6 मार्च 2013

सनातन भवन

"सनातन धर्म को लेकर अक्सर संशय पैदा किए जाते है कि इसमें न जाने कितने पंथ सम्प्रदाय है, सभी के दर्शन विचार भिन्न भिन्न है जो परस्पर विरोधाभास का सर्जन करते है्। तो दूसरी ओर इसे उदारता या खुलेपन के नाम प्रसंशित कर प्रत्येक विचारधारा को समाहित करने के विशेषण की तरह निरूपित करते है। यह दोनो ही परस्पर विरोधाभासी बयान सनतन धर्म के यथार्थ चरित्र से कोशों दूर है। सनातन धर्म में कितने भी भिन्न भिन्न दर्शन पंथ सम्प्रदाय हो, सनातन धर्म और उसकी सभी शाखाएँ , सनातन के 'मूल तत्वो और सिद्धांतो ' पर प्रतिबद्ध है। विचार और विवेचन पर उदार होने के उपरांत भी अपने आराध्यों  की पूजनीयता पर संदेह स्वीकार नहीं करते। इसी निष्ठा  के बल पर सनातन धर्म  आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है।"

सनातन एक प्राचीन विशाल और विख्यात भवन है। एक पुरातत्व धरोहर है। इस में अभी तक समग्र भवन का आमूल चूल परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि अपने अपने कमरे को सजाने का कार्य हुआ है, सजाने में भी प्रतिस्पर्धात्मक सज्जा। इस तरह की सज्जा ने मूल तत्वो और सिद्धांतो की नींव को जस का तस रखा, उसमें कोई समझोता नहीं किया। किसी कक्ष ने पुरातत्व को समझा तो उसने जीर्णोद्धार करते हुए पुनः पुरातन साज सज्जा में बनाया। तो किसी कक्ष ने सुविधा और सरलता को ध्यान में रखते हुए उपयोगी सज्जा प्रदान की। किसी ने अपनी सुविधा तो किसी ने दूसरो की सुविधा को महत्व देते हुए सज्जा को स्वरूप दिया। तो किसी ने सुरक्षा के मद्देनजर भवन को सुरक्षा उपकरणो से सज्जित किया। लेकिन किसी ने भी नींव को कमजोर करने का दुस्साहस नहीं किया। कुछ भौतिकवादीयों नें इसी भवन में तलघर बानाने के लिए तल खोद दिया, इस खुदाई में नींव पर भी आघात हुए पर नींव मजबूत थी, कुछ गम्भीर बिगाड नहीं हुआ। अल्प काल तक भौतिकवादी इसमें रहे किन्तु शीघ्र ही यह तहखाना, वीरान अन्धेरी कोठरी में परिवर्तित हो गया। आज-कल इस तलघर में  कुछ मजदूर, मोहल्ले के सताए लोग और इन दोनो के रहनुमा, रात अंधेरे ताश खेलकर टाईम-पास करते है।

बहुत पहले कुछ लोगों ने इसके मझले बढा दिए थे, टॉप पर उन्होने हवादार खिडकियां, प्रकाश के लिए खूबसूरत बाल्कनी से कक्ष सजा दिए थे, इनके द्वारा किए गए अतिरिक्त निर्माण से भी सनातन भवन की नींव को कोई खतरा नहीं था। समय समय कभी इसकी या कभी उसकी सजावटें बढती घट्ती रहती, नए युग में नया दौर आया, भवन के बाहरी रंग-रोगन का प्रस्ताव आता और पास भी होता, कुछ पुरातन धरोहरवादीयों ने दबी जुबां से विरोध भी किया कि इससे भवन की पुरातत्व पहचान विकृत हो जाएगी किन्तु नींव को कोई खतरा न देख, चुप लगा गए। इस तरह आन्तरिक और बाहरी सजावटें निरन्तर बदलती रही पर भवन की नींव मजबूत थी हर नवनिर्माण सह गई। किन्तु अब इस आधुनिक काल में प्रगतिशील निवासी अजीब प्रस्ताव लाने लगे है। आजकल सुन्दर कंगूरों का फैशन चल पड़ा है, और वे नींव में लगे बेशकीमती पत्थरो को निकाल कर उससे भवन के कंगूरे अलंकृत करना चाहते है। किन्तु नई फैशन का मोह ऐसा है कि दूरदृष्टि कुंठित हो चली है। नींव जिस पर भवन टिका हुआ है, और भवन जिस पर इनका ही अस्तित्व आश्रय लिए हुए है।

पास में ही कोई ऐसा ही वैभवशाली भवन बनाने की महत्वाकांक्षा लिए हुए है। वह ऐसा ही सुदृढ भवन बनाना चाहता है। वह स्ट्रक्चर तो अपनी पसंद का रखना चाहता है किन्तु नींव सनातन भवन जैसी बनाना चाह्ता है। वह अपनी भूमि से सूरंग खोद कर बार बार इसकी नींव देखता है इसी सुंरग खुदाई से सनातन भवन में हल्का सा कम्पन महसुस होता है लेकिन यह पडौसी आज तक नहीं जान पाया कि इसकी नींव किन कारणो से मजबूत है। उसकी समस्या यह है कि इस नीव और अपने स्ट्रक्चर के वास्तु की इन्जिनियरिंग का मेल नहीं बैठ रहा। निर्माण काल में बिगडे सम्बंधो से आज भी सनातन भवन और इनके बीच झगडे आम है।

दूसरी तरफ के पडौसी के पास सनातन भवन का पूरा नक्शा, निर्माण कला का इतिहास और रिपोर्ट्स उपलब्ध है जो कभी वह इस भवन से चुरा ले गया था। यह ज्यादा समझदार है, अपनी इस जानकारी का ढिंढोरा नहीं पीटता, उसने सनातन भवन की नींव के लिए बने विराट प्लेटफार्म का उपयोग, अपनी नींवें ठहराने के लिए किया। परिणामस्वरूप सनातन भवन का एक अंश झुकाव इस भवन की ओर हो गया, जो देखने पर नज़र नहीं आता। अपने स्ट्रक्चर में जरा सा अनुकूल परिवर्तन कर भवन खडा कर ही लिया है। शान्त रहता है और दबे पांव लक्ष्य की ओर बढ़ता है, इस तरह स्वयं के भवन को सुदृढ करता रहता है।

इन दोनो पडौसियों ने अपनी इमारत पर लिख रखा है ‘अपने पडौसी से प्रेम करो’ जिसकी पूरा शहर सराहना करता है। किन्तु सनातन भवन ने लिख रखा है ‘पूरे शहर को अपना परिवार समझो’ पर पता नहीं शहर इस तख्ती की तरफ आंख उठा कर नहीं देखता, शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता।

9 जनवरी 2013

मायावी ज्ञान

एक गांव में सप्ताह के एक दिन प्रवचन का आयोजन होता था। इसकी व्यवस्था गांव के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने करवाई थी ताकि भोले-भाले ग्रामीणों को धर्म का कुछ ज्ञान हो सके। इसके लिए एक दिन एक ज्ञानी पुरुष को बुलाया गया। गांव वाले समय से पहुंच गए। ज्ञानी पुरुष ने पूछा - क्या आपको मालूम है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? गांव वालों ने कहा - नहीं तो...। ज्ञानी पुरुष गुस्से में भरकर बोले - जब आपको पता ही नहीं कि मैं क्या कहने जा रहा हूं तो फिर क्या कहूं। वह नाराज होकर चले गए।

गांव के सरपंच उनके पास दौड़े हुए पहुंचे और क्षमायाचना करके कहा कि गांव के लोग तो अनपढ़ हैं, वे क्या जानें कि क्या बोलना है। किसी तरह उन्होंने ज्ञानी पुरुष को फिर आने के लिए मना लिया। अगले दिन आकर उन्होंने फिर वही सवाल किया -क्या आपको पता है कि मैं क्या कहने जा रहा हूं? इस बार गांव वाले सतर्क थे। उन्होंने छूटते ही कहा - हां, हमें पता है कि आप क्या कहेंगे। ज्ञानी पुरुष भड़क गए। उन्होंने कहा -जब आपको पता ही है कि मैं क्या कहने वाला हूं तो इसका अर्थ हुआ कि आप सब मुझसे ज्यादा ज्ञानी हैं। फिर मेरी क्या आवश्यकता है? यह कहकर वह चल पड़े।

गांव वाले दुविधा में पड़ गए कि आखिर उस सज्जन से किस तरह पेश आएं, क्या कहें। उन्हें फिर समझा-बुझाकर लाया गया। इस बार जब उन्होंने वही सवाल किया तो गांव वाले उठकर जाने लगे। ज्ञानी पुरुष ने क्रोध में कहा - अरे, मैं कुछ कहने आया हूं तो आप लोग जा रहे हैं। इस पर कुछ गांव वालों ने हाथ जोड़कर कहा - देखिए, आप परम ज्ञानी हैं। हम गांव वाले मूढ़ और अज्ञानी हैं। हमें आपकी बातें समझ में नहीं आतीं। कृपया अपने अनमोल वचन हम पर व्यर्थ न करें। ज्ञानी पुरुष अकेले खड़े रह गए। उनका घमंड चूर-चूर हो गया।

1 जनवरी 2013

फ़ास्ट ट्रैक न्यायपीठों के गठन की माँग को लेकर जनहित याचिका का समर्थन


आज नैतिक जीवन-मूल्यों की प्रतिस्थापना बेहद जरूरी हो गई है। सम्पूर्ण समाज में चरित्र, संयम व सदाचारों के प्रति अटल निष्ठा और पूर्ण आस्था आवश्यक है। ऐसे श्रेष्ठ नैतिक जीवन मूल्यों के पोषण के लिए, जिस तरह उत्कृष्ट चरित्र का महिमा वर्धन आवश्यक है उसी तरह निकृष्ट कर्मों के प्रति निरूत्साह के लिए दुष्कृत्यों की घृणा निंदा भी नितांत ही आवश्यक है। पापभीरूता के बिना दुष्कृत्यों के प्रति पूर्ण अरूचि नहीं होती। त्वरित न्याय व्यवस्था, समाज में दुष्कर्मों के प्रति भय सर्जन का प्रमुख अंग है। इस प्रकार कठोर दंड, भय और बदनामी के साथ साथ सामान्य जन को विकारों और दुष्कर्मों से सजग व सावधान भी रखता है।

मेरा लोकतंत्र के सभी स्तम्भों से अनुरोध है कि प्रथम दृष्टि सिद्ध बलात्कार मामलों के त्वरित निष्पादन हेतु, फ़ास्ट ट्रैक न्यायपीठों का शीघ्रातिशीघ्र गठन हो. यह उपाय समाज में व्याप्त इस दूषण को काफी हद तक दूर करने में सहायक सिद्ध होगा. अंततः हिंसा व अपराध मुक्त समाज ही तो हमारा ध्येय है।

श्री गिरिजेश राव द्वारा, ‘फ़ास्ट ट्रैक न्यायपीठों की स्थापना’ को लेकर प्रस्तावित जनहित याचिका का मैं भी पूरजोर समर्थन करता हूँ।

आप भी भारी संख्या मेँ समर्थन कर इस ज्वलंत आवश्यक्ता को बल प्रदान करिए.........

25 दिसंबर 2012

दर्पोदय

English: Portrait of Akbar the Great: This por...
हिन्दी: मुग़ल चित्रकार मनोहर द्वारा बनाया गया मुग़ल बादशाह अकबर का चित्र (Photo credit: Wikipedia)
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दंभ का तीव्र उदय!!

एक बादशाह इत्र का बहुत शौकीन था। एक दिन वह दरबार में अपनी दाढ़ी में इत्र लगा रहा था। अचानक इत्र की एक बूंद नीचे गिर गई। बादशाह ने सबकी नजरें बचाकर उसे उठा लिया। लेकिन पैनी नजर वाले वजीर ने यह देख लिया। बादशाह ने भांप लिया कि वजीर ने उसे देख लिया है।

दूसरे दिन जब दरबार लगा, तो बादशाह एक मटका इत्र लेकर बैठ गया। वजीर सहित सभी दरबारियों की नजरें बादशाह पर गड़ी थीं। थोड़ी देर बाद जब बादशाह को लगा कि दरबारी चर्चा में व्यस्त हैं, तो उसने इत्र से भरे मटके को ऐसे ढुलका दिया, मानो वह अपने आप गिर गया हो। इत्र बहने लगा। बादशाह ने ऐसी मुद्रा बनाई, जैसे उसे इत्र के बह जाने की कोई परवाह न हो। इत्र बह रहा था। बादशाह उसकी अनदेखी किए जा रहा था।

वजीर ने यह देखकर कहा- जहांपनाह, गुस्ताखी माफ हो। यह आप ठीक नहीं कर रहे हैं। जब किसी इंसान के मन में चोर होता है तो वह ऐसे ही करता है। कल आपने जमीन से इत्र उठा ली तो आपको लगा कि आपसे कोई गलती हो गई है। आपने सोचा कि आप तो शहंशाह हैं, आप जमीन से भला क्यों इत्र उठाएंगे। लेकिन वह कोई गलती थी ही नहीं। एक इंसान होने के नाते आपका ऐसा करना स्वाभाविक था। लेकिन आपके भीतर शहंशाह होने का जो घमंड है, उस कारण आप बेचैन हो गए। और कल की बात की भरपाई के लिए बेवजह इत्र बर्बाद किए जा रहे हैं। सोचिए आपका घमंड आपसे क्या करवा रहा है। बादशाह लज्जित हो गया।

हमारे  निराधार और काल्पनिक अपमान के भयवश, हमारा दंभ उत्प्रेरित होता है। दर्प का उदय हमारे विवेक को हर लेता है। दंभ से मोहांध बनकर हम उससे भी बडी मूर्खता कर जाते है, जिस मूर्खता के कारण वह काल्पनिक अपमान भय हमें सताता है।

16 दिसंबर 2012

सहन-शक्ति

बात महात्मा बुद्ध के पूर्व भव की है जब वे जंगली भैंसे की योनि भोग रहे थे। तब भी वे एकदम शान्त प्रकृति के थे। जंगल में एक नटखट बन्दर उनका हमजोली था। उसे महात्मा बुद्ध को तंग करने में बड़ा आनन्द आता। वह कभी उनकी पीठ पर सवार हो जाता तो कभी पूंछ से लटक कर झूलता,  कभी कान में ऊंगली डाल देता तो कभी नथुने में। कई बार गर्दन पर बैठकर दोनों हाथों से सींग पकड़ कर झकझोरता। महात्मा बुद्ध उससे कुछ न कहते।

उनकी सहनशक्ति और वानर की धृष्टता देखकर देवताओं ने उनसे निवेदन किया, "शान्ति के अग्रदूत, इस नटखट बंदर को दंड दीजिये। यह आपको बहुत सताता है और आप चुपचाप सह लेते हैं!"

वह बोले, "मैं इसे सींग से चीर सकता हूं, माथे की टक्कर से पीस सकता हूं, परन्तु में ऐसा नहीं करता, न करुंगा। अपने से बलशाली के अत्याचार को सहने की शक्ति तो सभी जुटा लेते हैं, परन्तु सच्ची सहनशक्ति तो अपने से बलहीन की प्रताड़ना सहन करने में है।"

10 दिसंबर 2012

अहिंसा का आलोक

वे सभी व्यक्ति अहिंसा की शीतल छाया में विश्राम पाने के लिए उत्सुक रहते हैं, जो सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हैं. अहिंसा का क्षेत्र व्यापक है. यह सूर्य के प्रकाश की भांति मानव मात्र और उससे भी आगे प्राणी मात्र के लिए अपेक्षित है. इसके बिना शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की बात केवल कल्पना बनकर रह जाती है. अहिंसा का आलोक जीवन की अक्षय संपदा है. यह संपदा जिन्हें उपलब्ध हो जाती है, वे नए इतिहास का सृजन करते हैं. वे उन बंधी-बंधाई परंपराओं से दूर हट जाते हैं, जिनकी सीमाएं हिंसा से स्पृष्ट होती हैं. परिस्थितिवाद का बहाना बनाकर वे हिंसा को प्रश्रय नहीं दे सकते.

अहिंसा की चेतना विकसित होने के अनंतर ही व्यक्ति की मनोभूमिका विशद बन जाती है. वह किसी को कष्ट नहीं पहुंचा सकता. इसके विपरीत हिंसक व्यक्ति अपने हितों को विश्व-हित से अधिक मूल्य देता है. किंतु ऐसा व्यक्ति भी किसी को सताते समय स्वयं संतप्त हो जाता है. किसी को स्वायत्त बनाते समय उसकी अपनी स्वतंत्रता अपहृत हो जाती है.

किसी पर अनुशासन थोपते समय वह स्वयं अपनी स्वाधीनता खो देता है. इसीलिए हिंसक व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में संतुष्ट और समाहित नहीं रह सकता. उसकी हर प्रवृत्ति मं एक खिंचाव-सा रहता है. वह जिन क्षणों में हिंसा से गुजरता है, एक प्रकार के आवेश से बेभान हो जाता है. आवेश का उपशम होते ही वह पछताता है, रोता है और संताप से भर जाता है.

हिंसक व्यक्ति जिस क्षण अहिंसा के अनुभाव से परिचित होता है, वह उसकी ठंडी छांह पाने के लिए मचल उठता है. उसका मन बेचैन हो जाता है. फिर भी पूर्वोपात्त संस्कारों का अस्तित्व उसे बार-बार हिंसा की ओर धकेलता है. ये संस्कार जब सर्वथा क्षीण हो जाते हैं तब ही व्यक्ति अहिंसा के अनुत्तर पथ में पदन्यास करता है और स्वयं उससे संरक्षित होता हुआ अहिंसा का संरक्षक बन जाता है.

अहिंसा के संरक्षक इस संसार के पथ-दर्शक बनते हैं और हिंसा, भय, संत्रास, अनिश्चय, संदेह तथा असंतोष की अरण्यानी में भटके हुए प्राणियों का उद्धार करते हैं.

-आचार्य तुलसी (राजपथ की खोज)

30 नवंबर 2012

मन बिगाडे हार है और मन सुधारे जीत

'मन' को जीवन का केंद्रबिंदु कहना शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी। मनुष्य की समस्त क्रियाओं, आचारों का आरंभ मन से ही होता है। मन सतत तरह-तरह के संकल्प, विकल्प, कल्पनाएं करता रहता है।मन की जिस ओर भी रूचि होती है,उसका रुझान उसी ओर बढता चला जाता है, परिणाम स्वरूप मनुष्य की सारी गतिविधियां उसी दिशा में अग्रसर होती है। जैसी कल्पना हो ठिक उसी के अनुरूप संकल्प बनते है और सारे प्रयत्न-पुरुषार्थ उसी दिशा में सक्रिय हो जाते है। अन्ततः उसी के अनुरूप परिणाम सामने आने लगते हैं.। मन जिधर या जिस किसी में रस-रूचि लेने लगे, उसमें एकाग्रचित होकर श्रमशील हो जाता है। यहाँ तक कि उसे लौकिक लाभ या हानि का भी स्मरण नहीं रह जाता। प्रायः मनुष्य प्रिय लगने वाले विषय के लिए सब कुछ खो देने तो तत्पर हो जाता है। इतना ही नहीं अपने मनोवांछित को पाने के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहने को सदैव तैयार हो जाता है।

मन यदि अच्छी दिशा में मुड़ जाए; आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास में रुचि लेने लगे तो मानव व्यक्तित्व और उसके जीवन में एक चमत्कार का सर्जन हो सकता है। सामान्य श्रेणी का मनुष्य भी महापुरुषों की श्रेणी में सहज ही पहुंच सकता है। आवश्यकता 'मन' को अनुपयुक्त दिशा से उपयुक्त दिशा में मोड़ने की ही है। सारी कठिनाई मन के सहज प्रवाह पर नियंत्रण स्थापित करने की है। इस समस्या के हल होने पर मनुष्य सच्चे अर्थ में मानव बनता हुआ देवत्व के लक्षण तक सहजता से पहुंच सकता है।

शरीर-स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने के समान ही हमें मन के प्रति और भी अधिक सचेत, सावधान रहने की जरूरत है। दोयम चिंतन, दुर्विचारों और दुर्भावनाओं से मन मलिन और पतित हो जाता है। उस स्थिति में मन अपनी सभी विशेषताओं और श्रेष्ठताओं से च्युत हो जाता है।

कहते है मन के प्रवाह को तो सहज ही बहने देना चाहिए। किन्तु मन के सहज बहाव पर भरोसा करना हमेशा जोखिम भरा होता है। क्योंकि प्रवाह के समान ही मन का पतन की तरफ लुढ़कना स्वभाविक है जबकि उँचाई की ओर उठना कठिन पुरूषार्थ भरा होता है। मन का स्वभाव बालक जैसा होता है, उमंग से भरकर वह कुछ न कुछ करना-बोलना चाहता है। यदि सही दिशा न दी जाए तो उसकी क्रियाशीलता तोड़-फोड़, गाली-गलौज और दुष्चरित्र के  रूप में सामने आ सकती है।

नदी के प्रवाह में बहता पत्थर सहजता से गोल स्वरूप तो पा लेता है किन्तु उसकी मोहक मूर्ति बनाने के लिए अनुशासन युक्त कठिन श्रम की आवश्यकता होती है। ठिक उसी तरह मन को उत्कृष्ट दिशा देने के लिए विशेष कठोर प्रयत्न करने आवश्यक होते है। मन के तरूवर् को उत्कृष्ट फलित करने के लिए साकात्मक सोच की भूमि, शुभचिन्तन का जल, सद्भाव की खाद और सुविचार का प्रकाश बहुत जरूरी है। मन में जब सद्विचार भरे रहेंगे तो दुर्विचार भी शमन या गलन का रास्ता लेंगे।

प्रखर चरित्र और आत्म निर्माण के लिए, मन को नियंत्रित रखना और सार्थक दिशा देना, सर्वप्रधान उपचार है। इसके लिए आत्मनिर्माण करने वाली, जीवन की समस्याओं को सही ढंग से सुलझाने वाली, उत्कृष्ट विचारधारा की पुस्तकों का पूरे ध्यान, मनन और चिंतन से स्वाध्याय करना कारगर उपाय है। यदि सुलझे हुए विचारक, जीवन विद्या के ज्ञाता, कोई संभ्रात सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। जिस प्रकार शरीर की सुरक्षा और परिपुष्टि के लिए रोटी और पानी  की आवश्यकता होती हैं उसी प्रकार आत्मिक शान्ति, सन्तुष्टि, स्थिरता और प्रगति के लिए मन को सद्विचारों, सद्भावों का प्रचूर पोषण देना नितांत आवश्यक है।

29 नवंबर 2012

आसक्ति की मृगतृष्णा

हमारे गांव में एक फकीर घूमा करता था, उसकी सफेद लम्बी दाढ़ी थी और हाथ में एक मोटा डण्डा रहता था। चिथड़ों में लिपटा उसका ढीला-ढाला और झुर्रियों से भरा बुढ़ापे का शरीर। कंधे पर पेबंदों से भरा झोला लिये रहता था। वह बार-बार उस गठरी को खोलता, उसमें बड़े जतन से लपेटकर रखी, रंगीन कागज की गड्डियों को निकालता, हाथ फेरता और पुनः थेले में रख देता। जिस गली से वह निकलता और जहां भी रंगीन कागज दिखता, वह बड़ी सावधानी से उसे उठा लेता, कोने सीधे करता, तह कर हाथ फेरता और उसकी गड्डी बना कर रख लेता।

फिर वह किसी दरवाजे पर बैठ जाता और कागजों को दिखाकर कहा करता, "ये मेरे प्राण हैं।" कभी कहता, "ये रुपये हैं। इनसे गांव के गिर रहे, अपने किले का पुनर्निर्माण कराऊंगा।" फिर अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरकर स्वाभिमान से कहता, "उस किले पर हमारा झंडा फहरेगा और मैं राजा बनूंगा।"

गांव के बालक उसे घेरकर खड़े हो जाते, उस पर हँसा करते। वयस्क और वृद्ध लोग भी उसकी खिल्ली उड़ाते। कहते, "पागल है, तभी तो रंगीन रद्दी कागजों से किले बनवाने की बात कर रहा है।"

मुझे अनुभूति हुई कि हम भी तो वही करते है। उस फकीर की तरह, हम भी रंग बिरंगे कागज संग्रह करने में व्यस्त है,  उनसे किले बनाने  के दिवास्वप्न में मस्त है। पागल तो हम है, जिन सुखों के पिछे बेतहासा भाग रहे है, अन्तत: वह सुख तो हमें मिलता ही नहीं। सारे ही प्रयास निर्थक स्वप्न ही साबित होते है। यह फकीर जैसे हम संसार के प्राणियों से कहता है, "तुम सब पागल हो, जो माया में लिप्त, तरह-तरह के किले बनाते हो और सत्ता के सपने देखते रहते हो, इतना ही नही, मोहासक्त तुम अपने पागलपन को बुद्धिमत्ता समझते हो"

ऐसे फकीर हर गांव- शहर में घूमते हैं, किन्तु हमने अपनी आंखों पर आसक्ति की पट्टी बांध रखी है और कान मोह मद से बंद कर लिये हैं। इसी से न हम यथार्थ को देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। वास्तव में पागल वह नहीं, हम हैं।

8 अक्टूबर 2012

जिजीविषा और विजिगीषा

मानव ही क्यों, प्राणीमात्र में मुख्यतः 'जिजीविषा' और 'विजिगीषा' दो वृतियाँ कार्यशील होती है। अर्थात् जीने की और जीतने की इच्छा। दीर्घकाल तक जीने की और ऐश्वर्यपूर्वक दूसरों पर अधिपत्य जमाने की स्वभाविक इच्छा मनुष्य मात्र में पाई जाती है। वस्तुतः 'जीने' की इच्छा ही 'जीतने' की इच्छा को ज्वलंत बनाए रखती है। एक छोटे से 'जीवन' के लिए, क्या प्राणी क्या मनुष्य, सभी आकाश पाताल एक कर देते है।

भौतिकवादी प्राय: इस 'जीने' और 'जीतने' के आदिम स्वभाव को, प्रकृति या स्वभाविकता के नाम पर संरक्षण और प्रोत्साहन देने में लगे रहते है। वे नहीं जानते या चाहते कि इस आदिम स्वभाव को सुसंस्कृत किया जा सकता है या किया जाय। इसीलिए प्राय: वे सुसंस्कृतियों का विरोध करते है और आदिम इच्छाओं को प्राकृतिक स्वभाव के तौर पर आलेखित/रेखांकित कर उसे बचाने का भरपूर प्रयास करते है। इसीलिए वे संस्कृति और संयम प्रोत्साहक धर्म का भी विरोध करते है। वे चाहते है मानव सदैव के लिए उसी जिजीविषा और विजिगीषा में लिप्त रहे, इसी में संघर्ष करता रहे, आक्रोशित और आन्दोलित बना रहे। जीने के अधिकार के लिए, दूसरों का जीना हराम करता रहे। और अन्ततः उसी आदिम इच्छाओं के अधीन अभिशप्त रहकर हमेशा अराजक बना रहे। 'पाखण्डी धर्मान्ध' व 'लोभार्थी धर्मद्वेषियों' ने विनाश का यही मार्ग अपनाया हुआ है।

दुर्भाग्य से "व्यक्तित्व विकास" और "व्यक्तिगत सफलता" के प्रशिक्षक भी इन्ही वृतियों को पोषित करते नजर आते है। इसीलिए प्रायः ऐसे उपाय नैतिकता के प्रति निष्ठा से गौण रह जाते है।

वस्तुतः इन आदिम स्वभावों या आदतों का संस्करण करना ही संस्कृति या सभ्यता है। धर्म-अध्यात्म यह काम बखुबी करता है। वह 'जीने' के स्वार्थी संघर्ष को, 'जीने देने' के पुरूषार्थ में बदलने की वकालत करता है। "जीओ और जीने दो" का यही राज है। बेशक! आप जीने की कामना कर सकते है, किन्तु प्रयास तो 'जीने देने' का ही किया जाना चाहिए। उस दशा में दूसरो का भी यह कर्तव्य बन जाएगा कि वे आपको भी जीने दे। अन्यथा तो गदर मचना निश्चित है। क्योंकि प्रत्येक अपने जीने की सामग्री जुटाने के खातिर, दूसरो का नामोनिशान समाप्त करने में ही लग जाएंगा। आदिम जंगली तरीको में यही तो होता है। और यही  विनाश का कारण भी है। जैसे जैसे सभ्यता में विकास आता है ‘जीने देने’ का सिद्धांत ‘जीने की इच्छा’ से अधिक प्रबल और प्रभाव से अधिक उत्कृष्ट होते चला जाता है। दूसरी 'जीतने की इच्छा' भी अधिपत्य जमाने की महत्वाकांक्षा त्याग कर, दिल जीतने की इच्छा के गुण में बदल जाती है।


(जिजीविषा-सहयोग) सभी को सहजता से जीने दो।
( हृदय-विजिगीषा) सभी के हृदय जीतो।

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥


6 अक्टूबर 2012

स्वार्थ का बोझ

एक आदमी अपने सिर पर अपने खाने के लिए अनाज की गठरी ले कर जा रहा था। दूसरे आदमी के सिर पर उससे चार गुनी बड़ी गठरी थी। लेकिन पहला आदमी गठरी के बोझ से दबा जा रहा था, जबकि दूसरा मस्ती से गीत गाता जा रहा था।

पहले ने दूसरे से पूछा, "क्योंजी! क्या आपको बोझ नहीं लगता?"

दूसरे वाले ने कहा, "तुम्हारे सिर पर अपने खाने का बोझ है, मेरे सिर पर परिवार को खिलाकर खाने का। स्वार्थ के बोझ से स्नेह समर्पण का बोझ सदैव हल्का होता है।"

स्वार्थी मनुष्य अपनी तृष्णाओं और अपेक्षाओं के बोझ  से बोझिल रहता है। जबकि परोपकारी अपनी चिंता त्याग कर संकल्प विकल्पों से मुक्त रहता है।

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