11 दिसंबर 2010

ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए






मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।
अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।
जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए।
इसलिए मैं लिखता अन्तिम दीन के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए॥
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16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही नेक काम के लिए लिखते हैं आप....
    हमेशा ही लिखते रहे...

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  2. नमन गुरुदेव.. इतना कुछ कहा है आपने कि अभिभूत हैं हम अभी तक... सचमुच ये विचार सच्चे मोतियों की तरह हैं..

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  3. मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।
    अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।

    सही सीख देती सही कविता.

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  4. विचार तो सुन्दर है पर यथार्थ में हम इसे लागु नहीं कर पाते है |

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  5. शेखर जी,
    आना जी,
    सम्वेदना बंधु,

    सराहना के लिये आभार जी

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  6. संगीता स्वरुप जी,
    कुसुमेश जी,
    डॉ॰ मोनिका शर्मा जी,

    बहुत बहुत आभार प्रोत्साहन के लिये

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  7. अंशुमाला जी,
    भारतीय नागरिक जी,

    आभार आपका,सराहना के लिए।

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  8. बहुत सुंदर विचार पेश किया आप ने कविता के रुप मे, धन्यवाद

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  9. अच्छी बात है जी प्रयास यूं ही जारी रखें

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  10. सुन्दर!
    आपका ये यकीन बरकरार रहे....

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  11. जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
    पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
    आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
    और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए ..


    सच है जिस रफ़्तार से देश बदल रहा है .... संवेदनाएँ मार रही हैं ... जल्दी ही ऐसा हो जाएगा अगर नही जागे तो ...

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