28 जून 2013

किसका सत्कार?



एक कंजूस सेठ थे। धर्म सभा में आखरी पंक्ति में बैठते थे। कोई उनकी ओर ध्यान भी नहीं देता था। एक दिन अचानक उन्होंने भारी दान की घोषणा कर दी। सब लोगों ने उन्हें आगे की पंक्ति में ले जाकर बैठाया, आदर सत्कार किया।
धनसंचय यदि लक्ष्य है,यश मिलना अति दूर।
यश - कामी को चाहिए,  त्याग  शक्ति  भरपूर ॥

सेठ ने कहा - "यह सत्कार मेरा नहीं, पैसे का हो रहा है।"

तभी गुरू बोले,- "पैसा तो तुम्हारे पास तब भी था, जब तुम पीछे बैठते थे और तुम्हें कोई पूछता नहीं था। आज तुम्हारा आदर इसलिये हो रहा है क्योंकि तुमने पैसे को छोड़ा है , दान किया है। तुम्हारे त्याग का सत्कार हो रहा है।"

अहंकार के भी अजीब स्वरूप होते है।

कभी हम वस्तुस्थिति का बहुत ही संकीर्ण और सतही अर्थ निकाल लेते है। दान अगर प्रकट हो जाय तो हमें दिखावा लगता है लेकिन प्रकटीकरण अन्य के लिए प्रोत्साहन का सम्बल बनता है इस यथार्थ को हम दरकिनार कर देते है, दिखावे और आडम्बर द्वारा श्रेय लेने की महत्वाकांक्षा निश्चित ही सराहनीय नहीं है किन्तु उसी में बसे त्याग और त्याग के प्रोत्साहन  प्रेरणा भाव की अवहेलना भी नहीं की जा सकती।

आसक्ति का त्याग निश्चित ही सराहनीय है।

सम्बन्धित सूत्र…
त्याग शक्ति
प्रोत्साहन हेतू दान का महिमा वर्धन

14 टिप्‍पणियां:

  1. सही विष्लेषण किया आपने.

    रामराम.

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन काँच की बरनी और दो कप चाय - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. आसक्ति का त्याग , मुश्किल तो है ही ..
    मंगलकामनाएं आपकी प्रयत्नों के लिए !

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  4. दान दे सकना एक गुण है, अन्यथा सब धन से चिपक कर बैठ जाते हैं।

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  5. आज तुम्हारा आदर इसलिये हो रहा है क्योंकि तुमने पैसे को छोड़ा है , दान किया है। तुम्हारे त्याग का सत्कार हो रहा है।" …………बहुत गहरी बात कह दी

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  6. वाह! सिक्के का दूसरा पहलू दिखने का शुक्रिया।

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  7. सही बात है । त्याग का मान होता है न कि कंजुसी से बचाए हुए धन का । सार्थक संदेश....

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  8. निकृष्ट कर्म द्वारा उपार्जित अर्थ के दान का क्या अर्थ.....?
    विभिन्न आपदाओं के पश्चात् 'दान' की जो दुकानें खुल जाती हैं, कृपा कर कोई
    उसे बंद करवाए ये दुकाने प्राय: संपन्न वर्ग द्वारा ही संचालित होती है और
    'प्रधान मंत्री' द्वारा भी.....

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