अपने पिछले लेख और उस पर आयी प्रतिक्रियाओं से चर्चा आगे बढाते हुए………एक नज़र जो विचार प्रस्तुत हुए…
“……सिर्फ कमेन्ट पाने या खुद को बौद्दिक रूप से संपन्न दिखाने जैसे कारणों या इच्छाओं की पूर्ति के लिए के लिए लेखन का ये खेल खेला जाता है”।
“……गुटबाजी की चर्चा से लगता है कि कहीं न कहीं आग तो है, वर्ना धुँआ नहीं उठता।"
“……गुट है और उसे बनाया और बढाया जाता है | बहुत सारी और भी बाते तथ्य है पर उन पर ज्यादा बहस करना ही बेकार है”।
“……जब परस्पर विरोधी विचारधाराएँ, रंजिश में बदल जाती हैं”!
“……प्रचलित धारा से अलग कुछ कहने वाला कुपाच्य हो जाता हैं”।
“……अब अनुभव में आ रहा है कि लोगों को परामर्श रुचते नहीं”।
मेरे द्वारा पूर्व वर्णीत, 'स्वभाविक ग्रुप-संकल्पना' जिसे यथार्थ में 'गुट-निर्पेक्षता' भी कहा जा सकता है। ऐसे ग्रुप का विचार, विषय और विधा की प्रकृति अनुसार एकीकरण हो जाना स्वभाविक है।
इसके इतर जो गुट मात्र विवादों के समय अस्तित्व में आते है और पुनः आपस में ही विवाद कर बिखर भी जाते है। क्योंकि ऐसे दल का आधार मात्र और मात्र अहं तुष्टि होता है। फिर भी हिन्दी ब्लॉग जगत को ऐसे गुटों से कोई खतरा नहीं है। प्रतिस्पृदा की दौड के मध्य ऐसे संयोजन का प्रकट होना और वियोजन भी हो जाना, विकास के दौर में सम्भावित ही है। इसे अपरिपक्वता से परिपक्वता की संधी के रूप में देखना ही ठीक है।
दूसरे, जो मात्र तुच्छ स्वार्थो भरी मानसिकता से गुटबंदी का खेल खेलते है, इसी खेल से विवादग्रस्त होकर अन्तत: तो महत्व खो ही देते है। क्योंकि वे केवल इस सूत्र पर कार्य कर रहे है कि 'बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ।' भले इस मानसिकता के चलते अपने ब्लॉग को अल्पकालिक प्रसिद्धि दे पाने में सफल हों, किन्तु विचारों की विश्वसनीयता खो देते है। वैचारिक दरिद्रता लेखकीय चरित्र का अंत है। निष्ठावान व्यक्तित्व में ही ब्लॉग की सफलता निहित है।
यह एक प्राकृतिक नियम है कि जो कमजोर होता है, स्वतः ही पिछड जाता है।(कमजोर से यहां आशय विचार दरिद्रता से है।) और साथ ही अर्थशास्त्र का एक सार्वभौमिक नियम है जो सभी जगह लागू होता है, "जैसी मांग, वैसी पूर्ति।" और यह सच्चाई है कि अन्ततः तो उच्च गुणवत्तायुक्त सार्थक लेखन की मांग उठनी ही है। इसलिए जो भी सार्थक गुणवत्तायुक्त सामग्री की पूर्ति करेंगे, वे ही टिकेंगे। निकृष्ट, भ्रांत और अविश्वसनीय सामग्री की मांग का समाप्त होना अवश्यंभावी है।
तीसरे, वे धार्मिक विचारधाराएँ जिनमें, दर्शन आधारित समीक्षा को अवकाश नहीं होता, कार्य-कारण पर विवेकयुक्त विवेचन को कोई जगह नहीं है, मानवीय सोच को विचार-मंथन के अवसर प्रदान नहीं करती। ऐसी धार्मिक विचारधाराएं तो सम्प्रदाय प्रचार के फुटपाथी गल्ले मात्र है। जो आने जाने वालों को अपनी दुकान में लाने हेतू चिल्ला कर, रोक कर,प्रलोभन देकर बुलाते है। ऐसे पंथप्रचारी गुटों के विवाद बस फ़ुट्पाथ स्तर के फेरी वालों की तकरार सम होते है। अतः इनसे भी हिन्दी ब्लॉग जगत को कोई हानि नहीं होने वाली। गम्भीर ज्ञान-चर्चा के लिये धर्म-दर्शन आधारित अन्य क्षेत्र विकसित हो ही जाते है। विवेकशील वैचारिकता अपना पड़ाव तय कर ही लेती है।
अंत में, अपने विचार परिमार्जन के परामर्श जिन्हें पथ्य नहीं, ऐसे ब्लॉगर के विचार तो स्वतः ही स्थिर होकर सडन को प्राप्त होंगे। और कहते हैं कि ‘जो झुकते नहीं टूट जाते है’। इसलिए जिन्हें विनय से नया ज्ञान प्राप्त करने की कूवत नहीं, विनम्रता से विचारों का परिशीलन नहीं करते, धारणाओं को परिष्कृत नहीं करते उस दशा में अन्तत: तो उनके अपने अन्तरमन से ज्ञान सर्वदा लुप्त हो जाता है। और अपने स्थिर ज्ञान का दम्भ भी उनकी लुटिया डुबोने के लिए प्रयाप्त है।
इसलिए उच्च वैचारिकता को किसी से भी कोई चुनौती नहीं है। किन्तु विकास संयुक्त सहयोग पर ही निर्भर है।
इसलिये चलें?, सार्थक ब्लॉग लेखन से ब्लॉग स्मृद्धि की ओर…………।
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