13 जून 2013

बहिर्मुखी दृष्टि

किसी गाँव में एक बुढ़िया रात के अँधेरे में अपनी झोपडी के बहार कुछ खोज रही थी। तभी गाँव के ही एक व्यक्ति की नजर उस पर पड़ी , "अम्मा! इतनी रात में रोड लाइट के नीचे क्या ढूंढ रही हो ?", व्यक्ति ने पूछा। "कुछ नहीं! मेरी सूई गुम हो गयी है, बस वही खोज रही हूँ।", बुढ़िया ने उत्तर दिया।

फिर क्या था, वो व्यक्ति भी महिला की मदद में जुट गया और सूई खोजने लगा। कुछ देर में और भी लोग इस खोज अभियान में शामिल हो गए और देखते- देखते लगभग पूरा गाँव ही इकठ्ठा होकर, सूई की खोज में लग गया। सभी बड़े ध्यान से सूई ढूँढने में लगे हुए थे कि तभी किसी ने बुढ़िया से पूछा ,"अरे अम्मा ! ज़रा ये तो बताओ कि सूई गिरी कहाँ थी?"

"बेटा , सूई तो झोपड़ी के अन्दर गिरी थी।", बुढ़िया ने ज़वाब दिया। ये सुनते ही सभी बड़े क्रोधित हो गए। भीड़ में से किसी ने ऊँची आवाज में कहा, "कमाल करती हो अम्मा ,हम इतनी देर से सूई यहाँ ढूंढ रहे हैं जबकि सूई अन्दर झोपड़े में गिरी थी, आखिर सूई वहां खोजने की बजाए, यहाँ बाहर क्यों खोज रही हो ?" बुढ़िया बोली, " झोपडी में तो धुप्प अंधेरा था, यहाँ रोड लाइट का उजाला जो है, इसलिए।”

मित्रों, हमारी दशा भी इस बुढिया के समान है। हमारे चित्त की शान्ति, मन का आनन्द तो हमारे हृदय में ही कहीं खो गया है, उसे भीतर आत्म-अवलोकन के द्वारा खोजने का प्रयास होना चाहिए। वह श्रम तो हम करते नहीं, क्योंकि वहाँ सहजता से कुछ भी नजर नहीं आता, बस बाहर की भौतिक चकाचौंध में हमें सुख और आनन्द मिल जाने का भ्रम लगा रहता है। शायद ऐसा इसलिए है कि अन्तर में झांकना बडा कठिन कार्य है, वहां तो हमें अंधकार प्रतीत होता है, और चकाचौंध में सुख खोजना बडा सहज ही सुविधाजनक लगता है। किन्तु यथार्थ तो यह है कि आनन्द जहां गुम हुआ है उसे मात्र वहीं से ही पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

आनन्द अन्तर्मन में ही छुपा होता है। बाहरी संयोगों का सुख, केवल और केवल मृगतृष्णा है। यदि हृदय प्रफुल्लित नहीं तो कोई भी बाहरी सुख-सुविधा हमें प्रसन्न करने में समर्थ नहीं। और यदि मन प्रसन्न है, संतुष्ट है तो कोई भी दुविधा हमें दुखी नहीं कर सकती।

19 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक सुन्दर विचार ...आभार ...

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  2. हार्दिक आभार! सार्वभौमिक कथा। प्रकाश का ऐसा आशावान प्रयोग जीवन के हर क्षेत्र में देखा है (बेशक सुई कभी न दिखी हो)

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  3. कथा अपने आप में परिपूर्ण है, इसका सार भी स्पष्ट है सुज्ञ जी, पर आजकल बात इससे आगे बढ गई है.

    यहां कम से कम बुढिया को तो ये मालुम है कि सूई अंदर गिरी है पर अंदर (मन)अंधेरा है, फ़िर झूंठ मूंठ ही सही, सूई (प्रभु)को खोजने के प्रयत्न में तो लगी है, शायद है ढूंढते ढूंढ्ते कभी बाहर से अंदर भी पहुंच जाये. बाकी खोजने वाले संगी साथी तो बुढिया से भी गये गुजरे हैं, बस नकल में लगे हैं.

    पर असली समस्या आजकल यह खडी हो गई है कि आजकल बुढिया को भी नही मालूम कि सूई बाहर गिरी की अंदर? या कि कहीं गिरी भी है? बस लोक दिखावन के लिये राम राम...राम जपने में लगी है. तो बताईये इस स्थिति कोई सयाना गुरू भी क्या कर लेगा?

    हम इतने विराट भौतिक जंजालों में उलझ चुके हैं कि हमें सूई की कोई चिंता ही नही है, कि सूई गिर चुकी है? घर में सूई का कोई महत्व भी है या नही? नही हमें कोई फ़िक्र नही है.

    वर्तमान में हम अपने लिये सूई का महत्व ही खो चुके हैं, बुढिया कम से कम नकली तरीके से हरि भजन करके काम में लगी तो थी, आजकल कोई सूई को ढूंढने का प्रयत्न तो दूर बल्कि सूई का ख्याल ही नही करता, बहुत ही प्रेरक कथा, आभार.

    रामराम.

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  4. हम भी पता नहीं कब से खोज रहे हैं बाहर...

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  5. हर भ्रमित इंसान को सार्थक सन्देश देती एक प्रेरक कथा ! आभार आपका इतनी खूबसूरत प्रस्तुति के लिये !

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  6. सच में , पहले पता तो हो कि कुछ खो गया है !!
    प्रेरक !

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  7. सही कहा है। अन्दर झाँकने की ज़रुरत है।

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  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(15-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  9. सार्थक और प्रेरक लघु कथा
    वाकई हम दिशा और दशा से भटक गये हैं
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

    आग्रह है- पापा ---------

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  10. यही तो हो रहा है आजकल!
    इसीलिये पहले समय की अपेक्षा कहीं अधिक अशांति और अधर्म है.

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