29 जुलाई 2013

द्वैध में द्वन्द्व, एकत्व में मुक्ति

मिथिला नरेश नमि दाह-ज्वर से पीड़ित थे। उन्हें भारी कष्ट था। भांति-भांति के उपचार किये जा रहे थे। रानियॉँ अपने हाथों से बावना चंदन घिस-घिस कर लेप तैयार कर रही थीं।

जब मन किसी पीड़ा से संतप्त होता है तो व्यक्ति को कुछ भी नहीं सुहाता। एक दिन रानियां चंदन घिस रही थीं। इससे उनके हाथों के कंगन झंकृत हो रहे थे। उनकी ध्वनि बड़ी मधुर थी, किंतु राजा का कष्ट इतना बढ़ा हुआ था कि वह मधुर ध्वनि भी उन्हें अखर रही थी। उन्होंने पूछा, "यह कर्कश ध्वनि कहां से आ रही है?"

मंत्री ने जवाब दिया, "राजन, रानियॉँ चंदन विलेपन कर रही हैं। हाथों के हिलने से कंगन आपस में टकरा रहे हैं।"

रानियों ने राजा की भावना समझकर कंगन उतार दिये। मात्र, एक-एक रहने दिया।

जब आवाज बंद हो गई तो थोड़ी देर बाद राजा ने शंकित होकर पूछा, "क्या चंदन विलेपन बंद कर दिया गया है?"

मंत्री ने कहा, "नहीं महाराज, आपकी इच्छानुसार रानियों ने अपने हाथों से कंगनों को उतार दिया है। सौभाग्य के चिन्ह के रुप में एक-एक कंगन रहने दिया है। राजन, आप चिन्ता मत कीजिये, लेपन बराबर किया जा रहा है।"

इतना सुनकर अचानक राजा को बोध हुआ, "ओह, मैं कितने अज्ञान में जी रहा हूं। जहॉँ दो हैं, वहीं संघर्ष है, वहीं पीड़ा है। मैं इस द्वन्द्व में क्यों जीता रहा हूं? जीवन में यह अशांति और मन की यह भ्रांति, आत्मा के एकत्व की साधना से हटकर, पर में, दूसरे से लगाव-जुडाव के कारण ही है।"

राजा का ज्ञान-सूर्य उदित हो गया। उसने सोचा-दाह-ज्वर के उपशांत होते ही चेतना की एकत्व साधना के लिए मैं प्रयाण कर जाऊंगा।

इसके बाद अपनी भोग-शक्ति को योग-साधना में रुपान्तरित करने के लिए राजा, नये मार्ग पर चल पड़ा।

16 टिप्‍पणियां:

  1. सही बोध ...
    शुभकामनायें आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  2. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन भारत मे भी होना चाहिए एक यूनिवर्सल इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शिवम मिश्रा जी, आभार संयोजित करने के लिए…

      हटाएं
  4. एक से अनेक होने की प्रक्रिया में यह संघर्ष तो होता ही है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं एकाकी एकत्व लिये, एकत्व लिये सब ही आते
    तन धन को साथी समझा था, पर ये भी छोड़ चले जाते..

    सुंदर प्रस्तुति।।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच्चे ज्ञान का बोध सही समय पर हो जाये तो कितना बेहतर हो.
    राजा का जीवन धन्य हुआ.
    अच्छी कथा.

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर "ब्लॉग - चिठ्ठा" में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह। सुन्दर बात कही।

    एक और बात पर ध्यान जाता है मेरा।

    दो के घर्षण से उठती ध्वनि थी तो मधुर किन्तु राजा की अपनी अस्वस्थता के चलते कर्कश प्रतीत हो रही थी।

    द्वैत में भी मिठास है। भक्ति का सुख तभी है जब द्वैत है। अपनी भक्ति तो नही ही होगी न?

    :)

    उत्तर देंहटाएं

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...