14 सितंबर 2012

हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।

आज जगत में हिंसा और प्रतिहिंसा का बोलबाला है। इसका प्रमुख कारण है लोगों में अधैर्य, असहनशीलता और आक्रोश की बढ़ती दर। सुखी सम्पन्न बनने की प्रतिस्पर्धा हो या सुरक्षित जीवन यापन का संघर्ष, व्यक्ति प्रतिक्षण तनाव में जीता है। यह तनाव ही उसे आवेश और अधैर्य की ओर ले जाता है। संतुष्ट और सुखी जीवन, अहिंसक जीवन मूल्यों से ही उपार्जित किया जा सकता है। किन्तु व्यक्ति के सहनशीलता और सब्र की सोच तथा भाव परित्यक्त हो चुके होते है। अन्तत: सुख के सरल मार्ग को छोड व्यक्ति अनावश्यक संघर्ष को ही जीवट मान इठलाता है।

अन्याय का जवाब हिंसा से दिया जाना सहज सामान्य प्रवृत्ति है किन्तु निराकरण पूर्णतया निष्फल ही होता है। आवेश आक्रोश से हमारे अपने मित्र तक हमसे सहमत नहीं होते तो फिर जो अन्यायी है, अवरोधक है वे हमारे आवेश, आक्रोश व प्रतिहिंसा से कैसे सुधर सकते है। अधैर्य-असहनशीलता हमेशा आक्रोश को जन्म देती है और आक्रोश हिंसा को, हिंसा प्रतिशोध को, और प्रतिशोध सहित दो तरफा आतंक को, क्योंकि व्यक्ति अपने प्रति हिंसा के भय की प्रतिक्रिया में भी आतंक फैलाता है। प्रतिशोध और आतंक पुनः हिंसा को जन्म देते है। इस प्रकार हिंसा प्रतिहिंसा एक दुश्चक्र की तरह स्थापित हो जाती है।

मानव सहित जीव मात्र का उद्देश्य है सुखी व संतुष्ट बनना। किन्तु उसे पाने का मार्ग हमने उलटा अपना रखा है। यह असफलता पर समाप्त होने वाला मिथ्या मार्ग है, दूसरों का दमन कभी भी सुखी व संतुष्ट बनने का समाधानकारी मार्ग नहीं हो सकता। आक्रोश व प्रति-अन्याय निदान नहीं है। सुखी तो सभी बनना चाहते है लेकिन सभी को संदेह है कि दूसरे उसे सुखी व संतुष्ट नहीं बनने देंगे अतः सभी दूसरों को आतंकित कर अपने सुखों को सुरक्षित करने के मिथ्या प्रयत्न में लगे हुए है। यदि दमन ही करना है तो दूसरों का दमन नहीं अपनी वृतियों दमन करना होगा, अपने क्रोध, अहंकार, कपट, और लोभ का दमन कर क्षमा, नम्रता सरलता और संतोष को अपनाना होगा। समता, सहनशीलता, धैर्य और विवेक को स्थान देना होगा।

हमें अनुभव हो सकता है कि ऐसे जीवन मूल्य कहां सफल होते है, किन्तु सफलता के निहितार्थ तुच्छ से स्वतः उत्कृष्ट हो जाते है। सभी को यही लगता है कि अपनी ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा तो अपने लिए जरूरी साधन है किन्तु दूसरों की ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा हमारे सुखों का अतिक्रमण है। सही मार्ग तो यह है कि इस धारणा को बल प्रदान किया जाय कि दूसरे सुखी व संतुष्ट होंगे तो संतुष्ट लोग हमारे सुखों पर कभी अतिक्रमण नहीं करेंगे और सुख सभी के लिए सहज प्राप्य रहेंगे। अन्यथा जरा से सुख को लभ्य बनाने के संघर्ष में अनेक गुना प्रतिस्पर्धा अनेक गुना संघर्ष और उस सुख भोग से भी लम्बा काल संघर्ष में व्यर्थ हो जाएगा। उसके बाद सुख पाया भी (जो कि असम्भव होगा) तो उसमें आनन्द कहाँ शेष बचेगा?

इसलिए इस छोटे से जीवन को अनावश्यक संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, उठापटक में अपव्यय होने से बचाना होगा। उसका एक ही तरीका है संतोष में व्याप्त सुख को पहचानना और उसका आस्वादन करना। हिंसा प्रतिहिंसा के दुश्चक्र को समाप्त करना और अहिंसक जीवन मूल्यों को सार्थक सफलता के रूप में पहचानना होगा।

32 टिप्‍पणियां:

  1. चरम शब्द से प्रगटते, साधारण सा भाव ।

    चरम दशा का किस तरह, होवे भाव अघाव ।

    होवे भाव अघाव, घाव छोटे को दारुण ।

    करे महज कर्तव्य, दिखावा बडका कारूण ।

    होय जरा सी बात, हटक तिल ताड़ बनाते ।

    सहनशीलता ख़तम, फटाफट आग लगाते ।।

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  2. हिंसा में इन्सां कहाँ
    इन्सां नहीं तो सभ्यता कहाँ
    असभ्य से सभी होने पर ही इन्सां आविष्कारक हुआ
    असभ्यता तो सिर्फ पतन है ...
    अन्याय से भयमुक्त होकर चलना है
    तलवार उठाना तो लाशें गिरना है
    और लाशों में निर्णय कहाँ !

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  3. प्रसन्न रहने के स्थायी साधन ढूढ़ने होंगे।

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  4. हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है...

    सही कहा आपने ...नहीं तो अब तक कई वैश्विक समस्याओं का समाधान हो ही चुका होता ...

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  5. @अधैर्य-असहनशीलता हमेशा आक्रोश को जन्म देती है और आक्रोश हिंसा को, हिंसा प्रतिशोध को, और प्रतिशोध सहित दो तरफा आतंक को, क्योंकि व्यक्ति अपने प्रति हिंसा के भय की प्रतिक्रिया में भी आतंक फैलाता है। प्रतिशोध और आतंक पुनः हिंसा को जन्म देते है। इस प्रकार हिंसा प्रतिहिंसा एक दुश्चक्र की तरह स्थापित हो जाती है।

    - एक कहावत भी है, तलवार के दम पर जीने वाले तलवार से ही मरते हैं। हिंसा के दुष्चक्र को अहिंसा, प्रेम और समझ-बूझ से ही तोड़ा जा सकता है।

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  6. काश लोग चैन से रहना सीख लें ...

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  7. बहुत ही सशक्‍त प्रस्‍तुति ...

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  8. साधारण परिस्थितियों में जो आप कह रहे हैं - वही सही है - हिंसा प्रतिहिंसा से हल नहीं निकल पाता | किन्तु जब स्थितियां शांति पूर्ण समझौते की सीमा से बाहर हों, तब ? जैसे - राम रावण युद्ध ? क्या तब श्री राम के पास कोई और विकल्प था ? ऐसे ही महाभारत में - युद्ध को अधिक समय तक टाले जाने के कारण, शायद, आवश्यकता से कहीं अधिक रक्तपात हुआ | यदि यही युद्ध बहुत पहले हुआ होता - तब शायद हिंसा इतनी न हुई होती / होती भी तो कई पाप-पूर्ण कर्म न हुए होते |

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    1. सर्वसाधारण जन के लिए साधारण परिस्थितियों मेँ अहिँसा ही उत्कृष्ट है.
      1-असाधारण परिस्थितियोँ मेँ मन्यु व्यवहार् वस्तुतः असाधारण महामानवोँ अवतारोँ के लिए ही निश्चित है. क्योँकि उन अवतारोँ व महापुरूषोँ मेँ ही उन परिस्थितियोँ मेँ तदानुकूल विवेकशील निर्णय क्षमता होती है. ऐसे न्यायसँगत निर्णय प्रत्येक साधारण नही ले सकता.
      2-हिंसा को अपरिहार्य सिद्ध करने के लिए राम रावण युद्ध या महाभारत से तुलना ही असँगत है.

      3-युद्धोँ के इन उदाहरण को सामान्य विकल्प की तरह प्रयोग नही किया जा सकता क्योँकि यह भी युगोँ के अंतर से पूर्णतः निर्विकल्प होने के पश्चात ही विवशता से अस्तित्व मेँ आए थे.
      4-निराकरण की दृष्टि से भी देखे तो इन युद्धोँ के बाद पाप-कर्म अथवा अधर्म का जडमूल से समापन नही हुआ, आज अधर्म का अस्तित्व प्रमाण है कि हिंसा प्रतिहिंसा मे समाधान नही है.

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    2. @ साधारण जन के लिए साधारण परिस्थितियों मेँ अहिँसा ही उत्कृष्ट है.
      ---- बिलकुल है | यही तो मैंने ऊपर कहा है , और अप इस ही बात को मेरी ही बात के विपक्ष में रख रहे हैं ?|

      @ असाधारण परिस्थितियोँ मेँ मन्यु व्यवहार् वस्तुतः असाधारण महामानवोँ अवतारोँ के लिए ही निश्चित है. क्योँकि उन अवतारोँ व महापुरूषोँ मेँ ही उन परिस्थितियोँ मेँ तदानुकूल विवेकशील निर्णय क्षमता होती है. ऐसे न्यायसँगत निर्णय प्रत्येक साधारण नही ले सकता
      ---- यहबिलकुल गलत है, और यह ग़लतफ़हमी अधिकाँश लोगों को है, सिर्फ आप ही यह नहीं कह रहे हैं | मन्यु व्यवहार सिर्फ असाधारण महामानवों के लिए निश्चित कदापि नहीं है - मन्यु व्यवहार तो स्वप्रगति और समाज सुधार की राह पर चलने वाले हर व्यक्ति द्वारा आत्मसात किये जाने के प्रयास होने चाहिए | हाँ - जो "निज" के सांसारिक जीवन के और सांसारिक लाभ के आगे सोच ही नहीं सकते - वे तो मन्यु का अर्थ भी नहीं समझ सकते - आत्मसात करना तो बहुत दूर की बात है |

      फिर कुछ लोग हैं जो स्वार्थी और धन / यश के भूखे होते हैं - वे मन्यु क्या जानेंगे ? वे "निज लाभ" के लिए तो "क्रोधित" होकर हिंसा पर उतारू हो जायेंगे, और इस क्रोध और हिंसा को दैवीय कहेंगे, इसमें देवी देवताओं के "क्रोध" का उदाहरण देंगे | किन्तु "समाज / मानवता" के सुधार या लाभ की बात आएगी, तब अपने कर्त्तव्य से छुटकारा पाने के बहाने हैं यह कि "जी, हम तो अहिंसा से रहते हुए किसी "महामानव" का इंतज़ार करते रहेंगे की वह आये और सब कुछ ठीक कर दे |" ऐसे स्वभाव को शास्त्र गैरजिम्मेदाराना और निंदनीय बताते हैं | सिर्फ ऐसा करने वालों को ही नहीं, बल्कि दूसरे कर्तव्य पथ पर चलने वालों को "हिंसात्मक" कह कर पथ भ्रमित करने वालों को भी पाप पूर्ण बताया गया है |

      @ हिंसा को अपरिहार्य सिद्ध करने के लिए राम रावण युद्ध या महाभारत से तुलना ही असँगत है
      ---- आपको ऐसा लगता है ? मुझे नहीं लगता | यही तो मैं कह रही हूँ कि कुछ परिस्थितियों में अहिंसा असंगत हो जाती है और हिंसा अपरिहार्य | और साधारण स्थिति में ऐसा नहीं है - साधारण स्थितियों में अहिंसा पथ ही सर्वश्रेष्ठ है, जहां तक हो सके अहिंसात्मक तरीके से ही स्थिति सुधारने के प्रयास होने चाहिए | किन्तु जब यह असंभव हो, तो असत्य और हिंसा नाम के दो दुर्गुणों में एक का चुनाव करना हो - सिर्फ तब - "हिंसा" को "असत्य के साथ मूक दर्शक बन कर, मूक समर्थन देते हुए खड़े रहना" की अपेक्षा चुनी जानी चाहिए |

      @ युद्धोँ के इन उदाहरण को सामान्य विकल्प की तरह प्रयोग नही किया जा सकता क्योँकि यह भी युगोँ के अंतर से पूर्णतः निर्विकल्प होने के पश्चात ही विवशता से अस्तित्व मेँ आए थे
      --- बिलकुल , साधारण की बात मैं कर ही नहीं रही थी | मेरी टिपण्णी शुरू ही इस बात से हुई है |

      @ निराकरण की दृष्टि से भी देखे तो इन युद्धोँ के बाद पाप-कर्म अथवा अधर्म का जडमूल से समापन नही हुआ, आज अधर्म का अस्तित्व प्रमाण है कि हिंसा प्रतिहिंसा मे समाधान नही है.
      ---- जडमूल समापन तो न हुआ , न होगा - क्योंकि यह जग का आवश्यक स्वरुप है | पाप कर्म , पुण्य कर्म, धर्म और अधर्म - सदा रहे थे, आज भी हैं और सदा रहेंगे | हाँ हमें अपने प्रयास करते रहना है - क्योंकि यह हमारा कर्त्तव्य है |फलीभूत होगा या नहीं यह प्रयास, इसकी मांग न राखी जाए | चाहे हिंसा का पथ अपनाया जाये या अहिंसा का - इन दोनों में से एक भी नहीं मिटने वाला - क्योंकि यह जगत है ही दुक्खालायम अशाश्वतं, और यह बना ही कर्म भूमि और फल्भूमि के रूप में है | जो पापमुक्त हो जायेंगे पूरी तरह से - वे इसे छोड़ कर मोक्ष को भले चले जाएँ, किन्तु यह सोचना बहुत ही मूर्खतापूर्ण है कि कुछ लोगों के अपने निज चुने रास्तों की श्रेष्ठता या निम्नता की वजह से संसार ही अपना स्वरुप बदल लेगा , या बदल सकता है | यहाँ पाप पुण्य दोनों हमेशा रहेंगे, धर्म अधर्म भी, न्य अन्याय भी और सुख दुःख भी | अपना कर्त्तव्य चुनते हुए संसार के बदलने की मांग / पूर्व शर्त न रखी जाए, तो बेहतर हो |

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    3. @---- बिलकुल है | यही तो मैंने ऊपर कहा है , और अप इस ही बात को मेरी ही बात के विपक्ष में रख रहे हैं ?|

      - मैने तो पहली पँक्ति को शीर्षक बनाकर आपके इस अँश का समर्थन ही किया था.
      @ हाँ - जो "निज" के सांसारिक जीवन के और सांसारिक लाभ के आगे सोच ही नहीं सकते - वे तो मन्यु का अर्थ भी नहीं समझ सकते - आत्मसात करना तो बहुत दूर की बात है |
      --हाँ, मैने ऐसे तत्वोँ के द्वारा मन्यु के दुर्पयोग की सम्भावना के कारण ही इसे महापुरूषो द्वारा सेवित माना है साधारण जन स्वार्थ वश अपने क्रोध को मन्यु मेँ खपाकर हिँसा का सेवन करते है. यही कह रहा हूँ मन्यु का अर्थ भी नहीं समझते मात्र शब्द मिल जाता है अपनी हिँसा को सार्थक सिद्ध करने के लिए. न्याय की निर्णायक क्षमता चाहिए. यही तो बात है - "वे "निज लाभ" के लिए तो "क्रोधित" होकर हिंसा पर उतारू हो जायेंगे, और इस क्रोध और हिंसा को दैवीय कहेंगे, इसमें देवी देवताओं के "क्रोध" का उदाहरण देकर" वक्रता से अपनी हिँसा को सहज सार्थक सिद्ध करने का प्रयास होगा. इस मानसिकता के लोग अहिंसा का बहाना धर कर् "महामानव" का इंतज़ार नही करते, वे तो हिंसा को ही दैवीय और अपरिहार्य साबित करने का प्रयास करते है क्योँकि हिंसक तो वे हो चुके अब तो मात्र उसे सही सिद्ध करने का उपाय ही शेष रहता है.
      @ किन्तु जब यह असंभव हो, तो असत्य और हिंसा नाम के दो दुर्गुणों में एक का चुनाव करना हो - सिर्फ तब - "हिंसा" को "असत्य के साथ मूक दर्शक बन कर, मूक समर्थन देते हुए खड़े रहना" की अपेक्षा चुनी जानी चाहिए |
      --समस्या ही सत्य असत्य के निर्णय की होगी, अगर यह निर्णय हिँसा का विकल्प अपनाने वाले के हाथ ही होगा तो सत्य असत्य का निर्णय ही उसी विकल्प के प्रभाव मेँ होगा.
      @किन्तु यह सोचना बहुत ही मूर्खतापूर्ण है कि कुछ लोगों के अपने निज चुने रास्तों की श्रेष्ठता या निम्नता की वजह से संसार ही अपना स्वरुप बदल लेगा , या बदल सकता है | यहाँ पाप पुण्य दोनों हमेशा रहेंगे, धर्म अधर्म भी, न्य अन्याय भी और सुख दुःख भी | अपना कर्त्तव्य चुनते हुए संसार के बदलने की मांग / पूर्व शर्त न रखी जाए, तो बेहतर हो
      -बिलकुल!! इसी लिए मेरा यह कहना सार्थक है कि हिंसा द्वारा संसार का स्वरुप बदलने की सोच मूर्खतापूर्ण है, और अपना कर्त्तव्य चुनते हुए हिँसा की अपरिहार्यता की पूर्व शर्त निर्थक है.

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    4. वस्तुतः मैँ आपकी ही बात का समर्थन कर रहा हूँ. मैँ उन छ्द्म लोगो द्वारा उपयोग मेँ ली जाती गलतफहमी को ही उजागर करना चाहता हूँ.स्वप्रगति और समाज सुधार की आड मेँ ही हिँसा को आवश्यक बताया जाता है, प्रत्येक अगर अपने हिँसा कर्म को ही अधर्म पर धर्म की विजय बताने लगे तो अधर्म भी स्वयम् को धर्म बताकर स्थापित होने के प्रयास मेँ रहता है.छ्द्म बहानो के निर्णय कठिन होते है, और प्रत्येक बार जीत सत्यपक्षी नही होती.

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    5. जी - मैं आपकी बात समझ रही हूँ, किन्तु अपनी बात समझा नहीं पा रही :( | मैं यह कहना चाहती हूँ - कि "हिंसा यदि "मैं" के लाभ / survival लिए होनी आवश्यक प्रतीत होती है - तो यह सिर्फ एक बहाना है, हम अपनी दुष्प्रवृत्ति को मन्यु का नाम दे कर छुपा रहे हैं |

      लकिन, हिंसा यदि "समाज / धर्म " के लाभ के लिए आवश्यक है - इसमें "मैं" को भले ही क्षति हो/ तकलीफ हो / या न हो / या लाभ हो - it is immaterial कि "मैं" के साथ क्या होता है - तब यह अपरिहार्य है - तब यह मन्यु है | इस की जड़ में क्रोध और प्रतिशोध नहीं हो, सिर्फ कर्त्तव्य पूर्ती हो , तब और सिर्फ तब ही यह मन्यु है |
      उदाहरण -
      १. जो अर्जुन ने किया या भीम ने किया - वह स्वार्थ था | 'अपनी' स्त्री के अपमान का, 'अपने' और 'अपने' भाइयों के साथ हुए अन्यायों का प्रतिशोध | वह हिंसा अपरिहार्य नहीं थी |
      २. जो महाभारत में भीष्म ने किया - "मैं" के वचन के अहंकार में किया, "मैं" के पित्रमोह में दिया गया मैं का वचन - यह स्वार्थ था |
      ३. जो भगत सिंह जी ने किया उसमें क्रोध नहीं था, देश के प्रति धर्म सर्वोपरि था | उनके द्वारा की गयी हिंसा कदापि निंदनीय नहीं है |
      ४. जो महाभारत युद्ध में अभिमन्यु या घटोत्कच ने किया वह सैनिक / क्षत्रिय धर्म था | उनके द्वारा युद्ध में की गयी हिंसा कदापि निंदनीय नहीं है |

      तो हिंसा हमेशा ही निंदनीय नहीं, हमेशा ही पाप नहीं | हिंसा की "हर कीमत पर निंदा करना" कुछ ऐसे व्यक्तियों को कर्तव्य पथ से डिगा सकता है जिनके डिगने से अन्याय पोषित हो और न्याय कमजोर पड़े | तब ऐसी निंदा करने वाले उस पाप के भागीदार होंगे, जिन्होंने उस कर्त्तव्य पथी को अपने पथ से डिगाया |

      हाँ - निराकरण की जो बात आप कह रहे हैं, मेरा मानना है कि निराकरण तो न हिंसा से निकलेगा, न अहिंसा से |

      अपरिहार्य स्थितियों में भी यदि "अहिंसा" के पल्ले में छुप कर बैठे रहा जाए - तब भी हिंसा तो होगी ही, किन्तु यह दुर्जनों के प्रति नहीं लक्षित होगी, यह लाचारों और सज्जनों पर दुष्टों द्वारा की जा रही होगी | इसे पूरी तरह मिटाया भले ही न जा सके, लेकिन शक्तिवंतों का कर्त्तव्य है कि वे ऐसा होते देखें, तो इसे रोकें - भले ही इसके लिए नायक को उस क्रूर-कर्म-कर्ता / अन्यायकर्ता के प्रति हिंसा करनी भी पड़े - जडमूल से अन्याय और पाप का समापन भले ही न हो - किन्तु लम्बे समय के लिए स्थितियों में सुधार आता है, हिंसा लाचारों की दिशा में होने से रूकती है | यह हिंसा करना नहीं है, यह सिर्फ पहले से हो रही हिंसा की दिशा में परिवर्तन करना है - इसमें नायक सिर्फ एक आईने का काम कर रहा है - जिसकी और से हिंसा आई, उसे उसी की और मोड़ दे रहा है, लाचार victim की और नहीं जाने दे रहा | यदि शक्तिवंत काबिलियत होते हुए भी यह नहीं करते - तो वे उस हिंसा के भागीदार हैं जो लाचारों पर पहले से हो रही है और वे मूक दर्शक बन कर इसे होने दे रहे हैं , इसकी दिशा बदलने के अपने कर्त्तव्य से मुंह छुपा रहे हैं ||

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    6. @ "हिंसा यदि "मैं" के लाभ / survival लिए होनी आवश्यक प्रतीत होती है - तो यह सिर्फ एक बहाना है,
      -किन्तु हिंसा में "मैं", स्वार्थ, व छद्म न्याय चिन्हित होगा कैसे, कल्याण कर्तव्य भाव उजागर होगा कैसे? क्योंकि सभी का अपना अपना सत्यपक्ष होता है प्रत्येक दुष्प्रवृत्ति को पूर्ण विश्वास होता है वह न्यायपक्ष में खड़ा है और उसकी हिंसा अन्याय से मुक्ति के लिए है। हिंसा घटित हो जाने के बाद तो उसका न्यायपक्ष निर्धारित किया जा सकता है जैसा कि उदाहरण से आया है। किंतु हिंसा पूर्व कैसे निर्धारित किया जाय? कल्पना कीजिए कि अपने दृष्टिकोण से न्यायी- अन्यायी का निर्णय कर हिंसा की जाती है, उस समय सही भी प्रतीत होती है किन्तु आगे चल कर तथ्य उजागर होते है कि अन्यायी वस्तुतः अन्यायी नहीं था, कोई तथ्य अगोचर था। ऐसे हालात में हो गई हिंसा को बदला या उलटा जा सकेगा? सज्जन-दुर्जन, लाचार-दुष्ट, अत्याचारी-victim हिंसा की दिशा में परिवर्तन कर सकते है किन्तु अन्तः समय निर्धारित करता है कौन सा उपाय सार्थक था और कौन क्या था।
      जैसे आपने कहा तो हिंसा हमेशा ही निंदनीय नहीं, हमेशा ही पाप नहीं | ठीक उसी प्रकार अहिंसा सदैव निन्दनीय नहीं है। वह कर्तव्य पथ से डिगाने का काम नहीं करती अगर कर्तव्य मात्र हिंसा ही न हो। हिंसा से रोकना अन्याय पोषण नहीं हो सकता। यह बात एकांगी है कि ऐसी निंदा करने वाले उस पाप के भागीदार होंगे। वैसे तो हिंसक प्रवृति शीघ्र डिग जाय मुस्किल है और सात्विक दैवीय सम्यक कर्त्तव्य पथी डिग जाय तो उसका ऐसा कैसा कर्तव्य पथ? सम्भवतः पूर्व धारणा से ही हिंसा प्रेरित हुआ व्यक्ति तो हिंसा को ही सही, उपादेय सिद्ध करने का प्रयास करेगा वह आचानक यु-टर्न वृति लेकर असफलता के लिए अहिंसा की चादर में नहीं दुबक पाएगा। वह हिंसा में कमी रह जाने का कारण प्रस्तुत करेगा।

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    7. @ -- जैसे आपने कहा तो हिंसा हमेशा ही निंदनीय नहीं, हमेशा ही पाप नहीं | ठीक उसी प्रकार अहिंसा सदैव निन्दनीय नहीं है। - exactly. that is exactly what i am trying to say - none of these are ALWAYS right or ALWAYS wrong. it depends on the context, not on the word or the action, it depends on the readon for which the action is being done.

      @ सम्भवतः पूर्व धारणा से ही हिंसा प्रेरित हुआ व्यक्ति तो हिंसा को ही सही, उपादेय सिद्ध करने का प्रयास करेगा - such persons are already on the wrong path - there is no question of FALLING from the right path, simply because they were NEVER at the right path to begin with ...

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    8. @ exactly. that is exactly what i am trying to say

      नहीं,आशय वह नहीं जो आपने कहा,"none of these are ALWAYS right or ALWAYS wrong" बल्कि "अहिंसा सदैव निन्दनीय नहीं है" से साफ आशय है कि मात्र हिंसा के समर्थन के लिए अहिंसा को पाप या कायरता या कर्तव्य पथ भ्रष्ट् प्रेरक ठहरा कर निन्दनीय नहीं कहा जाना चाहिए. क्योकि ऐसी मनःस्थिति अंततः शांति और संतुष्टि की बाधक है.

      मेरी बात पुनरावर्तन प्रतीत होगी फिर भी एक बार शीर्षक को पुनः उद्घाटित करना होगा- "हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।" लेकिन जब यह "none of these are ALWAYS right or ALWAYS wrong" दुविधा समक्ष हो, जब कि यह होती ही है तब मात्र "विवेक" ही हमारा दिशानिर्देश करता है और हम देश-काल-परिस्थिति के उपराँत भी दूरगामी सार्थक दृष्टिकोण से निश्चित रूप से उपादेय का निर्धारण कर सकते है.

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    9. @ such persons are already on the wrong path - there is no question of FALLING from the right path, simply because they were NEVER at the right path to begin with ...

      -exactly. that is exactly what i am trying to say

      (जो भी प्रारम्भ से ही हिंसा द्वारा सफलता अर्जित करने का एक विकल्प निर्धारित कर शुरूआत करता है वह उन्मार्ग में है यह शुरूआत ही गलत है।)

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    10. अपेक्षाएं रखना और ideals बनाना बहुत आसान है, भाषण देना और दूसरो के अपनाए रास्तों में खामियां देखना भी बहुत आसान है | लेकिन ac कमरे में / ऑफिस में / व्यापारिक अनुष्ठान / अपनी दुकान में बैठ कर कंप्यूटर पर कीबोर्ड पर लिखना बहुत आसान है कि "हिंसा बुरी है" |

      किन्तु यह कहने वाले, ऐसे impracticable आदर्श बनाने वाले लोगों का यह भी कर्त्तव्य है कि ऐसे आदर्ष मजबूर लोगों पर थोपने से पहले, उन्हें नीचा समझने / "गलत राह के राही" लेबल करने से पहले वे सामाजिक न्याय की पूर्ती के लिए कोई कारगर उपाय निकालें |

      हम - जो इश्वर की कृपा / जन्म के संयोंग से ऐसी परिस्थिति में हैं आज कि हमें उतना संघर्ष नहीं करना पड़ रहा, उतनी परेशानियां नहीं उठानी पड़ रहीं जितनी कई लोगों को | हमारा सौभाग्य है कि बचपन में हमें एजुकेट होने का मौका मिला, और हम इतना सोचने समझने के काबिल बन सके |

      ****हाँ, मैं मानती हूँ कि हिंसा अपने आप में गलत है |*******
      लेकिन मैं उस eutopian स्थिति की बात नहीं कर रही - मैं बात कर रही हूँ practical existing परिस्थितियों की | मैं यह नहीं कह रही कि हिंसा उचित है, मैं कह रही हूँ कि यह "हमेशा ही" अनुचित नहीं होती |

      यह अन्याय / असमानता / हिंसा एक पक्ष से दुसरे पक्ष पर हो ही रही हो, तब उस शोषक पक्ष को रोका ही न जाए ? अहिंसा के नाम पर सिर्फ दिल्ली के मैदानों में बैठ कर सत्याग्रह किये जाएँ, भले ही उस सत्याग्रह को अन्यायी पक्ष अनसुना करता रहे ? अहिंसा एक तरफ से और हिंसा दूसरी और से होती रहना उचित है ?

      यदि समाज ऐसा है कि "सब और अहिंसा है, न्याय है, असमानता नहीं है, शोषण नहीं है" - तब मैं आपकी बात बिलकुल सही मानती हूँ | अहिंसा परमो धर्मः - इस बात से मुझे तनिक भी इनकार नहीं है | लेकिन हर बात की कोई सीमा होती है | आँख बंद कर के "हिंसा बुरी है" कह देना वैसा ही है जैसे आती हुई मुसीबत से बचने के लिए रेत में सर छुपा लेना और मान लेना कि मुसीबत टल गयी |

      @ तब मात्र "विवेक" ही हमारा दिशानिर्देश करता है - true - दिशा निर्देश यदि "विवेक" करे, "क्रोध, स्वार्थ या प्रतिशोध" दिशानिर्देश न करे, तब ही स्थितियां सुधर सकती हैं, तब ही सम्यक समाधान निकल सकते हैं |

      जो यह कहते हैं कि हिंसा से समाधान नहीं निकल सकता, यह उनका नैतिक उत्तरदायित्व है कि वे शोषित वर्ग की समस्याओं का अहिंसात्मक हल भी करें | और यदि नहीं कर सकते , तो फिर अपने "उच्च आदर्शों" को शोषितो पर न थोपें | उनके द्वारा अपनाए गए हिंसात्मक मार्ग की निंदा न करें | यह न कहें कि "एक दिन ऐसा आएगा" जब सब कुछ स्वर्ग जैसा होगा, क्योंकि वह दिन अभी नहीं है, और जो दर्द में जी रहे हैं, उन्हें अपनी समस्याओं का निराकरण अभी चाहिए, और उन्हें अधिकार है कि उन्हें जो मार्ग उचित लगे, वे उसे अपनाएं |

      हटाएं
    11. @ ऐसी मनःस्थिति अंततः शांति और संतुष्टि की बाधक है.
      किसकी शान्ति और संतुष्टि की ? उनकी - जो ऊंची आदर्श बना और कह रहे हैं और स्वयं पहले ही comfortable स्थति में हैं, जो शोषित हैं ही नहीं ? या उनकी जो आज शोषित हैं और जिनकी समस्या को सुलझाने के प्रयास हो रहे हैं ?

      हटाएं
    12. मैं असहमति के अधिकार को रक्षित करता हूँ।
      साथ ही असहमति के प्रत्युत्तर में उपलब्ध दृष्टिकोण को व्यक्त करना भी आवश्यक मानता हूँ।

      @ अपेक्षाएं रखना और ideals बनाना बहुत आसान है, भाषण देना और दूसरो के अपनाए रास्तों में खामियां देखना भी बहुत आसान है | लेकिन ac कमरे में / ऑफिस में / व्यापारिक अनुष्ठान / अपनी दुकान में बैठ कर कंप्यूटर पर कीबोर्ड पर लिखना बहुत आसान है कि "हिंसा बुरी है" |

      -सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दिया जाय कि अहिंसा की आदर्श स्थिति थोप देने की प्रभुसत्ता मेरे पास तो नहीं है अतः यह लेखन इस अपेक्षा से तो नहीं किया जा रहा। यदि यह बहुत उँचा आदर्श है, अव्यवहारिक प्रतीत भी होता हो तब भी एक बार लोगों के समक्ष विचारार्थ रख देने में मैं बुराई नहीं मानता।
      और विचारों का भी ऐसा वर्ग-विभेद कैसे हो सकता है कि कम्फर्ट स्थिति वाला व्यक्ति अच्छे विचारों को लोक प्रस्तुत ही न करे? अगर कंप्यूटर पर कीबोर्ड से कोई साधारण सा अच्छा काम आसानी से कर भी लिया तो क्या पाप कर लिया? क्या कोई यह शुभ भाव रखने के लिए भी स्वतंत्र नहीं कि "सर्वे भवन्तु सुखिन:" और अगर ऐसे भाव प्रकट कर ले तो कहा जाय कि पहले जाओ जगत में सभी लोगों को सुखी करके आओ, फिर यह कामना या विचार प्रदर्शित करना?

      पता नहीं कौन शोषित है और कौन उनका वास्तविक शोषक? आज तो कोई भी हो, हर व्यक्ति अपने से जरा सा सत्ताशीन या जरा से शक्तिमान से शोषित है। हर बड़ी मछली अपने से छोटी को निगल रही है, सत्ता (पॉवर) मिली नहीं कि शोषण शुरू। समाज के सबसे नीचले शोषित को सत्ता दे के देख लो, सत्ता शोषण को प्रेरित कर ही देगी। उसके कर्मो से भी शोषण का अंत सम्भव नहीं होगा।

      @ लेकिन हर बात की कोई सीमा होती है | आँख बंद कर के "हिंसा बुरी है" कह देना वैसा ही है जैसे आती हुई मुसीबत से बचने के लिए रेत में सर छुपा लेना और मान लेना कि मुसीबत टल गयी |
      -उसी तरह से आँख बंद कर के कह देना "हिंसा लाजिमि है" वैसा ही है जैसे 'आ बैल मुझे मार' अर्थात् यह मुसीबतो को न्योता देने जैसा है। क्योंकि यह अराजकता को प्रोत्साहन जैसा है।
      @ जो दर्द में जी रहे हैं, उन्हें अपनी समस्याओं का निराकरण अभी चाहिए, और उन्हें अधिकार है कि उन्हें जो मार्ग उचित लगे, वे उसे अपनाएं |
      -यही अराजकता स्पेस है, यह अगर अधिकार है तो नियति के सामने मेरे सारे तर्क परास्त होते है

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    13. @ सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दिया जाय कि अहिंसा की आदर्श स्थिति थोप देने की प्रभुसत्ता मेरे पास तो नहीं है अतः यह लेखन इस अपेक्षा से तो नहीं किया जा रहा। यदि यह बहुत उँचा आदर्श है, अव्यवहारिक प्रतीत भी होता हो तब भी एक बार लोगों के समक्ष विचारार्थ रख देने में मैं बुराई नहीं मानता।
      -- एक बार लोगों के समक्ष विचारार्थ रखने में तो मैं भी कोई बुराई नहीं मानती | थोप देने की "प्रभुसत्ता" नहीं होना, और "अपेक्षा" नहीं होना, दो पृथक बातें हैं | यदि आप नहीं थोपना चाहते - तो यह आपकी अच्छाई है | यदि चाहते हैं और प्रभुसत्ता न होने से नहीं कर पा रहे - तो बात दूसरी हो जाती है |

      @ और विचारों का भी ऐसा वर्ग-विभेद कैसे हो सकता है कि कम्फर्ट स्थिति वाला व्यक्ति अच्छे विचारों को लोक प्रस्तुत ही न करे? अगर कंप्यूटर पर कीबोर्ड से कोई साधारण सा अच्छा काम आसानी से कर भी लिया तो क्या पाप कर लिया? क्या कोई यह शुभ भाव रखने के लिए भी स्वतंत्र नहीं कि "सर्वे भवन्तु सुखिन:" और अगर ऐसे भाव प्रकट कर ले तो कहा जाय कि पहले जाओ जगत में सभी लोगों को सुखी करके आओ, फिर यह कामना या विचार प्रदर्शित करना?
      --- बिलकुल पाप नहीं किया, शुभ भाव रखने के लिए आप उतने ही स्वतंत्र हैं जितनी मैं हूँ, और मैं उतनी ही स्वतंत्र हूँ जितने आप हैं |

      --- मैं यह नहीं कह रही की "पहले जाओ जगत में सभी लोगों को सुखी करके आओ, फिर यह कामना या विचार प्रदर्शित करना"
      नहीं, मैं यह कह रही हूँ की "पहले जाओ जगत में सभी लोगों को सुखी करके आओ, फिर यह मांग रखना की हिंसा कोई विकल्प है ही नहीं, अहिंसा ही एकमात्र विकल्प है " |
      --- विचार रखने, और दुसरे विचार को खारिज कर के अपने विचार की मांग रखने में फर्क है |

      @ पता नहीं कौन शोषित है और कौन उनका वास्तविक शोषक? यह बात तो बिलकुल सच है आपकी |

      @उसी तरह से आँख बंद कर के कह देना "हिंसा लाजिमि है" वैसा ही है जैसे 'आ बैल मुझे मार' अर्थात् यह मुसीबतो को न्योता देने जैसा है। क्योंकि यह अराजकता को प्रोत्साहन जैसा है।
      सहमत हूँ | आँख बंद कर के मैं दोनों ही बातों के विरोध में ही हूँ | आँख बंद कर के कोई भी रास्ता चुनना सही नहीं होता |

      @ यही अराजकता स्पेस है, यह अगर अधिकार है तो नियति के सामने मेरे सारे तर्क परास्त होते है
      :) हर स्थिति पर तर्क APPLY किये भी नहीं जाते :) |

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    14. @ - बिलकुल पाप नहीं किया, शुभ भाव रखने के लिए आप उतने ही स्वतंत्र हैं जितनी मैं हूँ, और मैं उतनी ही स्वतंत्र हूँ जितने आप हैं |

      --- तब फिर "अपेक्षाएं रखना और ideals बनाना, भाषण देना और दूसरो के हिंसक रास्तों में खामियां देखना| ac कमरे में / ऑफिस में / व्यापारिक अनुष्ठान / अपनी दुकान में बैठ कर कंप्यूटर पर कीबोर्ड पर लिखना कि "हिंसा बुरी है" |ऐसे शुभ भाव युक्त आदर्श प्रकट करना उन आदर्शों की स्थापना की अपेक्षा रखना कोई अनुचित नहीं है। "प्रभुसत्ता" से आशय अहिंसा स्थापित करने के कानूनी अधिकार से है और उसे कानून की तरह मैं थोप ही नहीं सकता। अतः थोपने का आपका आरोप निराधार है। जब थोपा ही नहीं जा सकता तो अच्छाई होने न होने का प्रश्न ही नहीं उठता। दूसरी आपके हिसाब से पृथक बात "अपेक्षा" हैं|वह भी यहाँ नदारद है। अपेक्षा है ही नहीं न की जाती है। न प्रस्तुत आलेख में रखी गई है। अच्छाई बुराई के विषय में सभी अपने अपने स्वतंत्र कर्मों के अधीन है। अतः चिंतन के लिए मात्र विचार ही प्रस्तुत किया जा सकता है और किया भी गया है।
      इसीलिए अन्त में यह कहा गया कि 'अराजकता का अधिकार' पाना ही प्रयोजन हो तो उसके बाद आने वाली सम्भावित नियति के सामने सारे तर्क परास्त ही होंगे।

      फिर भी यदि इसी तरह के तर्क हों तो प्रतितर्क इसप्रकार हो सकते है………

      प्रतिशोध से बुराई खत्म करने के आदर्श बनाने वाले लोगों का भी यह कर्त्तव्य है कि ऐसे आदर्श, शान्तिप्रिय लोगों पर थोपने से पहले, उन्हें नीचा, कायर समझने / "पथ भ्रमित" लेबल करने से पहले वे सामाजिक न्याय की पूर्ती के लिए हिंसा को कारगर साबित तो करे|

      जो यह कहते हैं कि हिंसा भी विकल्प है, उनका नैतिक उत्तरदायित्व है कि वे शोषित वर्ग की समस्याओं का हिंसात्मक हल भी प्रस्तुत करें |

      हिंसा "हमेशा ही" अनुचित नहीं होती मानने वाले उस हिंसा के हमेशा न्यायोचित औचित्य चेक कर लेने, गलती न होने, कपट न होने, निर्दोष को सजा न मिलने की सम्भावनाओं से मुक्त सुरक्षित तो करे।

      @ यदि समाज ऐसा है कि "सब और अहिंसा है, न्याय है, असमानता नहीं है, शोषण नहीं है" - तब मैं आपकी बात बिलकुल सही मानती हूँ |

      ऐसा समाज होगा कैसे? क्या हिंसा का जवाब हिंसा से देते हुए या शोषण का जवाब हिंसा से देते हुए ऐसा अहिंसक समाज अस्तित्व में आ जाएगा? अहिंसा न्याय व समानता यदि आएगी तो उन्ही अहिंसक, न्यायिक, सम्यक मूल्यों से आएगी। हिंसा से तो कदापि नहीं। जब तक हमारा सीमारेखायुक्त मन्तव्य हिंसा से शान्ति स्थापित करने का होगा, अहिंसक समाज की अवधारणा असम्भव है। यह बिलकुल ऐसा है जैसे 'न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी' हिंसा से न ऐसा समाज बनेगा न हिंसा दूर होगी।

      @--- विचार रखने, और दुसरे विचार को खारिज कर के अपने विचार की मांग रखने में फर्क है |

      --- विपरित विचार को खारिज किए बिना सार्थक विचार रखा ही नहीं जा सकता, दो नांव की सवारी मुस्किल है। भरे कप को थोडा बहुत भी खाली किए बिना उसमें नई चाय नहीं भरी जा सकती। विरोधाभास को खारिज करना ही सम्यक विचार है।

      @ :) हर स्थिति पर तर्क APPLY किये भी नहीं जाते :)

      --- मात्र अगम्य बात पर तर्क APPLY न भी किये जाय,क्योंकि वह मानव बुद्धि से सीमातीत विषय है। लेकिन गम्य विषयों पर तो मानव बुद्धि तर्क से ही काम लेगी, वह बुद्धि प्रत्येक गम्य को तर्क के बाद ही स्वीकार करेगी। यही विवेक की मांग है। और सम्यक विचार भी।

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    15. शायद मेरी बात स्पष्ट नहीं हो पा रही, इस हिंसा की अपरिहार्यता का क्यों इतना प्रखर विरोध कर रहा हूँ स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ।

      जो 'हिंसा' को 'हिंसात्मक' कहने के सत्य कथन को भी पाप पूर्ण बताकर असत्य वर्तन करते है,जबकि वे ही सत्य के लिए हिंसा का भी सहारा लेने को उचित ठहराते है। हिंसा को हमेंशा अनुचित नहीं मानते। अन्याय अत्याचार या अधर्म का बहाना आगे कर हिंसात्मक दुष्प्रवृत्ति को संरक्षण सम्बल देते है वे वस्तुतः अनावश्यक हिंसा को प्रोत्साहन दे रहे होते है। क्योंकि हिंसा करने के बाद प्रत्येक व्यक्ति अपनी हिंसा को न्यायसंगत ही सिद्ध करता है वह अपनी हिंसा को तोड़-मरोड़ कर शोषण व अत्याचार के विरूद्ध प्रतिक्रियात्मक साबित करता है। लाखों निर्दोषों की हत्या के लिए जवाबदार आतंकवादी भी अपने कुकृत्य को अत्याचार व अधर्म के खिलाप धर्मयुक्त जवाबी प्रतिक्रिया प्रमाणित करते रहते है। अन्याय के खिलाफ अपरिहा्र्य हिंसा की बात ऐसे लोगों के लिए आसान सा छद्म आवरण है। 'अत्याचार से लड़ने' का वाक्य एक आसान हथियार है और अत्याचारी लोगों के लिए तो लाभदायक खिलौना भी। किसी निर्दोष की फांसी के लिए जवाबदार गवाह अपने भूखे पेट को ढ़ाल बनाकर सही किया में खपा देता है, चोर गरीबी और शोषण को जवाबदार बताकर चौर्य कर्म को वाज़िब ठहराता है। हरेक दुष्प्रवृत्ति के पास भ्रमित करते न्यायसंगत कारण मौजुद है। हिंसा को उचित ठहराने के यह उपाय उन्हें आधार व प्रोत्साहन देने के समान है। ऐसे में यह कहना कि "उनके द्वारा अपनाए गए हिंसात्मक मार्ग की निंदा न करें |और जो दर्द में जी रहे हैं, उन्हें अपनी समस्याओं का निराकरण अभी चाहिए, और उन्हें अधिकार है कि उन्हें जो मार्ग उचित लगे, वे उसे अपनाएं|" कितना भयंकर हो सकता है।

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  9. निर्भर करता है कि वास्ता किसका किस से है - मानव का मानव से या मानव का बर्बर पशुओं से या फिर बर्बर पशु का किसी अपने जैसे ही बर्बर से| तब तक Hope for the peace, but be prepared for war.

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  10. उसका एक ही तरीका है संतोष में व्याप्त सुख को पहचानना और उसका आस्वादन करना।

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  11. सशक्त और सार्थक विश्लेषण प्रस्तुत किया है आपने.
    आपकी और शिल्पा बहिन की टिप्पणियों से भी ज्ञानवर्धन हुआ.

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  12. बहुत ही सशक्‍त प्रस्‍तुति ...

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