23 जुलाई 2010

उपकार



आत्म प्रशंसा में जुटे, दिखते है सब लोग ।
अपने सुख के वास्ते, ये बांट रहे हैं रोग ॥1॥


पर उपकार तूं किहा करे, कर अपनो उपकार ।
अहम घटे समता बढे, देह धरे का सार ॥2॥


तन की आंखें बंद कर, मन की आंखें खोल ।
मुख से बाते तब कर, जब ले उसको तोल ॥3॥

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सी उम्दा विचार व प्रस्तुती ,ऐसे ही लिखते रहिये एक न एक दिन तो समझना ही परेगा सभी को क्योकि जीवन अगर सच्चाई से जीना है तो कुछ कडुवे मगर फायदेमंद बातों को अपनाना ही होगा ...

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  2. धन्यवाद!! जयकुमार जी,
    आपने उपादेयता बता दी…। पुनः आभार

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. बहुत बढ़िया विचार प्रवाह ............... इसी तरह नीर-क्षीर विवेक से हमें सत्य दर्शन कराते रहिये

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  5. श्री शरीफ जी ने दुनिया की सबसे संकीर्ण जाति के मिथकों में से एक उपदेश ढूंढने में सफलता पाई, परंतु नजर पड़ गई .दिये।झूठी है यह कहानी। होंगे।2-सुज्ञ जैसे लोग बताते हैं कि महाभारत का युद्ध परमाणु अस्त्रों से लड़ा गया था। सो वहां तो परमाणु विकिरण ने सारे पेड़ और लाशें ही जला डाली होंगी। फिर वहां मृतक और बेरी का पेड़ होना असंभव है।3-इसके बावजूद यह सच्ची बात है कि भूख बहुत पीड़ा और अपमान देती है।4-इस बात को आप दलितों के जीवन की, बाबा साहब के जीवन की सच्ची घटनाओं के माध्यम से भी तो कह सकते थे, क्यों

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  6. अमीत जी,

    आपकी सराहना मेरे उत्साह का संबल है।
    आभार आपका

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  7. प्रार्थना जी,
    यदि यह व्यंग्य है,तो आपका शुक्रिया।
    और यदि प्रशसा है,तो मेरी वो औकात नहिं।
    और हां दोहों की विद्या,मात्राओं आदि का अनुसरण नहिं कर पाया हूं।

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  8. @ तन की आंखें बंद कर, मन की आंखें खोल ।
    इतना करतें ही तो परमात्मा प्रत्यक्ष हो जायेगा

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