27 जुलाई 2010

भोग-उपभोग

हानि न विष से हो सकी, जब तक किया न पान ।
पर क्रोध के उदय मात्र से,  भ्रष्ट हो गया ज्ञान ॥1॥

सुलग रहा  संसार यह,  जैसे वन की आग ।
फ़िर भी मनुज लगा रहा?, इच्छओं के बाग ॥2॥

साझा-निधि जग मानकर, यथा योग्य ही भोग ।
परिग्रह परिमाण कर,  जीवन एक सुयोग ॥3॥

6 टिप्‍पणियां:

  1. सचमुच जीवन एक सुयोग ही तो है !

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  2. अरविन्द जी,आपके आने से मन हर्षित हो गया।

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  3. @ साझा-निधि जग मानकर, यथा योग्य ही भोग ।
    सारे फसाद की जड़ ही आवश्यकता से अधिक संग्रह प्रवृत्ति है..........बेहतरीन ज्ञान

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  4. समीर जी,
    अमीत जी,
    सही फ़र्माया आपने, यह जगत हमारे सहित सभी जीवों की सम्पत्ति है।
    सम्पदा का हम दोहन न करें,आवश्यक उपयोग ही करें। यही भाव था।

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