29 मई 2013

नाथ अभिमान

एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता। उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था। चूंकि कमाने वाला वह अकेला ही था इसलिए उसे लगता था कि उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता। वह लोगों के सामने डींग हांका करता था।

एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा। संत कह रहे थे, "दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता। यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा। सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।" सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा, "मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।" संत बोले, "यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है।" इस पर मुखिया ने कहा, "आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए।" संत ने कहा, "ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से एक महीने के लिए गायब हो जाओ।" उसने ऐसा ही किया। संत ने यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है।

मुखिया के परिवार वाले कई दिनों तक शोक संतप्त रहे। गांव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए। एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहां नौकरी दे दी। गांव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी। एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया।

एक महीने बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया। घर वालों ने भूत समझकर दरवाजा नहीं खोला। जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया, 'हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं।' उस व्यक्ति का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया।

संसार किसी के लिए भी नही रुकता!! यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा।   जगत को चलाने की हाम भरने वाले बडे बडे सम्राट, मिट्टी हो गए, जगत उनके बिना भी चला है। इसलिए अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है।

19 टिप्‍पणियां:

  1. अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है।बहुत उम्दा,लाजबाब प्रस्तुति,,

    Recent post: ओ प्यारी लली,

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  2. कोई भी इस जगत में अपरिहार्य नहीं है .किसी के बिना कोई काम रुकता नहीं है -आपने सही कहा
    अनुभूति : विविधा -2

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  3. स्वीकारोक्ति के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रह जाता। जबरन कुछ विपरीत कहूँ भी तो कुतर्की कहलाऊँ। सत्संग का वास्तविक सुख कहीं है तो आपके विचारों में डूबकर ही है।

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  4. राम गयो रावण गयो जाको बहु परिवार, कह नानक थिर किछ नहीं सुपने ज्यो संसार।

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  5. जीवन चलता रहता है
    तेरे साथ भी
    तेरे बाद भी
    सादर

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  6. हकीकत तो यही है कि कोई किसी का मोहताज नहीं होता. व्यक्ति सोचता है पर अंजाम आपकी कहानी वाला ही होना तय है. वक्त अपने हिसाब से सबको ढाल लेता है. बहुत सुंदर कहानी.

    रामराम.

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  7. सत्यवचन, स्टेशन(दुनिया) कायम रहने चाहिए, रैलगाडियां(लोग) तों आती-जाति रहती हैं.

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  8. कहाँ ठहरता है कुछ भी किसी के बिना ...
    सादर

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  9. सच बात है, पालन करने वाला तो कोई और है।

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  10. बहुत अच्छी लगी कहानी. अपनी लघुता का बोध सबको कहाँ पाता है.

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  11. सुंदर अर्थपूर्ण कहानी, कई बार अहंकार नहीं यह चिंता का रूप भी ले लेता है ऐसे चिंतित लोगों को भी यह कहानी जरूर पढ़नी चाहिए।

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    1. बहुत बहुत आभार, श्रीमान्, आपने कहानी का अभिन्न फलितार्थ उजागर किया. व्यर्थ चिंता से चिंता-मुक्ति का बोध भी ग्रहण किया जा सकता है. प्रबुद्ध पाठकोँ का यही तो लाभ है.

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  12. बहुत ही सुन्दर कहानी .. आपकी इस रचना के लिंक का प्रसारण सोमवार (03.06.2013)को ब्लॉग प्रसारण पर किया जायेगा. कृपया पधारें .

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  13. अहंकार से दूर रहना सिखाती बहुत अच्छी कहानी आदरणीय सुज्ञ सर। बहुत-बहुत बधाई।

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