14 मार्च 2015

सीमाएँ

एक कुएं में मेंढकों का एक समूह रहता था। समूह क्या उनका पूरा संसार ही था। एक समय की बात है जोरदार वर्षा के कारण कुआं पानी से लबालब भर गया। एक क्षमतावान मेंढक ने अपने पूरे सामर्थ्य से छलांग लगाई, परिणामस्वरूप वह कुएं से बाहर था। भीतर के मेंढक स्वयं को कुएं के सुरक्षा घेरे में सुरक्षित रखने में सफल रहे। एक जिज्ञासु बुद्धिमान मेंढक ने अपने मुखिया से प्रश्न किया, "चाचा, क्या दुनिया इतनी ही है जो हमें दिखाई देती है?"
मुखिया ने जवाब दिया, "हां, ये संसार इतना ही है जो हमें दिखायी देता है। अन्य विद्वानों से भी मैने यही जाना है, मैने अपने उम्र भर के अनुभव से भी इसे प्रमाणित किया है।"
"चाचा, दुनिया इससे बडी क्यों नहीं हो सकती?", युवा मेंढक ने फिर प्रश्न किया। चाचा ने मुस्काते हुए कहा, "उपर देख! क्या दिखाई देता है? आसमान? कितना बडा है आसमान?"
"वह तो हमारे कुएं के बराबर ही है, युवा ने जवाब दिया।
"फिर बताओ जो आसमान हमें साफ साफ सीमांत तक दिखायी देता है तो दुनिया उससे बडी कैसे हो सकती है?"
युवा के लगातार प्रश्नों से परेशान होकर बूढे मुखिया ने कहा, "जो सामने है उस पर विश्वास करना चाहिए, व्यर्थ की कल्पनाएं नहीं गढ़नी चाहिए।" युवा मैंढक भी बुद्धिमान था और जिज्ञासु भी। उसने अनुमान व्यक्त किया, "चाचा हो सकता है हमारे पास ही एक और कुंआ हो, उसका भी अपना आकाश हो? कभी कभी में निकट से हल्की सी आवाजें सुनता हूं।"
"हो सकता है, किन्तु वह सब जानना असंभव है अतः इन फालतू की बातों में सर खपाना व्यर्थ काम है। तुम्हारे पास छोटा सा जीवन है, यह हमारा संसार भी पूरी तरह नहीं देख पाए हो, अतः खाओ पिओ और मौज करो।"

कुएं से बाहर गए मेंढक ने विराट संसार प्रत्यक्ष देखा, उसने रमणीय वन, विशाल सरोवर व असीम सागर देखे, आहार की प्रचूरता और स्वछंद असीमित भ्रमण देखा था। वह उसी समय अपने कुएं की मुंडेर पर था। उसने अपने मित्रों की सीमित सोच को सुना। वह यथार्थ बताना चाहता था। किन्तु उसकी आवाज खुले में फैल जाती थी और कुएं के मेंढको तक नहीं पहूंच पा रही थी। कुएं के भीतर की आवाजे, ध्वनि विस्तरण के कारण स्पष्ट सुनायी दे रही थी। एक बार तो उसने सोचा, कुएं में छलांग लगा कर, उन्हे यथार्थ बता दूं , उनके कल्याण का मार्ग बता दूं। किन्तु नीचे गिरने में नुक्सान ही नुक्सान था, या तो वह जान से जाता या फिर पुनः सीमाओं में कैद हो जाता। इसीकारण यथार्थ कभी पुनः कुए में नहीं पहूंचता, कभी पहूंच भी जाए तो उसपर विश्वास नहीं किया जाता।

ठीक उसी तरह हमारा ज्ञान कुएं जैसा क्षुद्र और हमारा अहंकार कुएं की गहराई जैसा विशाल है। जिसका ज्ञान कुएं समान सीमित और अन्धकार में डूबा हो, वह अनजाने अनन्त को कैसे समझ सकेगा? अहंकार सदा अज्ञान में ही होता है। अहंकार हटाकर अज्ञानता की सीमाओं से आगे की सोच प्रारम्भ हो तो अनंतता के समक्ष कुएं की क्षुद्रता स्वयं भंग हो जाती है। किन्तु अनंतता के दर्शन तभी संभव हैं जब कुएं की देखी भाली सीमाओं का आग्रह टूटे। जो विचार अपने को किसी आग्रह की चारदीवारी में बांध लेता है, वह कभी सत्य पा नहीं सकता।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-03-2015) को "ख्वाबों में आया राम-राज्य" (चर्चा अंक - 1918) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत बढ़िया बोध कथा। सही है, सच झूठ कुछ भी तब तक समझाया नहीं जा सकता जब तक खुद समझ न आए।

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  3. जितना मैने जाना उससे कहीं अधिक अनजाना है!!

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    1. बिलकुल, और अनजाने का समूल निषेध नहीं किया जा सकता।
      आभार, वाणी जी!!

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