2 अक्टूबर 2012

अहिंसा की सार्वभौम शक्ति

आज वैश्विक अहिंसा दिवस है, भारत के लिए यह गौरव का प्रसंग है कि विश्व को अहिंसा की इस अवधारणा का अर्पण किया। 15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

भारत में आदिकाल से, कुछ अपवादों को छोड़कर अहिंसा के प्रयोग प्रायः व्यक्तिगत ही हुए है। किन्तु महात्मा गांधी ने अहिंसा का मंथन कर अनेक प्रयोग द्वारा अहिंसा को सामूहिक साध्य बनाया। अतएव विश्व को अहिंसा की सामुहिक प्रस्थापना के प्रेरक महात्मा गांधी है। निष्ठापूर्वक सामूहिक प्रयोग ही अहिंसा की गति में तीव्रता ला सकते है और उसे अधिक क्षमतावान बना सकते है। महात्मा गांधी के इस अवदान के लिए समग्र विश्व ॠणी रहेगा।

मार-काट जबरदस्ती दंड या अत्यधिक दबाव द्वारा समाज में परिवर्तन का क्षणिक आभास आ सकता है परन्तु वास्तविक या स्थायी परिवर्तन नहीं आता। स्थायी परिवर्तन के लिए अहिंसा को ही माध्यम बनाना होगा। हिंसक मानसिकता में परदुख कातरता नहीं होती परिणाम स्वरूप हिंसकता शोषक बन जाती है। हिंसा पहले अन्याय के प्रतिकार का आवरण ओढ़ती है और हिंसा से शक्ति सामर्थ्य व सत्ता मिलते ही वह स्वयं अत्याचार और शोषण में बदल जाती है। परिणाम स्वरूप नए शोषित व असंतुष्ट पैदा होते है। और हिंसा-प्रतिहिंसा का एक दुष्चक्र चलायमान होता है। परिवार समाज देश और विश्व में यदि शांति के संदर्शन हो सकते है तो वह मात्र अहिंसा से ही।

वर्तमान युग में हिंसा के साधनो की प्रचुरता और तनाव उपार्जित अधैर्य नें हिंसा की सम्भावनाओं को अनेक गुना बढ़ा दिया है। हिंसा द्वारा हिंसा का उन्मूलन कर अहिंसा की प्रतिष्ठा सम्भव ही नहीं। स्याही से सने वस्त्र को स्याही से धोना बुद्धिमत्ता नहीं, स्याही के दाग पानी से ही धोए जा सकते है, ठीक उसी प्रकार हिंसा का प्रतिकार अहिंसा से ही किया जा सकता है। यदि कोई कहे कि हम हिंसा का प्रतिकार हिंसा से ही करेंगे तो यह दुराशा मात्र है।

कुछ लोगों की ऐसी धारणा बन गई है कि अहिंसा केवल धार्मिक क्षेत्र की वस्तु है, मगर यह भ्रांति है। अहिंसा का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। मानव जीवन के जितने भी क्षेत्र है, सभी अहिंसा की क्रिड़ा-भूमि है। धर्म, राजनीति, समाज, अर्थनीति, व्यापार, अध्यात्म, शिक्षा, स्वास्थ्य और विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में अहिंसा का अप्रतिहत प्रवेश है। उसके लिए न स्थान की कोई सीमा है और न काल की किसी परिधि से आबद्ध है। अहिंसा किन्तु परन्तु के विचलन से प्रभावित होते ही स्वच्छंद बनकर विपरित परिणामी हो जाती है।

जो लोग अहिंसा को कायरता का चिन्ह कहकर अहिंसात्मक प्रतिकार को अव्यवहार्य मानते है, उन्होने जिन्दगी की पोथी को अनुभव की आंखों से नहीं पढ़ा। वे अहिंसा की असीम शक्ति से अनभिज्ञ है और अहिंसा के स्वरूप को भी शायद नहीं समझते। क्या ईंट का जवाब पत्थर से देना या पद-पद पर संघर्ष करना ही शूर-वीरता का लक्षण है? अहिंसक प्रतिकार द्वारा दूसरे के हृदय पर विजय पाना ही शूर-वीरता है। हिंसा के मार्ग पर चलने वाले आखिर ऊब जाते है, थक जाते है और उससे हटने को तैयार हो जाते है। जिन्होने बड़े जोश के साथ लड़ाईयां लड़ी और कत्ले आम किया, उन्हे भी अन्त में सुलह करने को तैयार होना पडा। अतएव हिंसा का मार्ग राजमार्ग नहीं है, अहिंसा का मार्ग ही राजमार्ग और व्यवहार्य मार्ग है।

आज अहिंसा दिवस पर यह निश्चय करें कि- धैर्य की उर्वरक हृदय भूमि पर अहिंसा निष्कंटक फले-फूले।

24 सितंबर 2012

माली : सम्यक निष्ठा

उपवन में नए सुन्दर सलौने पौधे को आया पाकर एक पुराना पौधा उदास हो जाता है। गहरा निश्वास छोड़ते हुए कहता है, “अब हमें कोई नहीं पूछेगा अब हमारे प्रेम के दिन लद गए, हमारी देखभाल भी न होगी।“

युवा पौधे को इस तरह बिसूरते देख पास खड़े अनुभवी प्रौढ़ पेड़ ने कहा, “इस तरह विलाप-प्रलाप उचित नहीं हैं ।और  न ही नए  पौधे से ईर्ष्या करना योग्य  है।“

युवा पौधा आहत स्वर में बोला, “तात! पहले माली हमारा कितना ध्यान रखता था, हमें कितना प्यार करता था। अब वह अपना सारा दुलार उस  नन्हे पौधे को दे रहा है। उसी के साथ मगन रहता है, हमारी तरफ तो आँख उठाकर भी नहीं देखता।“

प्रौढ़ पेड़ ने समझाते हुए कहा, “वत्स! तुम गलत सोच रहे हो, बागवान सभी को समान स्नेह करता है। वह अनुभवी है, उसे पता है कब किसे अधिक ध्यान की आवश्यकता है। वह अच्छे से जानता है, किसे देखभाल की ज्यादा जरूरत है और किसे कम।“

युवा पौधा अब भी नाराज़ था, बोला- “नहीं तात! माली के मन पक्षपात हो गया है, नन्हे की कोमल कोपलों से उसका मोह अधिक है। वह सब को एक नज़र से नहीं देखता।“

अनुभवी पेड़ ने गम्भीरता से कहा- “नहीं, वत्स! ऐसा कहकर तुम माली के असीम प्यार व अवदान का अपमान कर रहे हो। याद करो! बागवान हमारा कितना ध्यान रखता था। उसके प्यार दुलार के कारण ही आज हम पल्ल्वित, पोषित, बड़े हुए है। हरे भरे और तने खड़े है। उसी के अथक परिश्रम से आज हम इस योग्य है कि हमें विशेष तवज्जो की जरूरत नहीं रही। तुम्हें माली की नजर में वात्सल्य न दिखे, किन्तु हम लोगों को सफलता से सबल बना देने का गौरव, उसकी आँखो में महसुस कर सकते हो। वत्स! अगर माली का संरक्षण व सुरक्षा हमें न मिलती तो शायद बचपन में ही पशु-पक्षी हमारा निवाला बना चुके होते या नटखट बच्चे हमें नोंच डालते। हम तो नादान थे, पोषण पानी की हमें कहां सुध-बुध थी, होती तो भी कहां हमारे पैर थे जो भोजन पानी खोज लाते? हम तो जन्मजात मुक है, क्षुधा-तृषा बोलकर व्यक्त भी नहीं कर सकते। वह माली ही था जिसने बिना कहे ही हमारी भूख-प्यास को पहचाना और तृप्त किया। उस पालक के असीम उपकार को हम कैसे भूल सकते है।“

युवा पौधा भावुक हो उठा- “तात! आपने मेरी आँखे खोल दी। मैं सम्वेदनाशून्य हो गया था। आपने यथार्थ दृष्टि प्रदान की है। ईर्ष्या के अगन में भान भूलकर अपने ही निर्माता-पालक का अपमान कर बैठा। मुझे माफ कर दो।“

युवा पौधा प्रायश्चित का उपाय सोचने लगा, अगले ही मौसम में फल आते ही वह झुक कर माली के चरण छू लेगा। दोनो ने माली को कृतज्ञ नजरों से देखा और श्रद्धा से सिर झुका दिया।

18 सितंबर 2012

सामर्थ्य का दुरुपयोग

एक था चूहा, एक थी गिलहरी। चूहा शरारती था। दिन भर 'चीं-चीं' करता हुआ मौज उड़ाता। गिलहरी भोली थी।'टी-टी' करती हुई इधर-उधर घूमा करती।

संयोग से एक बार दोनों का आमना-सामना हो गया। अपनी प्रशंसा करते हुए चूहे ने कहा, "मुझे लोग मूषकराज कहते हैं और गणेशजी की सवारी के रुप मे रूप में खूब जानते हैं। मेरे पैने-पैने हथियार सरीखे दांत लोहे के पिंजरे तो क्या, किसी भी चीज को काट सकते हैं।"

मासूम-सी गिलहरी को यह सुनकर  बुरा सा लगा। बोली, "भाई, तुम दूसरों का नुकसान करते हो, फायदा नहीं। यदि अपने दाँतों पर तुम्हें इतना गर्व है, तो इनसे कोई नक्काशी क्यों नहीं करते? इनका उपयोग करो, तो जानू! जहां तक मेरा सवाल है, दाँत तो मेरे भी तेज है,कितना भी कठोर बीज हो तोड, साफ करके संतोष से खा लेती हूं। पर मनमर्जी दुरुपयोग नहीं करती। मुझ में कोई खाश गुण तो नहीं पर मेरे बदन पर तीन धारियां देख रहे हो न, बस ये ही मेरा संदेश है।"

चूहा बोला, "तुम्हारी तीन धारियों की विशेषता क्या है?"

गिलहरी बोली, "वाह! तुम्हें पता नहीं? दो काली धारियों के बीच एक सफेद धारी है। यह तमस के मध्य आशाओँ का प्रकाश है। दो काली अंधेरी रातों के बीच ही एक सुनहरा दिन छिपा रहता है, भरोसा रखो। यह प्रतीक है कि कठिनाइयों की परतों के बीच मेँ ही असली सुख बसता है।" संदेश सुनकर चूहा लज्जित हो गया।

सामर्थ्य का उपयोग दूसरोँ को हानि पहुँचाने मेँ नहीं, उनके मार्ग में आशा दीप जगाने मेँ होना चाहिए.

14 सितंबर 2012

हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।

आज जगत में हिंसा और प्रतिहिंसा का बोलबाला है। इसका प्रमुख कारण है लोगों में अधैर्य, असहनशीलता और आक्रोश की बढ़ती दर। सुखी सम्पन्न बनने की प्रतिस्पर्धा हो या सुरक्षित जीवन यापन का संघर्ष, व्यक्ति प्रतिक्षण तनाव में जीता है। यह तनाव ही उसे आवेश और अधैर्य की ओर ले जाता है। संतुष्ट और सुखी जीवन, अहिंसक जीवन मूल्यों से ही उपार्जित किया जा सकता है। किन्तु व्यक्ति के सहनशीलता और सब्र की सोच तथा भाव परित्यक्त हो चुके होते है। अन्तत: सुख के सरल मार्ग को छोड व्यक्ति अनावश्यक संघर्ष को ही जीवट मान इठलाता है।

अन्याय का जवाब हिंसा से दिया जाना सहज सामान्य प्रवृत्ति है किन्तु निराकरण पूर्णतया निष्फल ही होता है। आवेश आक्रोश से हमारे अपने मित्र तक हमसे सहमत नहीं होते तो फिर जो अन्यायी है, अवरोधक है वे हमारे आवेश, आक्रोश व प्रतिहिंसा से कैसे सुधर सकते है। अधैर्य-असहनशीलता हमेशा आक्रोश को जन्म देती है और आक्रोश हिंसा को, हिंसा प्रतिशोध को, और प्रतिशोध सहित दो तरफा आतंक को, क्योंकि व्यक्ति अपने प्रति हिंसा के भय की प्रतिक्रिया में भी आतंक फैलाता है। प्रतिशोध और आतंक पुनः हिंसा को जन्म देते है। इस प्रकार हिंसा प्रतिहिंसा एक दुश्चक्र की तरह स्थापित हो जाती है।

मानव सहित जीव मात्र का उद्देश्य है सुखी व संतुष्ट बनना। किन्तु उसे पाने का मार्ग हमने उलटा अपना रखा है। यह असफलता पर समाप्त होने वाला मिथ्या मार्ग है, दूसरों का दमन कभी भी सुखी व संतुष्ट बनने का समाधानकारी मार्ग नहीं हो सकता। आक्रोश व प्रति-अन्याय निदान नहीं है। सुखी तो सभी बनना चाहते है लेकिन सभी को संदेह है कि दूसरे उसे सुखी व संतुष्ट नहीं बनने देंगे अतः सभी दूसरों को आतंकित कर अपने सुखों को सुरक्षित करने के मिथ्या प्रयत्न में लगे हुए है। यदि दमन ही करना है तो दूसरों का दमन नहीं अपनी वृतियों दमन करना होगा, अपने क्रोध, अहंकार, कपट, और लोभ का दमन कर क्षमा, नम्रता सरलता और संतोष को अपनाना होगा। समता, सहनशीलता, धैर्य और विवेक को स्थान देना होगा।

हमें अनुभव हो सकता है कि ऐसे जीवन मूल्य कहां सफल होते है, किन्तु सफलता के निहितार्थ तुच्छ से स्वतः उत्कृष्ट हो जाते है। सभी को यही लगता है कि अपनी ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा तो अपने लिए जरूरी साधन है किन्तु दूसरों की ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा हमारे सुखों का अतिक्रमण है। सही मार्ग तो यह है कि इस धारणा को बल प्रदान किया जाय कि दूसरे सुखी व संतुष्ट होंगे तो संतुष्ट लोग हमारे सुखों पर कभी अतिक्रमण नहीं करेंगे और सुख सभी के लिए सहज प्राप्य रहेंगे। अन्यथा जरा से सुख को लभ्य बनाने के संघर्ष में अनेक गुना प्रतिस्पर्धा अनेक गुना संघर्ष और उस सुख भोग से भी लम्बा काल संघर्ष में व्यर्थ हो जाएगा। उसके बाद सुख पाया भी (जो कि असम्भव होगा) तो उसमें आनन्द कहाँ शेष बचेगा?

इसलिए इस छोटे से जीवन को अनावश्यक संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, उठापटक में अपव्यय होने से बचाना होगा। उसका एक ही तरीका है संतोष में व्याप्त सुख को पहचानना और उसका आस्वादन करना। हिंसा प्रतिहिंसा के दुश्चक्र को समाप्त करना और अहिंसक जीवन मूल्यों को सार्थक सफलता के रूप में पहचानना होगा।

7 सितंबर 2012

आधा किलो आटा

एक नगर का सेठ अपार धन सम्पदा का स्वामी था। एक दिन उसे अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई। उसने तत्काल अपने लेखा अधिकारी को बुलाया और आदेश दिया कि मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, पता तो चले मेरे पास कुल कितनी सम्पदा है।

सप्ताह भर बाद लेखाधिकारी ब्यौरा लेकर सेठ की सेवा में उपस्थित हुआ। सेठ ने पूछा- “कुल कितनी सम्पदा है?” लेखाधिकारी नें कहा – “सेठ जी, मोटे तौर पर कहूँ तो आपकी सात पीढ़ी बिना कुछ किए धरे आनन्द से भोग सके इतनी सम्पदा है आपकी”

लेखाधिकारी के जाने के बाद सेठ चिंता में डूब गए, 'तो क्या मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मरेगी?' वे रात दिन चिंता में रहने लगे।  तनाव ग्रस्त रहते, भूख भाग चुकी थी, कुछ ही दिनों में कृशकाय हो गए। सेठानी द्वारा बार बार तनाव का कारण पूछने पर भी जवाब नहीं देते। सेठानी से हालत देखी नहीं जा रही थी। उसने मन स्थिरता व शान्त्ति के किए साधु संत के पास सत्संग में जाने को प्रेरित किया। सेठ को भी यह विचार पसंद आया। चलो अच्छा है, संत अवश्य कोई विद्या जानते होंगे जिससे मेरे दुख दूर हो जाय।

सेठ सीधा संत समागम में पहूँचा और एकांत में मिलकर अपनी समस्या का निदान जानना चाहा। सेठ नें कहा- "महाराज मेरे दुख का तो पार नहीं है, मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मर जाएगी। मेरे पास मात्र अपनी सात पीढ़ी के लिए पर्याप्त हो इतनी ही सम्पत्ति है। कृपया कोई उपाय बताएँ कि मेरे पास और सम्पत्ति आए और अगली पीढ़ियाँ भूखी न मरे। आप जो भी बताएं मैं अनुष्ठान ,विधी आदि करने को तैयार हूँ”

संत ने समस्या समझी और बोले- "इसका तो हल बड़ा आसान है। ध्यान से सुनो सेठ, बस्ती के अन्तिम छोर पर एक बुढ़िया रहती है, एक दम कंगाल और विपन्न। उसके न कोई कमानेवाला है और न वह कुछ कमा पाने में समर्थ है। उसे मात्र आधा किलो आटा दान दे दो। अगर वह यह दान स्वीकार कर ले तो इतना पुण्य उपार्जित हो जाएगा कि तुम्हारी समस्त मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। तुम्हें अवश्य अपना वांछित प्राप्त होगा।"

सेठ को बड़ा आसान उपाय मिल गया। उसे सब्र कहां था, घर पहुंच कर सेवक के साथ क्वीन्टल भर आटा लेकर पहुँच गया बुढिया के झोपडे पर। सेठ नें कहा- “माताजी मैं आपके लिए आटा लाया हूँ इसे स्वीकार कीजिए”

बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा आटा तो मेरे पास है, मुझे नहीं चाहिए”

सेठ ने कहा- "फिर भी रख लीजिए"

बूढ़ी मां ने कहा- "क्या करूंगी रख के मुझे आवश्यकता नहीं है"

सेठ ने कहा- "अच्छा, कोई बात नहीं, क्विंटल नहीं तो यह आधा किलो तो रख लीजिए"

बूढ़ी मां ने कहा- "बेटा, आज खाने के लिए जरूरी, आधा किलो आटा पहले से ही  मेरे पास है, मुझे अतिरिक्त की जरूरत नहीं है"

सेठ ने कहा- "तो फिर इसे कल के लिए रख लीजिए"

बूढ़ी मां ने कहा- "बेटा, कल की चिंता मैं आज क्यों करूँ, जैसे हमेशा प्रबंध होता है कल के लिए कल प्रबंध हो जाएगा"  बूढ़ी मां ने लेने से साफ इन्कार कर दिया।

सेठ की आँख खुल चुकी थी, एक गरीब बुढ़िया कल के भोजन की चिंता नहीं कर रही और मेरे पास अथाह धन सामग्री होते हुए भी मैं आठवी पीढ़ी की चिन्ता में घुल रहा हूँ। मेरी चिंता का कारण अभाव नहीं तृष्णा है।

वाकई तृष्णा का कोई अन्त नहीं है। संग्रहखोरी तो दूषण ही है। संतोष में ही शान्ति व सुख निहित है।

अन्य सूत्र......
आसक्ति की मृगतृष्णा
मधुबिन्दु
लोभ
भोग-उपभोग

31 अगस्त 2012

ध्यान की साधना और मन की दौड़

एक व्यक्ति ने किसी साधु से कहा, "मेरी पत्नी धर्म-साधना-आराधना में बिलकुल ध्यान नहीं देती। यदि आप उसे थोड़ा बोध दें तो उसका मन भी धर्म-ध्यान में रत हो।"

 साधु बोला, "ठीक है।""

अगले दिन प्रातः ही साधु उस व्यक्ति के घर गया। वह व्यक्ति वहाँ नजर नहीं आया तो  साफ सफाई में व्यस्त उसकी पत्नी से साधु ने उसके बारे में पूछा। पत्नी ने कहा, "वे चमार की दुकान पर गए हैं।"

पति अन्दर के पूजाघर में माला फेरते हुए ध्यान कर रहा था। उसने पत्नी की बात सुनी। उससे यह झूठ सहा नहीं गया। त्वरित बाहर आकर बोला, "तुम झूठ क्यों बोल रही हो, मैं पूजाघर में था और तुम्हे पता भी था।""

साधु हैरान हो गया। पत्नी ने कहा- "आप चमार की दुकान पर ही थे, आपका शरीर पूजाघर में, माला हाथ में किन्तु मन से चमार के साथ बहस कर रहे थे।"

पति को होश आया। पत्नी ठीक कह रही थी। माला फेरते-फेरते वह सचमुच चमार की दुकान पर ही चला गया था।  कल ही खरीदे जूते क्षति वाले थे, खराब खामी वाले जूते देने के लिए, चमार को क्या क्या सुनाना है वही सोच रहा था। और उसी बात पर मन ही मन चमार से बहस कर रहा था।

पत्नी जानती थी उनका ध्यान कितना मग्न रहता है। वस्तुतः रात को ही वह नये जूतों में खामी की शिकायत कर रहा था, मन अशान्त व असन्तुष्ट था। प्रातः सबसे पहले जूते बदलवा देने की बेसब्री उनके व्यवहार से ही प्रकट हो रही थी, जो उसकी पत्नी की नजर से नहीं छुप सकी थी।

साधु समझ गया, पत्नी की साधना गजब की थी और ध्यान के महत्व को उसने आत्मसात कर लिया था। निरीक्षण में भी एकाग्र ध्यान की आवश्यकता होती है। पति की त्रृटि इंगित कर उसे एक सार्थक सीख देने का प्रयास किया था।

धर्म-ध्यान का मात्र दिखावा निर्थक है, यथार्थ में तो मन को ध्यान में पिरोना होता है। असल में वही ध्यान साधना बनता है। यदि मन के घोड़े बेलगाम हो तब मात्र शरीर को एक खूँटे से बांधे रखने का भी क्या औचित्य?

29 अगस्त 2012

उदार मानस, उदात्त दृष्टि

पुराने जमाने की बात है। ग्रीस देश के स्पार्टा राज्य में पिडार्टस नाम का एक नौजवान रहता था। वह उच्च शिक्षा प्राप्त कर विशिष्ट विद्वान बन गया था।

एक बार उसे पता चला कि राज्य में तीन सौ जगहें खाली हैं। वह नौकरी की तलाश में था ही। इसलिए उसने तुरन्त अर्जी भेज दी।लेकिन जब नतीजा निकला तो मालूम पड़ा कि पिडार्टस को नौकरी के लिए नहीं चुना गया था।

जब उसके मित्रों को इसका पता लगा तो उन्होंने सोचा कि इससे पिडार्टस बहुत दुखी हो गया होगा, इसलिए वे सब मिलकर उसे आश्वासन देने उसके घर पहुंचे।

पिडार्टस ने मित्रों की बात सुनी और हंसते-हंसते कहने लगा, "मित्रों, इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे तो यह जानकर आनन्द हुआ है कि अपने राज्य में मुझसे अधिक योग्यता वाले तीन सौ युवा हैं।"

उदात्त दृष्टि जीवन में प्रसन्नता की कुँजी है। 
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हिन्दी ब्लॉगजगत की उन्नति एक दूसरे के विकास में सहभागिता से ही सम्भव है। " together we progress " सूत्र ही सार्थ है। यश-कीर्ती की उपलब्धि भले न्यायसंगत न हो, 'टांग खींचाई' तो निर्थक और स्वयं अपने ही पांवो पर कुल्हाड़ी के समान है। सभी की सफलता के प्रति उदात्त भावना ही सामुहिक रूप से सभी की सफलता है। विकास सदैव सहयोग में ही निहित है।


'परिकल्पना सम्मान' से सम्मानित सभी ब्लॉगर/चिट्ठाकारों को बधाई!!

हिन्दी ब्लॉगजगत की विकास भावना के लिए आयोजकों को भी बधाई!!



28 अगस्त 2012

सीख के उपहार

प्राचीन मिथिला देश में नरहन (सरसा) राज्य का भी बड़ा महत्व था। वहां का राजा बड़ा उदार और विद्वान् था। अपनी प्रजा के प्रति सदैव वात्सल्य भाव रखता था। प्रजा को वह सन्तान की तरह चाहता था, प्रजा भी उसे पिता की तरह मानती थी। किन्तु उसकी राजधानी में एक गरीब आदमी था, जो हर घड़ी राजा की आलोचना किया करता। राजा को इस बात की जानकरी थी किन्तु वे इस आलोचना के प्रति उपेक्षा भाव ही रखते।

एक दिन राजा ने इस बारे में गम्भीरता से सोचा। फिर अपने सेवक को 'गेहूं के आटे के बडे मटके', 'वस्त्र धोने का क्षार', 'गुड़ की ढेलियां'   बैलगाड़ी पर लाद कर उसके यहां भेजा।

राजा से उपहार में इन वस्तुओं को पाकर वह आदमी गर्व से फूल उठा। हो न हो, राजा ने ये वस्तुएँ उससे डर कर भेजी हैं। सामान को घर में रखकर वह अभिमान के साथ राजगुरु के पास पहुँचा। सारी बात बताकर बोला, "गुरुदेव! आप मुझसे हमेशा चुप रहने को कहा करते थे। यह देखिये, राजा मुझसे डरता है।"

राजगुरु बोले, "बलिहारी है तुम्हारी समझ की! अरे! राजा को अपने अपयश का डर नहीं है उसे मात्र यह चिंता है कि तुम्हारी आलोचनाओं पर विश्वास करके कोई अभिलाषी याचना से ही वंचित न रह जाय। राजा ने इन उपहारों द्वारा तुम्हे सार्थक सीख देने का प्रयास किया है। वह यह कि हर समय मात्र निंदा में ही रत न रहो, संतुष्ट रहो, शुभ-चिंतन करो और मधुर संभाषण भी कर लिया करो। आटे के यह मटके तुम्हारे पेट पुष्टि के साथ तुम्हारे संतुष्ट भाव के लिए हैं, क्षार तुम्हारे वस्त्रो के मैल दूर करने के साथ ही मन का मैल दूर करने के लिए है और गुड़ की ये ढेलियां तुम्हारी कड़ुवी जबान को मीठी बनाने के लिए हैं।"

25 अगस्त 2012

हिंसा का बीज़

कस्बे में एक महात्मा थे। सत्संग करते और लोगों को धैर्य, अहिंसा, सहनशीलता, सन्तोष आदि के सदुपदेश देते। उनके पास सत्संग मे बहुत बड़ी संख्या में भक्त आने लगे। एक बार भक्तों ने कहा महात्मा जी आप कस्बे में अस्पताल, स्कूल आदि भी बनवाने की प्रेरणा दीजिए। महात्मा जी ने ऐसा ही किया। भक्तों के अवदान और परिश्रम से योजनाएं भी बन गई। योजनाओं में सुविधा के लिए भक्तों नें, कस्बे के नेता को सत्संग में बुलाने का निर्णय किया।

नेताजी सत्संग में पधारे और जनसुविधा के कार्यों की जी भरकर सराहना  की और दानदाताओं की प्रशंसा भी। किन्तु महात्मा जी की विशाल जनप्रियता देखकर, अन्दर ही अन्दर जल-भुन गए। महात्मा जी के संतोष और सहनशीलता के उपदेशों के कारण कस्बे में समस्याएं भी बहुत कम थी। परिणाम स्वरूप नेता जी के पास भीड कम ही लगती थी।

घर आकर नेताजी सोच में डूब गए। इतनी अधिक जनप्रियता मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होगी, अगर यह महात्मा अहिंसा आदि सदाचारों का प्रसार करता रहा। महात्मा की कीर्ती भी इतनी सुदृढ थी कि उसे बदनाम भी नहीं किया जा सकता था। नेता जी अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे।आचानक उसके दिमाग में एक जोरदार विचार कौंधा और निश्चिंत होकर आराम से सो गए।

प्रातः काल ही नेता जी पहूँच गए महात्मा जी के पास। थोडी ज्ञान ध्यान की बात करके नेताजी नें महात्मा जी से कहा आप एक रिवाल्वर का लायसंस ले लीजिए। एक हथियार आपके पास हमेशा रहना चाहिए। इतनी पब्लिक आती है पता नहीं कौन आपका शत्रु हो? आत्मरक्षा के लिए हथियार का पास होना बेहद जरूरी है।

महात्मा जी नें कहा, "बंधु! मेरा कौन शत्रु?  शान्ति और सदाचार की शिक्षा देते हुए भला  मेरा कौन अहित करना चाहेगा। मै स्वयं अहिंसा का उपदेश देता हूँ और अहिंसा में मानता भी हूँ।" नेता जी नें कहा, "इसमें कहाँ आपको कोई हिंसा करनी है। इसे तो आत्मरक्षा के लिए अपने पास रखना भर है। हथियार पास हो तो शत्रु को भय रहता है, यह तो केवल सावधानी भर है।" नेताजी ने छूटते ही कहा, "महात्मा जी, मैं आपकी अब एक नहीं सुनूंगा। आपको भले आपकी जान प्यारी न हो, हमें तो है। कल ही मैं आपको लायसंस शुदा हथियार भैंट करता हूँ।"

दूसरे ही दिन महात्मा जी के लिए चमकदार हथियार आ गया। महात्मा जी भी अब उसे सदैव अपने पास रखने लगे। सत्संग सभा में भी वह हथियार, महात्मा जी के दायी तरफ रखे ग्रंथ पर शान से सजा रहता। किन्तु अब पता नहीं, महाराज जब भी अहिंसा पर प्रवचन देते, शब्द तो वही थे किन्तु श्रोताओं पर प्रभाव नहीं छोडते थे। वे सदाचार पर चर्चा करते किन्तु लोग आपसी बातचित में ही रत रहते। दिन प्रतिदिन श्रोता कम होने लगे।

एक दिन तांत्रिकों का सताया, एक विक्षिप्त सा  युवक सभा में हो-हल्ला करने लगा। महाराज नें उसे शान्त रहने के लिए कहा। किन्तु टोकने पर उस युवक का आवेश और भी बढ़ गया और वह चीखा, “चुप तो तूँ रह पाखण्डी” इतना सुनना था कि महात्मा जी घोर अपमान से क्षुब्ध हो उठे। तत्क्षण क्रोधावेश में निकट रखा हथियार उठाया और हवाई फायर कर दिया। लोगों की जान हलक में अटक कर रह गई।

उसके बाद कस्बे में महात्मा जी का सत्संग वीरान हो गया और नेताजी की जनप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।

23 अगस्त 2012

बहादुरी का अतिशय दंभ व्यक्ति को मूढ़ बना देता है।

पुराने समय की बात है जब ठाकुरों में आन बान शान और उसका दंभ हमेशा सिर चढ़ा रहता था। गांव में एक ठाकुर और एक बनिए का घर आमने सामने था। प्रातः काल दोनो ही अपनी दातुन विधी, घर के बाहरी चौकी पर सम्पन्न किया करते थे। प्रायः ठाकुर दातुन के पश्चात भीगी मूँछों पर ताव दिया करते, और सामने बैठा बनिया भी मुंह धोने के बाद सहज ही मूँछों पर दोनों हाथ फेरा करता था। ठाकुर को अपने सामने ही एक भीरू बनिए का यूँ मूँछों पर ताव देना हमेशा नागवार गुजरता था। मन तो करता था उसी समय बनिए को सबक सिखा दे लेकिन घर परिवार की उपस्थित में  ठीक न मानकर मन मसोस कर रह जाते। प्रतिदिन की यह क्रिया उनके रोष की ज्वाला को और भी तीव्र किए जाती थी।

संयोगवश एक दिन गांव के बाहर मार्ग में दोनो का आमना सामना हो ही गया। ठाकुर ने बनिए को देखते ही गर्जना की- “क्यों बे बनिए, शूरवीरता बढ़ गई है जो हमेशा मेरे सामने ही अपनी मूँछो पर ताव देता है?” बनिया भांप गया, आज तो गए काम से। किन्तु फिर भी अपने आप को सम्हालते हुए बोला, “वीरता और बहादुरी किसी की बपौती थोडे ही है”

ठाकुर फिर गरजा- “ अच्छा!? तो निकाल अपनी तलवार, आज बहादुरी और बल का फैसला हो ही जाय”

तत्काल बनिया नम्र होते हुए बोला- "देखिए ठाकुर साहब, अगर लड़ाई होगी तो हम में से किसी एक का वीरगति को प्राप्त होना निश्चित है। मरने के बाद निश्चित ही हमारा परिवार अनाथ हो जाएगा। उन्हें पिछे देखने वाला कौन? अतः क्यों न हम पहले पिछे की झंझट का सफाया कर दें, फिर निश्चिंत होकर बलाबल की परीक्षा करें?"

ठाकुर साहब मान गए। घर जाकर, सफाया करके पुनः निर्णय स्थल पर आ गए। थोडी ही देर में बनिया जी भी आ गए। ठाकुर ने कहा- “ले अब आ जा मैदान में”

बनिए नें कहा- “ठहरीए ठाकुर साहब! क्या है कि मैं जब सफाया करने घर गया तो सेठानी नें कहा कि- यह सब करने की जरूरत नहीं आप अपनी मूँछ नीचे कर देना और कभी ताव न देने का वादा कर देना, अनावश्यक लडाई का क्या फायदा?”

"इसलिए लीजिए मैं अपनी मूँछ नीचे करता हूँ और आपके सामने कभी उन पर ताव नहीं दूँगा।"

"चल फुट्ट बे डरपोक कहीं का!!" कहते हुए दूसरे ही क्षण ठाकुर साहब, दोनो हाथों से अपना सर पकडते हुए वहीं पस्त होकर बैठ गए।

बहादुरी का अतिशय दंभ व्यक्ति को मूढ़ बना देता है।
(यह एक दंत कथा है)

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