय को बचाने के उद्देश्य से ही स्थापित किए जाते है। जैसे- जगत में कुछ द्रव्य विषयुक्त है। विष मानव के प्राण हरने या रुग्ण करने में समर्थ है। यह तथ्य हमने, हमारे युगों युगों के अनुसंधान और असंख्य जानहानि के बाद स्थापित किया। आज हमारे लिए बेतर्क यह मानना  पर्याप्त है कि ‘विष मारक होता है’। यह अनुभवों का निचोड़ है। विषपान से बचने का 'उपक्रम' ही सप्रयोजन परम्परा है। ‘विष मारक होता है’ इस तथ्य को हम स्व-अनुभव की कसौटी पर नहीं चढ़ा सकते। और न ही  समाधान के लिए,प्रत्येक बार पुनः अनुसंधान किया जाना उचित होगा।

परम्परा का निर्वाह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक अभिगम है। विज्ञ वैज्ञानिक भी सिद्धान्त इसलिए ही प्रतिपादित करते है कि एक ही सिद्धांत पर पुनः पुनः अनुसंधान की आवश्यकता न रहे।  उन निष्कर्षों को सिद्धांत रूप स्वीकार कर, आवश्यकता होने पर उन्ही सिद्धांतो के आधार पर उससे आगे के अनुसंधान सम्पन्न किए जा सके। जैसे- वैज्ञानिकों नें बरसों अनुसंधान के बाद यह प्रमाणित किया कि आणविक क्रिया से विकिरण होता है। और यह विकिरण जीवन पर बुरा प्रभाव करता है। जहां आणविक सक्रियता हो मानव को असुरक्षित उसके संसर्ग में नहीं जाना चाहिए। उन्होंने सुरक्षा की एक क्रिया-प्रणाली विकसित करके प्रस्तुत की। परमाणविक विकिरण, उसका दुष्प्रभाव, उससे सुरक्षा के उपाय सब वैज्ञानिक प्रतिस्थापना होती है। किंतु प्रत्येक व्यक्ति बिना उस वैज्ञानिक से मिले, बिना स्वयं प्रयोग किए। मात्र पढ़े-सुने आधार पर सुरक्षा-उपाय अपना लेता है। यह सुरक्षा-उपाय का अनुसरण, परम्परा का पालन ही है। ऐसी अवस्था में मुझे नहीं लगता कोई भी समझदार, सुरक्षा उपाय पालने के पूर्व आणविक उत्सर्जन के दुष्प्रभाव को जाँचने का दुस्साहस करेगा।

बस इसीतरह प्राचीन ज्ञानियों नें मानव सभ्यता और आत्मिक विकास के उद्देश्य से सिद्धांत प्रतिपादित किए। और क्रिया-प्रणाली स्वरूप में वे निष्कर्ष हम तक पहुँचाए। हमारी अनुकूलता के लिए, बारम्बार के तर्क व अनुशीलन से मुक्त रखा।हमारे लिए उन सिद्धांतों से प्राप्य प्रतिलाभ का उपयोग कर लेना, सप्रयोजन परम्परा का निर्वाह है।

परम्पराओं पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

'निष्प्रयोजन परम्परा' अर्थात् 'रूढ़ि' का विवेचन हम अगले लेख में करेंगे………

10 अगस्त 2011

अभिप्रायः बोध : नयज्ञान -अनेकान्तवाद


नेकांतवाद शृंखला के इस लेख से जुड़ने के लिए, जिन बंधुओ ने पिछ्ले लेख न देखे हो, कृपया एक बार दृष्टि अवश्य डालें। ताकि आप विषय से जुड़ सकें।

सत्य की आवश्यकता पर देखे : सत्य की गवेषणा
अनेकांत विषय में प्रवेश के लिए पढें दृष्टांत : छः अंधे और हाथी - अनेकांतवाद
दृष्टिकोण में सत्यांश के महत्व पर  : सत्यखोजी उपकरण - अनेकांतवाद
अनेकांत के बारे में भ्रांतियाँ और ‘नय’ की भूमिका : सत्यान्वेषण लैब अनेकांतवाद
‘अपेक्षा’ का स्पष्टिकरण  और अनेकांत की परिभाषा : तथ्य की परीक्षण-विधि -अनेकांतवाद
नय ज्ञान पर सप्तनय की व्याख्या : अपेक्षा-बोध : नयज्ञान - अनेकान्तवाद

जिस में हमने सात में से मात्र दो नय नैगमनयऔर संग्रहनयके बारे में उदाहरण सहित जाना, अब……

3-व्यवहारनय संग्रहनय से ग्रहण हुए पदार्थों अथवा तथ्यों का योग्य रिति से पृथकत्व करने वाला अभिप्रायः व्यवहार नय है। संग्रह नय के अर्थ का विशेष रूप से बोध करने के लिए उसका पृथक् करण आवश्यक हो जाता है। हर वस्तु के भेद-प्रभेद करना इस नय का कार्य है यह नय सामान्य की उपेक्षा करके विशेष को ग्रहण करता है।जैसे-ज्वर एक सामान्य रोग है किन्तु मस्तिष्क ज्वर से किसी ज्वर विशेष का बोध होता है।सामान्य एक समूह है जबकि विशेष उसका एक विशिष्ट भाग. सामान्य से विशिष्ट की खोज में निरंतर सूक्ष्मता की आवश्यकता होती है।

4-ॠजुनय मात्र वर्तमान कालवर्ती प्रयाय को मान्य करने वाले अभिप्रायः को ॠजुनय कहते है। क्योंकि भूतकाल विनिष्ट और भविष्यकाल अनुत्पन्न होने के कारण, केवल वर्तमान कालवर्ती पर्याय को ही ग्रहण करता है। जैसे- वर्तमान में यदि आत्मा सुख अनुभव कर रही हो तो ही यह नय उस आत्मा को सुखी कहेगा। यानि यहाँ क्षण स्थायी पर्याय से सुखी दुखी मान लिया जाता है।

5-शब्दनय – यह नय शब्दप्रधान नय है। पर्यायवाची शब्दों में भी काल,कारक, लिंग, संख्या और उपसर्ग भेद से अर्थ भेद मानना शब्दनय है। जैसे- काल भेद से ‘गंगा थी,गंगा है,गंगा होगी’ इन शब्दों को तीन अर्थ-भेद से स्वीकार करेगा। यदि काल, लिंग, और वचनादि भेद नहीं हो तो यह नय भिन्न अर्थ होने पर भी शब्द के भेद नहीं करता। अर्थात् पर्यायवाची शब्दों का एक ही अर्थ मानता है।

6-समभिरूढनय – यह शब्दनय से भी सूक्ष्म है। शब्दनय जहाँ अनेक पर्यायवाची शब्द का एक ही अर्थ मानता है, उसमें भेद नहीं करता, वहाँ समभिरूढनय पर्यायवाची शब्द के भेद से अर्थ-भेद मानता है। इसके अभिप्रायः से कोई भी दो शब्द, एक अर्थ के वाचक नहीं हो सकते। जैसे- इन्द्र और पुरन्दर पर्यायवाची है फिर भी इनके अर्थ में अन्तर है। ‘इन्द्र’ शब्द से ऐश्वर्यशाली का बोध होता है और ‘पुरन्दर’ शब्द से ‘पुरों अर्थात् नगरों का नाश करने वाला’ ग्रहण होता है। यह नय शब्दों के मूल अर्थ को ग्रहण करता है, प्रचलित अर्थ को नहीं। इस प्रकार अर्थ भिन्नता को मुख्यता देकर समभिरूढनय अपना अभिप्रायः प्रकट करता है।

7-एवंभूतनय – यह नय समभिरूढनय से भी सूक्ष्म है। जिस समय पदार्थों में जो क्रिया होती है, उस समय क्रिया के अनुकूल शब्दों से अर्थ के प्रतिपादन करने को एवंभूत नय कहते है। यह सक्रियता के आधार पर उसी अनुकूल अर्थ पर बल देता है। जैसे- जब इन्द्र नगरों का नाश कर रहा हो तब उसे इन्द्र कहना व्यर्थ है, तब वह पुरन्दर है। जब वह ऐश्वर्य भोग रहा हो उसी समय उसमें इन्द्रत्व है। यथा खाली दूध की भगोली को दूध की भगोली कहना व्यर्थ है। जिस समय उसमें दूध हो उसे दूध की भगोली कहा जा सकता है। इस नय में उपयोग सहित क्रिया ही प्रधान है। यह वस्तु की पूर्णता को ही ग्रहण करता है। वस्तु में एक अंश कमी हो तो इस नय के विषय से बाहर रहती है।

इस प्रकार हर प्रतिक्रिया किसी न किसी नय से अपेक्षित होती है। नय समझ जाने पर हमें यह समझ आ जाता है कि कथन किस अपेक्षा से किया गया है। और हमें वक्ता के अभिप्राय: का निर्णय हो जाता है।

9 अगस्त 2011

अपेक्षा-बोध : नयज्ञान - अनेकान्तवाद


पिछले लेखों में हमने अनेकांत का भावार्थ समझने का प्रयास किया कि किसी भी कथन के अभिप्रायः को समझना आवश्यक है। अभिप्रायः इस बात पर निर्भर करता है कि कथन किस अपेक्षा से किया गया है। वस्तुतः कथन असंख्य अपेक्षाओं से किया जाता है किन्तु मुख्यतया सात अपेक्षाएँ होती है जिसका विवेचन यहाँ किया जा रहा है। अपेक्षाओं को जानने के सिद्धांत को नय कहते है।

नयसिद्धांत वक्ता के आशय या कथन को तत्कालिक संदर्भ में सम्यक प्रकार से समझने की पद्धति है।

जैसा पहले बताया गया कि प्रत्येक द्रव्य में अनंत गुण-धर्म रहे हुए होते है। उन अनंत गुण-धर्मों में से किसी एक को प्रमुखता देना, दूसरों को गौण रखते हुए और अन्य गुण-धर्मों का निषेध न करते हुए, एक को मुख्यता से व्यक्त करना या जाननानय ज्ञानकहलाता है।

सात नय (सप्तनय) इस प्रकार है:-

1-नैगमनय
2-संग्रहनय
3-व्यवहारनय
4-ॠजुनय
5-शब्दनय
6-समभिरूढनय
7-एवंभूतनय

1-नैगमनयनैगमनय संकल्प मात्र को पूर्ण कार्य अभिव्यक्त कर देता है। उसके सामान्य और प्रयाय दो भेद होते है। काल की अपेक्षा से भी नैगमनय के तीन भेद, भूत नैगमनय, भविष्य नैगमनय और वर्तमान नैगमनय होते है।

विषय के उलझाव से बचने के लिए यहाँ विस्तार में जाना अभी उचित नहीं है। कल उदाहरण दिया ही था कि नैगमनय निगम का अर्थ है संकल्प। नैगम नय संकल्प के आधार पर एक अंश स्वीकार कर अर्थघटन करता है। जैसे एक स्थान पर अनेक व्यक्ति बैठे हुए है। वहां कोई व्यक्ति आकर पुछे कि आप में से कल मुंबई कौन जा रहा है? उन में से एक व्यक्ति बोला – “मैं जा रहा हूँ। वास्तव में वह जा नहीं रहा है, किन्तु जाने के संकल्प मात्र से कहा गया कि जा रहा हूँ। इस प्रकार संकल्प मात्र को घटित कथन कहने पर भी उसमें सत्य का अंश रहा हुआ है। नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

भूत नैगमनय - भूतकाल का वर्तमान काल में संकल्प करना जैसे दशहरे के दिन कहना आज रावण मारा गया। जबकि रावण को मारे गए बहुत काल बीत गया। यह भूत नैगमनय की अपेक्षा सत्य है।

भविष्य नैगमनय - जैसे डॉक्टरी पढ रहे विद्यार्थी को भविष्य काल की अपेक्षा सेडॉक्टर साहबकह देना भविष्य नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

वर्तमान नैगमनयजैसे सोने की तैयारी करते हुए कहना किमैं सो रहा हूँवर्तमान नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

इस प्रकार नैगमनय के परिप्रेक्ष्य में कथन की अपेक्षा को परख कर, सत्यांश लेकर, कथन के अभिप्रायः को निश्चित करना अनेकांत या अपेक्षावाद का नैगमनय है।

2-संग्रहनयसंग्रहनय एक शब्द मात्र में एक जाति की अनेक वस्तुओं में एकता या संग्रह लाता है।
जैसे कहीं व्यक्ति प्रातः काल अपने सेवक से कहे- ‘ब्रश लाना तोऔर मात्रब्रशकहने से सेवक ब्रश, पेस्ट, जिव्हा साफ करनें की पट्टी, पानी की बोतल, तौलिया आदि वस्तुएं ला हाजिर करे तो वह सभी दातुन सामग्री की वस्तुएँ ब्रश शब्द में संग्रहित होने से ब्रश कहना संग्रहनय की अपेक्षा सत्य है।
इस प्रकार कई शब्द एक वस्तुनाम के भीतर समाहित होने से संग्रहनय की अपेक्षा से सत्य है इस सत्यांश द्वारा अभिप्रायः सुनिश्चित करना अपेक्षावाद या सापेक्षता नियम है।

क्रमशः……………

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