1 जुलाई 2013

ध्येयनिष्ठा

बहुत समय पहले की बात है, एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था। वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी। एक दिन एक महिला उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगी,  "बाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था, लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है, ठीक से बात तक नहीं करता"  "युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है”,  सन्यासी बोला।

” लोग कहते हैं कि आपकी जड़ी-बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है, कृपया आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दीजिए", महिला ने विनती की। सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला, "देवी मैं तुम्हे वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता, लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी वस्तु चाहिए जो मेरे पास नहीं है"  "आपको क्या चाहिए मुझे बताइए, मैं लेकर आउंगी!", महिला ने आग्रह किया। "मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए!", सन्यासी ने बताया।

अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी, बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा, बाघ उसे देखते ही दहाड़ा, महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी। अगले कुछ दिनों तक यही हुआ, महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली आती। महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता। अब तो महिला बाघ के निकट जाकर उसे परेशान करते कीट मक्खियों को दूर करती, सहलाती। बाघ को भी उसकी उपस्थिति रास आने लगी। उनकी मैत्री बढ़ने लगी, अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी। और देखते देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया।

फिर क्या था, वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची, और बोली, "मैं बाल ले आई बाबा!!"  "बहुत अच्छे!" और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल लेकर उसे जलती हुई अग्नी में झोंक दिया।  "अरे! ये क्या बाबा, आप नहीं जानते, इस बाल को लाने के लिए मैंने कितना कठिन श्रम किया और आपने इसे जला दिया? अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी?”, महिला घबराते हुए बोली।  "अब तुम्हे किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है", "सन्यासी बोला। जरा सोचो, तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया!, जब एक हिंसक पशु को धैर्य, मनोबल और प्रेम से जीता जा सकता है तो भला एक इंसान को नहीं ? तुमने धैर्य, सहनशीलता, ध्येय समर्पण व पुरूषार्थ से लक्ष्य सिद्ध करने का पाठ न केवल पढा, बल्कि उसे प्रायोगिक सिद्ध भी कर लिया है. बस अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण निष्ठा  एवं आत्मकेन्द्रित मनोबल चाहिए, यही कार्य की सफलता का मंत्र है।

'कस्तूरी कुण्डली बसे मृग ढ़ूंढे बन माहिं'  ……मानव में मनोबल की असीम शक्तियाँ छुपी होती है, जैसे ही प्रमाद हटता है और पुरूषार्थ जगता है, शक्तियाँ सक्रिय हो जाती है।

निष्ठा सूत्र :-
बांका है तो माका है
माली : सम्यक निष्ठा
शुद्ध श्रद्धा : अटल आस्था
स्वार्थ का बोझ-समर्पण की शक्ति

16 टिप्‍पणियां:

  1. अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण निष्ठा एवं आत्मकेन्द्रित मनोबल चाहिए, यही कार्य की सफलता का मंत्र है।

    अत्यंत सुंदर कथा.

    रामराम.

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  2. बहुत सुन्दर प्रेरक प्रस्तुति सुज्ञ जी, आभार।

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  3. बहुत ही सुन्दर, प्रेरक और सार्थक प्रस्तुती आभार।

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  4. .
    सार्थक सन्देश देती लघु कथा मन को गहराई तक छू गयी आभार मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं #
    आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  5. सबको ही प्रेम से जीता जा सकता है, सुन्दर शिक्षा।

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार८ /१ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है।

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  7. लक्ष्य पाने के लिए निष्ठा होनी चाहिए .... प्रेरक कथा

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  8. प्रेम से बात संभाली जा सकती है ... हालाँकि कलियुग का ध्यान भी रखना होगा :)
    प्रेरक !

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  9. प्रेम तो पत्थर को ही पिघला सकता है।
    सुन्दर सन्देश।

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  10. मनोबल से ही उद्देश्य की प्राप्ति की जा सकती है,,,उम्दा प्रस्तुति,,,

    RECENT POST: जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें.

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  11. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें

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