16 नवंबर 2010

बंधन

एक दार्शनिक जा रहा था। साथ में मित्र था। सामने से एक गाय आ रही थी, रस्सी गाय के बंधी हुई और  गाय मालिक रस्सी थामे हुए। दार्शनिक ने देखा, साक्षात्कार किया और मित्र से प्रश्न किया- “बताओ ! गाय आदमी से बंधी है या आदमी गाय से बंधा हुआ है?” मित्र नें तत्काल उत्तर दिया “यह तो सीधी सी बात है, गाय को आदमी पकडे हुए है, अतः गाय ही आदमी से बंधी हुई है।
दार्शनिक बोला- यदि यह गाय रस्सी छुडाकर भाग जाए तो आदमी क्या करेगा? मित्र नें कहा- गाय को पकडने के लिये उसके पीछे दौडेगा। तब दार्शनिक ने पूछा- इस स्थिति में बताओ गाय आदमी से बंधी है या आदमी गाय से बंधा हुआ है?  आदमी भाग जाए तो गाय उसके पीछे नहिं दौडेगी। जबकि गाय भागेगी तो आदमी अवश्य उसके पीछे अवश्य दौडेगा तो बंधा हुआ कौन है? आदमी या गाय। वस्तुतः आदमी ही गाय के मोहपाश में बंधा है।
व्यवहार और चिंतन में यही भेद है।
मानव जब गहराई से चिंतन करता है तो भ्रम व यथार्थ में अन्तर स्पष्ठ होने लगता है। 
___________________________________________

26 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...कितनी सच्ची बात कितने सरल अंदाज़ में समझाई है दार्शनिक ने...हम सभी गाय से बंधे हैं अब ये गाय घर हो पैसा हो जिंदगी हो...

    उत्तर देंहटाएं
  2. मानव जब गहराई से चिंतन करता है तो सत्य व भ्रम में अन्तर स्पष्ठ होने लगता है।सच है लेकिन चिंतन करे तब तो.

    उत्तर देंहटाएं
  3. गहराई से चिंतन करने को प्रेरित करती हुई पोस्ट !

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहा गुरु देव..मान गए. आगे भी उम्मीद करते हैं इसी तरह का ज्ञान प्राप्त होता रहेगा.

    आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  5. हंसराज जी! जीवन का यथार्थ बताता एक दर्शन..किंतु कितने भटके इंसान इसे समझ नहीं पाते औरभ्रम में जीते हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  6. @नीरज जी,
    सच कहा, हमें गुमान है कि सबको हमने बांध रखा है,पर हम ही मोह माया वश सबसे बंधे हुए है।

    @मासूम साहब,
    सच है, चिंतन करें तब ही।

    उत्तर देंहटाएं
  7. @दिव्या जी,

    अन्तर में चैतन्य बिराजमान है,अवश्य चिंतन होगा।

    @अनामिका जी,

    गुरु नहिं, ज्ञानाभिलाषी हूं, (कहीं प्रवचनकार बाबा न मान लेना):-))

    उत्तर देंहटाएं
  8. @सलिल जी,

    दुर्लभ होता है यथार्थ पा लेना, भ्रममोही के लिये तो दुष्कर!

    उत्तर देंहटाएं
  9. "मानव जब गहराई से चिंतन करता है तो सत्य व भ्रम में अन्तर स्पष्ठ होने लगता है।"
    बिलकुल सही-- धीरे-धीरे,चिंतन करते हुए सोच मं परिवर्तन संभव है...
    जब तक आदमी है गाय से बंधा है जब दार्शनिक हो जाता है तो गाय बंध जाती है उससे...

    उत्तर देंहटाएं
  10. सत्य है , फर्क है हमारे नजरिये में

    उत्तर देंहटाएं
  11. तर्कों की कोई सीमा है क्या ?

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत गहन विचार प्रस्तुत किया है आपने। आभार। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    विचार-श्री गुरुवे नमः

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत ही गहरी बात समझाई है……………उम्दा प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  14. सुज्ञ जी

    बिल्कूल सही बात कहा है आप ने की असल में तो बंधन में हम है लेकिन ये बंधन हमी ने बाधे है और समस्या ये है कि हम में से ज्यादातर इससे मुक्त होना ही नहीं चाहते है |

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है! हार्दिक शुभकामनाएं!
    लघुकथा – शांति का दूत

    उत्तर देंहटाएं
  16. अर्चना जी,
    अभिषेक जी,
    राम त्यागी जी,
    पूरविया जी,
    मनोज जी,
    वन्दना जी,
    अंशुमाला जी,

    आभार आपका, आपने सही चिंतन किया।

    जब गाय से हमारे बंधे होने का अहसास होता है, चिंतन वहीं से शुरु होता है। बंधन में रहते हुए भी बंधन से निर्लेप भाव स्थापित होता है।

    आप सभी का आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  17. राजभाषा हिंदी संचालक महोदय,

    हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये आपका प्रोत्साहन भी सराहनीय है!

    उत्तर देंहटाएं
  18. ये छोटे-छोटे कथानक जीवन-सूत्र समेटे रहते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  19. ..

    सुज्ञ जी
    मैंने जब इस 'बंधन' कथा को पढ़ा तब मन में आया कमेन्ट भाग गया. मैं उसे फिर पकड़कर लाया. लेकिन वो फिर भाग गया.
    अब आप बताइये — मैं कमेन्ट से बंधा हूँ या फिर कमेन्ट मुझसे बँधा है?

    कमेन्ट एक गाय है और मैं उस कमेन्ट-गाय को पकड़ने वाला दूधिया.
    कमेन्ट में जो अर्थ रूपी दूध होता है उसे हम और आप पीते हैं.
    दूधिया-धर्म कभी आप निभाते हो तो कभी मैं, तो कभी अन्य कमेन्ट-गाय पकड़ने वाले पाठक.

    __________
    आपने बहुत प्रेरणास्पद कथा सुनायी.

    ..

    उत्तर देंहटाएं
  20. सुज्ञ जी,
    व्यवहार और चिंतन का भेद ही तो जीवन-पथ को आलोकित करता है !
    अच्छी पोस्ट है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    उत्तर देंहटाएं
  21. माया का चरित्र खोल कर रख दिया ... सत्य भी तो एक माया ही है ...

    उत्तर देंहटाएं
  22. गहन चिन्तन को सरल बोधकथा के माध्यम से बहुत सुन्दर ढंग से समझाया है। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  23. कुमार राधारमण
    अनुराग जी
    वाणी गीत जी
    ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी
    दिगम्बर नासवा जी
    और,
    निर्मला कपिला जी,

    आभार आपका सराहना के लिये, आपकी प्रेरणा ही मेरी सही सोच को संबल देती है।

    उत्तर देंहटाएं

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...