15 अगस्त 2014

अनर्थक बोझ

फेसबुक पर एक सुन्दर दृष्टान्त पढ़ने में आया……

एक मनोवैज्ञानिक श्रोताओं को स्ट्रेस मैनेजमेंट समझा रही थी।  बात करते करते उसने पानी का ग्लास उठाया और सवालिया निगाह कमरे में मौजूद लोगों पे घुमाई.. लोग समझे फिर वही पुराना "आधा भरा या आधा खाली" वाला सवाल आएगा!! मगर प्रश्न हुआ, "इस ग्लास का वजन क्या होगा??" किसी ने कहा 50 ग्राम, किसी ने कहा 80.. ज्यादा से ज्यादा 100 ग्राम।

"दरअसल ग्लास का असली भार ज्यादा ध्यान देने लायक नहीं है",  वक्ता ने समझाया, "असली मुद्दा है कि आप इस वजन को कितनी देर उठाए रहते हैं। अगर एक दो मिनट की बात है तो कोई समस्या नहीं, किन्तु घंटे भर में मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा। अगर मैं यही वजन दिन भर उठाये रखूँ तो शायद मेरा हाथ सुन्न पड़ जायेगा। किसी भी अवधि में ग्लास का वजन नहीं बदलता, मगर जितनी देर मैं इसे उठाये रखूँ .. मेरे लिए कठिनाई उतनी ही बढ़ जाएगी.."

"जीवन की परेशानियाँ, जीवन के तनाव भी ऐसे ही हैं.. एक दो मिनट की चिंता से अन्तर नहीं पड़ता। लेकिन जैसे जैसे आप ज्यादा देर तक उसे ढोते रहते हैं, आपकी परेशानी बढती जाती है.. अगर दिन भर लगा दें तो सर दर्द हो जाए और ज्यादा लगाया तो और कुछ करने लायक ही नहीं रहते आप.."

"उम्मीद है ग्लास नीचे रखना याद रखेंगे आप!! ... "

यह दृष्टांत केवल तनाव या परेशानियों के बोझ को उतारने के लिए ही नहीं, मोह आसक्ति, आलोचना, कटुवचन, सामान्य से शौक, मामूली लगती बुरी आदतें, अनावश्यक उपभोग, चारित्रिक कमियाँ सभी के लिए यह आदर्श दृष्टांत है........

  • कुछ समय के लिए मोह सुहाता है किन्तु इसे हर समय उठाए रहना अति दुष्कर व दुष्परिणामी बन जाता है।
  • कुछ समय के लिए शौक सुहाता है किन्तु जब ये लत बन जाता है इसका बोझ असहनीय बन जाता है।
  • कुछ समय के लिए मामूली सी बुरी आदतें मनरंजन करती है किन्तु वे जब स्वभाव का हिस्सा बन जाती है, व्यक्तित्व बैठ जाता है।
  • कुछ समय के लिए गैरजरूरी उपभोग आनन्द देता है पर उसका भार हमेशा के लिए ढोया नहीं जा सकता।
  • कुछ समय तक किसी की आलोचना हमारी चतुरता का सुख दे जाती है पर हर समय आलोचना निन्दक स्वभाव सम बोझ बन जाती है।
  • उसी तरह कुछ चारित्रिक कमियाँ जीवन में कुछ समय के लिए सहज सामान्य प्रतीत होती है, यदि लगातार बनी रहे तो चरित्र को ही तोड़ के रख देती है।
इन सभी विकारों का हमारे जीवन में आ जाना सहज है किन्तु इन विकारों के बोझ को ढ़ोते जाना चरित्र को धराशायी कर देता है। इसलिए यह भार असहनीय बने इतना अवसर नहीं देना है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति। स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाएं!

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  2. सरल शब्दों में गहरी बात को कहना कोई आप से सीखे! अतिसुन्दर लिखा है, सुज्ञ जी। अभिनन्दन ! :)

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 17/08/2014 को "एक लड़की की शिनाख्त" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1708 पर.

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  4. बेहद सशक्‍त व सार्थक प्रस्‍तुति

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  5. सुंदर-प्रेणनादायक---
    आज की जन-जन के रोगों की अचूक दवा--बशर्ते दवा का सही उपयोग हो और सही समय पर.

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