16 जनवरी 2015

अकिंचन


सड़क के किनारे, मिट्टी के बर्तन व कलाकृतियाँ सजा कर, कुम्हार खाट पर पसरा हुआ था।
एक विदेशी उन कलाकृतियों का तन्मयता से अवलोकन कर रहा था। उसने मोल पूछा और कुम्हार ने लेटे लेटे ही मूल्य बता दिया।
विदेशी उसकी लापरवाही से बड़ा क्षुब्ध हुआ। उसे आश्चर्य हो रहा था। उसने कुम्हार को टोकते हुए कहा, “तुम काम में तत्परता दर्शाने के बजाय आराम फरमा रहे हो?”
कुम्हार ने कहा, "जिसको लेना होगा वह तो खरीद ही लेगा, आतुरता से आखिर क्या होगा?"
“इस तरह आराम से पडे रहने से बेहतर है तुम ग्राहकों को पटाओ, उन्हें अपनी यह सुन्दर वस्तुएं बेचो। तुम्हे शायद मालूम ही नहीं तुम्हारी यह कलाकृतियां विशेष और अभिन्न है। अधिक बेचोगे तो अधिक धन कमाओगे।“, विदेशी ने कहा।
कुम्हार ने पूछा, "और अधिक धन कमाने से क्या होगा?"
विदेशी ने समझाते हुए कहा, “तुम अधिक धन कमाकर, इन वस्तुओं का उत्पादन बढा सकते हो, बडा सा शोरूम खोल सकते हो, अपने अधीन कर्मचारी, कारीगर रख कर और धन कमा सकते हो।“
कुम्हार नें पूछा, “फिर क्या होगा?”
"तुम अपने व्यवसाय को ओर बढा सकते हो, देश विदेश में फैला सकते हो, एक बड़ा बिजनस एम्पायर खड़ा कर सकते हो", विदेशी ने कहा।
“उससे क्या होगा”, कुम्हार ने फिर पूछा।
विदेशी ने जवाब दिया, “तुम्हारी बहुत बडी आय होगी, तुम्हारे पास आलिशान सा घर, आरामदायक गाडियां और बहुत सारी सम्पत्ति होगी।“
कुम्हार ने फिर पूछा, “उसके बाद?”
"उसके बाद क्या, उसके बाद तुम आराम से जीवनयापन करोगे, आराम ही आराम, और क्या?"

कुम्हार ने छूटते ही पूछा, "तो अभी क्या कर रहा हूँ? जब इतना उहापोह, सब आराम के लिए ही करना है तब तो मै पहले से ही आराम कर रहा हूँ।"

क्या पाना है, यदि लक्ष्य निर्धारित है, अन्तः सुख प्राप्त करना ही ध्येय है, तो भ्रमित करने वाले छोटे छोटे सुख साधन मृगतृष्णा है। वे साधन मार्गभ्रष्ट कर अनावश्यक लक्ष्य को दूर करने वाले और मार्ग की दूरी बढाने वाले होते है। यदि सुख सहज मार्ग से उपलब्ध हो तो सुविधाभोग, भटकन के अतिरिक्त कुछ नहीं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. यदि सुख सहज मार्ग से उपलब्ध हो तो सुविधाभोग, भटकन के अतिरिक्त कुछ नहीं।
    - अंतिम वाक्य ने पूरी कथा पर फिर से मनन करने को बाध्य किया।

    सुज्ञ जी, आप-सा मार्गदर्शक मिलना ईश्वर की अपार कृपा है।

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    1. यह आपका स्नेह है, प्रतुल जी!!

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  2. जब आयो संतोष धन बाबा, सब धन धूरि समान! संतोषम परमम् सुखम्!!
    और गहराई से देखें तो याद आता है सिकन्दर महान का अपने साथ भारतवर्ष से एक सन्यासी को बलात अपने साथ ले जाने का! बहुत दिनों बाद आप प्रकट हुये, अच्छा लगा! फेसबुक पर ही सारा ध्यान और ज्ञान लुटाने के साथ साथ ब्लॉग पर भी आते रहें! इसे हमारा अनुरोध मानें!

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    1. आभार, सलिल जी, आपका आदेश सर आँखों पर !

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