30 अगस्त 2010

अपने अंदर है दुश्मनों का डेरा।

मिथ्या कहलाता है जग इसी से,
क्योंकि जग में भ्रमणाओं का घेरा।
क्या ढ़ूंढे हम दुश्मन जगत में,
अपने अंदर है दुश्मनों का डेरा।


कोई अपमान कैसे करेगा,
हमको अपने अभिमान ने मारा।
लोग ठग ही न पाते कभी भी,
हमको अपने ही लोभ ने मारा।


क्रोध अपना लगाता है अग्नि,
दावानल सा लगे जग सारा।
लगे षडयंत्र रचती सी दुनियां,
खुद की माया नें जाल रचाया।


मेरा दमन क्या दुनिया करेगी,
मुझको अपने ही मोह ने बांधा।
रिश्ते बनते है पल में पराए,
मैने अपना स्वार्थ जब साधा।


दर्द आते है मुझ तक कहां से,
खुद ही ओढा भावों का लबादा।
इच्छा रहती सदा ही अधूरी,
पाना चाहा देने से भी ज्यादा।


खुद का स्वामी मुझे था बनना,
मैने बाहर ही ढूंढा खेवैया।
स्व कषायों ने नैया डूबो दी,
जब काफ़ी निकट था किनारा।


मिथ्या कहलाता है जग इसी से,
क्योंकि जग में भ्रमणाओं का घेरा।
क्या ढ़ूंढे हम दुश्मन जगत में,
अपने अंदर है दुश्मनों का डेरा।

23 टिप्‍पणियां:

  1. दिल की गहराईयों से लिखी हुई रचना है......

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  2. मेरा दमन क्या दुनिया करेगी,
    मुझको अपने ही मोह ने बांधा।
    रिश्ते बनते है पल में पराए,
    मैने अपना स्वार्थ जब साधा।

    सच्ची और अच्छी पंक्तियाँ...बहुत सुन्दर रचना है आपकी...बधाई...
    नीरज

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  3. आत्म-मंथन करती आपकी रचना बहुत बढ़िया रही!

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  4. कोई अपमान कैसे करेगा,
    हमको अपने अभिमान ने मारा।
    लोग ठग ही न पाते कभी भी,
    हमको अपने ही लोभ ने मारा ...

    बहुत खूब ... पर आज इस बात को कोई समझता नही है ... ये स्वयं का अभिमान .. अपना लोभ ही है जो पतन का कारण बनता है .... अच्छा लिख़ाः है ...

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  5. शाहनवाज़ साहब,
    नीरज गोस्वामी जी,
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी,
    दिगम्बर नासवा जी

    सराहना के लिये शुक्रिया साहब।

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  6. कविता आध्यात्मिक स्वरूप की है। भिन्न प्रकार की शैली से उसकी प्रभावोत्पादकता बढ़ती,यद्यपि मूल अर्थ अब भी संप्रेषित होता ही है।

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  7. बहुत ही सुन्दर और गहरे भाव के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना प्रशंग्सनीय है! उम्दा प्रस्तुती!

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  8. मैंने बाहर ही ढूंढा खेवैया.
    बहुत अच्छी प्रकार से अपने बात कही
    बहुत-बहुत मन को छूने वाली कबिता

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  9. अच्छी रचना है, अगर 'अग्नी' की जगह 'अग्नि' कर पाएँ तो ज्यादा बेहतर होगा.

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  10. कुमार राधारमण जी,
    उर्मि जी,
    सुबेदार जी,
    मजाल साहब,

    आपकी निर्मल सराहना के लिये आभार।

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  11. क्रोध अपना लगाता है अग्नि,
    दावानल सा लगे जग सारा।
    लगे षडयंत्र रचती सी दुनियां,
    खुद की माया नें जाल रचाया।


    मेरा दमन क्या दुनिया करेगी,
    मुझको अपने ही मोह ने बांधा।
    रिश्ते बनते है पल में पराए,
    मैने अपना स्वार्थ जब साधा।


    बहुत ही उम्दा और आत्ममंथन करती हुई सच्ची रचना ,सुज्ञ जी बहुत बढ़िया

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  12. अच्छी कविता लिखी है आपने .......... आभार

    कुछ लिखा है, शायद आपको पसंद आये --
    (क्या आप को पता है की आपका अगला जन्म कहा होगा ?)
    http://oshotheone.blogspot.com

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  13. hns raaj bhaayi aapne shi khaa sbse bde dushmn hmare andr hi mojud hen kaam,krodh,vaasnaa,laalch, bhrsshtachaar,ashishtta yeh sb km se km mere men to hen or yhi mere dushmn he aapki is kvitaa ne mujhe sch kaa ehsaas kraaya he dhnyvaad, dusri baat saanp aajkl bilon men nhin astinon men plaa krte hen bil vaale saanp to spere ki bin pr nachte hen or pkd men aajaate hen lekin astin ke saanp to bs jan or izzt lekr hi jaate hen. akhtar khan akela ktoa rajsthan

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  14. मनुष्य के स्वार्थ को बताती अच्छी रचना

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  15. खुद का स्वामी मुझे था बनना,
    मैने बाहर ही ढूंढा खेवैया।
    स्व कषायों ने नैया डूबो दी,
    जब काफ़ी निकट था किनारा।

    -भाई, मोह लिया मन!! बहुत सलीके से बात रखी है. वाह!

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  16. महक ज़ी,
    ओशो विचारक जी,
    अख्तर साहब,
    अंजना जी,
    सगीता दीदी,
    समीर जी,

    आपका लाख लाख शुक्रिया मेरे भावों को प्रोत्साहन दिया।

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  17. gaurtalab par aane ka bahut - bahut shukriya!

    bahut hi achha blog hai aapka..anmol khajana haath laga!

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  18. सुज्ञ ji...ye abhivayakti bahut hi sunder hai.
    badi achhi baat aapne kahi.

    Mujhe ye rachna bahut achhi lagi.

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  19. आदमी के अंदर बईठा हुआ सब सत्रु से आप एक्के साथ मुलाक़ात करवा दिए.. सच कहे हैं कि ई सब दुस्मन को भगाने के बादे आदमी इंसान बनता है...बहुत अच्छा लगा पढकर!!

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  20. हम खुद ही अपने मित्र और खुद ही शत्रु हैं।
    ..उम्दा खयाल।

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  21. पी के सिंह जी,
    विरेन्द्र जी,
    सलील जी,
    देवेन्द्र जी,

    शुभ भावों को प्रोत्साहित करने का आभार।

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  22. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ........माफी चाहता हूँ..

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