6 सितंबर 2011

मधुबिन्दु


मैने एक कथा सुनी………

एक व्यक्ति घने जंगल में अंधेरे से भागा जा रहा था कि एक कुंए में गिरने को हुआ। गिरते गिरते उसके हाथ में कुएं पर झुके वृक्ष की ड़ाल आ गई। वहां कुछ प्रकाश भी था। उसनें नीचें झांका तो कुएं में चार विकराल अजगर मुंह फाड़े उपर ताक रहे थे। वे उसके गिरने का इन्तज़ार ही कर रहे थे। उसनें आस पास देखा तो, जिस डाल को पकड़ वह लटक रहा था, दो चुहे, एक काला एक सफेद, उसी डाल को कुतर रहे थे। इतनें में एक विशाल हाथी कहीं से चला आया और अपनी सूंढ़ से वृक्ष के तने को पकड़ कर हिलाने लगा। वह व्यक्ति डर से सिहर उठा। ठीक उपर की शाखा पर मधुमक्खी का छत्ता था, हाथी के हिलाने से मक्खियाँ उडने लगी। 

छत्ते से शहद-बिंदु टपकने लगा। एक बिंदु टपककर उसकी नाक से होता हुआ होठों तक आ पहुँचा। उस व्यक्ति ने प्यास से सूख रही अपनी जीभ को होठों पर फेरा, एक छोटे से मधु बिन्दु में अनंत आनन्द भरा मधुर स्वाद था। उसे लगा जैसे जीवन में मुझे इसी मिठास की तलाश थी, यही मेरा चीर-प्रतिक्षित उद्देश्य था। उसने मुंह उपर किया, कुछ क्षणों बाद फ़िर मधु-बिन्दु मुंह में टपका। वह मस्त हो गया। बेताबी से अगली बूंद का इन्तजार करता। और फिर रसास्वादन कर प्रसन्न हो उठता। आस पास खड़ी विपत्तियों को भूल चुका था। हवा में लटका, हाथी पेड गिराने पर आमदा, चुहे डाल कुतरने में व्यस्त और नीचे चार अज़गर उसका निवाला बना देने को आतुर। किन्तु वह तो एक एक बिन्दु का स्वाद लेने में मस्त था। 

उसी जंगल से शिव-पार्वती अपने विमान से गुज़र रहे थे। पार्वती नें उस मानव की दुखद स्थिति को देखा और शिव से उसे बचा लेने का अनुरोध किया। भगवान शिव नें विमान को उसके निकट ले जाते हुए हाथ बढाया और उस व्यक्ति को कहा- मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं, आओ, विमान में आ जाओ, मै तुम्हें तुम्हारे इच्छित स्थान पर छोड दूँगा। उस व्यक्ति नें कहा- ठहरिए भगवन् एक शहद बिन्दु चाट लूं तो चलुं। एक बिन्दु फिर एक बिन्दु। हर बिन्दु के बाद, अगले बिन्दु के लिए उसकी प्रतिक्षा प्रबल हो जाती। उसके आने की प्रतिक्षा में थक कर आखिर, भगवान शिव ने विमान आगे बढ़ा दिया।

आप इस कथा का सटीक भावार्थ बताएं, क्या कहना चाहती है यह कथा?

प्रतीक हिंट्स:
  • घने जंगल का अंधेरा = अज्ञान
  • डाली = आयुष्य
  • काले सफेद चुहे = दिन रात
  • चार अज़गर = चार गति
  • हाथी =घमंड़, अभिमान
  • मधु बिन्दु = संसार-सुख
  • शिव = कल्याण (मुक्ति) उपदेश
  • पार्वती = शक्ति, पुरूषार्थ प्रेरणा

आप कथा के अपने दृष्टिकोण से भाव प्रकट करने में स्वतंत्र है।

51 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छी बोध कथा
    बातो का अर्थ समझा कर बहुत अच्छा किया
    ये सत्य है ये संसार हमको भर्मित करता है
    इसका आकर्षण बहुत तेज है

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  2. बहुत सुंदर कथा ...सार है ...जीवन में निरंतर चलते रहें ...लिप्त न हों ...लिप्त होने से रुक जाती है प्रगति ...

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  3. पहली बात तो चित्र बेहद अच्छा लगाया है
    अब बात कथा की.......
    इस कथा को हर लेवल पर फिट किया जा सकता है
    विद्यार्थी जीवन , पेशे/व्यवसाय जीवन में मानव मन छोटे छोटे सुखों में उलझा जाता है , ऐसा नहीं की सुखों को ना भोगे .. अवश्य भोगे लेकिन उतना ही जितनी आवश्यकता हो , अन्यथा सच्चे विकास का मार्ग रुक जाएगा ..
    इसीलिए सत्संग को जीवन में शामिल भी करना चाहिए इससे मन / माइंड री-सेट हो जाता है , जीवन जीने की युक्तियाँ प्राप्त होती हैं

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  4. कबीर जी ने कहा है

    कुशल कुशल ही पूछते, जग में रहा न कोय
    जरा भई न भय मुआ ते कुशल कहाँ ते होय.

    आपने अपनी इस सुन्दर कहानी में सम्पूर्ण 'जीवन दर्शन'
    ही प्रस्तुत कर दिया है.'प्रेय' की आस में 'श्रेय'
    को ठुकराते रहते हैं हम .'शिव' कल्याण का ही स्वरुप हैं,
    अज्ञान और आसक्तियों में उलझे रहने के कारण हम जीवन
    रहते भी अपना कल्याण नहीं कर पाते.और फिर यही कहना
    पड़ता है अंत में
    'अब पछताए क्या होत है,जब चिडियाँ चुग गयीं खेत'.

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  5. या फिर कुछ ऐसा भी मान सकते हैं की स्ट्रेस लेवल हाई होने पर छोटे छोटे सुख [रीलीफ ] मिलने भर से संघर्ष का अंत ना समझें , अक्सर ऐसा ही होता है

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  6. हम तो शहद चाटने में ही व्यस्त हैं।

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  7. अपने लोभ के आगे हम खुद को फंसा लेते हैं और वहाँ ईश्वर भी नाकामयाब होते हैं... अन्यथा ईश्वर तो हमेशा हाथ बढ़ाते हैं

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  8. ghareloo janjaalon me ulajhe rahnaa kyaa madhu chaatnaa kahaa jaayegaa... bahut samay se yahii sochtaa rahtaa hoon... kyaa ghar-grihasthi chhodkar vairaagy le loon? ... kisse maargdarshan kii apekshaa karoon ... khud to uljhaa hii rahtaa hoon... parivaar ke prati apne kartwyon ko nibhaate huye hii jeewan samaapt kar doon kyaa?

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  9. बड़ी अच्छी लगी बोधकथा ....... ईश्वर है तो पर हमें शायद फुर्सत नहीं की उन्हें देखे ...समझें

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  10. क्षमा करें प्रतुल जी, थोडी देर हो गई। कहीं वैराग्यवासित न हो गए हों :)
    यह सही है रस्सी के दो सिरे होते है, पर बीच में भी असंख्य पडाव होते है।
    उसी तरह संसार-मोह और वैराग्य के बीच समाधान कारक स्थिति सम्भव है।

    अनुपमा त्रिपाठी जी नें कहा ही है 'लिप्त न हों'

    सम्यक विवेकी नर वही, करे कुटुम्ब प्रतिपाल।
    अन्तर से अलिप्त रहे, ज्यों धाय खिलावे बाल॥

    ज्यों धाय खिलावे बाल का अर्थ है जैसे दाय माँ सगे पुत्र समान मोह से अलिप्त रहते हुए कर्तव्य भाव से बच्चे का लालन-पालन करती है।

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  11. वंदे मातरम !

    बढ़िया बोधकथा लिखी हैआदरणीय सुज्ञ जी !


    आपकी अन्य प्रविष्टियों की तरह ही सहजता से विद्वता की प्रस्तुति …


    आपको सपरिवार
    बीते हुए हर पर्व-त्यौंहार सहित
    आने वाले सभी उत्सवों-मंगलदिवसों के लिए
    ♥ हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !♥
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  12. आदरणीय भाई सुज्ञ जी, जहां तक मैं समझ सकता हूँ मुझे तो यही लगा कि अज्ञानतावश दिन रात अपने अहंकार में चूर एक व्यक्ति सांसारिक सुखों में फंसा हुआ है| ऐसे में उसे मुक्ति भी नही भा रही|
    किन्तु यहाँ इस कहानी में अहंकार के कारण सांसारिक सुख मिल रहा है, जबकि सांसारिक सुख के कारण अहंकार आने की बात मुझे अधिक सही लगती है|
    भाई साहब मैं इतनी गहरी बात समझने में थोडा कमज़ोर हूँ| आपने तो उत्सुकता बढ़ा दी| अब कृपया जल्दी से अँधेरा तो छांटिए|

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  13. अस्सी के दशक में समाज को तीन भाग में बाँट एक अनुभवी महिला को कहते सुना था, "बंगाली का माथा / आसामी का कथा / बिहारी का खाता"...
    यह भी सत्य है कि छोटे से छोटे विषय पर भी मानव समाज 'ॐ' को प्रतिबिंबित करते (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) समान तीन भाग में बंट जाता प्रतीत होता है - विषय का अनुमोदन; विरोध; और न अनुमोदन न विरोध...

    यद्यपि योगिराज कृष्ण कहते हैं उन्होंने दो प्रकार के ही मानव बनाए हैं - देवता और राक्षस, अर्थात परोपकारी और स्वार्थी... उन्होंने भी अर्जुन का रथ मित्रों और शत्रु दोनों दलों के बीच ला खड़ा करने के पश्चात, उपदेश दे और न समझ पाने के कारण दिव्य चक्षु दे उसे परम सत्य से अवगत कराया...
    और बुद्ध के 'मध्य मार्ग' समान, योगेश्वर शिव नटराज भी मानव को दोनों के बीच - रस्सी पर संतुलन करते जैसे - जीवन यापन का संकेत देते हैं...

    गीता में भी कृष्ण कह गए कि जो आत्मा काल-चक्र में प्रवेश पा जाती है उसको तीनों तरह के कर्म करने ही पड़ेंगे, किसी को छूट नहीं है - सात्विक, राजसिक, और तामसिक... किन्तु जो 'ज्ञानी' है, वो इन से लिप्त नहीं होता...
    'नेकी कर कुएं में डाल' विचार अपनाता है!
    फिर भी 'नासमझ' जिसके साथ नेकी करता है उसे ही कुवें में डाल देता है कभी कभी!
    और यही 'कृष्णलीला है', कह सकते हैं...
    कृष्ण भी कहते हैं कि आप ज्ञानी हो या विज्ञानी, आपको आत्म समर्पण करना आवश्यक है यदि परम सत्य को पाना है, जो पृथ्वी पर शरीर में बंदी आत्मा / मानव जीवन का उद्देश्य भी है :)

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  14. प्रेरक कथा!!
    दिवस जी की बातो से सहमत ! हम अपने स्वार्थ में इतने उलझ जाते है की अपना हित अहित भूल जाते हैं ! धन्यवाद !!

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  15. बोध कथा अच्छी लगी ...
    सभी प्रतिक्रियाएं पढ़ी , आपके विश्लेषण का इंतजार रहेगा !

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  16. आध्यात्म और भौतिकता को परिभाषित करती सरल बोध कथा.

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  17. सम्यक विवेकी नर वही, करे कुटुम्ब प्रतिपाल।
    अन्तर से अलिप्त रहे, ज्यों धाय खिलावे बाल॥

    @ अच्छी राह दिखायी ... तभी तो आपसे मन की उलझन कह लेता हूँ. मालुम है कि यहीं सुलझ भी सकता हूँ........... आभार मित्र.

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  18. सुज्ञ भैया, आपकी कहानी तो बहुत ही सुन्दर है, और आपका दिया भावार्थ यह है कि हम सांसारिक सुख रुपी मधु के लालच में विमान से मुक्ति के रास्ते को ठुकरा रहे हैं |

    अब ज़रा इसी कथा के अर्थ कुछ बदल दें? let us look at it with another point of view

    घने जंगल का अंधेरा = अज्ञान जनित निराशा और दुःख दर्द | [असल में तो अँधेरा है नहीं, यह तो हमारा अज्ञान है - प्रकाश का अभाव है, जो हमें ऐसा दिखाता है कि सब ओर अँधेरा है , actually god is everywhere, omnipresent]

    डाली = पिछले पुण्य कर्मों से संचित मानव योनी में आयु का सीमित समय , जो एकमात्र निमित्त है ईश्वर तक पहुँचने का , पर जिसे हम उस तक जाने के पुल के बजाये अपने संबल के साधन मात्र के रूप में प्रयुक्त कर रहे हैं |

    काले सफेद चुहे = दिन रात जो हमारी सीमित समयावधि को लगातार काटते हुए कम करते जा रहे हैं |

    चार अज़गर = अहंकार - जो काम , क्रोध , लोभ , मोह के चलते हमें सब ओर से सब चीज़ों को भयावह बना कर दिखा रहा है , डरा रहा है और हमें निगल जाने को तत्पर है |

    हाथी = माया - जो हमें अपनी स्थिति की भयावहता पर केन्द्रित - और अधिक केन्द्रित कर रही है, जिसकी वजह से हम अपने समय को और अधिक कस कर पकड़ लेते हैं, उस डाली पर इतने केन्द्रित हो जाते हैं कि यह नहीं देख पाते कि वही डाली एक पुल की तरह हमें इन सब से पार ईश्वर तक ले जाने का रास्ता भी बन सकती थी | हम अपने routine समय बंधन ( meaningless tight schedule of time for just survival like animals - eat, sleep, reproduce and stock up for future ) को इतना कस के पकडे हैं कि देख ही नहीं पाते कि उस समय (डाली) का उपयोग हम जो सिर्फ survive करने के लिए कर रहे हैं, उसी डाली का हम दूसरे रूप में (एक पुल के रूप में ) उपयोग करते तो वही डाली (समय) हमें प्रभु तक पहुंचा सकती थी ,,, उस किनारे जिस पर वह डाली खुद जुडी है, वह हमें वहां पहुंचा सकती थी !!!!!

    मधु बिन्दु = ईश्वर रुपी मधु छत्ते से हमारी ओर बार बार आती आनंद की लगातार लहरें, जो हमें सारे सांसारिक बंधनों से पल भर के लिए आज़ाद करा देती हैं और हमारा ध्यान इन चीज़ों से हटा कर पल भर को उस चिर सुख के छत्ते पर लगा देती हैं | परन्तु माया रुपी हाथी, अहंकार का अजगर, दिन रात के routine के चूहे हमारा ध्यान उस से फिर खींच लेते हैं और हमें संसार में फिर रमा देते हैं | हम अपने schedule से इतना कस कर बंधे हैं कि हम अपने बंधन में कसे सिर्फ उस बूँद (सत्संग) से ही खुश हो जाते हैं , परन्तु यह सत्संग जिस ओर इशारा कर रहा है, उस ओर पल भर को देख कर हम फिर संसार में रम जाते हैं, उस छत्ते (ईश्वर) की ओर विमान (उपदेश के दिखाए रास्ते) पर बैठ कर जाना ही नहीं चाहते |

    मधु का छत्ता = ईश्वर का दिव्य प्रदेश |

    शिव = सदगुरु, जो हमें प्रभु प्राप्ति पर पहुंचाने के लिए विमान लिए खड़े हैं |

    विमान = सदगुरु के उपदेश , जिन्हें हम देख सुन कर भी अनदेखा अनसुना किये जा रहे हैं, उन पर जाना नहीं चाहते और समय (डाली) को पुल या राह के बजाये संबल समझ कर संतुष्ट हैं |

    पार्वती = सदगुरु की कृपा ( जो हमारे लगातार कु-पात्रता दर्शाते जाने के बावजूद भी ) सदगुरु को प्रेरित करती है कि वे हम पर कृपा बनाए रखें |

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  19. मानव शरीर नवग्रह के रसों से बना है, जिस में शनि ग्रह का सार स्नायु तंत्र के रूप में आठ चक्रों में भंडारित शक्ति को मेरुदंड पर उपस्थित आठ चक्रों के बीच मूलाधार से सहस्रार तक, या सहस्रार से नीचे मूलाधार तक, पहुँचाने का माध्यम है... उसी प्रकार उसके प्रतिबिम्ब समान, जब मैं दिल्ली से मुंबई रेल से सफ़र करता हूँ, अथवा वापिस आता हूँ, तो जैसे कुछ मुख्य जंक्शन आदि के अतिरिक्त कुछ छोटे मोटे स्टेशन भी पड़ते हैं और वहां से कुछेक यात्री भी अपने अपने गंतव्य तक सफ़र करते हैं...
    गीता में मानव को उल्टा वृक्ष भी बताया गया है, जिसकी जड़ें पृथ्वी पर न हो कर आकाश में हैं...

    और हम जानते हैं कि वृक्ष भोजन कि सामग्री मानव समान ही पृथ्वी से ऊपर पत्तों तक उठा सूर्य की ऊर्जा से खाना पका उसके अपने विभिन्न भागों तक पहुंचाता है, मूल से मूल तक एक चक्र...

    इस कारण कहा जा सकता है कि मानव का मूल में हाथी (गणेश और उसका वाहन चूहा!) मंगल ग्रह का सार है और सहस्रार में चन्द्रमा का सार (गणेश की माँ पार्वती अथवा दुर्गा) मधु! जिस तक योगी का प्रयास होता है सारी भोजन सामग्री को आठों चक्रों से उठा ऊपर तक पहुंचा मधु (सोमरस, अमृत) के घड़े को सदैव भरा रखना...:)

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  20. पोस्ट तो पोस्ट ...............कमेंट्स भी लाजवाब............

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  21. बंधुश्री दिवस गौड जी,

    @ जहां तक मैं समझ सकता हूँ मुझे तो यही लगा कि अज्ञानतावश दिन रात अपने अहंकार में चूर एक व्यक्ति सांसारिक सुखों में फंसा हुआ है|

    >>व्यक्ति 'अहंकार में चूर' नहीं, तृष्णा के मोह में लिप्त है। क्षणिक सुख-भोग की लालसा में आसक्त है। एक बूंद से दूसरी बूंद मध्य की दयनीय दुखद प्रतिक्षा से भी भ्रांत आनंद पा रहा है।
    (कथा में उसके हलन चलन से मक्खियों के डंक मारने का उल्लेख छूट गया था, जो दुखों को मधु-मोह वश सहने का प्रतीक था।)

    @ ऐसे में उसे मुक्ति भी नही भा रही|

    >> उसे मुक्ति तो भा रही है पर। आसक्त होने के कारण प्रलोभन से उभर नहीं पा रहा है। जैसे व्यसनी को व्यसनमुक्ति भाती तो है,पर व्यसन उसे ललचाता है, वह छोड नहीं पाता।

    @ किन्तु यहाँ इस कहानी में अहंकार के कारण सांसारिक सुख मिल रहा है,

    >> अहंकार से एक विशेष सुख मिलता हीं। जैसे दबंग लोग धौस जमाकर कार्य भी करवाते है। और मन ही मन खुश भी होते है। ऐसी अहंकारी दबंगई का प्रदर्शन देखकर, बाल से व्यस्क होते व्यक्ति में भी अहंकार जन्म लेता है। यही अहंकार पूरे जीवन को झिंझोड़ता रहता है। गिराने, पतन की सीमा तक।
    (वस्तुतः हाथी भी उसे दौडता देखकर ही पिछे पड़ा था, अज्ञान की दौड(प्रतिस्पृदा) से अहंकार का पिछे लग जाना)

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  22. इस कथा को जीवन की कई परिस्थितियों से मेल करके देखा जा सकता है और इसके कई और भी अर्थ और बिम्ब खोजे जा सकते हैं.. सुगी जी! पोस्ट के साथ साथ विद्वज्जनों की टिप्पणियाँ भी बहुत कुछ सिखाती हैं!!

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  23. सारा सुख वैराग्य में ही नहीं , कुछ तो है जो मोह में भी है। एक बार सुख का स्वाद चखने के बाद उसके मोह से विरत होना दुष्कर है। और शायद एक साधारण मनुष्य इस सुख से वंचित होना भी नहीं चाहता। यही तो अंतर है सन्यासी और अनुरागी में।

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  24. शिल्पा दीदी,
    आपका प्रस्तुत भावार्थ सही है।
    किन्तु जो दूसरा दृष्टिकोण आपने प्रस्तुत किया, उसमें मधु बिन्दु, मधु छत्ता, शिव का विमान की संगति नहीं बैठ रही।
    मधु बिन्दु अगर ईश्वरीय आनन्द की लहरे है,और मधु का छत्ता अगर ईश्वर का दिव्य प्रदेश। तो पार्वती रूपी सदगुरु की कृपा उसके दुख से द्रवित हो, उस सुख से बचाने का क्यों अनुरोध करेगी। और जिसे ईश्वर का दिव्य प्रदेश मिल गया उसे विमान रूपी उपदेश की क्या आवश्यकता?

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  25. बहुत ही ज्ञानवर्धक प्रस्‍तुति ...आभार ।

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  26. बहुत ही अच्छी बोध कथा| हम सांसारिक सुख के लालच में मुक्ति के रास्ते को ठुकरा रहे हैं|

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  27. सभी विद्वज्जनों ने कथा के गर्भित शिक्षा तक पहुँचने में हमारी सहायता की है।
    बोध कथा के सार से सभी सहमत है।

    क्षणिक सुखों का ऐसा मोहक नशा हम पर हावी रहता है कि चारों तरफ के कष्ट दुखों को अनभिज्ञ होकर झेलते हुए हम प्रमादी हो जाते है, रहती है तो मात्र तृष्णा। और शास्वत सुख हो भी सकता है, हम कल्पना तक नही कर पाते और कल्याण मार्ग को ही ठुकरा देते है।

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  28. संसार सुख के समक्ष इंसान सब कुछ भूल जाता है...बहुत सुन्दर कथा...

    नीरज

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  29. पहले कहानी ... फिर आपकी व्याख्या ... अब इसके बाद कुछ व्याख्या करने और मानने का मन नहीं कर रहा ..... बह्हुत खूब ... सारगर्भित सुग्य जी ...

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  30. खुद को ज्ञानवान ही नहीं, अज्ञानी कहने में भी अहंकार है। संसार में आए हैं,तो शहद-बिंदु चाटने में भी कोई बुराई नहीं;इसका स्वाद भी सबके नसीब में नहीं होता। बस,इतना ध्यान रहे कि स्वाद क्षणिक रहे और उसका आनन्द यह समझ कर लिया जाए कि यही असली स्वाद नहीं है।

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  31. हिंदी दिवस पर सबको शुभकामनाएं! आइए हम सब मिलकर इस खूबसूरत और समृद्ध भाषा के विस्तार और विकास में अपना अपना योगदान दे इससे हिंदी के साथ साथ हमारा अपना भी भला होगा ऐसा मेरा विचार/मानना है!!

    आपकी राय जरुर दे !!

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  32. ji haan sugya bhaiya - sahi kahaa - theek se sangati nahi baith rahi ....

    :)

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  33. यह बोधकथा का अर्थ इतना ही है कि व्‍यक्ति चारों तरफ दुखों से घिरा है लेकिन फिर भी एक बूंद सुख को त्‍यागना नहीं चाहता अर्थात उसी में मस्‍त हो जाता है, अपनी मुक्ति के साधन को भी ठुकरा देता है। लेकिन इस कहानी का एक वास्‍तविक रूप यह भी है कि ऐसी विपरीत परिस्थिति में भूख प्‍यास सब हवा हो जाती है, पहले व्‍यक्ति अपने बचाव के साधन ढूंढता है। जब जहाज डूब रहा होता है और कोई नाव बचाने को आती है तब व्‍यक्ति सामने रखा भोजन पहले नहीं खाता, पहले भागकर बचता है।

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  34. प्राचीन 'सिद्ध पुरुषों', 'योगियों' के दृष्टिकोण से 'सत्य' प्रतीत होता प्राणी / मानव जीवन केवल निराकार 'परम सत्य' की लीला है! जो स्वयं तो शून्य स्थान और काल से सम्बंधित है, किन्तु जिसका प्रभाव अनंत शून्य ब्रह्माण्ड, कृष्ण अंतरिक्ष, के भीतर व्याप्त है... अन्य अनंत साकार रूपों में से एक, हमारी पृथ्वी अर्थात धरा, गंगाधर शिव, को भी - जिसने 'हमें', अनंत काल से श्रंखला बद्ध तरीके से, (हिमालयी श्रंखला समान सांकेतिक द्योतक), भी धरा है...

    प्रत्येक प्राणी को थोड़े से समय के लिए ही किन्तु :(
    जिस कारण प्रत्येक को सीमित काल में 'परम सत्य' तक पहुँचने के लिए अपने मानसरोवर रुपी मन में भी अनुमान लगाना होगा...

    इस में सहायक हो सकती हैं हमारी कथा-कहानियां...

    जैसे हाथी रुपी गणेश को विष्णु के प्रथम अवतार ग्राह ने अपने जबड़े में 'मूलाधार' में जकड़ा हुआ है, और मध्य में छह ('६) अन्य ग्राह (छह मुंह वाला कार्तिकेय) बाधा रूप में शिव ने बैठाए हुए हैं और गणेश की माँ. गंगाधर शिव के मस्तक पर विराजमान होते हुई भी, अपने पुत्र के वियोग में आंसू बहा रही है - मधु बिंदु समान जीवन दाई सोमरस जिसकी मात्र एक बूँद अन्य ग्राहों से शेष बचने पर गणेश को भी अमृत रखने में सहायक है...

    किन्तु माँ से वियोग तभी समाप्त हो सकता है जब विष्णु की माया को 'गणेश' रुपी हाथी मकडजाल समान शिव द्वारा रचित मायाजाल को तोड़ने में सक्षम हो जाए, सभी सार का योग कर... जो बिना प्रयास, कुण्डलिनी जागरण, के संभव नहीं है...
    और उसके लिए कृष्ण / विष्णु के अष्टम अवतार की ही प्रार्थना आवश्यक है...

    "जय श्री कृष्ण", शिल्पा जी के "कान्हा", और कुछ के "श्रीनाथ जी", आदि आदि, बहुरूपिया कृष्ण के अनंत अन्य रूप :)

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  35. हमें अपने पूर्वजों से पता तो है कि विष्णु के अष्टम अवतार पर तो स्वयं योगेश्वर विष्णु (निराकार नादबिन्दू, पृथ्वी के केंद्र में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति, 'परम सत्य') / (साकार, ब्रह्माण्ड के सार, सत्यम शिवम् सिन्दरम में वर्णित, अर्थात साकार का सत्य, अर्थात सत्व) गंगाधर शिव ने सब कुछ अनादि काल से / साढ़े चार अरब वर्षों से छोड़ा हुआ है - जिससे वे साधना में लीन रह सकें, अनंत काल तक...

    किन्तु शिव का प्रतिरूप मानव, केवल अविश्वास के कारण, देवताओं के गुरु बृहस्पति में 'आत्म समर्पण' करने में हिचकिचाता है - जिनका स्थान मानव शरीर में नाभी में माना जाता है, जहां से तथाकथित उत्पन्न हुए कमल के फूल पर ब्रह्मा जी अर्थात सूर्य / इंद्र देवता आकाश में बैठे हुए हैं :)

    अर्जुन पुत्र अभिमन्यु को भी महारथियों ने चक्रव्यूह में घेर धराशायी किया, क्यूंकि वो अज्ञानी था, जबकि अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य से सिक्षा पा कर चक्रव्यूह में प्रवेश और सही सलामत उस से बाहर आना जानता था,,, किन्तु वो भी 'परम सत्य' को नहीं जानता था, जिसके लिए कृष्ण को जन्म ले द्वापर युग का अंत तो करना ही था, 'कृष्ण लीला' के एक चरण में, जो ब्रह्मा के एक दिन में १,०००+ बार आता है, क्यूंकि काल-चक्र में सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग, और कलियुग के योग से बना महायुग बार बार आता है, जब तक ब्रह्मा की रात नहीं आ जाती... और ब्रह्मा के एक और नए दिन में यही महायुग का अनंत चक्र फिर से आरम्भ हो जाता है... और एक नयी रात आजाती है जब सब आत्माएं कृष्ण में समा जाती हैं, उसी स्तर से एक और नए दिन में अपनी यात्रा आरम्भ करने...

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  36. वाह,बहुत अच्छी सीख देती हुई बोध कथा

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  37. लालच बुरी बला होती है |वह मनुष्य शहद के लालच में यह भी भूलगया कि जैसे ही वह नीचे गिरेगा अजगर उसे अपना भोजन बना लेंगे वह क्षणिक प्रलोभन से अपने को नहीं बचापाया |
    आशा

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  38. इस पोस्ट को बार बार पढकर और सभी टिप्पणियों को पढकर अच्छा ज्ञानवर्धन हुआ.
    अनुपम सार्थक प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार,सुज्ञ जी.

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  39. नयी पोस्ट का इन्तजार है

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  40. कठिन है 'आम आदमी' का इसे समझ पाना, फिर भी यद्यपि शब्दों से इसका वर्णन कठिन है, प्रयास कर रहा हूँ हंसराज जी...

    वृक्ष के समान, (मूल, तना, और हरे-भरे पत्तों के बीच मीठे फल), मानव शरीर को भी तीन भाग में बंटा देखा जा सकता है...
    एक घट समान शून्य, सर में सबसे ऊपर मस्तक में 'सहस्रार चक्र', जिसमें चन्द्रमा का सार है; और उसके नीचे शिव का अधिकतर बंद, तीसरे नेत्र, अर्थात 'अजना चक्र' में गंगाधर शिव अर्थात पृथ्वी का सार...

    और नीचे वाले शून्य, अर्थात घट, धड में, सीने में ('अनहत चक्र' में) अमृत राक्षस राहू का सर (अर्थात अल्ट्रा वायोलेट किरण का सार),; उसके नीचे पेट में ('मणिपुराका चक्र', सोलर प्लेक्सस में), सूर्य का सार; नाभि में ('स्वाधिस्थान चक्र' में) राहू के धड, अर्थात इन्फ्रारेड किरण, का सार; और उसके नीचे, नाभि और 'मूलाधार चक्र' जिसमें मंगल गृह का सार (गणेश हैं), के बीच सूर्य की आरम्भिक ऊर्जा का सार (काली की लाल जिव्हा), अर्थात गणेश के वाहन, भूरे-काले चूहे, यानी रिद्धि -सिद्धि...

    सर और धड के बीच गले (नादबिन्दू अर्थात 'विशुद्धि चक्र') में शुक्र ग्रह का सार (कार्तिकेय/ नीलकंठ महादेव/ नीलाम्बर कृष्ण), अर्थात 'विष' - कुवें में विषधर - जो शक्ति को ऊपर माथे तक पहुँचने में, गणेश और पार्वती के मिलन में, बाधा हेतु 'चैक पोस्ट',,, जिसको केवल शिव के निर्देश पर ही किसी व्यक्ति विशेष, योगी, के भीतर विघ्नहर्ता गणेश और पार्वती का मिलन संभव है, अर्थात उसका 'कुण्डलिनी जागरण' शेषनाग के जागने पर ही संभव हो सकता है :)

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  41. नोट - करणी माता, देशनोक राजस्थान के मंदिर में (जैसा टीवी के किसी चैनल में देख पता चला) भूरे और काले चूहे अधिकतर दिखाई देते हैं... और सफ़ेद चूहे को देखा जाना अत्यंत शुभ माना जाता है... उस मंदिर में कहते हैं केवल ४-५ सफ़ेद चूहे हैं जिन्हें स्वयं करणी माता और उनके परिवार के सदस्यों के ही प्रतिरूप माना जाता है...

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  42. बहुत सुन्दर आलेख के साथ ही सुन्दर साज-सज्जा भी है ब्लॉग की.

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  43. हमारे पूर्वज, सिद्ध पुरुष, आदि के माध्यम से निराकार ब्रह्म, नादबिन्दू अर्थात अनंत शक्ति के पुंज, 'परम सत्य' ने हमें, उसके विभिन्न काल के 'सत्य', अथवा विभिन्न युग को प्रतिलक्षित करते प्रतिरूप / शक्ति पुंज दर्शाया - एक योगी, अर्थात अष्ट-चक्र के माध्यम से 'चौंसठ योगिनियों' द्वारा बना एक शक्ति पुंज... वैसे ही जैसे फल वृक्ष की अतिरिक्त शक्ति अथवा ऊर्जा को दर्शाता है, जो उसे अपने जीवन के लिए आवश्यक नहीं है - उसे तीनों लोक का कोई प्राणी अपने हित में ग्रहण कर सकता है... जिसके भाग्य में हो, इत्यादि इत्यादि...
    और अंततोगत्वा सभी प्राणी, का शरीर, प्रत्येक शव की मिटटी पृथ्वी, गंगाधर शिव में ही मिल जाती है... योगी इस लिए कह गए, "शिवोहम!" एवं "तत त्वम् असी"! 'में वास्तव में अनंत आत्मा हूँ, और तुम भी वही हो, सभी परमात्मा के अंश'!

    इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति, पशु जगत का प्राणी, उसकी मर्जी से आया है, और जैसे मानव द्वारा निर्मित मानव हित में, (और द्वैतवाद के कारण अहित में भी) बनायी जाती प्रतीत होती हैं, उसी प्रकार 'हम' भी कुछ उसके उद्देश्य पूर्ती हेतु कुछ रोल निभा रहे हैं , जिनको जान पाना सामन्यतः हमारी पहुँच के बाहर हैं... किन्तु परमात्मा से जो सीधा सम्बन्ध स्थापित करलें, तपस्या / साधना द्वारा, कुण्डलिनी जागरण द्वारा जैसे, केवल वो ही मानव का उद्देश्य जान सकता है...
    और सिद्ध पुरुषों, हमारे पूर्वजों के माध्यम से हमें बताया गया है कि वो केवल परम सत्य को मानव जीवन में ही पाना संभव है, और जितना शीघ्र पा लें उतना अच्छा (प्रहलाद, ध्रुव, आदि समान!).... ..

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  44. विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
    नवीन सी. चतुर्वेदी

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  45. पहली बार इस ब्लॉग पर आने का
    सौभाग्य प्राप्त हुआ..आकर प्रसन्नता
    हुई.. आभार !

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  46. बहुत बढ़िया बोधात्मक कहानी प्रस्तुति के लिए आभार!

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  47. आपके ब्लॉग पर पहली बार आया अच्छा लगा...

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  48. is sansar mein sukh aur dukh ke beech fasa manushya jyada se jyada pane ki lalsa mein jeevan ke mool uddeshya ko bhool jata hai jo ki mukti hai...vah mukti pane ke sadhan chodkar sansakarik prapancho mein fasa rahta hai aur charo gatiyon mein ghumta rahta hai...uska aagyan, abhiman use sahi rasta nahin dikhla pata..

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