17 जून 2012

ब्लॉग-जगत और पात्र का आधारभूत तल्ला

एक राजकुमार बहुत ही चंचल और नट्खट था। दासियों से चुहलबाजी करना और कर्मचारियों से गाली गलोच और तुच्छकार भरा वाणीव्यवहार उसका प्रिय शगल था। राजा नें उसे युवराज बनाया तब भी उसकी चंचलता कम न हुई। राजा ने सोचा – कल को जब यह राजा बनेगा, निश्चित ही यह प्रजापालन निति-नियम से नहीं करेगा। सोचने लगा युवराज की इन बुरी आदतों से छुटकारा कैसे हो? उसने एक निर्णय किया और उसकी सेवा में रत एक दासी को आदेश दिया कि युवराज दिन भर में जो भी वचन बोले दुर्व्यवहार करे उसे लिखकर शाम को मेरे सामने प्रस्तुत किया जाय। अब राजकुमार जो भी बोलता, पूर्व में ही विचार करता कि मेरे वचन रिकार्ड किए जा रहे हैं, परिणाम स्वरूप वह वाणी-व्यवहार में अतिरिक्त सावधान हो गया। कुछ ही दिनों में उसकी वाणी और व्यवहार दोनों शालीन और कुलीन हो गए। 

आज ब्लॉग-जगत में लेख व टिप्पणियों के माध्यम से जो भी हम अभिव्यक्त हो रहे है। सब कुछ रिकार्ड पर जा रहा है जो हमारे एक व्यक्तित्व का निरन्तर निर्माण कर रहा है। जिसका प्रभाव हमारे जीवन पर पडना ही है। पर हम इस रिकार्ड से सजग नहीं है। हम समझते है यह मनमौज का मनोरंजन माध्यम है। दो घडी मौज ली, अपने मान-अभिमान को पोषा और खेल खत्म!! किन्तु इसके जीवन पर पडते असर से हम बेदरकार है। अपने व्यक्तित्व पर जरा से आरोप पर हमारा इगो चित्कार कर उठता है और प्रतिक्रियात्मक तंज के साथ साथ, अपना मान बचाने के लिए हम हर अच्छा बुरा उपाय कर गुजरते है। किन्तु हमारे ही कटु-शब्दों से, ओछी वाणी से स्वयं हमारा 'मान' ही घायल और क्षत-विक्षित हो जाता है, हम नहीं देखते कि व्यक्तित्व के मान को अखण्ड रखने के मिथ्या प्रयासों में, हमारा वही व्यक्तित्व विकृत प्रतिबिम्बित होता जा रहा है जिसका मद के कारण हमें रत्तिभर भी भान नहीं रहता। मान-मद में चूर हम जिस डिब्बे में 'सम्मान' इक्कट्ठा करने का भ्रमित प्रयास कर रहे है, यह भी नहीं देखते कि उस डिब्बे का तो तल्ला है ही नहीं है। सारा का सारा, स्वमान, सरे राह बिखर कर धूल में मिल रहा है। जिस पात्र के आधारभूत तल्ला नहीं होता, उस पात्र में सम्मान भला कैसे ठहरेगा? चरित्र के प्रति सजग वाणी-व्यवहार भरा व्यक्तित्व ही पात्र का आधारभूत तल्ला है।

34 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ..
    धन्यवाद

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  2. अच्छी कथा के माध्यम से सार्थक सदेश.......

    सादर

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  3. बहुत अच्छी बात याद दिलाई है। समाज और स्वयं के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति सजग रहना बुद्धिमानी, सौम्यता और बड़प्पन की प्रतीक है। हिन्दी ब्लॉग जगत में एक और प्रवृत्ति दिखती है, जल्दी आहत हो जाने की, किसी सामान्य सी बात को अपने ऊपर व्यंग्य या आक्षेप समझने की। इस प्रवृत्ति के कारण भी कई बार बिना बात के बात बढ जाती है। चुप रहने को कमज़ोरी समझकर सहनशीलों को उकसाया जाता है, ऐसे उदाहरण भी दिखते हैं। कुल मिलाकर, कम शब्दों में कही गई सुन्दर सलाह! धन्यवाद!

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    1. समझ -समझ का फेर है . दूसरों को हर समय आहत करते रहने वाले स्वयं पर किया गया निर्मल हास्य भी बर्दाश्त नहीं कर पाते ! सहमत हूँ आपसे !

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  4. उदाहरण के साथ आपकी नेक सलाह से सहमत से हूँ,,,,,,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  5. जैसा करेंगे, वैसा भरेंगे..सच कहा आपने, सब सुरक्षित है..

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  6. वाकई बहुत सही बात कही है .
    बहुत से लोग इस सच से अनजान हैं या जानबूझकर अनजान रहते हैं.

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  7. कटु वाणी से दूसरे का अपमान हुआ या नहीं , यह तो उस पर निर्भर होता है , मगर आपका अपना मान अवश्य घट जाता है , नासमझ को समझाया जा सकता है ,जानकर जो अनजान बने , उसे कौन समझा सकता है , इसलिए कई बार लोंग चुप रह जाते हैं .
    सार्थक पोस्ट !

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  8. ...कई बार हम लिख तो देते हैं आदर्श की बातें पर हमारे आचरण की कलई भी अगले पल खुल जाती है !

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  9. सिर्फ वाणी-व्यवहार नहीं, हमारे मनीषियों ने तो सोचने तक की शुचिता और शुद्धता पर जोर दिया है| 'मन में कुछ विचार लाते समय ये माना जाए कि ये विचार आकाश में लिखे दिखने हैं' शब्दशः ये तो नहीं लेकिन ऐसा ही एक सूत्र पढ़ा था कभी|
    इसके अतिरिक्त 'थोथा चना बाजे घना' और 'अधजल गगरी छलकत जाए' जैसे मुहावरे भी इसी विषय पर प्रकाश डालते हैं|

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  10. good post mr suyagya
    every one will interpret it with their own angle so the comments will make it more intresting
    i liked it and the comments also

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  11. .
    .
    .
    आदरणीय सुज्ञ जी,

    अब यहाँ पर दो मत हैं एक वह जो गुलाब, कमल या बृह्मकमल को ही फूल मानता है और चाहता है कि हर कोई उसी सा दिखे व गंध दे (ब्लॉगर के संदर्भ में वैसा ही सोचे-लिखे-दिखे)... और दूसरा मत है जो यह कहता है कि इस वन का हर फूल अपने आप में अनूठा है व इस वन को बनाता है...

    किसी ने कहा था... Let thousands different flowers bloom, Let thousands different and unique thoughts flourish.

    ब्लॉगिंग अपने 'खुद' को अभिव्यक्त करने का व दूसरों के विचारों को जानने का जरिया है, इससे अधिक और कुछ नहीं...



    ...

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    1. प्रवीण शाह साहब,

      प्रस्तुत आलेख सभी को एक समान एक नजर एक सोच से देखने समझने पर आधारित नहीं है। यह दूसरों में समान रूप से खूबियां अच्छाईयां देखने के लिए नहीं है।
      आपके दूसरे मत से पूर्णतया सहमत!!, वन का हर फूल अपने आप में अनूठा है। प्रत्येक मनुष्य अपने आप में सभी स्तर पर अनूठा है, उसके विचार, उसके दृष्टिकोण, रहन सहन, जीवन स्तर अनूठा है समानता खोजना या चाहना असंभावित है। विभिन्नताओं से ही समग्रता आकार लेती है।
      किन्तु विकास और उत्कर्ष आदिम चाहना है। प्रस्तुत आलेख स्वयं अपने स्तर पर उत्कृष्ट व्यक्तित्व को प्रेरित करने के उद्देश्य से है। जैसे सुधार पहले स्वयं से करो, समाज स्वतः सामुहिक रूप से बदलेगा। उसी तरह यह ब्लॉगर के व्यक्तित्व विकास का प्रेरणा सुझाव है।

      आपकी अन्तिम पंक्ति के अर्धांश से भी सहमत!!ब्लॉगिंग निश्चित ही स्वयं को अभिव्यक्त करने का व दूसरों के विचारों को जानने का जरिया है। किन्तु इस बात से सहमत नहीं कि "इससे अधिक और कुछ नहीं..." अभिव्यक्त करना प्रतिक्रिया जानने की इच्छा से होता है और फिर दूसरों के विचारों को क्यों जानना? क्या करेंगे जानकर? जानना स्वयं हमारे विचारों को परिष्कृत परिपक्व करने के उद्देश्य से होता है। और निसंदेह परिष्कृत विचार हमारे व्यवहार और व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनानें में आधारभूत भूमिका निभाते है। क्यों अधिक कुछ नहीं, विचार ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते है।

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  12. प्रवीण शाह जी की बात को आगे बढ़ती हूं , असल में हम बगीचे को सुन्दर (वो भी बस आपनी ही नजर में) बनाने के चक्कर में सभी फूलो को एक जैसा ही बनाने की सोच रहे है जो की कभी भी संभव नहीं है हर फुल को उसी के रंग रूप के साथ स्वीकारिये प्रकृति ने उसे वैसे ही बनाया है | यदि मनुष्य को बस एक मनुष्य की नजर से ही देखे तो गुस्सा , नाराजगी , एक दूसरे का पक्ष लेना बड़ी ही आम सी बात है ये मानव स्वभाव है इसे हम कभी भी बदल नहीं सकते है संसार में सभी संत नहीं हो सकते है | यदि आप ब्लॉग जगत को भी उसी का एक हिस्सा मानते है तो यहाँ आ कर मनुष्य कैसे बदल सकता है | यहाँ तो हम प्रत्यक्ष किसी को जानते नहीं है जब नीजि जीवन में हमारा व्यवहार सीधे हमें प्रभावित करता है लोगो के बीच हमारी एक छवि का निर्माण करता है जब हम उस जगह पर अपने आप को नहीं बदलते है तो इस दुनिया में हम कैसे अपने आप को बदल ले , ये संभव नहीं है |

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    1. अधिकांश बात मैं प्रवीण शाह साहब के प्रत्युत्तर में कह चुका, सभी को एक जैसा बनाना वाकई असंभव है अपकी इस बात से सहमत हूँ। और ऐसा सोचना भी अतिश्योक्ति। किन्तु "संसार में सभी संत नहीं हो सकते है" तो संसार में सभी असंत भी बने नहीं रह सकते। इतना ही नहीं सभी एक समान साधारण भी नहीं हो सकते है, कुछ असाधारण भी बन निकल आते है। सभ्यता और विकास एक तरह से प्राकृतिक नियम सा है। लोग उंचे उठकर उत्कृष्टता की ही अपेक्षा रखते है और उँचाईयाँ ही सर करना चाह्ते है। उसी में अपना स्वयं का व्यक्तित्व भी है जिसे वे सर्वप्रिय, अच्छा मिलनसार बनाने को प्रयासरत रहते ही है।
      अच्छी छवि का निर्माण की प्रक्रिया में लगे रहने को ही व्यक्तित्व विकास कहते है। और वह सम्भव है।

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    2. all flowers have equal importance, i agree.
      but

      is there no difference between flowers and thorns either?

      yes - both are natural, both are to be accepted. but - which ones do we want to grow in our garden decides what we should expect from life...

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  13. अक्षरश: सही कहा है ... बेहद सार्थक व सटीक प्रस्‍तुति ... आभार

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  14. चरित्र के प्रति सजग वाणी-व्यवहार भरा व्यक्तित्व ही पात्र का आधारभूत तल्ला है।…………सत्य वचन्…………सार्थक पोस्ट्।

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  15. हाँ, आज हम शायद समझ नहीं रहे किन्तु नेट पर हम जो भी कह लिख रहे हैं वह हमारे चरित्र का कच्चा चिट्ठा सदा के लिए संजो रहा है. बाद में हम चाहकर भी उसे बदल न पाएँगे. किन्तु प्रवीण शाह से सहमत.
    घुघूतीबासूती

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  16. अंतर्जाल हमारी अभिव्यक्ति को सन्धारित करता है । हमारी अभिव्यक्ति हमारे विचारों को सन्धारित करती है। हमारे विचार हमारे संस्कार को सन्धारित करते हैं। इसलिये अंतरजाल पर प्रकट हुई हमारी हर अभिव्यक्ति एक प्रामाणिक अभिलेख बन जाती है। और अंत में यह बात --

    ब्लॉग एक दिन सपने में आया
    बोला, क्यों कहते
    आभासी
    सब मुझको
    यह बात कभी मैं समझ न पाया।
    माना, मैं दर्पण हूँ न्यारा
    कभी हंसाता कभी रुलाता
    जो जैसा सचमुच है दिखता
    वैसा ही मैं उसे दिखाता।
    सम्बन्ध बनाता
    प्यार जगाता।
    कोई रूठ गया तो
    उसे मनाता।
    झगड़े करवाता
    आग लगाता।
    जो सचमुच दुनिया में होता
    वही काज तो मैं भी करता।
    फिर क्यों सौतेलापन
    मुझसे होता
    यह बात कभी मैं समझ न पाया।

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  17. कल 20/06/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    बहुत मुश्किल सा दौर है ये

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  18. बहुत सटीक और सार्थक चिंतन...

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  19. हम चाहे ब्लॉग पर हों, अपने निजी जीवन में अपने परिचितों और परिजनों के बीच -- हमारे व्यक्तित्व की एक छवि सबके मन में बन जाती है. हम मिथ्याभिमान में भले ही जीते रहे कि मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं लेकिन जो श्रेष्ठ होता है वह तो अपने को बहुत ही विनम्रता से आपके समक्ष खड़ा होता है कि हम कुछ भी नहीं. किस भ्रम में इंसान जीता रहता है. बहुत सटीक शब्दों में वह कह दिया जो कहना थोड़ा मुश्किल होता है.

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    उत्तर
    1. आपने सटीक और सही कहा… वास्तविक श्रेष्ठता तो विनम्रता में बसती है, प्रदर्शन की आवश्यकता भी नहीं। विनय विहिन को श्रेष्ठता का मात्र मिथ्याभिमान होता है।

      सुज्ञ ब्लॉग़ पर आपके शायद पहली बार पधारने का आभार रेखा जी!!

      हटाएं
  20. जिस पात्र के आधारभूत तल्ला नहीं होता, उस पात्र में सम्मान भला कैसे ठहरेगा? चरित्र के प्रति सजग वाणी-व्यवहार भरा व्यक्तित्व ही पात्र का आधारभूत तल्ला है।

    सही विचार. यह सब कुछ मिटने वाला नहीं है परन्तु कृत्रिमता भी स्वीकार्य नहीं है. एक स्वाभाविक महक भी जरुरी है बनावटीपन से जुदा.

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  21. बहुत ही श्रेष्‍ठ उदाहरण से अपनी बात आपने कही है। बहुत प्रेरणादायी और अनुकरणीय।

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  22. एक बढ़िया एवं आवश्यक लेख के लिए बधाई भाई जी ...
    सतत लेखन से एक व्यक्तित्व निर्माण हो रहा है बशर्ते वे लेखन में ईमानदार हों, जो लोग मात्र फायदे के लिए लिख रहे हैं धीरे धीरे उनका आवरण उतर जाता है और चमक खो बैठते हैं !
    लेखनी अपने आपको देर सबेर उजागर कर देती है ...
    जो अच्छे हैं वे हमेशा पसंद किये जायेंगे...
    सादर

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  23. सूचनाओं का कोई भी माध्यम हो, वह बोध और मानव विकास की अवधारणा से परे नहीं है। जीवन-मूल्यों में सुधार के लक्ष्य से निरपेक्ष नहीं है। विविध स्वभाव और गुण-दोष की विद्यमानता होते हुए भी यथास्थितिवाद स्वीकार कर लिया जाना मूर्खता है, सुखदायक प्रगति में उत्कृष्टता का सफर जारी रहना ही ज़ीवट है। जीवनमूल्यों को उँचा उठाया जाना सभ्यता और विकास की शर्तिया मांग है।
    यह परकेन्द्रित दृष्टि (अपनी नजर से दूसरों को देखने) की बात नहीं है, किन्तु लेख में उत्कृष्टता का निर्देश स्वकेन्द्रित दृष्टि है। साफ है आप अपना स्वयं का व्यक्तित्व किस तरह का देखना चाहते है, उत्कृष्ट उधर्वगामी, यथास्थिति, अथवा पतनोमुखी?

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  24. जिस पात्र के आधारभूत तल्ला नहीं होता, उस पात्र में सम्मान भला कैसे ठहरेगा? चरित्र के प्रति सजग वाणी-व्यवहार भरा व्यक्तित्व ही पात्र का आधारभूत तल्ला है।


    आपकी बातें गहन और अनमोल हैं.
    अमल में आ जाएँ तो बेडा पार हो जाए.

    आपके ब्लॉग पर देरी से आ पाया हूँ, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ.
    पिछले २-३ महीनों में ब्लॉग भ्रमण बहुत कम रहा.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा.
    आपका हर शब्द प्रेरणादायक होता है.

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  25. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति। मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद।

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