6 अक्तूबर 2012

स्वार्थ का बोझ

एक आदमी अपने सिर पर अपने खाने के लिए अनाज की गठरी ले कर जा रहा था। दूसरे आदमी के सिर पर उससे चार गुनी बड़ी गठरी थी। लेकिन पहला आदमी गठरी के बोझ से दबा जा रहा था, जबकि दूसरा मस्ती से गीत गाता जा रहा था।

पहले ने दूसरे से पूछा, "क्योंजी! क्या आपको बोझ नहीं लगता?"

दूसरे वाले ने कहा, "तुम्हारे सिर पर अपने खाने का बोझ है, मेरे सिर पर परिवार को खिलाकर खाने का। स्वार्थ के बोझ से स्नेह समर्पण का बोझ सदैव हल्का होता है।"

स्वार्थी मनुष्य अपनी तृष्णाओं और अपेक्षाओं के बोझ  से बोझिल रहता है। जबकि परोपकारी अपनी चिंता त्याग कर संकल्प विकल्पों से मुक्त रहता है।

14 टिप्‍पणियां:

  1. सच में, यदि परोपकार का सोच लें तो, ईश्वर बहुत दे देता है, सम्हालने के लिये।

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  2. सुन्दर सन्देश! सचमुच स्वार्थ की कीमत बहुत भारी है।

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  3. अंतर नजरिये का, वही असली अंतर है।

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  4. कितनी बड़ी बात ... ये है जीवन की असली कला

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  5. बोझ काम करने वाले की मानसिकता पर भी निर्भर होता है ....
    बढ़िया !

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  6. मंदिर के निर्माण में पत्थर तोडते मजदूरों का वक्तव्य याद आ गया..
    पहला रोते हुए बोला - दिखाई नहीं देता पत्थर तोड़ रहा हूँ.
    दूसरे ने कराहते हुए कहा - मजदूरी कर रहा हूँ.
    तीसरा गाते हुए कहने लगा - भगवान का मंदिर बना रहा हूँ.
    /
    पीड़ा में आनंद की अनुभूति प्रदान करता है निस्वार्थ कर्म!! प्रेरक कथा सुज्ञ जी!

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  7. जीवन की एक और कला और निस्वार्थ कर्म की सच्ची शिक्षा.

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  8. सीख देती प्रस्तुति...सुन्दर आलेख

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  9. स्वार्थ के बोझ से स्नेह समर्पण का बोझ सदैव हल्का होता है .....सारगर्भित पंक्ति

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