22 जुलाई 2010

संतोष

मनुज जोश बेकार है, अगर संग नहिं होश ।
मात्र कोष से लाभ क्या, अगर नहिं संतोष ॥1॥

दाम बिना निर्धन दुःखी, तृष्णावश धनवान ।
कहु न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान ॥2॥

धन संचय यदि लक्ष्य है, यश मिलना अति दूर।
यश - कामी को चाहिये, त्याग शक्ति भरपूर ॥3॥

11 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर विचार ! लेखनी भी काबिले तारीफ़ !

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  2. आप की रचना 23 जुलाई, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

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  3. धन्यवाद्……………अभार…………॥ इन्द्रनील ज़ी

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  4. धन्यवाद……………अभार…………॥ अनामिका ज़ी

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  5. साहित्य को समृद्ध करने वाली रचना, आभार! यदि आपकी अनुमति हो तो आपकी रचनाओं को हम आपके नाम से प्रिंट मीडिया में उपयोग कर सकते है. एक बार फिर से आभार और साधुवाद!

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  6. संदेशात्मक दोहे..बहुत अच्छे लगे

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  7. पुरुषोत्तम जी,

    आप उपयोग कर सकते है, बस ध्यान रहे इसका उपयोग व्यंग्य की तरह न हो।

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  8. संगीता स्वरूप जी,
    आभार!!

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  9. सुन्दर रचना, सुन्दर विचार! हार्दिक आभार!

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