18 अक्टूबर 2010

संगत की रंगत

सद् भावना के रंग, बैठें जो पूर्वाग्रही संग।
संगत की रंगत तो, अनिच्छा ही लगनी हैं॥

जा बैठे उद्यान में तो, महक आये फ़ूलों की।
कामीनी की सेज़ बस, कामेच्छा ही जगनी है॥

काजल की कोठरी में, कैसा भी सयाना घुसे।
काली सी एक रेख, निश्चित ही लगनी है॥

कहे कवि 'सुज्ञ'राज, इतना तो कर विचार।
कायर के संग शूर की, महेच्छा भी भगनी है॥ 

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16 अक्टूबर 2010

नम्रता

भवन्ति नम्रास्तरवः फ़लोदगमैर्नवाम्बुभिर्भूमिविलम्बिनो घना:।
अनुद्धता  सत्पुरुषा: समृद्धिभिः  स्वभाव एवैष परोपकारिणम्॥

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- जैसे फ़ल लगने पर वृक्ष नम्र हो जाते है,जल से भरे मेघ भूमि की ओर झुक जाते है, उसी प्रकार सत्पुरुष  समृद्धि पाकर नम्र हो जाते है, परोपकारियों का स्वभाव ही ऐसा होता है।
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8 अक्टूबर 2010

मैं गुणपूजक हूं।


           जब मैने अपना उपनाम ‘सुज्ञ’ चुना तो इतना गहन चिंतन किया कि इससे मेरा सम्पूर्ण व्यक्तिव ही प्रकट हो जाय। ‘सुज्ञ’= “सच्चा ज्ञान जो सुगमता से आत्मसात कर ले”।  ‘सुविज्ञ’ नहिं जिससे विशेष ज्ञान होने का गर्व ध्वनित होकर पुष्ठ होता हो।
मैं सभी दर्शनों का विद्यार्थी हूं, सभी दर्शनों का गुणाभिलाषी हूं, वस्तूतः मैं गुणपूजक हूं।

           मै धार्मिक सत्य वचनो का अनुकरण अवश्य करता हूं, महापुरूष मेरे आदर्श है। करोडों वर्षों के विचार मंथन व उत्पन्न ज्ञान- गाम्भीर्य से जो तत्व-रहस्य उनका उपदेश होता है। उन शुद्ध विचारों का मैं समर्थन करता हूं।
           सुज्ञ को किसी धर्मसम्प्रदाय परंपरा में खण्ड खण्ड कर देखना असम्भव है। मैने कभी किसी नाम संज्ञा के धर्म को नहिं माना। पर जहां से सार ग्रहण करता हूं, उस दर्शन की एक विशेष शब्दावली है, जो उसकी पहचान स्थापित कर देती है। इस दर्शन में ऐसी जाति या धर्म-वाचक संज्ञा है ही नहिं, शास्त्रों में इस धर्म के लिये ‘मग्गं’ (मार्ग) शब्द ही आया है। और मार्गानुसरण कोई भी कर सकता है।
           इसके सुक्षम अहिंसा अभिगम ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया, और अहिंसा ही इसका प्रमुख लक्षण है यही लक्षण इसे मुखारित कर जाता है। जैसे जैसे लोग कहते है इतनी सुक्षम अहिंसा सम्भव नहिं, सम्भावनाएं तलाशते हुए मैं, अहिंसा के प्रति और भी आस्थावान होता जाता हूं।
          इसीलिये मानव उपयोग में क्रूरताजन्य पदार्थों, जिसके बिना आनंद से कार्य हो सकता है, मै विरोध करता हूं। 
अतःबिना किसी लागलपेट के, किसी पूर्वाग्रह के मै कह सकता हूं, मैं सम्यग्दर्शनवान हूं। मैं इस सम्यग विचारधारा पर पूर्णरूप से श्रद्धावान हूं, अन्ततः मै सम्यग्दृष्टि हूं।

          किताबें तो अपने आप में जड है, सर पर उठा घुमने से वह ज्ञान देने में समर्थ नहिं। उसमें उल्लेखित ज्ञान ही सत्य स्वरूप है, और ज्ञान चेतन का लक्षण है। और धर्म आत्मा का स्वभाव। इसलिये जब भी मेरे सम्मुख कोई ज्ञान-शास्त्र आये, मैं मेरे विवेक को छलनी और बुद्दि को सूप बना देता हूं, ‘सार सार को गेहि रहे थोथा देय उडाय’। यह विवेक परिक्षण विधि भी ‘सम्यग्दृष्टि’ की ही देन है। इसलिये मुझे यह चिंता कहीं नहिं रही कि, क्या सही लिखा है, क्या गलत। परिक्षण परिमाण जो हमारे पास है। इसीलिये मैने हींट-लाईन चुनी नीर-क्षीर विवेक।

(यह स्पष्ठिकरण है मेरी विचारधाराओं का, ताकि मेरे मित्र अनभिज्ञ या संशय-युक्त न रहे। ---सुज्ञ)

20 सितंबर 2010

छलती है मैत्री

यत्न करें असीम, कहां निभ पाती है मैत्री।
अपेक्षाएं है अनंत, बडी नादां होती है मैत्री।

निश्छल नेह मिले कहां, मात्र दंभ पे चलती है मैत्री।
दमन के चलते है दांव, छल को ही छलती है मैत्री।

मित्रता आयेगी काम, अपेक्षाओं पे चलती है मैत्री।
जब भी पडते है काम, स्वार्थी बन लेती है मैत्री।
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3 सितंबर 2010

घाघ कलुषित हृदय, क्रूरता संग सहभोज सहवास करने लगे है।

हमारे हृदय और अंतरमन इतने घाघ व नासूर बन चुके है कि सदाचरण आसानी से स्वीकार नहीं होता। न हमें रूचता है न पचता है। बडे सतर्क रहते है कि सदाचार-संस्कार अपना कर कहीं हम  बुद्दु, सरल, भोले न मान लिये जाय। चतुरता का आलम यह कि हम, 'यह सब तो बडी बडी ज्ञान की बातें', 'बाबाओं के प्रवचन', 'सत्संग' आदि शब्दों से मखौल उडाकर अपनी विद्वता बचाने का प्रयास करते है।

इन आदतों से हमारे हृदय इतने कलुषित हो गये है कि सुविधाभोग़ी पूर्वाग्रहरत हम क्रूरता के संग सहभोज सहवास करने लगे है। निर्दयता को चातुर्य कहकर आदर की नज़र से देखते है। भला ऐसे कठोर हृदय में सुकोमलता आये भी तो कैसे?

माया, छल, कपट व असत्य को हम दुर्गुण नहीं, आज के युग की आवश्यकता मान भुनाते है। आवेश,धूर्तता और प्रतिशोध ही आसान विकल्प नजर आते है।

अच्छे सदविचारों को स्वभाव में सम्मलित करना या अंगीकार करना बहुत ही कठिन होता है,क्योंकि जन्मों के या बरसों के सुविधाभोगी कुआचार हमारे व्यवहार में जडें जमायें होते है, वे आसानी से दूर नहीं हो जाते।

सदाचरण बस आध्यात्मिक बातें है, किताबी उपदेश भर है, पालन मुश्किल है,या कलयुग व जमाने के नाम पर सदाचरण को सिरे से खारिज नहीं किया जाना चाहिए। पालन कितना ही दुष्कर हो, सदविचारों पर किया गया क्षणिक चिन्तन भी कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यदि सदाचरण को 'अच्छा' मानने की प्रवृति मात्र भी हमारी मानसिकता में बनी रहे,  हमारी आशाओं की जीत है। दया के,करूणा के,अनुकंपा के और क्षमा के भावों को उत्तम जानना, उत्तम मानना व उत्तम कहना भी नितांत ही आवश्यक है। हमारे कोमल मनोभावों को हिंसा व क्रूरता से दूर रखना, प्रथम व प्रधान आवश्यकता है, कुछ देर से या शनै शनै ही सही हृदय की शुभ मानसिकता, अंततः क्रियान्वन में उतरती ही है।

निरंतर हृदय को निष्ठुरता से मुक्त रख, उसमें सद्विचारों को आवास देना नितांत ही जरूरी है।

2 सितंबर 2010

क्षमा-सूत्र

 
  • प्रतिशोध लेने का आनंद मात्र एक दिन का होता है, जबकि क्षमा करने का गौरव सदा बना रहता है।
  • सच्ची क्षमा समस्त ग्रंथियों को विदीर्ण करने का सामर्थ्य रखती है।
  • हर परिस्थिति में स्वयं को संयोजित संतुलित रखना भी क्षमा ही है।
  • क्षमा देने व क्षमा प्राप्त करने का सामर्थ्य उसी में है जो आत्म निरिक्षण कर सकता है
  • क्षमापना आत्म शुद्धि का प्रवाहमान अनुष्ठान है, सौम्यता, विनयसरलता, नम्रता शुद्ध आत्म में स्थापित होती है।

1 सितंबर 2010

तीन की करामत!!

तीन निकल वापस नहिं लौटते
  •  बंदूक से गोली
  •  मुहं से बोली
  •  तन से प्राण
तीन सदा स्मरण रहे
  •  कर्ज़
  •  फ़र्ज़
  •  मर्ज़
तीनों का सम्मान करें
  • माता
  • पिता
  • गुरू
तीन को कभी छोटा न समझो
  • कर्ज़
  • शत्रु
  • बीमारी
तीन को कोई चुरा नहिं सकता
  • ज्ञान
  • कौशल
  • अक्ल

तीनों को वश में रखें
  •  मन
  •  काम
  •  क्रोध
तीन प्रतिक्षा नहिं करते
  •  समय
  • ग्राहक
  • मौत
तीन जीवन उपचार
  •  कम खाना
  •  गम खाना
  •  नम जाना

30 अगस्त 2010

अपने अंदर है दुश्मनों का डेरा।

मिथ्या कहलाता है जग इसी से,
क्योंकि जग में भ्रमणाओं का घेरा।
क्या ढ़ूंढे हम दुश्मन जगत में,
अपने अंदर है दुश्मनों का डेरा।


कोई अपमान कैसे करेगा,
हमको अपने अभिमान ने मारा।
लोग ठग ही न पाते कभी भी,
हमको अपने ही लोभ ने मारा।


क्रोध अपना लगाता है अग्नि,
दावानल सा लगे जग सारा।
लगे षडयंत्र रचती सी दुनियां,
खुद की माया नें जाल रचाया।


मेरा दमन क्या दुनिया करेगी,
मुझको अपने ही मोह ने बांधा।
रिश्ते बनते है पल में पराए,
मैने अपना स्वार्थ जब साधा।


दर्द आते है मुझ तक कहां से,
खुद ही ओढा भावों का लबादा।
इच्छा रहती सदा ही अधूरी,
पाना चाहा देने से भी ज्यादा।


खुद का स्वामी मुझे था बनना,
मैने बाहर ही ढूंढा खेवैया।
स्व कषायों ने नैया डूबो दी,
जब काफ़ी निकट था किनारा।


मिथ्या कहलाता है जग इसी से,
क्योंकि जग में भ्रमणाओं का घेरा।
क्या ढ़ूंढे हम दुश्मन जगत में,
अपने अंदर है दुश्मनों का डेरा।

26 अगस्त 2010

क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है


सौ सौ चुहे खा के बिल्ली, हज़ को जा रही है।
क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है॥

गुड की ढेली पाकर चुहा, बन बैठा पंसारी।
पंसारिन नमक पे गुड का, पानी चढा रही है॥

कपि के हाथ लगा है अबतो, शांत पडा वो पत्थर।
शांति भी विचलित अपना, कोप बढा रही है
॥
 
हिंसा ने ओढा है जब से, शांति का चोला।
अहिंसा मन ही मन अबतो, बडबडा रही है॥

सियारिन जान गई जब करूणा की कीमत।
मासूम हिरनी पर हिंसक आरोप चढा रही है॥

सौ सौ चुहे खा के बिल्ली, हज़ को जा रही है।
क्रूरता आकर करूणा के, पाठ पढा रही है॥

23 अगस्त 2010

मांसाहार प्रचार का भ्रमज़ाल (सार्थक विकल्प निरामिष)

सलीम खान ने कभी अपने ब्लॉग पर यह '14 बिन्दु' मांसाहार के पक्ष में प्रस्तुत किये थे। असल में यह सभी कुतर्क ज़ाकिर नाईक के है, जो यहां वहां प्रचार माध्यमों से फैलाए जाते है। वैसे तो इन फालतू कुतर्को पर प्रतिक्रिया टाली भी जा सकती थी, किन्तु  इन्टरनेट जानकारियों का स्थायी स्रोत है यहाँ ऐसे भ्रामक कुतर्क अगर अपना भ्रमजाल फैला कर स्थायी रहेंगे तो लोगों में संशय और भ्रम यथावत बना रहेगा। ये कुतर्क यदि निरूत्तर रहे तो भ्रम, सच की तरह रूढ़ हो जाएंगे, इसलिए  इन कुतर्कों का यथार्थ और तथ्ययुक्त खण्ड़न  जालस्थानों पर उपलब्ध होना नितांत ही आवश्यक है।

मांसाहार पर यह प्रत्युत्तर-खण्ड़न, धर्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अहिंसा और करूणा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए जा रहे है। मांसाहार को भले ही कोई अपने धर्म का पर्याय या प्रतीक मानते हो, जीव-हत्या किसी भी धर्म का उपदेश या सिद्धांत नहीं हो सकता। इसलिए इस को खण्ड़न अगर निंदा भी माना जाता है तो स्पष्ट रूप से यह हिंसा, क्रूरता और निर्दयता की निंदा है। प्रायोजित गोश्तखोरी की हिंसा प्रेरणा सर्वत्र निंदनीय ही होनी चाहिए, क्योंकि इस विकार से बनती हिंसक मनोवृति समाज के शान्त व संतुष्ट जीवन ध्येय में प्रमुख बाधक है।

निश्चित ही शारीरिक उर्जा पूर्ति के लिए भोजन करना आवश्यक है। किन्तु सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, मानव इस जगत का मुखिया है। अतः प्रत्येक जीवन के प्रति, उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी मानव का कर्तव्य है। सृष्टि के सभी प्राणभूत के अस्तित्व और संरक्षण के लिए सजग रहना, मानव की जिम्मेदारी है। ऐसे में आहार से उर्जा पूर्ति का निर्वाह करते हुए भी, उसका भोजन कुछ ऐसा हो कि आहार-इच्छा से लेकर, आहार-ग्रहण करने तक वह संयम और मितव्ययता से काम ले। उसका यह ध्येय होना चाहिए कि सृष्टि की जीवराशी  कम से कम खर्च हो। साथ ही उसकी भावनाएँ सम्वेदनाएँ सुरक्षित रहे, मनोवृत्तियाँ उत्कृष्ट बनी रहे। प्रकृति-पर्यावरण और स्वभाव के प्रति ऐसी निष्ठा, वस्तुतः उसे मिली अतिरिक्त बुद्धि के बदले, कृतज्ञता ज्ञापन  है। अस्तित्व रक्षा के लिए भी अहिंसक जीवन-मूल्यों को पुनः स्थापित करना मानव का कर्तव्य है। सभ्यता और विकास को आधार प्रदान के लिए सौम्य, सात्विक और सुसंस्कृत भोजन शैली का प्रसार नितांत आवश्यक है।

सलीम खान के मांसाहार भ्रमजाल का खण्ड़न।

1 - दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.

खण्ड़न- इस तर्क से मांसाहार ग्रहणीय नहीं हो जाता। यदि मांसाहर लेने का यही मूढ़ता भरा कारण है तो  ऐसा भी कोई प्रधान धर्म नहीं, जिस ने शाकाहार पर प्रतिबंध लगाया हो। प्रतिबंध तो मूढ़ बुद्धि के लिए होते है, विवेकवान के लिए संकेत ही पर्याप्त होते है। धर्म केवल हिंसा न करने का उपदेश करते है एवं हिंसा प्रेरक कृत्यों से दूर रहने की सजग करते है। आगे मानव के विवेकाधीन है कि आहार व रोजमर्रा के वे कौन से कार्य है जिसमें हिंसा की सम्भावनाएं अधिक है और उसका सारा प्रयास हिंसा से विरत रहकर बचने का होना चाहिए। सभी धर्मों में, अहिंसा के उद्देश्य से ही, प्रकट व अप्रकट रूप से, सभी जीवों के प्रति दया, करूणा, रहम और सहिष्णुता आदि को उपदेशित किया गया है। पाबन्दीयां तो कपट और माया का सहारा लेकर बचने के रास्ते निकालने वालों के लिए होती है। विवेकवान के लिए तो दया, करूणा, रहम, सदाचार, ईमान में अहिंसा और जीवदया ही गर्भित है।

2 - क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?

खण्ड़न- अगर एस्किमोज़ मांसाहार के बिना नहीं रह सकते तो क्या आप भी शाकाहार उपलब्ध होते हुए एस्किमोज़ का बहाना आगे कर मांसाहार चलाए रखेंगे? खूब!! एस्किमोज़ तो वस्त्र के स्थान पर चमड़ा पहते है, आप क्यों नही सदैव उनका वेश धारण किए रहते? अल्लाह नें आर्कटिक में मनुष्य पैदा ही नहीं किये थे,जो उनके लिये वहां पेड-पौधे भी पैदा करते, लोग पलायन कर पहुँच जाय तो क्या किया जा सकता है। ईश्वर नें बंजर रेगीस्तान में भी इन्सान पैदा नहीं किए थे, फ़िर भी सत्ता भूखा स्वार्थी मनुष्य वहाँ भी पहुँच ही गया। यह तो कोई बात नहीं हुई कि  दुर्गम क्षेत्र में रहने वालों को शाकाहार उपलब्ध नहीं, इसलिए सभी को उन्ही की आहार शैली अपना लेनी चाहिए। आपका यह एस्किमोज़ की आहारवृत्ति का बहाना निर्थक है। जिन देशों में शाकाहार उपलब्ध न था, वहां मांसाहार क्षेत्र वातावरण की अपेक्षा से विवशता हो सकता है और इसीलिए ही उसी वातावरण के संदेशकों-उपदेशकों नें मांसाहार पर उपेक्षा का रूख अपनाया और निषेध नहीं किया। यदि शाक उपलब्ध होता तो, सभ्य व सुधरे लोगों की पहली पसंद शाकाहार ही होता है। बुद्धिमता यही है कि जहां सात्विक पौष्ठिक शाकाहार प्रचूरता से उपलब्ध है वहां जीवों को मौत के घाट उतार कर उदरपूर्ति नहीं करनी चाहिए। सजीव और निर्जीव एक गहन विषय है। जीवन वनस्पतियों आदि में भी है, लेकिन प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता की पराकाष्ठा है। आप लोग दबी जुबां से कहते भी हो कि "मुसलमान, शाकाहारी होकर भी एक अच्छा मुसलमान हो सकता है" इस सच्चाई के उपरांत मांसाहार की ज़िद्द मूर्खता है। आखिर एक 'अच्छा मुसलमान' बनने से इतना परहेज ही क्यों ?

3 - अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 - अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 - अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.

खण्ड़न- इस विषय पर जानने के लिए शाकाहार मांसाहार की हिंसा के सुक्ष्म अन्तर  को समझना होगा। साथ ही हिंसा में विवेक  करना होगा। स्पष्ट हो जाएगा कि जीवहिंसा प्रत्येक कर्म में है, किन्तु हम विवेकशील है,  हमारा कर्तव्य बनता है, हम वह रास्ता चुनें जिसमे जीव हिंसा कम से कम हो। किन्तु आपके तर्क की सच्चाई यह है कि वनस्पति हो या पशु-पक्षी, उनमें जान साबित करके भी आपको किसी की जान बचानी नहीं है। आपका कुतर्क वनस्पति जीवन पर करूणा के उद्देश्य से नहीं, हिंसा अहिंसा आपके लिए अर्थहीन है, आपको तो मात्र सभी में 'जीव' साबित करने के बाद भी वक्रता के साथ, बडे से बडे प्राणी और बडी से बडी हिंसा का ही चुनाव करना है।

"एक यह भी कुतर्क दिया जाता है कि शाकाहारी सब्जीयों को पैदा करनें के लिये आठ दस प्रकार के जंतु व कीटों को मारा जाता है।"

खण्ड़न- इन्ही की तरह कुतर्क करने को दिल चाहता है………
भाई, इतनी ही अगर सभी जीवों पर करूणा आ रही है,और जब दोनो ही आहार हिंसाजनक है तो दोनो को छोड क्यों नहीं देते?  दोनो नहीं तो पूरी तरह से किसी एक की तो कुर्बानी(त्याग) करो…॥ कौन सा करोगे????


"ऐसा कोनसा आहार है,जिसमें हिंसा नहीं होती।"

खण्ड़न- यह कुतर्क ठीक ऐसा है कि 'वो कौनसा देश है जहां मानव हत्याएं नहीं होती?' इसलिए मानव हत्याओं को जायज मान लिया जाय? उसे सहज ही स्वीकार कर लिया जाय? और उसे बुरा भी न कहा जाय? आपका आशय यह है कि, जब सभी में जीवन हैं, और सभी जीवों का प्राणांत, हिंसादोष है तो सबसे उच्च्तम, क्रूर, घिघौना बडे जीव की हत्या का दुष्कर्म ही क्यों न अपनाया जाय? यह तो समझ का सरासर दिवालियापन है!!

तर्क से तो बिना जान निकले पशु शरीर भी मांस में परिणित नहीं हो सकता। तार्किक तो यह भी है कि किसी भी तरह का मांस हो, अंततः मुर्दे का ही मांस होगा। उपर से तुर्रा यह है कि हलाल तरीके से काटो तो वह मुर्दा नहीं । मांस के लिये जीव की जब हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मख्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मख्खियों को कैसे आभास हो जाता है। उसी क्षण से वह मांस मख्खियों के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही लगभग 563 तरह के सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार किया जाता है वह जगह व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, और यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यानि एक ताज़ा मांस के टुकडे पर ही हज़ारों मख्खी के अंडे, लाखों सुक्ष्म जीव, और हज़ारों रोगाणु होते है। कहो, किसमें जीव हिंसा ज्यादा है।, मुर्दाखोरी में या अनाज दाल फ़ल तरकारी में?

रही बात इन्द्रिय के आधार पर अपराध की तो जान लीजिए कि हिंसा तो अपराध ही है बस क्रूरता और सम्वेदनाओं के स्तर में अन्तर है। जिस प्रकार किसी कारण से गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो होने वाले दुख की मात्रा व तीव्रता बढ़ती जाती है। कम से अधिकतम दुख महसुस होता है क्योंकि इसका सम्बंध भाव से है। उसी तरह अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा पर क्रूर भाव की श्रेणी बढती जाती है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। सम्वेदना भी अधिक से अधिक कुंद हो जानी चाहिए। आप कम इन्द्रिय पर अधिक करूणा की बात करते है न, क्या विकलेन्द्रिय भाई के अपराध के लिए इन्द्रिय पूर्ण भाई को फांसी दे देना न्यायोचित होगा? यदि दोनो में से किसी एक के जीवन की कामना करनी पडे तो किसके पूर्ण जीवन की कामना करेंगे? विकलेन्द्रिय या पूर्णइन्द्रिय?

6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दांत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.

7 - और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.

खण्ड़न- मानते है इन्सान कुछ भी खा/चबा सकता है, किन्तु प्राकृतिक रूप से वह शिकार करने के काबिल हर्गिज नहीं है।  वे दांत शिकार के अनुकूल नहीं है। उसके पास तेज धारदार पंजे भी नहीं है। मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल है। मानव प्रकृति से शाकाहारी ही है। खाने चबाने को तो हमने लोगों को कांच चबाते देखा है, जहर और नशीली वस्तुएँ पीते पचाते देखा है। मात्र खाने पचाने का सामर्थ्य हो जाने भर से जहर, कीचड़, कांच मिट्टी आदि उसके प्राकृतिक आहार नहीं हो जाते। ‘खाओ जो पृथ्वी पर है’ का मतलब यह नहीं कि कहीं निषेध का उल्लेख न हो तो धूल, पत्थर, जहर, एसीड आदि भी खा लिया जाय या खाने की संस्तुति की जाय। इसलिए ऐसे किसी बेजा तर्क से मांसहार तर्कसंगत सिद्ध नहीं हो जाता।

8 - आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.

खण्ड़न- हां, देखा तो नहीं, पर सुना अवश्य था कि आदि मानव मांसाहारी थे। पर नवीनतम जानकारी तो यह भी मिली कि प्रगैतिहासिक मानव शाकाहारी था। यदि फिर भी मान लें कि वे मांसाहारी थे तो बताईए शिकार कैसे करते थे? अपने उन दो छोटे भोथरे दांतो से? या कोमल नाखूनो से? मानव तो पहले से ही शाकाहारी रहा है, उसकी मां के दूध के बाद उसकी पहली पहचान फलों - सब्जियों से हुई होगी। जब कभी कहीं, शाकाहार का अभाव रहा होगा तो पहले उसने पत्थर आदि के हथियार बनाए होंगे फिर शिकार किया होगा, पहले उसने अग्नी जलाना सीखा होगा  फ़िर मांसाहार किया होगा। यानि हथियारों और आग्नी के अविष्कार के पहले वह फ़ल फ़ूल पर ही आश्रित था।

लेकिन फिर भी इस कुतर्क की जिद्द है तो, आदि युग में तो आदिमानव नंगे घुमते थे, क्या हम आज उनका अनुकरण करें? वे अगर सभ्यता के लिए अपनी नंगई छोड़ कर परिधान धारक बन सकते है तो हम आदियुगीन जंगली मांसाहार त्याग कर, सभ्ययुगीन संस्कारी शाकाहार क्यों नहीं अपना सकते? हमारे आदि पूर्वज शिकार से निर्दोष आहार की तरफ बढ़े है उन्होने विकार से संस्कार की और विकास साधा है क्या हम उस विकास को उलट कर पुनः पतन गामी बन जाएं?

9 - जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है - यह कहना 'मांसाहार आपको आक्रामक बनता है' का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.

खण्ड़न- इसका तात्पर्य ऐसा नहीं कि हिंसक पशुओं के मांस से हिंसक,व शालिन पशुओं के मांस से शालिन बन जाओगे।

इसका तात्पर्य यह है कि जब आप बार बार बड़े पशुओं की अत्यधिक क्रूरता से हिंसा करते है तब ऐसी हिंसा, और हिंसा से उपजे आहार के कारण, हिंसा के प्रति सम्वेदनशीलता खत्म हो जाती है। क्रूर मानसिकता पनपती है और गूढ़ हिंसक मनोवृति बनती है। ऐसी मनोवृति के कारण आवेश आक्रोश द्वेष सामान्य सा हो जाता है। क्रोधावेश में हिंसक कृत्य भी सामान्य होता चला जाता है। इसलिए आवेश आक्रोश की जगह कोमल संवेदनाओं का संरक्षण जरूरी है। जैसे आपने प्राय देखा होगा कि रोज रोज कब्र खोदने वाले के चहरे का भाव पत्थर की तरह सपाट रहता है। क्या वह मरने वाले के प्रति जरा भी संवेदना या सहानुभूति दर्शाता है? वस्तुतः उसके बार बार के इस कृत्य में सलग्न रहने से, मौत के प्रति उसकी सम्वेदनाएँ मर जाती है।

10 - यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.

खण्ड़न- हाथ कंगन को आरसी क्या?, यदि शाकाहारी होने से कमजोरी आती तो मानव कब का शाकाहार और कृषि-कर्म  छोड चुका होता। कईं संशोधनों से यह बात उभर कर आती रही है कि शाकाहार में शक्ति के लिए जरूरी सभी पोषक पदार्थ है। बाकी शक्ति सामर्थ्य के प्रतीक खेलो के क्षेत्र में अधिकांश खिलाडी शाकाहार अपना रहे है। कटु सत्य तो यह है कि शक्तिशाली, शांतिप्रिय, बुद्धिमान बनाने के गुण मांसाहार में तो बिलकुल भी नहीं है।

11 - शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.

खण्ड़न- भाड में जाय वो बंजर पाश्चात्य देश जो ताज़ा शाक पैदा नहीं कर सकते!! भारत में यह सस्ता और सहज उपलब्ध है तब यहां तो शाकाहार अपना लेना ही बुद्धिमानी है। सस्ते महंगे की सच्चाई तो यह है कि पशु से 1 किलो मांस प्राप्त करने के लिए उन्हें 13 किलो अनाज खिला दिया जाता है, उपर से पशु पालन उद्योग में बर्बाद होती है विशाल भू-सम्पदा, अनियंत्रित पानी के उपयोग का यह दुष्कृत्य  निश्चित ही पृथ्वी पर भार है। मात्र  उपलब्ध उपजाऊ भूमि का भी अन्न उत्पादन के लिए प्रयोग हो तो निश्चित ही अन्न सभी जगह अत्यधिक सस्ता हो जाएगा। बंजर निवासियों को कुछ अतिरिक्त खर्चा करना पडे तब भी उनके लिए सस्ता सौदा होगा।

12 - अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.

खण्ड़न- यदि अल्लाह ही जीवन देता हरता है  तो संख्या कम करने का ठेका अल्लाह से आपने ले रखा है?

जो लोग ईश्वरवादी है, वे तो अच्छी तरह से जानते है, संख्या का बेहतर प्रबंधक ईश्वर ही है।

जो लोग प्रकृतिवादी है वे भी जानते है कि प्रकृति के पास जैव सृष्टि के संतुलन का गजब प्लान है।

करोडों साल से जंगली जानवर और आप लोग मिलकर शाकाहारी पशुओं को खाते आ रहे हो, फ़िर भी जिस प्रजाति के जानवरों को खाया जाता है, बिलकुल ही विलुप्त या कम नहीं हुए। उल्टे मांसाहारी पशु अवश्य विलुप्ति की कगार पर है। सच्चाई तो यह है कि जो जानवर खाए जाते है उनका बहुत बडे पैमाने पर उत्पादन होता है। जितनी माँग होगी उत्पादन उसी अनुपात में बढता जाएगा। अगर नही खाया गया तो जानवरों की खेती ही नहीं होगी। मांसाहारियों ने जानवर पैदा करने के उद्योग लगा रखे है।

13 -कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.

खण्ड़न- मेडिकल बुक किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह 'अंतिम सत्य' नहीं है। वह इतनी इमानदार है कि कल को यदि कोई नई शोध प्रकाश में आए तो वह अपनी 'बुक' में इमानदारी से परिवर्तन-परिवर्धन कर देगी। शाकाहार के श्रेष्ठ विकल्प होने पर अभी तक गम्भीर शोध-खोज नहीं हुई है। किन्तु सवाल जब मानव स्वास्थ्य का है तो कभी न कभी यह तथ्य अवश्य उभर कर आएगा कि मांसाहार मनुष्य के स्वास्थ्य के बिलकुल योग्य नहीं है। और फिर माँसाहार त्याग का उपाय सहज हो, अहानिकर हो तो माँसाहार से निवृति का स्वागत होना चाहिए। मेडिकल बुक में भावनाओं और सम्वेदनाओं पर कोई उल्लेख या निर्देश नहीं होता, तो क्या भावनाओं और सम्वेदनाओं की उपयोगिता महत्वहीन हो जाती है? भावों के प्रभाव पर कोई शोध खोज तथ्य या तत्व  मेडिकल बुक में नहीं है, तो क्या मन के भावों पर उपदेश करती उस अन्तिम बुक को भी निरस्त कर देंगे कि मेडिकल बुक में भावों के बारे में कुछ नहीं लिखा?

14 - और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

खण्ड़न- सरकारें क्यों प्रतिबंध लगायेगी? जबकि उसके निति-नियंता भी इसी समाज की देन है, यहीं से मानसिकता और मनोवृतियां प्राप्त करते है। लोगों का आहार नियत करना सरकारों का काम नहीं है।यह तो हमारा फ़र्ज़ है, हम विवेक से उचित अनुचित का भेद करें और उचित को अपनाएं, अनुचित को दूर हटाएं। उदाहरण के लिए झुठ पर सरकारी कानून से प्रतिबंध कहीं भी नहीं लगाया गया है। फिर भी सर्वसम्मति से झूठ को बुरा माना जाता है। किसी प्रतिबंध से नहीं बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता से हम झूठ का व्यवहार नहीं करते। कानून सच्च बोलने के लिए मजबूर नहीं कैसे कर पाएगा?  इसीलिए सच पाने के लिए अदालतों को धर्मशास्त्रों शपथ दिलवानी पडती है। ईमान वाला व्यक्ति इमान से ही सच अपनाता है और झूठ न बोलने को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर बचता है। उसी तरह अहिंसक आहार को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर अपनाना होता है।

हर प्राणी में जीवन जीने की अदम्य इच्छा होती है, यहां तक की कीट व जंतु भी कीटनाशक दवाओं के प्रतिकार की शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं से प्रतिकार शक्ति पैदा कर लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जिजीविषा का परिणाम होता है। सभी जीना चाहते है मरना कोई नहीं चाहता।

इसलिए, 'ईमान' और 'रहम' की बात करने वाले 'शान्तिपसंद' मानव का यह फ़र्ज़ है कि वह जीए और जीने दे।

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