25 अप्रैल 2011

ईश्वर रिश्वत लेते है?


(ईश्वर एक खोज- भाग-1)

ईश्वर रिश्वत लेते है

अबोध शाह आते ही कहने लगे- “ईश्वर रिश्वत लेते है”  मुझे आश्चर्य हुआ, ईश्वर और रिश्वत? अबोध शाह ने विस्तार से बताया- अपने कस्बे के मध्य जो ईश्वरीय कार्यालय है, वहां मैं अपने आवश्यक कार्य के लिये गया था। वहाँ के ऑफिसर ने बताया इस काम के लिये माल तो देना ही पडेगा ‘हमारे उपरी ईश्वर को बडा हिस्सा पहुँचाना होता है’। मुझे विश्वास नहीं हुआ और उन्हें साथ लेकर हम पहुँच गये कार्यालय।

मैने वहां कार्यरत ऑफिसर से पूछ-ताछ प्रारंभ की,- ‘साहब’ आज तक किसी ने ईश्वर को देखा नहीं, फिर आपने उसके एवज में रिश्वत कैसे ग्रहण की? ऑफिसर नें उलटा प्रश्न दागा- क्या ईश्वर ने आपसे शिकायत की् है? कि उन्हें हिस्सा नहीं पहुँचा? मेरे पास जवाब नहीं था, मैं बगलें झाकते हुए इधर उधर देखने लगा, कार्यालय में चारों और सूचना पटल लगे थे। इन पर ईश्वर के कायदे कानून नियम संक्षिप्त में लिखे थे। उपर ही पंच-लाईन की तरह बडे अक्षरों में लिखा था-“ईश्वर परम दयालु कृपालु है”

मैने जरा दृढ बनते हुए पुनः प्रश्न किया, जब वह परम दयालु है, हमें खुश रखना उसका कर्तव्य है। तो अपना फर्ज़ निभाने की रिश्वत कैसे ले सकता है? ‘देखिये’, ऑफिसर बोला- आप जरा समझदार है सो आपको विस्तार से बताता हूँ पुछो जरा अपने इस मित्र से कि वह काम क्या करवाने आया था? नियम विरुद्ध काम ईश्वर के कर्तव्य नहीं होते। जब काम नियम विरुद्ध करवाने होते है तो रिश्वत तो लगेगी ही। ईश्वर लेता है या नहीं यह बाद की बात, किन्तु नियम विरुद्ध जाकर हमें आप लोगों के दिल को तसल्ली देनी श्रम साध्य कार्य है। इस रिश्वत को आप तो बस तसल्ली का सर्विस चार्ज ही समझो।
यह लो बुक-लेट इस में ईश्वर के सभी नियम कायदे कानून विस्तार से लिखे हुए है। सभी अटल है, साफ़ साफ़ लिखा है।अर्थात् बदले नहीं जा सकते, स्वयं ईश्वर भी नहीं बदल सकते। आपके डेढ़ सयाने मित्र अबोध शाह ने पता है क्या अर्जी लगाई थी? ‘अपने स्वजनों की सलामती के लिये’ जबकि नियम अटल है, मृत्यु शास्वत सत्य है, आज तक जो संसार में आया उसे मरना ही है, युगों युगों के इतिहास में एक भी अमर व्यक्ति बता दो तो हम मान लेंगे ईश्वर के नियम परिवर्तनशील है। फिर भला इसके स्वजन सदैव सलामत कैसे रह सकते है? या तो आप लोग यह नियमावली भली भांति समझ लो और नियमानुसार चलो, कोई रिश्वत की जरूरत नहीं, यह चेतावनी भी इस बुकलेट में स्पष्ठ लिखी हुई है। ईश्वर के आकार-प्रकार पर सर खपाने की जगह उसके बनाए नियमों का ईमानदारी से पालन करो, यही उसका प्रधान निर्देश है।

मैं जान गया, ऑफ़िसर एक स्पष्ठ वक्ता है। उसे यह ट्रेनिंग मिली है कि सभी को उनके पेट की क्षमता के आधार पर ही भोजन दिया जाय। मुझे अच्छा फंडा लगा।
मेरी जिज्ञासा बलवती हो गई कि मुझे इस बुकलेट का अध्यन करना चाहिए, जैसे जैसे समझुंगा आपसे शेयर करूँगा…

21 टिप्‍पणियां:

  1. गरमा-गरम चटखारेदार खबरें, सत्‍यकथाएं रोज छप रही हैं, इतनी कि वही सब पढ़ना ओवर डोज हो रहा है, फिर यह सौम्‍य सी वार्ता (आप और भी शेयर करने वाले हैं), और क्‍या कहूं.

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  2. रिश्वत खाने वाले ईश्वर को भी नहीं छोड़ते !

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  3. रिश्वत का इतिहास क्या है,इस पर रिसर्च हो तो अच्छा है.

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  4. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  5. दोनों लालची हैं नियम विरुद्ध काम कराने वाला चाहता है मेरा काम बन जाए और अफसर चाहता है कि मेरा काम बन जाए !
    शुभकामनायें !

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  6. सीधी सच्ची बात। लोभ पाप का मूल है।

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  7. बहुत ही उम्दा अंदाज़ में सार्थक सन्देश दिया है आपने इस कथा के माध्यम से।

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  8. लेने वाला अधिक दोषी है.. देने वाले को तो सरकार तनख्वाह नहीं देती, लेकिन लेने वाले को देती है...

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  9. :)
    @bhartiya nagrik.....pta nhi...shayad dosh thopna hi galat hai.

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  10. किसी भी प्रयोजन से काम बन जाये बस .....

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  11. ऱिश्वत खाने वाले अपने बच्चों को भी नही बकसते।अति सुंदर।

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  12. रिश्वत की महिमा अपरंपार है।

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  13. यह दृष्टांत ईश्वर के उन भक्तों को उद्देश कर लिखा गया है जो पूजा-पाठ-प्रसाद को रिश्वत की तरह अपनों की सलामती के लिये उपयोग करते है। जबकि अटल नियम के सामनें यह अर्पण कोई काम नहीं करता। और पूजा-पाठ को अपनी अपेक्षा पर खरा न उतरते देख निर्लिप्त ईश्वर से ही किनारा कर बैठते है।

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  14. आप सही कह रहे हैं ये पूजा पाठ रिश्‍वत का ही एक प्रकार है।

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  15. अपकी बात सही है। कलयुग मे भगवान के नाम पर रिश्वत दान ही तो है\ शुभकामनायें। नही तो सब बाबे करोडों के मालिक न होते। \

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  16. लोगो को येन-केन -प्रकारेण...काम पूरा होने से मतलब होता है..
    बहुत ही सशक्त रूप से सार्थक संदेश दिया है..

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